द ‘व्हाइट मुग़ल’ सर डेविड ऑक्टरलोनी: 13 पत्नियां, नसीराबाद की स्थापना और नेपाल फतह की पूरी कहानी

डेविड ऑक्टरलोनी का यह आलेख आप अधूरा नहीं छोड़ सकते हैं क्योंकि भारतीय इतिहास में ब्रिटिश काल (British Era) के कई ऐसे अधिकारी रहे हैं जिन्होंने अपनी क्रूरता के लिए सुर्खियां बटोरीं, लेकिन इसी इतिहास में एक ऐसा ‘गोरा साहब’ भी था जो भारत की मिट्टी और यहाँ की तहज़ीब के प्यार में इस कदर डूबा कि लोग उसे ‘लोन अख्तर’ (Lony Akhtar) कहने लगे। हम बात कर रहे हैं सर डेविड ऑक्टरलोनी (Sir David Ochterlony) की। ईस्ट इंडिया कंपनी के इस जांबाज जनरल ने न केवल राजस्थान में नसीराबाद छावनी (Nasirabad Cantonment) की नींव रखी, बल्कि उनकी लाइफस्टाइल किसी मुग़ल शहंशाह से कम नहीं थी।

डेविड ऑक्टरलोनी की दिल्ली में हाथियों की सैर और 13 बीवियों का इतिहास (13 Wives History Sir David Ochterlony)

इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल की किताब ‘व्हाइट मुगल्स’ (White Mughals) में ऑक्टरलोनी के भारतीयकरण का अद्भुत वर्णन मिलता है। वे ब्रिटिश वर्दी से ज्यादा भारतीय मखमल के कुर्ते, चूड़ीदार पाजामा और कश्मीरी शॉल पहनना पसंद करते थे।

उनके महल में कुल 13 भारतीय महिलाएं थीं, जिन्हें वे अपनी पत्नियां मानते थे। दिल्ली की जनता के लिए शाम का सबसे बड़ा आकर्षण ऑक्टरलोनी की सवारी होती थी। वे रोज़ शाम को अपनी सभी 13 पत्नियों के साथ अलग-अलग 13 हाथियों पर सवार होकर लाल किले (Red Fort) के आस-पास घूमने निकलते थे।

‘डेविड ऑक्टरलोनी की जनराली बेगम’ मुबारक-उल-निस्सा का दबदबा (Bibi Mubarak-ul-Nissa Begum)

इन सभी 13 पत्नियों में से ऑक्टरलोनी की सबसे प्रिय और मुख्य पत्नी बीबी मुबारक-उल-निस्सा बेगम थीं। वे मूल रूप से पुणे की रहने वाली एक ब्राह्मण महिला थीं, जो बाद में इस्लाम में परिवर्तित हो गईं। ऑक्टरलोनी सेना में ‘जनरल’ (General) के पद पर थे, इसलिए दिल्ली के लोग मुबारक-उल-निस्सा को आदर और खौफ से ‘जनराली बेगम’ (General’s Begum) कहते थे। ऑक्टरलोनी ने अपनी इसी बेगम के लिए पुरानी दिल्ली में एक आलीशान बाग बनवाया था, जिसे आज भी ‘मुबारक बाग’ (Mubarak Bagh Delhi) या मुबारकपुर कहा जाता है।

डेविड ऑक्टरलोनी ने की नसीराबाद छावनी की स्थापना और ‘नासिर-उद-दौला’ की उपाधि (Nasir-ud-Daula Title)

दिल्ली की रक्षा करने और मुग़ल दरबार के प्रति सम्मान के कारण मुग़ल बादशाह द्वारा डेविड ऑक्टरलोनी को ‘नासिर-उद-दौला’ (Nasir-ud-Daula) यानी “राज्य का रक्षक” की शाही उपाधि दी गई थी।

साल 1818 में जब अंग्रेजों को राजपूताना के केंद्र में एक मजबूत सैनिक ठिकाने की जरूरत हुई, तो ऑक्टरलोनी ने अजमेर के पास एक रणनीतिक मैदान चुना। नवंबर 1818 में उन्होंने यहाँ एक छावनी बसाई और अपनी इसी उपाधि ‘नासिर’ के नाम पर इसका नाम ‘नसीराबाद’ रखा। यही नसीराबाद छावनी आगे चलकर 1857 की क्रांति (1857 Revolt) में राजस्थान का सबसे पहला और मुख्य केंद्र बनी।

डेविड ऑक्टरलोनी की प्रशासनिक उपलब्धियां: राजपूताना और दिल्ली के पहले रेजिडेंट (First British Resident)

डेविड ऑक्टरलोनी दिल्ली के पहले रेजिडेंट (First British Resident of Delhi): साल 1803 में जब अंग्रेजों ने दिल्ली पर नियंत्रण किया, तो ऑक्टरलोनी को वहाँ का पहला ब्रिटिश रेजिडेंट बनाया गया। 1804 में उन्होंने मुट्ठी भर सैनिकों के साथ यशवंतराव होल्कर की विशाल मराठा सेना से दिल्ली की रक्षा की थी।

डेविड ऑक्टरलोनी राजपूताना के पहले रेजिडेंट (First Resident of Rajputana): 1818 में राजपूताना की रियासतों के साथ संधियां करने और उन पर प्रशासनिक नियंत्रण रखने के लिए ऑक्टरलोनी को ही ‘रेजिडेंट इन राजपूताना’ नियुक्त किया गया था।

डेविड ऑक्टरलोनी :नेपाल का विजेता और कोलकाता का ‘शहीद मीनार’ (Anglo-Nepalese War & Shaheed Minar)

1814-1816 के आंग्ल-नेपाल युद्ध (Anglo-Nepalese War) में जब सभी ब्रिटिश कमांडर गोरखा सेना के सामने घुटने टेक रहे थे, तब ऑक्टरलोनी ने अदम्य साहस दिखाते हुए काठमांडू तक चढ़ाई कर दी। उन्होंने ही नेपाल सरकार को प्रसिद्ध ‘सुगौली की संधि’ (Treaty of Sugauli) करने पर मजबूर किया।

उनकी इसी नेपाल जीत और सैन्य गौरव की याद में 1828 में कोलकाता में एक विशाल मीनार बनाई गई, जिसे ‘ऑक्टरलोनी मॉन्यूमेंट’ (Ochterlony Monument Kolkata) कहा जाता था। आजादी के बाद, 1969 में भारत सरकार ने इसका नाम बदलकर ‘शहीद मीनार’ (Shaheed Minar) कर दिया, जो आज भी कोलकाता का एक प्रमुख लैंडमार्क है।

डेविड ऑक्टरलोनी का अंतिम समय और कब्र (David Ochterlony Tomb in Meerut)

गवर्नर-जनरल से हुए कुछ राजनीतिक मतभेदों और अपमान के कारण ऑक्टरलोनी का अंतिम समय बड़े तनाव में बीता। 15 जुलाई 1825 को मेरठ में उनकी मृत्यु हो गई। मेरठ के ऐतिहासिक सेंट जॉन चर्च (St. John’s Church) के कब्रिस्तान में आज भी उनका मकबरा (David Ochterlony Tomb) मौजूद है, जो इतिहास के उस दौर की गवाही देता है।

डेविड ऑक्टरलोनी :भारतीय पोशाक और हुक्का पीते हुए पेंटिंग्स

डेविड ऑक्टरलोनी को ब्रिटिश इतिहास में “व्हाइट मुग़ल” यानी ‘गोरा मुग़ल’ कहा जाता है। वे उन ब्रिटिशर्स में से थे जो भारत को लूटने नहीं, बल्कि इसके रंग में पूरी तरह रंगने आए थे।

वेशभूषा और हुक्का: ऑक्टरलोनी को अपनी ब्रिटिश वर्दी से ज्यादा भारतीय मखमल के कुर्ते, चुड़ीदार पाजामा, और कश्मीरी शॉल ओढ़ना पसंद था। वे नियमित रूप से फारसी (Persian) भाषा बोलते थे, कव्वाली और गजलें सुनते थे, और भारतीय शैली के अनुसार जमीन पर बैठकर हुक्का पीते थे।

मूल ऐतिहासिक पेंटिंग: इतिहास में भी ‘गुलाम अली खान’ नामक एक प्रसिद्ध कलाकार द्वारा बनाई गई एक वास्तविक मुग़ल शैली की पेंटिंग (Delphi Durbar Painting) मौजूद है, जिसमें ऑक्टरलोनी को अपने घर में भारतीय संगीत का आनंद लेते और हुक्का पीते हुए दिखाया गया है।

“Mubarak Bagh Delhi” (मुबारक बाग, पुरानी दिल्ली)

यह बाग सर डेविड ऑक्टरलोनी और उनकी सबसे प्रिय बेगम मुबारक-उल-निस्सा (जनराली बेगम) के अमर प्रेम का प्रतीक है। ऑक्टरलोनी ने अपनी इस बेगम के लिए पुरानी दिल्ली के उत्तरी इलाके (उत्तरी दिल्ली) में एक विशाल और बेहद खूबसूरत बाग और महल का निर्माण करवाया था।

बाग की खासियत: इसे ‘मुबारक बाग’ (Mubarak Bagh) नाम दिया गया था। इस बाग के भीतर एक शानदार मुग़ल शैली का बंगला था, जहाँ ऑक्टरलोनी और जनराली बेगम अपनी गर्मियों की शामें बिताते थे। यहाँ फव्वारे, खूबसूरत पेड़-पौधे और पानी की नहरें बनाई गई थीं, जो मुग़ल उद्यानों (जैसे शालिमार बाग) से प्रेरित थीं।

वर्तमान स्थिति: समय के साथ और दिल्ली के शहरीकरण के कारण वह पुराना भव्य बाग तो लुप्त हो गया, लेकिन आज भी उत्तरी दिल्ली में उस ऐतिहासिक बाग के नाम पर “मुबारकपुर” (Mubarakpur) या “मुबारक बाग” नाम का एक पूरा इलाका (लोकेलिटी) मौजूद है।

“ऑक्टरलोनी मॉन्यूमेंट कोलकाता (Ochterlony Monument) अर्थात् शहीद मीनार

जब ऑक्टरलोनी की मृत्यु हुई, तो उनके सम्मान में कोलकाता (तब कलकत्ता) में 1828 में एक बहुत बड़ा 48 मीटर ऊंचा स्मारक बनाया गया था, जिसे “ऑक्टरलोनी मॉन्यूमेंट” (Ochterlony Monument) कहा जाता था। आजादी के बाद, 1969 में इसका नाम बदलकर “शहीद मीनार” कर दिया गया, जो आज भी कोलकाता का एक प्रमुख लैंडमार्क है।’शहीद मीनार’ नाम कैसे पड़ा: आजादी के बाद, भारत की लोकतांत्रिक सरकार ने इस औपनिवेशिक (Colonial) प्रतीक को एक नया रूप देने का फैसला किया। 9 अगस्त 1969 को इस स्मारक का नाम बदलकर “शहीद मीनार” (Shaheed Minar) कर दिया गया और इसे भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर शहीदों की याद में समर्पित कर दिया गया।

सर डेविड ऑक्टरलोनी को ‘व्हाइट मुग़ल’ क्यों कहा जाता है?

व्हाइट मुग़ल’ (White Mughal) शब्द का प्रयोग उन ब्रिटिश अधिकारियों के लिए किया जाता था जो भारत आने के बाद यहाँ की संस्कृति, भाषा और जीवनशैली से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने पूरी तरह से भारतीय या मुग़ल तौर-तरीकों को अपना लिया। डेविड ऑक्टरलोनी इसके सबसे बड़े उदाहरण थे। वे न केवल उर्दू और फारसी बोलते थे, बल्कि उन्होंने भारतीय वेशभूषा अपनाई, हुक्का पीते थे और मुग़ल नवाबों की तरह दिल्ली में दरबार भी लगाते थे। इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल ने उनकी इसी जीवनशैली के कारण उन्हें यह नाम दिया।

कोलकाता के ‘शहीद मीनार’ (Shaheed Minar Kolkata) की वास्तुकला की क्या खासियत है?

ऑक्टरलोनी की याद में बने इस स्मारक (पूर्व नाम: ऑक्टरलोनी मॉन्यूमेंट) की वास्तुकला दुनिया में बेजोड़ है। यह दुनिया की उन चुनिंदा इमारतों में से है जिसमें तीन अलग-अलग संस्कृतियों का मिश्रण दिखता है। इसका निचला आधार (Base) मिस्र (Egyptian) की कला से प्रेरित है, इसका मुख्य खंभा (Column) सीरियाई (Syrian) वास्तुकला पर आधारित है, और इसके शीर्ष पर बना खूबसूरत गुंबद तुर्की (Turkish) शैली का है। इसकी इसी भव्यता के कारण प्रसिद्ध लेखक मार्क ट्वेन ने इसे ‘बादलों को चूमने वाली मीनार’ कहा था।

सर डेविड ऑक्टरलोनी ईस्ट इंडिया कंपनी के कुशल जनरल और दिल्ली व राजपूताना के पहले ब्रिटिश रेजिडेंट थे. उन्होंने 1818 में राजस्थान में नसीराबाद छावनी की स्थापना की. भारतीय संस्कृति और मुग़ल जीवनशैली से बेहद प्रभावित होने के कारण उन्हें ‘व्हाइट मुग़ल’ भी कहा जाता था.

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