रातभर जगकर लोग क्यों देखते हैं राजस्थान का यह अनोखा ‘रम्मत लोक नाट्य (Rammat Folk Theater)’? जानिए इसकी 5 दिलचस्प वजहें!

रम्मत लोक नाट्य (Rammat Folk Theater) का पूरा इतिहास! पाटा संस्कृति, तेज कवि की स्वतंत्र बावनी, टेरियो, मुख्य वाद्य यंत्र पर ऐसी जानकारी कि पढ़कर आप खुश हो जायेंगे।

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क्या है रम्मत लोक नाट्य? (What is Rammat Folk Drama?)

सरल शब्दों में कहें तो ‘रम्मत’ का शाब्दिक अर्थ ‘खेल’ या मनोरंजन से है। यह एक ऐसा संगीत नाट्य (Musical Theatre) है जो पूरी तरह से काव्य रचनाओं (Poetic compositions) पर आधारित होता है। इसमें ऐतिहासिक (Historical) और पौराणिक (Mythological) कहानियों को गीतों और संवादों के माध्यम से मंच पर उतारा जाता है।

इस नाट्य विधा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें मंच पर कोई भारी-भरकम साज-सज्जा या पर्दों का तामझाम नहीं होता। कलाकार सीधे दर्शकों के बीच आकर बैठ जाते हैं ताकि लोग उनकी वेशभूषा और मेकअप को अच्छी तरह देख सकें। इसके संवादों में स्थानीय बोली की ऐसी महक होती है, जो दर्शकों को शुरू से अंत तक बांधकर रखती है।

रम्मत लोक नाट्य के 2 सबसे प्रसिद्ध रूप (2 Most Famous Forms of Rammat)

बीकानेर की रम्मत (Rammat of Bikaner)

बीकानेर में रम्मत का इतिहास बहुत पुराना है। यहाँ होली के दिनों में फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी तक इसका शानदार आयोजन होता है।

मंचन का तरीका: यहाँ रम्मत का प्रदर्शन लकड़ी के बड़े-बड़े तख्तों (जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘पाटा’ कहा जाता है) पर किया जाता है। बीकानेर की पाटा संस्कृति इसके लिए काफी प्रसिद्ध है।

शुरुआत: बीकानेर में रम्मतों की शुरुआत हमेशा ‘फक्कड़दाता री रम्मत’ से होती है।

प्रमुख विषय व कलाकार: प्रहलाद, लैला-मजनूं, राजा हरिश्चंद्र और पूर्णमल की कहानियां यहाँ खूब खेली जाती हैं। ‘हिड़ाऊ मेरी’ (आदर्श पति-पत्नी पर आधारित) यहाँ की सबसे लोकप्रिय रम्मत है, जिसका सूत्रपात जवाहर लाल पुरोहित जी ने किया था। फागू और सूआ महाराज यहाँ के दिग्गज कलाकार माने जाते हैं।

2. जैसलमेर की रम्मत (Rammat of Jaisalmer)

जैसलमेर की रम्मत का अपना एक अलग ही गौरवशाली इतिहास है। यहाँ के कलाकारों ने रम्मत को केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि देशभक्ति का जरिया भी बनाया।

तेज कवि और ‘स्वतंत्र बावनी’: जैसलमेर के सबसे प्रमुख रम्मत कलाकार तेज कवि (Tej Kavi) थे। उन्होंने ‘स्वतंत्र बावनी’ (Swatantra Bawni) नामक एक क्रांतिकारी पुस्तक रचित की और इसे महात्मा गांधी को भेंट किया था, जिसके कारण ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया था। सकलमल और तुलसीदास भी यहाँ के अन्य नामचीन कलाकार हैं।

रम्मत लोक नाट्य की 5 मुख्य विशेषताएं जो इसे बनाती हैं अनोखा:

साहित्यिकता (Literary depth): रम्मत की सबसे बड़ी ताकत इसकी काव्य रचनाएं और उच्च साहित्यिक स्तर है।

सामुदायिक सद्भाव (Community Harmony): इस लोक नाट्य में जाति-पांति का कोई भेद नहीं होता; समाज के सभी समुदायों के लोग मिलकर इसमें भाग लेते हैं

पारंपरिक वाद्य यंत्र: नगाड़े की थाप और ढोलक की गूंज ही इस पूरे नाटक का बैकग्राउंड म्यूजिक होती है।

पाटा संस्कृति: खुले चौक में लकड़ी के पाटों पर बैठना और जमीन से जुड़कर कला का आनंद लेना अद्भुत है।

सरल रंगमंच (Simple Stage): बिना किसी आधुनिक तकनीक या लाइटिंग के भी यह नाटक दर्शकों को पूरी रात जगाए रखने का दम रखता है।

क्या है कच्छी घोड़ी नृत्य? (What is Kacchi Ghodi Dance?)

‘कच्छी घोड़ी’ का सीधा सा अर्थ है—काठ या बांस से बनी नकली घोड़ी। यह राजस्थान का एक अत्यंत लोकप्रिय व्यावसायिक लोक नृत्य (Professional Folk Dance) है, जिसे केवल पुरुषों द्वारा किया जाता है।

इस नृत्य में नर्तक बांस और रंग-बिरंगे कागजों-कपड़ों से बनी एक कृत्रिम घोड़ी को अपनी कमर पर बांधते हैं। इसके बाद वे बिल्कुल किसी दूल्हे की तरह शाही वेशभूषा (धोती-कुर्ता और पगड़ी) धारण करते हैं और हाथ में चमचमाती तलवार लेकर युद्ध का स्वांग रचते हुए घोड़ी को नचाते हैं।

फक्कड़दाता री रम्मत (Fakkaddata Ri Rammat)

यह बीकानेर की सबसे प्राचीन रम्मतों में से एक है। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि इसमें मंच पर आकर कलाकार मस्ती और फक्कड़पन के साथ समाज की कुरीतियों पर करारा व्यंग्य (Satire) करते हैं।

बाबा रामदेव जी के भजन और रम्मत (Bhajans of Baba Ramdevji)

रम्मत की शुरुआत हमेशा चौमासा, लावणी और गणपति वंदना से होती है, लेकिन लोकदेवताओं में सबसे पहले बाबा रामदेव जी के भजन गाकर ही खेल की विधिवत शुरुआत की जाती है। ऐसा माना जाता है कि इससे आयोजन बिना किसी बाधा के संपन्न होता है।

हिड़ाऊ मेरी री रम्मत (Hidau Meri Ri Rammat)

जवाहरलाल पुरोहित जी द्वारा रचित यह रम्मत आदर्श पति-पत्नी के चरित्र पर आधारित है। बीकानेर के बिस्सों के चौक में खेली जाने वाली यह रम्मत अपनी उच्च साहित्यिक शैली और आदर्शवादी संवादों के लिए पूरे राजस्थान में विख्यात है।

तेज कवि और स्वतंत्र बावनी (Tej Kavi & Swatantra Bawni)

जैसलमेर के तेज कवि ने अपनी इस पुस्तक के माध्यम से अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती दी थी। जब ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ्तारी का वारंट निकाला, तो वे खुद पुलिस थाने पहुंच गए थे और कमिश्नर के सामने खड़े होकर कहा था:

कमिश्नर खोल दरवाजा, हमें भी जेल जाना है, हिंद तेरा है न तेरे बाप का, हमारी मातृभूमि पर तुमने क्यों डेरा जमाना है।”

फागू महाराज, सूआ महाराज और मनीराम व्यास का रम्मत से संबंध (Relation with Rammat)

फागू महाराज, सूआ महाराज और मनीराम व्यास का संबंध बीकानेर की प्रसिद्ध रम्मत (Rammat of Bikaner) से है। ये तीनों रम्मत लोक नाट्य के महान और दिग्गज कलाकार (Legends of Rammat) माने जाते हैं।

फागू महाराज और सूआ महाराज: इन्हें बीकानेर में रम्मतों का ‘भीष्म पितामह’ या मुख्य सूत्रधार माना जाता है। इन्होंने बीकानेर की पाटा संस्कृति (Pata Culture) में रम्मत को एक नई ऊंचाई दी।

मनीराम व्यास: मनीराम व्यास रम्मत के बेहतरीन गायक और रचयिता थे। बीकानेर के ‘व्यास चौक’ में होने वाली रम्मतों में इनका योगदान अतुलनीय रहा है। इनके गाए हुए मोड़ और लावणी आज भी बीकानेर में गूंजते हैं।

तेज कवि जैसलमेरी का क्रांतिकारी जीवन और रम्मतें (Tej Kavi Jaisalmeri)

जैसलमेर के तेज कवि (Tej Kavi) केवल एक लोक कलाकार नहीं थे, बल्कि वे एक सच्चे देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानी (Freedom Fighter) थे। उन्होंने अपनी रम्मत विधा को देश की आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ एक हथियार बनाया।

अखाड़े की स्थापना: तेज कवि ने जैसलमेर में ‘श्री कृष्ण कंपनी’ नाम से एक रम्मत अखाड़ा (Rammat Akhada) शुरू किया था।

अंग्रेजों को खुली चुनौती: उनकी रम्मतों के संवाद और गीत इतने जोशीले होते थे कि उन्हें सुनकर युवाओं में देशभक्ति की लहर दौड़ जाती थी। इसी से परेशान होकर ब्रिटिश सरकार ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी कर दिया था।

जेल के सामने गर्जना: वारंट जारी होने पर तेज कवि डरे नहीं, बल्कि वे खुद चलकर जैसलमेर पुलिस थाने (जेल) के दरवाजे पर पहुंच गए और वहां खड़े होकर उन्होंने कमिश्नर के सामने यह ऐतिहासिक पंक्तियां गाई थीं:

“कमिश्नर खोल दरवाजा, हमें भी जेल जाना है।हिंद तेरा है न तेरे बाप का, हमारी मातृभूमि पर तुमने क्यों डेरा जमाना है।”

तेज कवि की प्रमुख रम्मतें और रचनाएं (Famous Creations):

स्वतंत्र बावनी (Swatantra Bawni – 1943): यह उनकी सबसे प्रसिद्ध और क्रांतिकारी रचना है। इसमें 52 कड़ियां (बावनी) थीं जो पूरी तरह देशभक्ति से ओत-प्रोत थीं। उन्होंने यह पुस्तक महात्मा गांधी को भेंट की थी, जिसके बाद अंग्रेजी हुकूमत पूरी तरह भड़क गई थी।

मुमल-महेन्द्र री रम्मत (Mumal-Mahendra Rammat): यह जैसलमेर की प्रसिद्ध प्रेम कहानी मुमल और महेंद्र पर आधारित रम्मत थी, जिसे उन्होंने स्थानीय रंग में ढाला।

जोगी-भरथरी री रम्मत (Jogi-Bhartari Rammat): राजा भरथरी के वैराग्य और जीवन पर आधारित एक बेहद लोकप्रिय रम्मत।

छैल-तम्बोला री रम्मत (Chhail-Tambolan Rammat): यह भी उनकी एक प्रमुख संगीतमय प्रस्तुति थी जो जैसलमेर के जनमानस में रची-बसी थी।

“गणपति वंदना, चौमासा और लावणी जैसी लोकगीत शैलियों का संबंध किस लोक नाट्य से है

गणपति वंदना: रम्मत के मंच (पाटे) पर खेल शुरू होने से पहले सबसे पहले गणेश जी की स्तुति गाई जाती है।

चौमासा: इसके तहत वर्षा ऋतु का बेहद सुंदर काव्यात्मक वर्णन (Poetic description) गाकर सुनाया जाता है।

लावणी: यह रम्मत के संवादों और कड़ियों को जोड़ने वाली मुख्य लोकगीत शैली है, जो अपनी विशेष तान और सुर के लिए जानी जाती है।

“रम्मत के कलाकारों को क्या संज्ञा दी जाती है?”

रम्मत लोक नाट्य में भाग लेने वाले पात्रों, नर्तकों या अभिनेताओं को स्थानीय भाषा में ‘खेलार’ (या खेलारी) कहा जाता है।

टेरियो (Teriyo) रम्मत में क्या है?

: रम्मत लोक नाट्य में जो कलाकार मुख्य संवाद, मुख्य कड़ियां या गीतों की शुरुआती पंक्तियां गाते हैं, उन्हें ‘टेरियो’ कहा जाता है। टेरियो रम्मत का सबसे मुख्य गायक या सूत्रधार होता है। जब टेरियो ऊंचे स्वर में टेक (कड़ी) उठाता है, तो बाकी के कलाकार (गायक) उसके पीछे-पीछे उस कड़ी को दोहराते हैं। इनकी आवाज बहुत बुलंद और दमदार होती है ताकि बिना माइक के भी दूर तक सुनाई दे।

पाटा संस्कृति (Pata Culture) और रम्मत लोक नाट्य

बीकानेर में रम्मत का मंचन किसी आधुनिक थिएटर या ऊंचे स्टेज पर नहीं होता, बल्कि मोहल्लों के चौकों में लकड़ी के बहुत बड़े-बड़े तख्तों (पाटों) को जोड़कर एक खुला मंच बनाया जाता है। इसी को बीकानेर में पाटा कहते हैं और इस भावना का नाम पाटा संस्कृति है जो inforamal कम्युनिकेशन है।

रम्मत लोक नाट्य मुख्य वाद्य यंत्र (Musical Instruments)

अर्थ: रम्मत मूल रूप से एक संगीत और काव्य प्रधान नाट्य है, इसलिए इसमें संगीत का बहुत बड़ा रोल है। इसके मुख्य वाद्य यंत्र नगाड़ा (Nagada) और ढोलक (Dholak) हैं।

: नगाड़े की जोरदार थाप ही रम्मत के खेलार (कलाकारों) में जोश भरती है। इसके अलावा कहीं-कहीं झांझ और थाली का प्रयोग भी सहायक वाद्यों के रूप में किया जाता है, लेकिन परीक्षा के लिहाज से ‘नगाड़ा और ढोलक’ सबसे मुख्य हैं।

फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से चतुर्दशी तक होली के त्योहार पर रम्मत का आयोजन कैसे होता है ?

राजस्थान, खासकर बीकानेर में होली का हुड़दंग केवल एक या दो दिन का नहीं होता, बल्कि यह पूरे एक सप्ताह तक चलता है। फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से लेकर फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी (होली दहन से एक दिन पहले) तक हर रात बीकानेर के चौक रम्मतों से गुलजार रहते हैं।

रात्रिकालीन मंचन (Night Performances): रम्मतों का आयोजन हमेशा रात के समय शुरू होता है जो अगले दिन सुबह भोर (सुबह 4-5 बजे) तक चलता है।

अखाड़ों के बीच मुकाबला: बीकानेर के अलग-अलग मोहल्लों के अखाड़े (जैसे बिस्सों का चौक, आचार्यों का चौक, व्यास चौक) अपने-अपने पाटे (लकड़ी के मंच) तैयार करते हैं। इन दिनों में अलग-अलग रातों को अलग-अलग रम्मतें जैसे- हिड़ाऊ मेरी री रम्मत, अमरसिंह राठौड़ री रम्मत, चौसर री रम्मत खेली जाती हैं।

रम्मत में प्रयुक्त होने वाली प्रमुख लोकगीत शैलियां:

गणपति वंदना (Ganpati Vandana)महत्व: किसी भी रम्मत की शुरुआत मंच पर गणेश जी की स्तुति के साथ होती है। खेलार (कलाकार) मंच पर आते हैं और सबसे पहले विघ्नहर्ता गणेश जी को याद करते हैं ताकि पूरा आयोजन बिना किसी बाधा के संपन्न हो सके।

चौमासा (Chaumasa)अर्थ: ‘चौमासा’ का शाब्दिक अर्थ है चार महीने, जो मुख्य रूप से वर्षा ऋतु (Monsoon) को दर्शाते हैं।रम्मत में उपयोग: रम्मत की शुरुआत में (गणपति वंदना के ठीक बाद) कलाकारों द्वारा ‘चौमासा’ गाया जाता है। इसमें बादलों का उमड़ना, बिजली की कड़क, मोर की कूक और वर्षा ऋतु में विरह या मिलन के भावों को बहुत ही सुंदर काव्यात्मक शैली में गाया जाता है। हालांकि यह आयोजन फाल्गुन (फागुन/सर्दियों के अंत) में होता है, लेकिन चौमासा गाकर माहौल में एक अलग ही रस घोल दिया जाता है।

लावणी (Lavani)अर्थ: लावणी का अर्थ यहाँ ‘बुलावे’ या ‘मनुहार’ से है (यह महाराष्ट्र के लावणी नृत्य से अलग, विशुद्ध रूप से एक राजस्थानी लोकगीत शैली है)।रम्मत में उपयोग: रम्मत में लावणी के गीत श्रृंगार रस, भक्ति रस या वीर रस से ओत-प्रोत होते हैं। जब मुख्य पात्र (जैसे लैला-मजनूं या हिड़ाऊ मेरी के पात्र) एक-दूसरे से संवाद करते हैं या किसी को अपनी बात समझाते हैं, तो वे लावणी छंद का प्रयोग करते हैं। नगाड़े की तेज थाप पर जब लावणी की तान टूटती है, तो दर्शक झूम उठते हैं।

जैसलमेर की रम्मत का गौरवशाली इतिहास (History of Jaisalmer Rammat)

जैसलमेर में रम्मत लोक नाट्य (Rammat Folk Theater) का इतिहास केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा। यहाँ के कलाकारों ने अपने गीतों और छंदों को आजादी की लड़ाई का मुख्य हथियार बनाया।

इस परंपरा को सबसे ऊंचे मुकाम पर पहुँचाने का श्रेय तेज कवि जैसलमेरी को जाता है, जिन्होंने जैसलमेर में ‘श्री कृष्ण कंपनी’ (Shree Krishna Company) नाम से एक प्रसिद्ध रम्मत अखाड़ा शुरू किया था। उन्होंने रम्मत के पारंपरिक धार्मिक विषयों को पूरी तरह बदलकर उसमें समकालीन राजनीतिक चेतना और देशप्रेम का ऐसा रंग भरा कि पूरी मरुभूमि अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़ी हुई।

जवाहरलाल पुरोहित और ‘हिड़ाऊ मेरी री रम्मत’ का इतिहास (History of Hidau Meri Rammat)

बीकानेर की रम्मत परंपरा में जवाहरलाल पुरोहित जी का योगदान अतुलनीय है। उन्होंने ही यहाँ की प्रसिद्ध ‘हिड़ाऊ मेरी री रम्मत’ (Hidau Meri Ri Rammat) की शुरुआत की। उच्च साहित्यिक भाषा (Literary Language) और प्रभावशाली संवादों वाली इस रम्मत का होली पर बीकानेर के ‘बिस्सों का चौक’ में लकड़ी के बड़े पाटों पर रातभर भव्य मंचन होता है।

जवाहरलाल पुरोहित रम्मत की सबसे बड़ी विशेषताएं:

जवाहरलाल पुरोहित जी बीकानेर की प्रसिद्ध ‘हिड़ाऊ मेरी री रम्मत’ (Hidau Meri Ri Rammat) के प्रवर्तक हैं। इसका मुख्य केंद्र ‘बिस्सों का चौक’ है, जहाँ होली पर लकड़ी के पाटों पर मंचन होता है। उच्च साहित्यिक स्तर (Literary Richness) और ख्याल शैली से प्रभावित इस रम्मत का कथानक आदर्श पति-पत्नी के पवित्र रिश्ते, मीठी नोक-झोंक और पारिवारिक मूल्यों पर आधारित है। नगाड़े की थाप पर होने वाला यह नाटक पारंपरिक वेशभूषा और पश्चिमी राजस्थानी संस्कृति का बेहतरीन संरक्षण करता है।

राजस्थान का रम्मत लोक नाट्य (Rammat Folk Theater) केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मरुभूमि की जीवंत कला, पाटा संस्कृति और देशभक्ति का अनूठा प्रतीक है। होली के त्योहार पर बीकानेर और जैसलमेर की गलियों में गूंजती ये तानें हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को बयां करती हैं, जिसे हर कला प्रेमी को एक बार जरूर अनुभव करना चाहिए।

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