नगरी( माध्यमिका) :चित्तौड़गढ़ का वो 1 गुप्त महानगर, जो कालीबंगन से भी पहले दुनिया के सामने आया

नगरी ( माध्यमिका) चित्तौड़गढ़ का पहला उत्खनित स्थल, जो कभी शिवि जनपद की राजधानी था। जानिए घोसुंडी शिलालेख, हाथी बाटा और इसके पतन का सच।

पुरातात्विक फैक्ट फाइल: माध्यमिका नगरी (Archaeological Fact File: Nagari)

  • वर्तमान नाम (Current Name)नगरी (Nagari Village)
  • भौगोलिक स्थिति (Location)चित्तौड़गढ़ जिला, राजस्थान (Chittorgarh, Rajasthan)
  • दूरी (Distance from Main City)चित्तौड़गढ़ मुख्यालय से लगभग 11 से 14 किलोमीटर
  • प्राचीन ऐतिहासिक नाम (Ancient Name)माध्यमिका / मज्झिमिका (Madhyamika)
  • मुख्य ऐतिहासिक काल (Historical Era)महाभारत काल से गुप्त काल (लगभग 1000 ईसा पूर्व – 6ठी शताब्दी ईस्वी)
  • प्रशासनिक पहचान (Ancient Identity)शक्तिशाली शिवि जनपद (Shivi Janapada) की प्राचीन राजधानी
  • ऐतिहासिक गौरव (Historical Pride)राजस्थान का पहला उत्खनित स्थल होने का गौरव प्राप्त
  • सबसे प्राचीन लिखित साक्ष्य (Inscription)घोसुंडी शिलालेख (दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व – ब्राह्मी लिपि)
  • धार्मिक महत्व (Religious Significance)भारत में वैष्णव (भागवत) संप्रदाय और वासुदेव पूजा का सबसे पहला लिखित प्रमाण
  • विनाश/पतन का मुख्य कारण (Reason of Decline)5वीं-6ठी शताब्दी में बर्बर हूण आक्रांताओं के विनाशकारी
  • संरक्षण संस्था (Governing Body)भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI – राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक)
  • प्रवेश नियम और समय (Timings & Fees)प्रतिदिन सुबह 09:00 से शाम 05:00 बजे तक (प्रवेश बिल्कुल मुफ्त)

नगरी चित्तौड़गढ़ का इतिहास (Nagari Chittorgarh History in Hindi)

चित्तौड़गढ़ से लगभग 11 किलोमीटर दूर स्थित नगरी गाँव राजस्थान के सबसे प्राचीन पुरातात्विक स्थलों (Archaeological Sites) में से एक है。 मौर्य और गुप्त काल (Mauryan and Gupta Era) के समय यह एक समृद्ध और विशाल औद्योगिक व व्यापारिक नगर हुआ करता था। इस स्थान का ऐतिहासिक महत्व इतना अधिक है कि महान व्याकरणविद् पतंजलि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘महाभाष्य’ में भी इस प्राचीन शहर का उल्लेख किया है। इतिहास प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए यह स्थान प्राचीन भारतीय संस्कृति, उन्नत नगर नियोजन (Town Planning) और धार्मिक विकास को समझने का एक सबसे महत्वपूर्ण और जीवंत केंद्र माना जाता है

प्राचीन माध्यमिका नगरी सभ्यता की खोज किसने की थी और यहाँ से क्या अवशेष मिले हैं?

प्राचीन माध्यमिका नगरी सभ्यता की खोज और सर्वप्रथम उत्खनन (Excavation) वर्ष 1904 में प्रसिद्ध पुरातत्वविद डॉ. डी.आर. भंडारकर द्वारा किया गया था。 यहाँ की खुदाई में हड़प्पा और मौर्य कालीन प्राचीन सभ्यता के अवशेष, पक्की ईंटों के ऊंचे चबूतरे, बौद्ध स्तूप (Buddhist Stupa) और गुप्त कालीन कलाकृतियाँ प्राप्त हुई हैं। यह सभ्यता राजस्थान की सबसे प्राचीन नगरीय व्यवस्था और धार्मिक सहिष्णुता की गवाह रही है। यहाँ वैष्णव (भागवत) धर्म और बौद्ध धर्म के प्राचीनतम साक्ष्य मिले हैं, जो यह साबित करते हैं कि यह क्षेत्र प्राचीन काल में आध्यात्मिक चेतना का मुख्य केंद्र था।

नगरी (माध्यमिका) को राजस्थान का पहला उत्खनित स्थल क्यों कहा जाता है और इसका क्या महत्व है?

पुरातात्विक इतिहास के अनुसार, चित्तौड़गढ़ की नगरी (माध्यमिका) को राजस्थान का पहला उत्खनित स्थल (First Excavated Site) होने का गौरव प्राप्त है। भारत सरकार के पुरातत्व विभाग द्वारा वर्ष 1904 में सबसे पहले इसी स्थान पर वैज्ञानिक तरीके से खुदाई का कार्य शुरू किया गया था。 कालीबंगन या आहड़ सभ्यता की खोज से भी बहुत पहले इस स्थल का उत्खनन हो चुका था। यही कारण है कि राजस्थान के प्राचीन इतिहास और पुरातत्व विज्ञान (Archaeology) की शुरुआत इसी पवित्र भूमि से मानी जाती है, जिसने राज्य के प्राचीनतम इतिहास को पूरी दुनिया के सामने उजागर किया।

प्राचीन काल में शिवि जनपद की राजधानी माध्यमिका की भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति क्या थी?

महाभारत काल और सिकंदर के आक्रमण के समय, पंजाब से विस्थापित होकर शिवि जाति के लोग राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में आकर बस गए थे। उन्होंने यहाँ अपना एक शक्तिशाली जनपद स्थापित किया, जिसे ‘शिवि जनपद’ कहा गया। इस गौरवशाली जनपद की राजनीतिक और प्रशासनिक राजधानी ‘माध्यमिका’ थी, जिसे आज हम चित्तौड़गढ़ के ‘नगरी’ गाँव के नाम से जानते हैं। अरावली की सुरक्षित पहाड़ियों और नदियों के नजदीक स्थित होने के कारण माध्यमिका उस दौर का एक अत्यंत सुरक्षित, शक्तिशाली, राजनैतिक रूप से सुदृढ़ और आर्थिक रूप से समृद्ध महानगर माना जाता था।

नगरी चित्तौड़गढ़ में स्थित प्राचीन ‘प्रकाश स्तंभ’ (Light Tower) या दीया बुर्ज का क्या इतिहास है?

नगरी पुरातात्विक स्थल पर पत्थरों से निर्मित एक विशाल और ऊँची मीनार जैसी प्राचीन संरचना स्थित है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘प्रकाश स्तंभ’ या ‘दीया बुर्ज’ कहा जाता है। इतिहास की दृष्टि से इसे ‘अकबर का दीया’ भी कहा जाता है, क्योंकि चित्तौड़गढ़ किले पर घेराबंदी के समय सम्राट अकबर ने अपने सैन्य शिविर के मुख्य प्रकाश स्रोत और निगरानी चौकी (Watch Tower) के रूप में इसका उपयोग किया था। हालांकि, कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह मौर्य काल या गुप्त काल का एक प्राचीन धार्मिक विजय स्तंभ (Victory Pillar) या दीप-स्तंभ भी हो सकता है।

नगरी (माध्यमिका) से प्राप्त प्राचीन सिक्कों और शिलालेखों से हमें क्या ऐतिहासिक जानकारी मिलती है?

माध्यमिका के उत्खनन से तांबे और चांदी के प्राचीन सिक्के मिले हैं, जिन पर ब्राह्मी लिपि (Brahmi Script) में ‘मज्झिमिकाय शिवि जनपदरस’ अंकित है, जो इसके शिवि जनपद की राजधानी होने का अकाट्य प्रमाण है। इसके अलावा, यहाँ से राजस्थान का सबसे प्राचीन ‘घोसुंडी शिलालेख’ (Ghosundi Inscription) प्राप्त हुआ है। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के इस शिलालेख से भारत में ‘गजवंश’ के राजा सर्वतात द्वारा अश्वमेध यज्ञ करवाए जाने और राजस्थान में ‘वैष्णव (भागवत) संप्रदाय’ व वासुदेव (कृष्ण) की पूजा के सबसे पहले और प्राचीनतम लिखित साक्ष्य मिलते हैं, जो ऐतिहासिक रूप से बेहद अनमोल हैं।

प्राचीन माध्यमिका नगरी को वर्तमान में किस नाम से जाना जाता है और इसका यह नाम कैसे पड़ा?

प्राचीन काल की प्रसिद्ध ‘माध्यमिका’ को वर्तमान समय में राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के ‘नगरी’ गाँव के नाम से जाना जाता है। इतिहास के अनुसार, इस क्षेत्र के बिल्कुल मध्य (सेंटर) में स्थित होने के कारण संस्कृत भाषा के शब्द ‘मध्यम’ से इसका नाम माध्यमिका पड़ा था। समय के साथ अपभ्रंश होकर और एक विकसित प्राचीन ‘नगर’ होने के कारण स्थानीय लोगों ने इसे ‘नगरी’ कहना शुरू कर दिया। आज यह छोटा सा गाँव भारत सरकार के पुरातत्व विभाग (ASI) के अधीन एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संरक्षित राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्मारक है।

घोसुंडी शिलालेख का धार्मिक महत्व (Religious Importance of Ghosundi Inscription)

घोसुंडी शिलालेख (Ghosundi Inscription) पूरे भारत में वैष्णव (भागवत) संप्रदाय का सबसे पहला और प्राचीनतम लिखित दस्तावेज माना जाता है। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के इस ब्राह्मी लिपि वाले शिलालेख में साक्षात भगवान संकर्षण (बलराम) और वासुदेव (भगवान श्री कृष्ण) के मंदिर की चारदीवारी (पूजा शिला प्राकार) बनाने का स्पष्ट उल्लेख है। यह खोज यह साबित करती है कि ईसा मसीह के जन्म से भी सदियों पहले राजस्थान की इस पावन भूमि पर भगवान कृष्ण और विष्णु जी की पूजा पूरी श्रद्धा के साथ बड़े स्तर पर की जाती थी।

क्या प्राचीन काल में माध्यमिका नगरी पर किसी विदेशी आक्रांता या राजा ने आक्रमण किया था?

जी हाँ, प्राचीन माध्यमिका अपनी अत्यधिक समृद्धि और रणनीतिक स्थिति के कारण विदेशी आक्रमणकारियों के निशाने पर रही है। यूनानी (यवन) शासक मेनान्डर (Menander) ने दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में इस भव्य शहर पर एक बड़ा आक्रमण किया था, जिसका लिखित प्रमाण पतंजलि के ‘महाभाष्य’ और ‘गार्गी संहिता’ जैसे ग्रंथों में मिलता है। इन ग्रंथों में लिखा है कि “यवनों ने माध्यमिका को घेर लिया था”। इसके अलावा, मध्यकाल में अकबर ने भी चित्तौड़गढ़ घेराबंदी के दौरान नगरी के प्राचीन प्रकाश स्तंभ (दीया बुर्ज) को अपना सैन्य मुख्यालय बनाया था।

नगरी चित्तौड़गढ़ कैसे पहुँचे और दर्शन का समय (How to Reach Nagari Chittorgarh & Timings)

नगरी पुरातात्विक स्थल चित्तौड़गढ़ शहर और मुख्य चित्तौड़गढ़ किले से लगभग 11 से 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। आप चित्तौड़गढ़ जंक्शन रेलवे स्टेशन से स्थानीय ऑटो, टैक्सी या निजी वाहन द्वारा आसानी से केवल 20 मिनट में यहाँ पहुँच सकते हैं। यहाँ का निकटतम हवाई अड्डा उदयपुर (Maharana Pratap Airport) है, जो लगभग 100 किमी दूर है। यह ऐतिहासिक स्थल पर्यटकों के लिए प्रतिदिन सुबह 09:00 बजे से शाम 05:00 बजे तक खुला रहता है और यहाँ प्रवेश करने के लिए कोई शुल्क (No Entry Fee) नहीं देना पड़ता है।

माध्यमिका नगरी का महाभारत और नकुल से संबंध (Connection of Madhyamika Nagari with Mahabharata and Nakula)

माध्यमिका नगरी का इतिहास न केवल मौर्य काल बल्कि महाभारत काल (Mahabharata Era) से भी जुड़ा हुआ है। महाभारत के ‘सभा पर्व’ के अंतर्गत आने वाले ‘दिग्विजय पर्व’ में उल्लेख मिलता है कि पांडु पुत्र नकुल ने अपनी पश्चिमी भारत की विजय यात्रा के दौरान इस क्षेत्र पर चढ़ाई की थी और माध्यमिका नगरी को जीतकर पांडव साम्राज्य का हिस्सा बनाया था। इसके पश्चात ही इंद्रप्रस्थ में भगवान कृष्ण की उपस्थिति में राजा युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ (Rajasuya Yajna) संपन्न हुआ था, जो इस नगर की प्राचीनता का बहुत बड़ा धार्मिक प्रमाण है।

माध्यमिका और गुप्त साम्राज्य का गुप्तकालीन मंदिर (Madhyamika and the Gupta Empire Inscription)

मौर्य और शुंग वंश के बाद चौथी शताब्दी में माध्यमिका गुप्त साम्राज्य (Gupta Empire) के प्रभाव में आई थी। यहाँ से गुप्त संवत 481 (424 ईस्वी) का एक ऐतिहासिक शिलालेख प्राप्त हुआ है, जिससे पता चलता है कि यहाँ सत्यसूर, श्रीगंध और दास नामक आम नागरिकों द्वारा भगवान विष्णु के एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया गया था। इसके अतिरिक्त यहाँ से प्राप्त एक खंडित यूप स्तंभ (Yupa Pillar) से यह प्रमाणित होता है कि गुप्त काल के दौरान यहाँ के शासकों द्वारा पवित्र ‘वाजपेय यज्ञ’ भी संपन्न करवाया गया था।

चीनी यात्री ह्वेनसांग और माध्यमिका नगरी (Chinese Traveler Xuanzang and Madhyamika Nagari)

जी नहीं, प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) ने 7वीं शताब्दी में राजस्थान के भीनमाल (जालौर) और बैराठ (विराटनगर) की यात्रा तो की थी, लेकिन उनके आने से पहले ही विदेशी हूण आक्रमणकारियों (Huna Invaders) के लगातार हमलों के कारण माध्यमिका नगरी पूरी तरह उजड़ चुकी थी। ह्वेनसांग के समय तक इस महान महानगर का गौरव इतिहास के पन्नों में दब चुका था और यहाँ की अधिकांश आबादी सुरक्षित स्थानों पर पलायन कर चुकी थी। यही कारण है कि उनकी यात्रा वृत्तांत ‘सी-यू-की’ में माध्यमिका नगर का सीधा विवरण देखने को नहीं मिलता है।

माध्यमिका के विनाश का मुख्य कारण (Main Reason for the Destruction of Madhyamika)

: माध्यमिका नगरी के विनाश के पीछे मुख्य रूप से लगातार विदेशी आक्रमण और राजनीतिक अस्थिरता उत्तरदायी थी। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में यवन (इंडो-ग्रीक) राजा मेनान्डर के भीषण हमले ने इस नगर की आर्थिक कमर तोड़ दी थी। इसके बाद कुषाण, पश्चिमी क्षत्रप और मालव जनजातियों के बीच इस पर अधिकार को लेकर लंबे संघर्ष हुए। अंततः 5वीं-6ठी शताब्दी ईस्वी में बर्बर हूण राजाओं (Huna Kings) के अत्यंत क्रूर और विनाशकारी आक्रमणों ने इस गौरवशाली औद्योगिक व व्यापारिक महानगर को पूरी तरह नष्ट कर दिया, जिसके बाद यह केवल एक गाँव बनकर रह गया।

नगरी की प्रस्तर शिल्पकला और टेराकोटा मूर्तियाँ (Stone Sculptures and Terracotta Art of Nagari

नगरी से प्राप्त कलाकृतियाँ प्राचीन भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र का अनूठा उदाहरण हैं। यहाँ की खुदाई में मिट्टी से बनी अत्यंत सुंदर टेराकोटा मूर्तियाँ (Terracotta Statues) मिली हैं, जिनमें शिव-पार्वती की प्रेममयी मुद्राएँ और तत्कालीन समाज की वेशभूषा दिखाई देती है। इसके अलावा, यहाँ से अरावली के पत्थरों पर तराशे गए उत्कृष्ट प्रस्तर पैनल (Sculptured Panels) मिले हैं, जिन पर पशु-पक्षियों, यक्ष-यक्षिणियों और विभिन्न पौराणिक दृश्यों का बारीक अंकन किया गया है। यह प्राचीन सामग्रियाँ वर्तमान में चित्तौड़गढ़ राजकीय संग्रहालय और उदयपुर के म्यूजियम में पर्यटकों व शोधकर्ताओं के लिए सुरक्षित रखी गई हैं।

माध्यमिका और चित्तौड़गढ़ दुर्ग का संबंध (Connection between Madhyamika and Chittorgarh Fort)

इतिहास के अनुसार, माध्यमिका नगरी (Madhyamika Nagari) का विनाश और चित्तौड़गढ़ किले का उदय एक-दूसरे से सीधे जुड़े हैं। जब 6ठी शताब्दी में हूण आक्रमणों के कारण मैदानी इलाके में बसी माध्यमिका पूरी तरह असुरक्षित हो गई, तब यहाँ के मौर्य शासकों ने सुरक्षा के लिहाज से पास ही स्थित एक विशाल और ऊँची पहाड़ी (मेसा का पठार) को चुना। मौर्य राजा चित्रांगद मौर्य ने इसी सुरक्षा रणनीति के तहत चित्तौड़गढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया। इसके बाद माध्यमिका की अधिकांश बची हुई आबादी और राजनीतिक केंद्र पहाड़ी के ऊपर बने इस सुरक्षित किले में स्थानांतरित हो गए।

नगरी से प्राप्त हाथी बाटा का रहस्य (The Mystery of Hathi Bhata Inscription in Nagari)

नगरी गाँव के बाहरी इलाके में स्थित ‘हाथी बाटा’ पत्थरों से निर्मित एक विशाल प्राचीन संरचना है, जो पर्यटकों के बीच गहरी जिज्ञासा का विषय है। वास्तव में, यह एक प्राचीन बौद्ध या मौर्य कालीन चट्टान को काटकर बनाया गया ढांचा है, जिसे मध्यकाल में सैन्य उद्देश्यों के लिए भी ढाला गया था। स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार, इसका आकार दूर से खड़े एक विशाल हाथी जैसा प्रतीत होता है, जिसके कारण इसका नाम ‘हाथी बाटा’ पड़ा। यह स्थल प्राचीन काल की पाषाण शिल्पकला (Stone Architecture) और मेवाड़ के सामरिक इतिहास का एक अनूठा उदाहरण माना जाता है।

बौद्ध और वैष्णव धर्म के अलावा प्राचीन माध्यमिका का जैन धार्मिक ग्रंथों में क्या उल्लेख मिलता है?

माध्यमिका नगरी प्राचीन भारत में सर्वधर्म समभाव का एक आदर्श केंद्र थी। जैन धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘आवश्यक चूर्णी’ और अन्य श्वेतांबर जैन साहित्य में इस नगर का विशेष उल्लेख मिलता है। इन ग्रंथों के अनुसार, महावीर स्वामी के निर्वाण के कुछ सदियों बाद माध्यमिका जैन संस्कृति और भिक्षुओं का एक प्रमुख गढ़ बन चुका था। यहाँ जैन आचार्यों द्वारा ज्ञान और दर्शन पर कई महत्वपूर्ण शास्त्रार्थ किए गए थे। खुदाई में मिले कुछ प्राचीन गृह-अवशेष और कलाकृतियाँ यह प्रमाणित करती हैं कि यहाँ वैष्णव और बौद्ध अनुयायियों के साथ-साथ जैन समुदाय भी बेहद समृद्ध था।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) वर्तमान में नगरी (माध्यमिका) स्थल की सुरक्षा और देखरेख कैसे करता है?

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India) ने नगरी को एक राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक (Monument of National Importance) घोषित किया है। एएसआई (ASI) ने प्राचीन बौद्ध स्तूप के चबूतरे, प्रकाश स्तंभ और घोसुंडी के पास के ऐतिहासिक क्षेत्रों के चारों तरफ सुरक्षा घेरा बनाया है। समय-समय पर इस स्थल के क्षरण को रोकने के लिए रासायनिक संरक्षण (Chemical Conservation) और वैज्ञानिक मरम्मत कार्य किए जाते हैं। इसके साथ ही, यहाँ आने वाले इतिहास के छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए प्राचीन साक्ष्यों को समझने हेतु सूचना बोर्ड और गाइडलाइंस भी लगाई गई हैं।

नगरी के प्राचीन कुएँ और जल संरक्षण तकनीक (Ancient Wells and Water Conservation in Nagari)

माध्यमिका के उत्खनन के दौरान इतिहासकारों को प्राचीन काल की बेहतरीन जल प्रबंधन और कुआँ निर्माण तकनीक के साक्ष्य मिले हैं। यहाँ पक्की ईंटों और रिंग-वेल्स (वलय कूप) के अवशेष पाए गए हैं, जो मौर्य और शुंग काल के उन्नत नागरिक जीवन को दर्शाते हैं। ये कुएँ इस तरह डिजाइन किए गए थे कि वर्षा का जल आसानी से संचित हो सके और गंदे पानी की निकासी के लिए भी सोखते गड्ढे (Soak Pits) बने थे। यह उन्नत तकनीक साबित करती है कि हजारों साल पहले भी माध्यमिका के नागरिक स्वच्छता और पर्यावरण के प्रति बेहद जागरूक थे।

माध्यमिका नगरी का भगवान महावीर से संबंध (Connection of Madhyamika Nagari with Bhagwan Mahavira)

प्राचीन जैन ग्रंथों के अनुसार, माध्यमिका (नगरी) जैन धर्म का एक अत्यंत पावन केंद्र रही है। भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण (Moksha) के बाद के प्राचीनतम प्राकृत शिलालेखों में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने स्वयं इस क्षेत्र में विहार (यात्रा) किया था। सिरोही के वीतिभय पत्तन से मंदसौर (दशपुर) जाते समय वर्धमान महावीर कुछ समय के लिए माध्यमिका में रुके थे। इसके अतिरिक्त, प्रसिद्ध जैन ग्रंथ ‘कल्पसूत्र’ के अनुसार जैन श्रमणों की एक मुख्य गणशाखा का नाम ही ‘माध्यमिका शाखा’ रखा गया था, जो इसकी प्राचीन जैन सांस्कृतिक समृद्धि को प्रमाणित करता है।

बेड़च नदी और नगरी सभ्यता का संबंध (Connection of Berach River and Nagari Civilization)

प्राचीन माध्यमिका नगरी सभ्यता पूर्ण रूप से बेड़च नदी (Berach River) के तट पर विकसित हुई थी, जिसे प्राचीन काल में ‘आयड़ नदी’ भी कहा जाता था। यह नदी बनास नदी की एक प्रमुख सहायक नदी है। बेड़च नदी के निरंतर बहने वाले पानी और उपजाऊ मैदानी भाग के कारण ही हजारों साल पहले यहाँ कृषि, उन्नत व्यापार और बड़े उद्योगों का विकास संभव हो पाया था। नदी मार्ग से माल का परिवहन आसान होने के कारण माध्यमिका मौर्य और शुंग काल में मालवा और मरु प्रदेश के बीच का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र बन सकी।

नगरी (माध्यमिका) में स्थित ऐतिहासिक ‘नारायण वाटिका’ क्या है और इसका निर्माण किसने करवाया था?

नगरी में भगवान कृष्ण और बलराम की पूजा के प्राचीनतम साक्ष्य मिले हैं, जिसे ऐतिहासिक दस्तावेजों में ‘नारायण वाटिका’ कहा गया है। चक्रवर्ती राजा पराशरी पुत्र सर्वतात ने ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में इस पवित्र भागवत धाम के चारों तरफ पत्थरों की एक विशाल सुरक्षा दीवार (शिला प्राकार) बनवाई थी। सम्राट अशोक द्वारा लुंबिनी में पत्थरों के उपयोग के बाद, पूरे भारतीय इतिहास में किसी मंदिर के चारों तरफ ‘शिला प्राकार’ यानी पाषाण चारदीवारी बनाने का यह पहला और प्राचीनतम लिखित उदाहरण है, जिसे आज भी इतिहास में नारायण वाटिका के नाम से जाना जाता है।

माध्यमिका का शुंग साम्राज्य से संबंध (Connection of Madhyamika with the Shunga Empire)

जब दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में उत्तर-पश्चिमी सीमा से यवन (इंडो-ग्रीक) राजा मेनान्डर ने माध्यमिका नगरी को चारों तरफ से घेर लिया था, तब मगध के प्रतापी सम्राट पुष्यमित्र शुंग (Pushyamitra Shunga) ने अपनी सेना भेजी थी। शुंग साम्राज्य के वीर योद्धाओं ने माध्यमिका की पवित्र भूमि पर यूनानी आक्रांताओं के साथ भीषण युद्ध किया और उन्हें यहाँ से मार भगाया। यवनों को परास्त करने के बाद माध्यमिका लंबे समय तक शुंग साम्राज्य का एक प्रमुख रणनीतिक और प्रशासनिक हिस्सा बनी रही, जिससे इस क्षेत्र में वैदिक संस्कृति को पुनः नया जीवन मिला।

पाणिनी की अष्टाध्यायी में माध्यमिका का उल्लेख (Mention of Madhyamika in Panini’s Ashtadhyayi)

ईसा पूर्व 5वीं से 4थी शताब्दी के महान भारतीय संस्कृत व्याकरणविद् पाणिनी ने अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अष्टाध्यायी’ (Ashtadhyayi) और उनके ‘गणपथ’ में माध्यमिका क्षेत्र का विशेष रूप से उल्लेख किया है। पाणिनी ने इस क्षेत्र को ‘शिवि जनपद’ और इसकी बसावट को कला व व्यापार का मुख्य केंद्र बताया है। महाभाष्यकार पतंजलि से भी सदियों पहले पाणिनी द्वारा किया गया यह वर्णन यह साबित करता है कि सिकंदर के आक्रमण और मौर्य साम्राज्य के उदय से भी पहले माध्यमिका भारतवर्ष के राजनैतिक नक्शे पर एक बेहद महत्वपूर्ण और स्थापित महानगर था।

राजस्थान के इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने नगरी (माध्यमिका) के बारे में अपने यात्रा वृत्तांत में क्या लिखा है?

राजस्थान के इतिहास के जनक कहे जाने वाले कर्नल जेम्स टॉड (Colonel James Tod) ने 19वीं शताब्दी की शुरुआत में चित्तौड़गढ़ के पास स्थित नगरी (Nagari) गाँव का दौरा किया था। उन्होंने अपनी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान’ में इस स्थान के प्राचीन खंडहरों, बिखरे हुए प्राचीन शिलालेखों और पाषाण कलाकृतियों का विशेष रूप से उल्लेख किया है। टॉड ने इसे मेवाड़ क्षेत्र का एक प्राचीनतम हिंदू-बौद्ध शहर बताया था, जिसके अवशेष उनकी कलात्मक भव्यता की कहानी बयां करते हैं। भंडारकर के उत्खनन से बहुत पहले टॉड ने ही इस स्थल को वैश्विक पहचान दी

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