मेवाड़ के रक्षक और पांडवों के आराध्य: श्री चारभुजानाथ मंदिर, गढ़बोर (Shrine of Shri Charbhuja Nath, Garhbor Rajsamand)

श्री चारभुजानाथ मंदिर, गढ़बोर राजसमंद जिले की कुंभलगढ़ तहसील के गढ़बोर गांव में स्थित है जो अपनी ऐतिहासिकता, दैवीय चमत्कारों और सेवा-पूजा की अत्यंत कठिन मर्यादाओं के लिए पूरे भारत में अनूठा है। मेवाड़ के सुप्रसिद्ध पंच-तीर्थों (श्रीनाथजी, सांवलियाजी, एकलिंगनाथ जी, द्वारिकाधीश और केशरियानाथ जी) में गढ़बोर के चारभुजा जी का स्थान बेहद महत्वपूर्ण है।

श्री चारभुजानाथ मंदिर, गढ़बोर: संपूर्ण फैक्ट फाइल (Quick Fact File)

  • मुख्य स्थान (Main Location) गढ़बोर गांव (Garhbor Village), कुंभलगढ़ तहसील, जिला राजसमंद, राजस्थान।
  • दूरी (Distance) उदयपुर (Udaipur) से 112 किमी और कुंभलगढ़ दुर्ग (Kumbhalgarh Fort) से 32 किमी।
  • प्रतिमा की प्राचीनता (Age of Idol) लगभग 5,285 वर्ष प्राचीन (द्वापर युग / महाभारत काल)।
  • मूल संस्थापक (Original Founder) पांडव (Pandavas) — जिन्होंने देह त्यागने से पूर्व इसे जलमग्न किया था।
  • प्रथम मंदिर निर्माता राजपूत शासक राजा गंगदेव (इन्हें स्वप्न में आदेश मिला था)।
  • ऐतिहासिक जीर्णोद्धार सन् 1444 ई. (वि.स. 1501) में खरवड़ शाखा के ठाकुर महिपाल चौक्षेत्र का प्राचीन नाम शिलालेखों के अनुसार इस क्षेत्र का प्राचीन नाम “बद्री” था।हान व उनके पुत्र रावत लक्ष्मण द्वारा।
  • 1,000 पुजारी परिवारों का ‘ओसरा’ (Turn System): मंदिर की सेवा का अधिकार सिर्फ गुर्जर समाज (Gurjar Caste) के 1,000 परिवारों के पास है। प्रत्येक अमावस्या को मुख्य पुजारी बदलता है। परिवारों की संख्या अधिक होने के कारण किसी का नंबर 4 साल में तो किसी का 48 से 50 साल में (जीवन में सिर्फ एक बार) आता है।
  • कठिन तपस्या और नियम: ओसरे के दौरान पुजारी एक महीने तक अपने घर नहीं जा सकता, उसे मंदिर में ही रहना पड़ता है। इस दौरान पूर्ण ब्रह्मचर्य, बिना साबुन के स्नान और हर प्रकार के व्यसन से दूर रहना अनिवार्य है। परिवार में मौत (सूतक) होने पर भी वह सेवा नहीं छोड़ सकता।
  • शाही प्रतिबंध (Royal Restriction): भक्त देवा गुर्जर की लाज रखने के लिए भगवान ने स्वयं सिर से असली बाल दिखाए थे, जिससे रक्त टपकने लगा था। उस रात के बाद से मेवाड़ के राणा (राजा) बनने के बाद यहाँ कोई शासक दर्शन के लिए सीधे नहीं आता। केवल युवराज पद पर रहते हुए ही दर्शन की अनुमति है।
  • शस्त्रों से शृंगार: राजा और रक्षक रूप में होने के कारण ठाकुरजी को मोर मुकुट और बंशी के साथ-साथ शंख, चक्र, गदा, ढाल-तलवार और भाला भी धराए जाते हैं।
  • दर्शन का समय: प्रतिदिन सुबह 8:00 बजे से शाम 7:30 बजे तक पट भक्तों के लिए खुले रहते हैं। दिनभर में कुल 5 विशेष दर्शन होते हैं।
  • सबसे बड़ा मेला (Main Fair): प्रतिवर्ष भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी (जलझूलनी एकादशी – Jaljhulni Ekadashi) को यहाँ लाखों श्रद्धालुओं का विशाल मेला लगता है। इस दिन ठाकुरजी को सोने के विमान (रथ) में बिठाकर पवित्र सरोवर में स्नान कराने ले जाया जाता है। इसके अलावा जन्माष्टमी पर भगवान के पोतड़े धोने की विशेष परंपरा निभाई जाती है
  • विशेष महाप्रसाद: मंगला दर्शन में ताजा मक्खन, राजभोग में केसरिया भात व लापसी और शाम को कसार व शुद्ध दूध का भोग लगाया जाता है।

श्री चारभुजानाथ मंदिर, गढ़बोर ,चतुर्भुज रूप का प्राकट्य और पौराणिक इतिहास (Mythological History of Charbhuja Nath)

इस मंदिर की स्थापना का इतिहास सीधा महाभारत काल और भगवान श्रीकृष्ण के गोलोक गमन से जुड़ा हुआ है:

श्रीकृष्ण की आज्ञा और विश्वकर्मा का निर्माण: पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण इस धरातल को छोड़कर गोलोक जाने वाले थे, तब उनके परम सखा उद्धव व्याकुल हो गए। श्रीकृष्ण ने देवशिल्पी विश्वकर्मा से स्वयं और बलराम जी की दो दिव्य प्रतिमाएं बनवाईं और इन्हें देवराज इंद्र को सौंपकर कहा कि ये मूर्तियां पांडव युधिष्ठिर और सुदामा को दे दी जाएं। कलयुग में मनुष्य इन मूर्तियों के दर्शन कर अपनी मनोकामनाएं पूरी कर सकेंगे।

पांडवों और सुदामा द्वारा पूजा: इंद्र देव ने कृष्ण स्वरूप की यह चतुर्भुज प्रतिमा पांडवों को और दूसरी सत्यनारायण प्रतिमा सुदामा को दी। सुदामा द्वारा पूजी गई मूर्ति आज भी पास के ही सेवंत्री गांव में स्थित है। पांडवों ने हिमालय जाकर देह त्यागने से पूर्व इस भव्य मूर्ति की पवित्रता अक्षुण्ण रखने के लिए इसे जलमग्न (पानी में छुपा) कर दिया था।

राजा गंगदेव को स्वप्न: द्वापर युग के बाद, गढ़बोर के तत्कालीन राजपूत शासक राजा गंगदेव को चारभुजानाथ ने स्वप्न में दर्शन देकर पानी से मूर्ति निकालकर मंदिर स्थापित करने का आदेश दिया। राजा ने ऐसा ही किया और इस प्रकार गढ़बोर धाम की स्थापना हुई। बाद में मुगलों के आक्रमणों के दौरान भी इस पवित्र विग्रह को कई बार जलमग्न कर सुरक्षित रखा गया।

श्री चारभुजानाथ मंदिर गढ़बोर का ऐतिहासिक जीर्णोद्धार और राजपूत शौर्य की गाथा (Historical Insights)

चौहान वंश द्वारा जीर्णोद्धार: चारभुजा के ऐतिहासिक शिलालेख के अनुसार, सन् 1444 ईस्वी (विक्रम संवत 1501) में चौहान वंश की खरवड़ शाखा के ठाकुर महिपाल चौहान और उनके पुत्र रावत लक्ष्मण चौहान ने इस मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार करवाया था

प्राचीन नाम ‘बद्री’: मंदिर के एक प्राचीन शिलालेख से यह भी ज्ञात होता है कि इस पूरे क्षेत्र का प्राचीन नाम “बद्री” था, जो कि हिमालय के बद्रीनाथ धाम से मेल खाता है।

सोलंकी राजाओं का समर्पण: रूपनगर और देसूरी के सोलंकी राजाओं ने ठाकुरजी के बाल भोग के लिए देसूरी और झीलवाड़ा की उपजाऊ जमीनें मंदिर को अर्पित की थीं, जिसका वर्णन इस प्रसिद्ध दोहे में मिलता है:भला सोलंकी राजवा ,धणी दैसुरी नाम |गॉव गढबोर अर्पण किया ,चारभुजा के घाम

मेवाड़ महाराणाओं के श्री चारभुजानाथ मंदिर गढ़बोर आने पर प्रतिबंध क्यों है? (Royal Restriction Myth & Story)

मेवाड़ के इतिहास में एक बेहद भावुक प्रसंग इस मंदिर से जुड़ा है। एक बार तत्कालीन मेवाड़ महाराणा उदयपुर से दर्शन के लिए आ रहे थे, लेकिन उन्हें पहुँचने में देर हो गई। मंदिर के मुख्य पुजारी देवा गुर्जर ने भगवान का शयन (सुला) करा दिया और नियमानुसार ठाकुरजी को पहनाई जाने वाली माला खुद पहन ली।

अचानक महाराणा मंदिर पहुँच गए। पुजारी ने आनन-फानन में वह माला उतारकर महाराणा को पहना दी। महाराणा ने जब माला देखी, तो उसमें एक सफेद बाल (Hair) उलझा हुआ था। उन्होंने पुजारी से पूछा, “क्या भगवान बूढ़े होने लगे हैं?” पुजारी देवा ने घबराकर ‘हाँ’ कह दिया। महाराणा ने संदेह होने पर जांच के आदेश दिए।

अगले दिन जब सैनिकों ने मूर्ति के सिर से उस बाल को उखाड़ना चाहा, तो साक्षात श्रीविग्रह से रक्त (खून) की बूंदें टपकने लगीं। भगवान ने अपने भक्त देवा की लाज रख ली। उसी रात भगवान ने महाराणा को स्वप्न में आदेश दिया कि भविष्य में कोई भी मेवाड़ महाराणा गढ़बोर दर्शन के लिए सीधे नहीं आएगा। तब से आज तक इस परंपरा का निर्वाह हो रहा है; मेवाड़ के महाराणा यहाँ सीधे नहीं आते, लेकिन महाराणा बनने से पूर्व ‘युवराज’ के रूप में यहाँ आकर धोक लगाते हैं और आशीर्वाद लेकर ही पदवी धारण करते हैं।

श्री चारभुजानाथ मंदिर गढ़बोर :1000 परिवार और ‘ओसरे’ की सबसे कठिन सेवा परंपरा (The Unique Traditional System)

क्या है ओसरे की परंपरा?48 साल का लंबा इंतजार: इन 1000 परिवारों में पूजा का अधिकार गोत्र और संख्या के अनुसार विभाजित है, जिसे ‘ओसरा’ (Turn) कहा जाता है। यह ओसरा हर अमावस्या को बदलता है। परिवारों की संख्या इतनी अधिक है कि किसी परिवार का नंबर 4 साल में आता है, तो किसी का पूरे 48 से 50 साल में (यानी जीवन में सिर्फ एक बार)।

पुजारी के कड़े नियम और मर्यादाएं:कठिन तपस्या: जिस पुजारी का ओसरा चलता है, वह एक महीने तक अपने घर नहीं जा सकता। उसे मंदिर परिसर में ही रहना पड़ता है।

शोक में भी सेवा: यदि ओसरे के दौरान पुजारी के सगे-संबंधियों या परिवार में किसी की मृत्यु (शोक) भी हो जाए, तो भी वह मंदिर छोड़कर नहीं जा सकता; उसे भगवान की सेवा की मर्यादा निभानी ही पड़ती है।

कठिन ब्रह्मचर्य और नियम: इस एक महीने के दौरान पुजारी किसी भी प्रकार के व्यसन (Addiction) से दूर रहते हैं, बदन पर साबुन नहीं लगाते और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। भगवान की रसोई के लिए पानी केवल चांदी के कलश (और फागोत्सव व जलझूलनी पर सोने के कलश) में ही लाया जाता है। गर्भगृह में पुजारी के अलावा किसी भी अन्य व्यक्ति का प्रवेश पूरी तरह वर्जित है।

श्री चारभुजानाथ मंदिर, गढ़बोर दर्शन, शृंगार और महाप्रसाद (Darshan, Shringar & Prasad)

चारभुजानाथ मंदिर के कपाट सुबह 8:00 बजे से रात 7:30 बजे तक भक्तों के लिए खुले रहते हैं, जहाँ दिनभर में 5 विशेष दर्शन होते हैं:

  • मंगला दर्शन: इस समय ठाकुरजी को शुद्ध मक्खन (Butter) का भोग लगाया जाता है
  • राजभोग दर्शन: दोपहर में केसरिया भात, पारंपरिक लापसी और सादा चावल का महाप्रसाद चढ़ाया जाता है।
  • शाम के दर्शन: संध्या के समय कसार और गाय के शुद्ध दूध का भोग लगता है।
  • शृंगार की विशेषता: ठाकुरजी के चतुर्भुज स्वरूप को मोर मुकुट, बंशी और रत्नजड़ित आभूषणों से सजाया जाता है। चूंकि वे राजा और रक्षक रूप में हैं, इसलिए प्रतिमा को शंख, चक्र, गदा के साथ-साथ ढाल-तलवार और भाला भी धराए जाते हैं। जन्माष्टमी के पावन पर्व पर भगवान के पोतड़े (बाल वस्त्र) धोने की ऐतिहासिक परंपरा आज भी निभाई जाती है।
  • भाद्रपद मास की जलझूलनी एकादशी (Jaljhulni Ekadashi) पर यहाँ राजस्थान का सबसे विशाल मेला लगता है, जहाँ ठाकुरजी को सोने के रथ (विमान) में बिठाकर पवित्र सरोवर में स्नान कराने ले जाया जाता है।

ठाकुरजी का अनोखा शृंगार: मोर मुकुट के साथ ढाल-तलवार क्यों?

सामान्यतः भगवान श्रीकृष्ण के विग्रहों में उनके हाथों में केवल मुरली (बांसुरी) या सुदर्शन चक्र दिखाई देता है, लेकिन गढ़बोर के चारभुजानाथ जी के शृंगार में अद्भुत विविधता है:

वीर और वात्सल्य रस का मेल: ठाकुरजी के शीश पर बेहद सुंदर रत्नजड़ित मोर मुकुट (More Mukut) सजाया जाता है और होठों पर सोने की बंशी (Flute) धराई जाती है, जो उनके शांत और वात्सल्य रूप को दर्शाती है।

रक्षक और योद्धा रूप: चूंकि यह मूर्ति महाभारत काल में पांडवों द्वारा पूजी जाती थी, इसलिए इस विग्रह को एक क्षत्रिय योद्धा और राजा के रूप में सजाया जाता है। भगवान के चारों हाथों में सनातन धर्म के पारंपरिक प्रतीक शंख, चक्र, गदा और पद्म (कमल) तो विराजमान हैं ही, लेकिन इसके साथ ही उनके सम्मुख ढाल, तलवार और भाला भी धराए जाते हैं। मान्यता है कि भगवान इस वीर रूप में अपने भक्तों और पूरे मेवाड़ अंचल की रक्षा दुष्टों से करते हैं।

भगवान चारभुजानाथ जी को मोर मुकुट-बंशी के साथ ढाल, तलवार और भाला जैसे अस्त्र-शस्त्र क्यों धराए जाते हैं और उनके 5 भोगों की क्या विशेषता है?

गढ़बोर के श्री चारभुजानाथ जी का विग्रह द्वापर युग में महाभारत युद्ध से पूर्व पांडवों द्वारा पूजित है। पांडवों ने भगवान को अपने रक्षक, मार्गदर्शक और राजा के रूप में पूजा था, इसलिए यहाँ विष्णु स्वरूप को मोर मुकुट-बंशी के वात्सल्य भाव के साथ-साथ क्षत्रिय योद्धा के रूप में ढाल, तलवार और भाला धराए जाते हैं, जो मेवाड़ और भक्तों की रक्षा का प्रतीक है। भगवान की सेवा राजसी मर्यादा से होती है, जिसमें दिनभर में 5 दर्शन होते हैं। बाल स्वरूप के लिए मंगला में ताजा मक्खन और राजा स्वरूप के लिए राजभोग में प्रसिद्ध केसरिया भात व लापसी का शाही महाप्रसाद चढ़ाया जाता है।

मेवाड़ का महाकुंभ: जलझूलनी एकादशी मेला और ठाकुरजी का स्वर्ण विमान (Jaljhulni Ekadashi Mela)

राजस्थान (Rajasthan) के राजसमंद जिले में स्थित गढ़बोर के चारभुजानाथ मंदिर का सबसे दिव्य, भव्य और अलौकिक उत्सव जलझूलनी एकादशी मेला (Jaljhulni Ekadashi Mela) है। भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवझूलनी एकादशी) को आयोजित होने वाला यह मेला मेवाड़ अंचल का एक ‘महाकुंभ’ माना जाता है, जिसमें भक्ति, परंपरा और राजसी वैभव का ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है जो देश में कहीं और दुर्लभ है।

ठाकुरजी का नगर भ्रमण: इस पावन तिथि पर भगवान चारभुजानाथ जी अपने गर्भगृह से बाहर निकलकर अपनी प्रजा का हाल जानने नगर भ्रमण पर निकलते हैं।

स्वर्ण और रजत का रथ (बेवाण): भगवान को बिठाने के लिए विशेष सोने और चांदी से निर्मित पालकी (जिसे स्थानीय भाषा में बेवाण या विमान कहा जाता है) का उपयोग किया जाता है। सूर्य की किरणों में चमकता यह स्वर्ण विमान जब मंदिर के सिंहद्वार से बाहर आता है, तो पूरा गढ़बोर “चारभुजानाथ की जय” और “हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की” के गगनभेदी जयकारों से गूंज उठता है।

क्षीर सागर (सरोवर) में शाही स्नान: मंदिर से गाजे-बाजे, ऊंट-घोड़ों और अखाड़ों के करतबों के साथ भव्य शोभायात्रा रवाना होती है, जो रिछेड़ मार्ग पर स्थित पवित्र सरोवर (जिसे दूधिया तालाब या क्षीर सागर कहा जाता है) पहुँचती है। यहाँ मुख्य पुजारी भगवान के विग्रह को गोदी में लेकर नाव में बैठते हैं और पवित्र सरोवर के जल में ठाकुरजी को ‘जलझूलनी’ यानी शाही स्नान (Holy Bath) कराने की पारंपरिक रस्म पूरी की जाती है।

गढ़बोर के चारभुजानाथ मेले को ‘लखी मेला’ (Lakhni Mela) क्यों कहा जाता है?

इस मेले को लखी मेला (Lakhni Mela) इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लाखों में होती है।मल्टीपल स्टेट्स से आने वाले भक्त: मेले के दौरान केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश से भारी संख्या में (High Volume) श्रद्धालु गढ़बोर पहुँचते हैं। विशेष रूप से गुजरात और महाराष्ट्र के प्रवासी राजस्थानी और माहेश्वरी समाज के लोग इस दिन अपनी कुलदेवी आमज माता और आराध्य चारभुजानाथ के दर्शन के लिए हफ्तों पहले अपनी बुकिंग करवा लेते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा निर्मित 5285 वर्ष पुरानी पांडव कालीन मूर्ति और सुदामा की मूर्ति का आपस में क्या संबंध है, और सुदामा वाली दूसरी मूर्ति वर्तमान में कहाँ स्थित है?

पौराणिक इतिहास के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने गोलोक गमन से पूर्व देवशिल्पी विश्वकर्मा से स्वयं के विग्रह की दो दिव्य मूर्तियां बनवाई थीं। श्रीकृष्ण ने ये मूर्तियां देवराज इंद्र के माध्यम से अपने परम भक्तों—पांडवों और सुदामा को भेंट की थीं। द्वापर युग में पांडवों द्वारा पूजी जाने वाली मुख्य चतुर्भुज मूर्ति वर्तमान में राजसमंद के गढ़बोर गांव में ‘श्री चारभुजानाथ’ के नाम से विश्व प्रसिद्ध है। वहीं, श्रीकृष्ण के परम मित्र सुदामा द्वारा पूजी जाने वाली दूसरी जुड़वां मूर्ति गढ़बोर के पास ही स्थित सेवंत्री गांव में श्री रूपनारायण (सत्यनारायण जी) के नाम से प्रतिष्ठित है, जिनका आपस में गहरा संबंध है।

गढ़बोर चारभुजा नाथ मंदिर की रक्षा के लिए 125 युद्ध क्यों लड़े गए?

मध्यकाल में मुगलों और अन्य विदेशी आक्रांताओं ने मेवाड़ के कई प्रसिद्ध मंदिरों को तोड़ने का प्रयास किया था। चारभुजा नाथ की पवित्र और चमत्कारी प्रतिमा को शत्रुओं के विनाश से सुरक्षित रखने के लिए स्थानीय राजपूत शासकों, गुर्जर पुजारियों और मेवाड़ के वीरों ने मिलकर इतिहास में लगभग 125 छोटे-बड़े युद्ध लड़े।

श्री चारभुजानाथ मंदिर, गढ़बोर मूर्ति को ‘जलमग्न’ (पानी में छिपाकर) रखने का क्या रहस्य है?

जब भी आक्रांताओं के आक्रमण का भारी संकट आता था और युद्ध में सुरक्षा असंभव लगती थी, तब मंदिर के पुजारी अत्यंत सूझबूझ से भगवान की मूल प्रतिमा को गर्भगृह से निकालकर पास ही बहने वाली गोमती नदी या अन्य गुप्त जलस्रोतों (जैसे दूध-कुंड) के गहरे पानी में छिपा देते थे। संकट टलने के बाद मूर्ति को पुनः जल से निकालकर स्थापित किया जाता था।

श्री चारभुजानाथ मंदिर, गढ़बोर मूर्ति जलमग्न रखने की इस ऐतिहासिक घटना का आज क्या महत्व है?

इतिहास की इसी जलमग्न परंपरा की याद में आज भी हर साल भाद्रपद मास की ‘जलझूलनी एकादशी’ (ग्यारस) मनाई जाती है। इस दिन भगवान चारभुजा नाथ को बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मंदिर से बाहर लाकर नदी या कुंड के पवित्र जल में स्नान (जलविहार) कराया जाता है, जिसे देखने देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं।

ग्वाले सूराजी बगड़वाल कौन थे और उनका चारभुजा जी मंदिर से क्या संबंध है?

सूराजी बगड़वाल गढ़बोर क्षेत्र के एक स्थानीय गुर्जर ग्वाले (गाय चराने वाले) थे। लोक मान्यताओं के अनुसार, वे ही वह पहले व्यक्ति थे जिनके माध्यम से अरावली की पहाड़ियों में छिपे भगवान चारभुजा नाथ के चमत्कारी विग्रह (मूर्ति) के प्रकट होने का रहस्य दुनिया के सामने आया।

सूराजी की गाय के साथ चारभुजा में क्या चमत्कारी घटना घटित होती थी?

सूराजी की गायों में से एक विशेष गाय रोज़ाना जंगल में एक निश्चित स्थान पर जाकर खड़ी हो जाती थी। वहाँ उसके स्तनों से स्वतः ही दूध की धारा बहने लगती थी और वह भूमि पर गिर जाता था। जब सूराजी ने इस रहस्य का पीछा किया, तब उन्हें उस पवित्र स्थान का पता चला।

गढ़बोर भूमि के नीचे मूर्ति होने का पता राजा गंगदेव को कैसे चला?

जब ग्वाले सूराजी ने इस अनोखी घटना की जानकारी गढ़बोर के तत्कालीन राजपूत शासक राजा गंगदेव को दी, तो राजा ने उस स्थान पर खुदाई करवाई। उसी समय राजा गंगदेव को स्वप्न में भगवान ने दर्शन देकर वहाँ अपनी मूर्ति होने और उसे स्थापित करने का आदेश दिया था।

गढ़बोर गांव भौगोलिक स्थिति और कैसे पहुँचें गढ़बोर श्री चार भुजा मंदिर

प्राचीन शिलालेखों के अनुसार इस क्षेत्र का ऐतिहासिक नाम ‘बद्री’ भी था, जिस कारण इस धाम को ‘मेवाड़ का बद्रीनाथ’ भी कहा जाता है।

दूरी: यह मंदिर राजसमंद जिला मुख्यालय से लगभग 38 किलोमीटर, कुंभलगढ़ से 32 किलोमीटर और झीलों की नगरी उदयपुर से करीब 112 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

मार्ग: आप उदयपुर महाराणा प्रताप हवाई अड्डे या उदयपुर रेलवे स्टेशन पर उतरकर निजी टैक्सी या राज्य परिवहन की बसों द्वारा सड़क मार्ग से आसानी से गढ़बोर पहुँच सकते हैं।

श्री चारभुजानाथ मंदिर, गढ़बोर की वास्तु कला

मुख्य विग्रह: मंदिर के गर्भगृह में भगवान चारभुजा नाथ की 85 सेंटीमीटर ऊँची श्याम वर्ण की दिव्य चतुर्भुजी प्रतिमा विराजमान है, जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म (कमल) सुशोभित हैं।

कांच और संगमरमर का काम: मंदिर का निर्माण सफ़ेद संगमरमर, चूने और उत्तम कोटि के दर्पणों (कांच की नक्काशी) से किया गया है।

सोने-चाँदी के कपाट: गर्भगृह के अंदरूनी द्वार (कपाट) सोने से और बाहरी कपाट चांदी के पत्तरों से मढ़े हुए हैं।

प्रवेश द्वार: मंदिर के मुख्य सिंहद्वार के दोनों ओर विशाल पाषाण (पत्थर) के हाथी पहरेदार के रूप में निर्मित हैं।

चारभुजा जी को ‘मेवाड़ का बद्रीनाथ’ क्यों कहा जाता है?

प्राचीन शिलालेखों और पुराणों के अनुसार इस पावन क्षेत्र का ऐतिहासिक नाम ‘बद्री’ था। जिस प्रकार उत्तर भारत में बद्रीनाथ धाम का महत्व है, उसी प्रकार मेवाड़ क्षेत्र में इस चतुर्भुज स्वरूप की अत्यधिक मान्यता होने के कारण इसे ‘मेवाड़ का बद्रीनाथ’ कहा जाता है।

गढ़बोर चारभुजा नाथ मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि मेवाड़ के शौर्य, अनूठी परंपराओं और इतिहास का जीवंत प्रतीक है। 125 युद्धों का गौरवशाली इतिहास और ग्वाले सूराजी की पावन कथा इस धाम को अद्वितीय बनाती है। आज भी यहाँ होने वाला जलझूलनी मेला लाखों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था को प्रदर्शित करता है।

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