अकबर की सेना के छक्के छुड़ाने वाले ‘चतुर्भुज’ योद्धा: वीर कल्लाजी राठौड़ की अनसुनी कहानी

जानिए राजस्थान के सुप्रसिद्ध लोक देवता वीर कल्लाजी राठौड़ का पूरा इतिहास। उन्हें ‘चार हाथों वाले देवता’ क्यों कहा जाता है, उनका जन्म, गुरु भैरवनाथ और चित्तौड़गढ़ की वीर गाथा।

📋 फैक्ट फाइल: लोक देवता वीर कल्लाजी राठौड़

  • पूरा नाम वीर कल्लाजी राठौड़ (उपनाम: कल्याण सिंह)
  • जन्म तिथि 1544 ईस्वी (विक्रम संवत् 1601, आश्विन शुक्ल अष्टमी)
  • जन्म स्थान सामियाना गाँव, मेड़ता (नागौर, राजस्थान)
  • राजवंश मेड़ता का राठौड़ राजवंश
  • पिता का नाम :आससिंह राठौड़
  • बुआ (रिश्ते में) :प्रसिद्ध कृष्ण भक्त मीराबाई (कल्लाजी उनके भतीजे थे)
  • चाचा :महान योद्धा राव जयमल राठौड़
  • दीक्षा: गुरुयोगी भैरवनाथ
  • आराध्य देवी :नागणेची माता
  • ऐतिहासिक युद्ध :चित्तौड़गढ़ का तीसरा साका (1567-68 ई.) अकबर के विरुद्ध
  • वीरगति स्थल / छतरीभैरवपोल, चित्तौड़गढ़ दुर्ग (किला)
  • मुख्य सिद्ध पीठ :रनेला (सलूम्बर, राजस्थान)
  • प्रमुख मान्यता :थान (स्थान) पर भूत-प्रेत बाधा और बीमार पशुओं का चमत्कारिक इलाज
  • संबंधित साहित्य’कंकु कंबध’ पुस्तक (लेखक: डॉ. ज्योति पुंज)
  • शीश कटने के बाद भी युद्ध: लोक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार, चित्तौड़गढ़ के युद्ध में भैरवपोल के पास कल्लाजी का सिर (शीश) धड़ से अलग हो गया था, लेकिन उनका बिना सिर का धड़ (कंबध) काफी दूर तक मुगलों की सेना काटते हुए आगे बढ़ता रहा था.
  • रुंडेला (रनेला) तक पहुंचा धड़: ऐसा माना जाता है कि कल्लाजी का बिना सिर का धड़ लड़ते-लड़ते चित्तौड़गढ़ से उनकी मंगेतर (कृष्णा) के पास रनेला (सलूम्बर) तक पहुंच गया था, जहाँ उनकी मंगेतर उनके धड़ के साथ सती हुई थीं.
  • ‘कंबध’ शब्द का अर्थ: साहित्य और डिंगल भाषा में बिना सिर के लड़ने वाले योद्धा के धड़ को ‘कंबध’ कहा जाता है. डॉ. ज्योति पुंज की पुस्तक का नाम ‘कंकु कंबध’ इसी ऐतिहासिक चमत्कारिक घटना से प्रेरित है.
  • पशु चिकित्सा के लोक देवता: ग्रामीण राजस्थान और मालवा (मध्य प्रदेश) के क्षेत्रों में कल्लाजी को केवल इंसानों की बीमारी या भूत-प्रेत भगाने के लिए ही नहीं, बल्कि रोगी पशुओं के इलाज के लिए सबसे बड़ा लोक देवता माना जाता है. पशु के बीमार होने पर कल्लाजी के नाम का ताँती (धागा) बांधा जाता है.
  • ‘भाथी खत्री’ के रूप में पूजा: कल्लाजी राठौड़ की ख्याति केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है। पड़ोसी राज्य गुजरात में उन्हें ‘भाथी खत्री’ के रूप में बेहद आदर के साथ पूजा जाता है.
  • अफीम (कालिया) का भोग: डूंगरपुर के सामलिया थान पर कल्लाजी को अफीम का भोग लगाया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘कालिया’ या ‘केसर-अफीम’ का प्रसाद कहा जाता है. लोक जीवन में मान्यता है कि यह अफीम कल्लाजी के भक्तों के लिए कष्ट निवारक दवा का काम करती है.
  • मेवाड़ राजघराने से विशेष संबंध: कल्लाजी राठौड़ मेवाड़ के शासक महाराणा उदयसिंह (महाराणा प्रताप के पिता) के समकालीन थे. चित्तौड़गढ़ पर संकट आने पर मेड़ता के होने के बावजूद उन्होंने मेवाड़ की रक्षा के लिए अपने पूरे प्राण न्यौछावर कर दिए.
  • मेवाड़ के समकालीन शासक: वीर कल्लाजी राठौड़ मेवाड़ के प्रसिद्ध महाराणा उदयसिंह (महाराणा प्रताप के पिता) के समकालीन थे.
  • भौगोलिक संबंध (नागौर से सलूम्बर): इनका जीवन काल और प्रभाव क्षेत्र राजस्थान के तीन बड़े क्षेत्रों को जोड़ता है— जन्म मारवाड़ (मेड़ता, नागौर) में हुआ, कर्मभूमि और शहादत मेवाड़ (चित्तौड़गढ़) में हुई, और मुख्य सिद्ध पीठ वागड़/मेवाड़ सीमा के रनेला (वर्तमान में सलूम्बर जिला) में स्थित है.
  • सामलिया (डूंगरपुर) थान की विशेषता: डूंगरपुर जिले के सामलिया में कल्लाजी की विशेष मान्यता है. यहाँ स्थापित उनकी काले पत्थर की मूर्ति पर श्रद्धालु बड़ी आस्था के साथ केसर और अफीम चढ़ाते हैं.
  • कल्लाजी की हवेली: चित्तौड़गढ़ और उनके प्रभाव वाले क्षेत्रों में कल्लाजी के मूल निवास स्थान को आज भी आदरपूर्वक ‘हवेली’ कहकर पुकारा जाता है.
  • पारिवारिक परिचय (पिता और दादा): कल्लाजी के पिता का नाम आससिंह था और उनके दादा राव अचलाजी थे, जो मेड़ता के प्रसिद्ध शासक राव दूदाजी के पुत्र थे.

कल्लाजी राठौड़ का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

जन्म स्थान: वीर कल्लाजी राठौड़ का जन्म राजस्थान के नागौर जिले में स्थित मेड़ता के सामियाना गाँव में हुआ था.

जन्म तिथि: उनका जन्म 1544 ईस्वी में हुआ था। यदि हिंदू कैलेंडर (विक्रम संवत्) के अनुसार बात करें, तो उनका जन्म विक्रम संवत् 1601 के आश्विन शुक्ल अष्टमी (दुर्गाष्टमी के पावन दिन) को हुआ था।

वंश व संबंध: वे मेड़ता के राठौड़ राजवंश से थे। प्रसिद्ध कृष्ण भक्त मीराबाई रिश्ते में उनकी बुआ लगती थीं (यानी कल्लाजी मीराबाई के भतीजे थे) और प्रसिद्ध योद्धा जयमल राठौड़ उनके चाचा थे।

कल्लाजी राठौड़ के गुरु का नाम क्या था?

कल्लाजी राठौड़ के गुरु का नाम भैरवनाथ था।गुरु भैरवनाथ से ही कल्लाजी ने योग साधना, शस्त्र विद्या और जड़ी-बूटियों (चिकित्सा) का गूढ़ ज्ञान प्राप्त किया था, जिसके कारण आगे चलकर वे एक महान योगी और पराक्रमी योद्धा बने।

वीर कल्लाजी राठौड़ की मुख्य पीठ (थान) कहाँ स्थित है?

वीर कल्लाजी राठौड़ की मुख्य सिद्ध पीठ रनेला (सलूम्बर) में स्थित है। इसके अलावा डूंगरपुर के सामलिया में भी उनका एक प्रसिद्ध थान है, जहाँ उनकी काले पत्थर की मूर्ति पर अफीम और केसर चढ़ाई जाती है।

वीर कल्लाजी राठौड़ की छतरी (स्मारक) कहाँ बनी हुई है?

वीर कल्लाजी राठौड़ की छतरी चित्तौड़गढ़ किले में ‘भैरवपोल’ के पास बनी हुई है। यह वही स्थान है जहाँ उन्होंने मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की थी।

कल्लाजी राठौड़ को किसका अवतार माना जाता है?

लोक मान्यताओं और धार्मिक आस्था के अनुसार, वीर कल्लाजी राठौड़ को शेषनाग का अवतार माना जाता है।

वीर कल्लाजी राठौड़ को चार हाथों वाले देवता क्यों कहा जाता है?

चित्तौड़गढ़ के तीसरे साके (1567-68 ई.) में अकबर की सेना के खिलाफ युद्ध के दौरान कल्लाजी के चाचा जयमल राठौड़ गंभीर रूप से घायल हो गए थे। कल्लाजी ने जयमल को अपने कंधों पर बिठा लिया, जिससे दोनों के हाथों में दो-दो तलवारें आ गईं। रणभूमि में चार तलवारें एक साथ चलते देख दुश्मनों को वे साक्षात ‘चतुर्भुज देवता’ (चार हाथ और दो सिर वाले) दिखाई दिए।

कल्लाजी राठौड़ के प्रमुख उपनाम क्या-क्या हैं?

कल्लाजी राठौड़ को शेषनाग का अवतार, केहर, कल्याण, कमधज, बाल ब्रह्मचारी, योगी, विनाशक, चक्रवात युद्ध के धनी तथा दूल्हे के वेश में मरने वाला देवता जैसे कई प्रसिद्ध उपनामों से जाना जाता है.

गुजरात के किस लोक देवता का संबंध वीर कल्लाजी से माना जाता है?

वीर कल्लाजी राठौड़ की ख्याति और मान्यता केवल राजस्थान की सीमाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पड़ोसी राज्य गुजरात में भी उन्हें अगाध श्रद्धा के साथ पूजा जाता है. गुजरात के लोक जीवन और सांस्कृतिक परंपराओं में पूजे जाने वाले लोक देवता ‘भाथी खत्री’ को वीर कल्लाजी राठौड़ का ही स्वरूप या उनसे गहराई से जुड़ा हुआ माना जाता है.

वहाँ के स्थानीय समाज और भक्तों में यह दृढ़ विश्वास है कि कल्लाजी ने अपनी चमत्कारिक शक्तियों, योग साधना और जन-कल्याण के कार्यों से गुजरात के इस क्षेत्र को भी प्रभावित किया था. यही कारण है कि आज भी गुजरात के कई अंचलों में ‘भाथी खत्री’ के रूप में वीर कल्लाजी राठौड़ की वीरता, उनके त्याग और उनके चमत्कारों की गाथाएं बड़े चाव से गाई और सुनी जाती हैं.

चित्तौड़गढ़ का तीसरा साका और ‘चार हाथों वाले देवता वीर कल्लाजी राठौड़’ की कहानी

कल्लाजी राठौड़ के जीवन का सबसे ऐतिहासिक और रोमांचक मोड़ सन 1567-1568 में आया, जब अकबर की विशाल मुगल सेना ने चित्तौड़गढ़ के किले को चारों तरफ से घेर लिया। महाराणा उदयसिंह को सुरक्षित पहाड़ी क्षेत्रों में भेजकर किले की कमान सेनापति राव जयमल राठौड़ और पत्ता चूंडावत को सौंपी गई।

वीर कल्लाजी राठौड़ और वह ऐतिहासिक घटना:

युद्ध के दौरान एक रात जब राव जयमल किले की टूटी हुई दीवार की मरम्मत करवा रहे थे, तब अकबर की ‘संग्राम’ नामक बंदूक की गोली उनके पैर में लग गई। पैर गंभीर रूप से घायल हो जाने के कारण जयमल अगले दिन युद्ध के मैदान में पैदल या घोड़े पर चलने में असमर्थ हो गए। लेकिन उनके भीतर देशप्रेम की आग सुलग रही थी, वे महलों में बैठकर मरने के बजाय रणभूमि में मुगलों का संहार करते हुए वीरगति पाना चाहते थे।

अपने काका (चाचा) की यह व्याकुलता देखकर 24 वर्षीय वीर कल्लाजी राठौड़ ने कहा—”काकासा, आप चिंता न करें। पैर काम नहीं कर रहे तो क्या हुआ, मेरे कंधे आपके पैर बनेंगे।”

वीर कल्लाजी राठौड़ और रणभूमि में साक्षात काल:

23 फरवरी 1568 को जब किले के द्वार खोलकर राजपूत योद्धा ‘केसरिया’ बाना पहनकर भूखे शेरों की तरह मुगलों पर टूट पड़े, तब एक अद्भुत दृश्य देखने को मिला। युवा कल्लाजी ने अपने घायल काका जयमल को अपने कंधों पर बिठा लिया।

कल्लाजी के दोनों हाथों में तलवारें थीं और उनके कंधों पर बैठे जयमल के दोनों हाथों में भी तलवारें थीं।

जब यह जोड़ी युद्ध के मैदान में उतरी, तो चारों तरफ बिजली की गति से तलवारें चलने लगी।

मुगलों की सेना के बीच यह अफवाह फैल गई कि दो सिर और चार हाथों वाला कोई देवता रणभूमि में उतर आया है।

इस भीषण युद्ध में कल्लाजी और जयमल ने अकेले ही सैकड़ों मुगल सैनिकों के सिर धड़ से अलग कर दिए। अकबर खुद इन दोनों की वीरता देखकर हैरान और भयभीत हो गया था।

वीर कल्लाजी राठौड़:बिना शीश के लड़ा धड़ (अद्भुत बलिदान)

मुगलों के वार से राव जयमल वीरगति को प्राप्त हुए। ठीक उसी समय एक क्रूर मुगल सैनिक ने पीछे से वार करके वीर कल्लाजी का शीश (सिर) काट दिया।

लेकिन चमत्कार यहीं नहीं रुका। योग साधना और राष्ट्रभक्ति के बल पर कल्लाजी का बिना सिर का धड़ (Body) भी दोनों हाथों में तलवारें लेकर मुगलों को काटता हुआ किले के भीतर आगे बढ़ता रहा। उनका धड़ चित्तौड़गढ़ से लड़ते-लड़ते काफी दूर तक गया। कल्लाजी की मंगेतर कृष्णा (शिवगढ़ के राव कृष्णदास की पुत्री) उनका इंतजार कर रही थीं, जिन्होंने बाद में कल्लाजी के पार्थिव शरीर के साथ सती होकर खुद को इतिहास में अमर कर लिया।

वीर कल्लाजी राठौड़ की लोकदेवता के रूप में मान्यता और प्रमुख मंदिर (Temples & Cult veer kallaji Rathod)

चित्तौड़गढ़ के तीसरे साके में अपने प्राणों की आहुति देने के बाद, वीर कल्लाजी आम जनमानस के आराध्य देव बन गए।

मुख्य छतरी (Smarak): चित्तौड़गढ़ दुर्ग के भैरव पोल पर आज भी वीर कल्लाजी और राव जयमल की भव्य छतरी बनी हुई है, जहाँ हर साल लाखों पर्यटक और श्रद्धालु शीश झुकाते हैं।

वागड़ क्षेत्र में मान्यता: डूंगरपुर और बांसवाड़ा (वागड़) में कल्लाजी के सैकड़ों मंदिर (जिन्हें ‘थान’ कहा जाता है) हैं। यहाँ कल्लाजी को ‘सामलिया जी’ भी कहा जाता है, जहाँ उनकी काले पत्थर की मूर्ति स्थापित है

चमत्कार: स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, कल्लाजी के थान पर भूत-प्रेत की बाधा, सर्पदंश (Snake bite), बिच्छू या पागल कुत्ते के काटने का इलाज आज भी उनकी भभूति और आशीर्वाद से ठीक हो जाता है।

कल्लाजी राठौड़ की मंगेतर का नाम क्या था ?

कल्लाजी राठौड़ की मंगेतर का नाम कृष्णा कंवर था, जो शिवगढ़ (मध्य प्रदेश) के राव कृष्णदास की पुत्री थीं। वे कल्लाजी की वीरता और योग साधना से अत्यधिक प्रभावित थीं। चित्तौड़गढ़ के तीसरे साके में जब कल्लाजी मुगलों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए, तब कृष्णा कंवर रूंढेला गांव में उनकी दिव्य देह के साथ सती हो गईं।

कल्लाजी राठौड़ का मुख्य मंदिर कहाँ है ?

: वीर कल्लाजी राठौड़ का मुख्य और सबसे प्रसिद्ध मंदिर (सामलिया जी थान) राजस्थान के डूंगरपुर जिले के सामलिया (सामलियां) गांव में स्थित है। इसके अलावा उदयपुर का रूंढेला धाम भी उनका एक अन्य प्रमुख आस्था केंद्र माना जाता है। सामलिया जी मंदिर में कल्लाजी की काले पत्थर की अत्यंत सुंदर और चमत्कारी मूर्ति स्थापित है, जहाँ विशेष रूप से रविवार को भक्तों का भारी मेला लगता है।

कल्लाजी राठौड़ की छतरी किस पोल पर है ?

कल्लाजी राठौड़ की छतरी चित्तौड़गढ़ दुर्ग के ‘भैरव पोल’ पर स्थित है। सन 1568 में मुगलों के खिलाफ भीषण युद्ध के दौरान इसी स्थान के पास वीर कल्लाजी ने अदम्य साहस दिखाते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी। इस स्मारक पर आज भी हर साल लाखों श्रद्धालु और पर्यटक वीर योद्धा के सर्वोच्च बलिदान को नमन करने आते हैं।

कल्लाजी राठौड़ का धड़ कहाँ गिरा था ?

वीर कल्लाजी राठौड़ का धड़ उदयपुर जिले के रूंढेला (रूंड़ेदा) गांव में गिरा था। चित्तौड़गढ़ दुर्ग के भैरव पोल पर उनका शीश कटने के बाद भी उनका बिना सिर का धड़ दोनों हाथों में तलवारें लेकर मुगलों को काटता हुआ रूंढेला तक आगे बढ़ता रहा। इसी पावन स्थल पर उनकी मंगेतर कृष्णा कंवर उनके पार्थिव शरीर के साथ सती हुई।

श्री कल्लाजी राठौड़ धाम रूंढेला (Randela)

चित्तौड़गढ़ के तीसरे साके (1568) में वीर कल्लाजी का शीश कटने के बाद भी उनका बिना सिर का धड़ मुगलों से लड़ते हुए रूंढेला पहुँचा, जहाँ उनकी मंगेतर कृष्णा कंवर सती हुईं। यह मेवाड़-वागड़ में कल्लाजी की मुख्य, शक्तिशाली गद्दी है। यहाँ की चमत्कारी भभूति से बीमारियां और सर्पदंश दूर होते हैं। प्रतिवर्ष लगने वाले विशाल मेले में लाखों श्रद्धालु आते हैं तथा यहाँ कल्लाजी की शेषनाग अवतार के रूप में पूजा की जाती है।

कल्लाजी राठौड़ के थान (मंदिर) पर मुख्य रूप से किस समस्या का इलाज होता है?

वीर कल्लाजी राठौड़ के थान (स्थानीय मंदिरों) को चमत्कारी और संकट निवारक माना जाता है। उनके थान पर मुख्य रूप से सर्पदंश (सांप का काटना), बिच्छू या अन्य विषैले जीवों के डंक, पागल कुत्ते के काटने और ऊपरी हवा (भूत-प्रेत या मानसिक व्याधियों) का इलाज किया जाता है। स्थानीय लोगों का अटूट विश्वासऔर आस्था है कि कल्लाजी महाराज के नाम की तांती (धागा) बांधने और मंदिर की पवित्र भभूति (राख) लगाने मात्र से बड़े से बड़ा जहर उतर जाता है और प्रेत बाधा से मुक्ति मिल जाती है। प्रत्येक रविवार को उनके मंदिरों में ऐसी समस्याओं से पीड़ित लोगों की भारी भीड़ उमड़तीहै।

कल्लाजी राठौड़ का मुख्य अस्त्र क्या था और उनकी युद्ध कला की क्या विशेषता थी?

वीर कल्लाजी राठौड़ का मुख्य अस्त्र तलवार था। वे द्वंद्व युद्ध और अस्त्र-शस्त्रादि के संचालन में अत्यंत निपुण थे, विशेष रूप से वे दोनों हाथों में दो तलवारें एक साथ बिजली की गति से चलाने में माहिर थे। उनकी सबसे बड़ी युद्ध कला विशेषता चित्तौड़गढ़ के तीसरे साके (1568) में देखने को मिली, जब उन्होंने अपने घायल काका राव जयमल को अपने कंधों पर बिठा लिया। इस प्रकार कल्लाजी और जयमल के चारों हाथों में तलवारें लहराने लगीं। इस ‘चतुर्भुज रूप’ के घातक प्रहारों के सामने विशाल मुगल सेना टिक नहीं सकी और अकबर की सेना में खलबली मच गई।

सामलिया जी लोकदेवता का इतिहास क्या है और कल्लाजी से इनका क्या संबंध है?

राजस्थान के वागड़ क्षेत्र (डूंगरपुर और बांसवाड़ा) में वीर कल्लाजी राठौड़ को ‘सामलिया जी’ के नाम से पूजा जाता है। डूंगरपुर जिले के सामलिया (सामलियां) गांव में कल्लाजी महाराज का एक अत्यंत प्राचीन और विश्व प्रसिद्ध मुख्य मंदिर स्थित है। इस मंदिर में कल्लाजी महाराज की काले पत्थर की अत्यंत सुंदर मूर्ति स्थापित होने के कारण स्थानीय भील और अन्य समाज के लोग उन्हें ‘सामलिया जी’ पुकारते हैं। यहाँ का इतिहास कल्लाजी के चमत्कारों और जनसेवा से जुड़ा है। मंदिर में मूर्ति पर अफ़ीम (केसर) चढ़ाने की अनूठी परंपरा है और यहाँ आने वाले भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं।

कल्लाजी राठौड़ का बलिदान दिवस कब मनाया जाता है और इसका क्या महत्व है?

वीर कल्लाजी राठौड़ का बलिदान दिवस प्रतिवर्ष 24 फरवरी को मनाया जाता है। सन 1568 में इसी दिन (23-24 फरवरी) चित्तौड़गढ़ दुर्ग के तीसरे साके के दौरान अकबर की मुगल सेना से लोहा लेते हुए कल्लाजी ने वीरगति प्राप्त की थी। भैरव पोल के पास शीश कटने के बाद भी उनका धड़ दुश्मनों का संहार करता रहा था। यह दिन राजस्थानी संस्कृति में अदम्य साहस, स्वाभिमान, देशभक्ति और सर्वोच्च बलिदान के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस दिन चित्तौड़गढ़ दुर्ग स्थित उनकी छतरी और देश भर के कल्लाजी मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित होती हैं।

वीर कल्लाजी राठौड़ की जयंती

वीर कल्लाजी राठौड़ की जयंती प्रतिवर्ष आश्विन शुक्ल नवमी (नवरात्रि की नवमी तिथि) को मनाई जाती है।इस दिन उनके प्रमुख पीठों और मंदिरों (विशेष रूप से राजस्थान के बांसवाड़ा, चित्तौड़गढ़ और सामलिया क्षेत्र में) में विशेष पूजा-अर्चना और मेलों का आयोजन किया जाता है। चूंकि यह तिथि हिंदू पंचांग के अनुसार बदलती रहती है, इसलिए ग्रेगोरियन कैलेंडर (अंग्रेजी कैलेंडर) के अनुसार यह हर साल सितंबर या अक्टूबर के महीने में आती

वीर कल्लाजी राठौड़ का जीवन केवल युद्ध के मैदान में दिखाए गए पराक्रम की कहानी नहीं है, बल्कि यह गुरु-भक्ति, योग साधना, पारिवारिक मर्यादा और राष्ट्र के प्रति सर्वोच्च बलिदान का सबसे बड़ा उदाहरण है। मात्र 24 वर्ष की छोटी सी आयु में उन्होंने जो इतिहास रचा, वह दुनिया के सैन्य इतिहास में विरला ही देखने को मिलता है। सिर कटने के बाद भी धड़ से युद्ध लड़ना उनके मानसिक संकल्प औ दृढ़ता का प्रतीक है।

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