जयपुर का मीर जाफ़र: हरगोविंद नाटाणी और वो ऐतिहासिक गद्दारी जिसने राजा को आत्महत्या पर मजबूर किया

हरगोविंद नाटाणी कौन था? जानिए जयपुर के राजा सवाई ईश्वरी सिंह के साथ हुई उस ऐतिहासिक गद्दारी और धोखे की पूरी कहानी, जिसने जयपुर रियासत को हिलाकर रख दिया था।

हरगोविंद नाटाणी पृष्ठभूमि: जयपुर की गद्दी के लिए गृहयुद्ध (Background: Civil War for Jaipur’s Throne)

साल 1743 में आमेर और जयपुर के महान शासक सवाई जयसिंह द्वितीय की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद उनके बड़े पुत्र ईश्वरी सिंह (Ishwari Singh) जयपुर के नए महाराजा बने। लेकिन उनके सौतेले भाई (Stepbrother) माधोसिंह प्रथम (Madhosingh I) ने इस फैसले को चुनौती दी।

माधोसिंह का दावा मेवाड़ और मारवाड़ रियासतों के समर्थन पर टिका था। इस प्रकार जयपुर की गद्दी के लिए एक भयानक गृहयुद्ध (Civil War) छिड़ गया। इस संकट के समय हरगोविंद नाटाणी, महाराजा ईश्वरी सिंह के सबसे वफादार और चालाक सैन्य कमांडर (Military Commander) के रूप में उभरा।

हरगोविंद नाटाणी की शुरुआती वफादारी और ‘नाटाणियों का बाग’ (Early Loyalty and Rewards)

शुरुआती दौर में हरगोविंद नाटाणी ने महाराजा ईश्वरी सिंह के लिए कई महत्वपूर्ण युद्ध लड़े। राजमहल के युद्ध (Battle of Rajmahal) और बगरू के युद्ध (Battle Bagru) के दौरान नाटाणी ने जयपुर की सेना का नेतृत्व किया। हालांकि बगरू के युद्ध में जयपुर को भारी नुकसान हुआ, लेकिन नाटाणी की रणनीतियों से प्रभावित होकर महाराजा ईश्वरी सिंह ने उसे जयपुर का दीवान (Prime Minister) नियुक्त कर दिया।

महाराजा ने नाटाणी को पुरस्कार के रूप में एक विशाल और खूबसूरत बाग तोहफे में दिया, जिसे ‘नाटाणियों का बाग’ (Nataniyon Ka Bagh) कहा गया। इतिहास का यह वही स्थान है जहाँ आज जयपुर का प्रसिद्ध पांच सितारा हेरिटेज होटल ‘जयमहल पैलेस’ (Jai Mahal Palace) स्थित है।

ईर्ष्या और पहला बड़ा षड्यंत्र हरगोविंद नाटाणी द्वारा

सत्ता और अधिकार हाथ में आते ही हरगोविंद नाटाणी के भीतर का लालच और ईर्ष्या (Jealousy and Greed) जाग उठी। जयपुर दरबार में एक और बेहद बुद्धिमान और वफादार मंत्री थे, जिनका नाम केशवदास खत्री (Keshavdas Khatri) था। केशवदास के मराठा सरदारों, विशेषकर होल्कर और सिंधिया के साथ बहुत अच्छे कूटनीतिक संबंध (Diplomatic Relations) थे। वे बिना युद्ध किए बातचीत से मराठों के संकट को टालने की क्षमता रखते थे।

हरगोविंद नाटाणी को डर था कि अगर केशवदास ने मराठों के साथ समझौता करा दिया, तो दरबार में उनका कद बढ़ जाएगा। इसलिए नाटाणी ने महाराजा ईश्वरी सिंह के कान भरने शुरू किए। उसने झूठे सबूत (Fake Evidence) गढ़कर राजा को विश्वास दिलाया कि केशवदास अंदरूनी तौर पर दुश्मनों से मिले हुए हैं। अपने सेनापति की बातों में आकर भ्रमित राजा ने केशवदास खत्री को ज़हर देकर मारने का आदेश दे दिया। यह जयपुर की बर्बादी की पहली बड़ी कूटनीतिक भूल (Diplomatic Mistake) थी।

मराठों का आक्रमण और हरगोविंद नाटाणी का ऐतिहासिक धोखा (Maratha Invasion and the Ultimate Betrayal)

केशवदास खत्री की मृत्यु के बाद, मराठा शासक मल्हार राव होल्कर (Malhar Rao Holkar) अत्यधिक क्रोधित हो गए, क्योंकि केशवदास उनके मित्र थे। दूसरी ओर, माधोसिंह ने मराठों को जयपुर पर आक्रमण करने के लिए भारी धन का लालच दिया। साल 1750 में मराठों की एक विशाल सेना (Massive Maratha Army) ने जयपुर की तरफ कूच कर दिया और निवाई (टोंक के पास) तक आ पहुँची।

इस भयानक संकट को देखकर महाराजा ईश्वरी सिंह बेहद चिंतित हो गए। उन्होंने अपने मुख्य सेनापति हरगोविंद नाटाणी को बुलाया और युद्ध की तैयारियों (War Preparations) के बारे में पूछा। तब नाटाणी ने अति-आत्मविश्वास का नाटक (Drama of Overconfidence) करते हुए ढोंग रचा और राजस्थानी भाषा में कहा:

अन्नदाता, आप बिल्कुल फिक्र न करें, एक लाख कच्छवाहा सैनिक मेरी जेब में हैं।” (One lakh Kachwaha soldiers are in my pocket).

लेकिन जब मराठा सेना जयपुर के परकोटे (Walled City) और मोती डूंगरी तक आ पहुँची, तो नाटाणी का असली रंग सामने आया। जब अंतिम युद्ध की रणनीति (Final War Strategy) बनाने के लिए महाराजा ने उसे बुलाया, तो नाटाणी ने लड़ने से साफ मना कर दिया और अपनी गद्दारी दिखाते हुए ऐतिहासिक वाक्य कहा:

अब क्या करूं अन्नदाता, मेरी तो जेब ही फट गई।” (What can I do now My Lord, my pocket itself has torn).

एक राजा का दुखद अंत: ईश्वरी सिंह की आत्महत्या (The Tragic End: Suicide of Ishwari Singh)

अपने सबसे भरोसेमंद सेनापति के इस अप्रत्याशित धोखे (Unexpected Betrayal) और चारों तरफ से घिर चुकी मराठा सेना के खौफ ने महाराजा ईश्वरी सिंह को तोड़ कर रख दिया। राजकोष (Royal Treasury) खाली था और लड़ने के लिए सेनापति ने हाथ खड़े कर दिए थे।

इस घोर अपमान और पराजय से बचने के लिए, मात्र 30 वर्ष की आयु में, 12 दिसंबर 1750 की मध्यरात्रि को महाराजा ईश्वरी सिंह ने अपनी तीन रानियों और एक वफादार पासवान के साथ ज़हर पी लिया और जहरीले कोबरा सांप (Venomous Cobra Snake) से खुद को कटवाकर आत्महत्या (Suicide) कर ली। जयपुर के इतिहास में यह पहली और एकमात्र घटना थी जब किसी राजा को इस तरह अपनी जान गँवानी पड़ी।

हरगोविंद नाटाणी गद्दार का अंत

महाराजा ईश्वरी सिंह की मृत्यु के तुरंत बाद, हरगोविंद नाटाणी पाला बदलकर (Defected) माधोसिंह प्रथम से जा मिला। माधोसिंह जयपुर के नए महाराजा बने। नाटाणी को लगा कि उसे अपनी गद्दारी का बड़ा इनाम मिलेगा, लेकिन इतिहास गवाह है कि गद्दारों पर कभी कोई पूरी तरह भरोसा नहीं करता।

कुछ ही समय बाद, जयपुर दरबार में नाटाणी का प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो गया। शासकों ने उससे ‘नाटाणियों का बाग’ (जयमहल पैलेस) और सभी राजकीय अधिकार व संपत्तियां (Royal Rights and Properties) छीन लीं। वह समाज और इतिहास की नज़रों में हमेशा के लिए लांछित हो गया।

“ईश्वरी सिंह की छतरी कहाँ है?”

जयपुर के महाराजा ईश्वरी सिंह की छतरी (समाधि) आम कछवाहा शासकों की तरह गैटोर (Gaitor) में नहीं बनी है, जो राजस्थान इतिहास का एक बड़ा अपवाद है। उनकी छतरी जयपुर सिटी पैलेस के पीछे स्थित जय निवास उद्यान (गोविंद देव जी मंदिर के पास) में बनी है।

सन् 1750 में मराठों के भारी कर्ज और आंतरिक राजनीति से तंग आकर महाराजा ने महल में आत्महत्या कर ली थी। उस समय जयपुर की सीमा पर मराठा सेना खड़ी थी। इस डर और अफरा-तफरी के कारण उनके शव को महलों से बाहर गैटोर ले जाना सुरक्षित नहीं माना गया और महल परिसर के भीतर ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया।

जयपुर का गृह-युद्ध (Succession War)”ईश्वरी सिंह और माधो सिंह का विवाद” (सवाई जयसिंह की मृत्यु के बाद दोनों भाइयों में गद्दी की जंग और उदयपुर व मराठों का हस्तक्षेप)।

सवाई जयसिंह की मृत्यु (1743 ई.) के बाद उनके दो बेटों—ईश्वरी सिंह और माधो सिंह—के बीच जयपुर की गद्दी के लिए भीषण गृह-युद्ध छिड़ गया। इस विवाद की मुख्य जड़ें देवारी समझौते, उदयपुर और मराठों के हस्तक्षेप से जुड़ी हैं:

विवाद का मुख्य कारण (देवारी समझौता – 1708)शर्त: मेवाड़ (उदयपुर) की राजकुमारी चंद्रकुंवारी से विवाह के समय सवाई जयसिंह ने शर्त मानी थी कि उससे उत्पन्न पुत्र ही जयपुर का उत्तराधिकारी बनेगा।संकट: ईश्वरी सिंह सवाई जयसिंह के बड़े पुत्र थे, जबकि माधो सिंह मेवाड़ की राजकुमारी के छोटे पुत्र थे। नियमतः ईश्वरी सिंह राजा बने, लेकिन वादे के मुताबिक माधो सिंह ने गद्दी पर दावा ठोक दिया।

उदयपुर और मराठों का हस्तक्षेप

उदयपुर (मेवाड़): माधो सिंह के ननिहाल (मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह II) ने अपनी भांजे का पक्ष लिया और सेना भेज दी।मराठे (धन के भूखे): इस पारिवारिक जंग में मराठों (होल्कर और सिंधिया) की एंट्री हुई। उन्होंने दोनों भाइयों से भारी चौथ (पैसा) लेकर बारी-बारी से दोनों पक्षों का साथ दिया, जिसने जयपुर को आर्थिक रूप से बर्बाद कर दिया।

जयपुर और प्रमुख मराठा युद्ध और परिणाम

राजमहल का युद्ध (1747): टोंक में हुए इस युद्ध में ईश्वरी सिंह ने माधो सिंह, मेवाड़ और मराठों की संयुक्त सेना को हरा दिया। इस जीत की खुशी में उन्होंने जयपुर में ‘ईसरलाट’ (सरगासूली) मीनार बनवाई।

बगरू का युद्ध (1748): इस युद्ध में माधो सिंह और मराठों ने ईश्वरी सिंह को हरा दिया। ईश्वरी सिंह को मराठों को भारी हर्जाना और माधो सिंह को 5 परगने देने पड़े।

दुखांत अंत (1750):मराठा सरदार मल्हारराव होल्कर ने पैसों के लिए जयपुर पर दोबारा भारी दबाव बनाया। सेनापति हरगोविंद नाटाणी के असहयोग और इस अपमान से तंग आकर महाराजा ईश्वरी सिंह ने सरगासूली के पास जहर पीकर और सांप से कटवाकर आत्महत्या कर ली। इसके बाद माधो सिंह I जयपुर के शासक बने।

“ईसरलाट या सरगासूली का इतिहास”

जयपुर के त्रिपोलिया बाजार में स्थित ‘ईसरलाट’ या ‘सरगासूली’ एक सात मंजिला ऐतिहासिक मीनार है, जिसका निर्माण महाराजा ईश्वरी सिंह ने 1749 ई. में करवाया था। [1] उन्होंने 1747 के राजमहल युद्ध में अपने सौतेले भाई माधो सिंह, मेवाड़ और मराठों की संयुक्त सेना पर मिली शानदार जीत की याद में इस विजय स्तंभ को बनवाया था। सरगासूली’ का अर्थ है ‘स्वर्ग को छूने वाली मीनार’।

विडंबना यह है कि जिस मीनार को ईश्वरी सिंह ने अपनी सबसे बड़ी जीत के प्रतीक के रूप में बनवाया, वही उनके दुखांत अंत का कारण बनी। सन् 1750 में मराठों के भारी सैन्य दबाव, आर्थिक कर्ज और अपनों के धोखे से तंग आकर उन्होंने इसी परिसर में जहर पीकर और जहरीले सांप से कटवाकर आत्महत्या कर ली थी। स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, उन्होंने इस मीनार से कूदकर अपनी जान दी थी।

“केशवदास खत्री कौन थे?

केशवदास खत्री जयपुर के महाराजा ईश्वरी सिंह के एक अत्यंत ईमानदार, योग्य दीवान (प्रधानमंत्री) और कुशल सेनापति थे। उन्होंने मराठों के खिलाफ युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।हालाँकि, राजदरबार की आपसी गुटबाजी के कारण महाराजा के दूसरे सेनापति हरगोविंद नाटाणी उनसे ईर्ष्या करते थे। नाटाणी ने चालबाजी से केशवदास के खिलाफ महाराजा ईश्वरी सिंह के कान भरे और उन पर गद्दारी का झूठा आरोप लगवा दिया। इस षड्यंत्र और अपमान से आहत होकर केशवदास खत्री ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली थी।

Isarlat Jaipur opening timings & entry fees ईसरलाट’ या ‘सरगासूली ‘प्रवेश शुल्क

जयपुर की ऐतिहासिक ‘ईसरलाट’ या ‘सरगासूली’ मीनार पर्यटकों के लिए रोज़ाना सुबह 9:30 AM से शाम 4:30 PM तक खुली रहती है. पुरानी गुलाबी नगरी (Pink City) का 360-डिग्री खूबसूरत नज़ारा देखने के लिए पर्यटक यहाँ आते हैं.

इस स्मारक का प्रवेश शुल्क (Entry Fee) भारतीय वयस्कों के लिए ₹50 से ₹70 प्रति व्यक्ति है. भारतीय छात्रों के लिए इसमें विशेष छूट दी गई है, उनके लिए टिकट की कीमत मात्र ₹25 रखी गई है. विदेशी पर्यटकों के लिए यहाँ का प्रवेश शुल्क लगभग ₹100 से ₹150 तक रहता है. पर्यटकों को सलाह दी जाती है कि वे शाम 4:00 PM से पहले यहाँ पहुँच जाएँ ताकि आसानी से प्रवेश मिल सके.

हरगोविंद नाटाणी का वह कौन सा संवाद (Dialogue) है जो आज भी राजस्थानी कहावतों में प्रसिद्ध है?

मराठों की विशाल सेना देखकर जब राजा ने नाटाणी से रणनीति पूछी, तो उसने कहा था—”अन्नदाता, म्हारो तो खींसो ही फाटग्यो” (यानी मेरी तो जेब/थैली ही फट गई है)। इस डरपोक और निराशाजनक जवाब ने राजा का मनोबल पूरी तरह तोड़ दिया था।

बगरू के युद्ध (1748) में भरतपुर के किस प्रसिद्ध शासक ने ईश्वरी सिंह का साथ दिया था?

बगरू के युद्ध में जाट साम्राज्य के महान और प्रतापी शासक महाराजा सूरजमल ने ईश्वरी सिंह का खुलकर साथ दिया था और माधो सिंह व मराठों की संयुक्त सेना के खिलाफ वीरता से लड़े थे।

ईश्वरी सिंह की मृत्यु के तुरंत बाद जयपुर का प्रधानमंत्री (दीवान) कौन बना?

ईश्वरी सिंह की मृत्यु के बाद जब माधो सिंह I जयपुर की गद्दी पर बैठे, तो उन्होंने हरगोविंद नाटाणी की संदिग्ध भूमिका को देखते हुए उसे हटा दिया और अपने वफादार कनहीराम (Kanhi Ram) को जयपुर का नया दीवान नियुक्त किया था।

ईसरलाट (सरगासूली) मीनार की वास्तुकला (Architecture) की क्या विशेषता है?

: यह अष्टकोणीय (Octagonal) आकार की सात मंजिला मीनार है, जिसे पीले रंग से रंगा गया है। इसकी वास्तुकला में मुगल और राजपूत शैली का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है, और इसके अंदर ऊपर जाने के लिए एक गोलाकार (Circular) सीढ़ी बनी हुई है।

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