राजराजेश्वरी माता भरतपुर के इतिहास और चमत्कारों की पूरी कहानी। जानिए मुगलों के शाही खजाने से मुक्त कराकर महाराजा जवाहर सिंह द्वारा स्थापित इस मंदिर का पृथ्वीराज चौहान से क्या नाता है और यह जाट राजवंश की कुलदेवी कैसे बनीं।
राजराजेश्वरी माता भरतपुर का रोचक इतिहास (Historical Background)
इस मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है और इसका सीधा संबंध दिल्ली के अंतिम हिंदू सम्राट वीर पृथ्वीराज चौहान से माना जाता है।
पृथ्वीराज चौहान की इष्टदेवी: प्राचीन लोक मान्यताओं और मंदिर के वंशानुगत पुजारियों के अनुसार, माता राजराजेश्वरी सम्राट पृथ्वीराज चौहान की परम इष्टदेवी थीं। वे किसी भी युद्ध अभियान पर जाने से पहले माता की विशेष आराधना करते थे।
मुगलों के खजाने में कैद: तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद जब दिल्ली की सत्ता पर मुस्लिम शासकों और कालांतर में मुगलों का अधिकार हुआ, तो उन्होंने इस दिव्य मूर्ति के चमत्कारों से भयभीत होकर इसे जनता की नजरों से दूर कर दिया। मुगलों ने इस अष्टभुजी प्रतिमा को लोहे के एक भारी संदूक (बक्से) में बंद करके अपने शाही तोशखाने (खजाने) में सुरक्षित रखवा दिया, जहाँ यह मूर्ति कई सौ सालों तक कैद रही।
भरतपुर के राजराजेश्वरी माता मंदिर का निर्माण किसने और कब करवाया था?
भरतपुर के इस प्रसिद्ध मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में सिनसिनवार जाट राजवंश के प्रतापी राजा महाराजा जवाहर सिंह ने करवाया था। वर्ष 1765 में दिल्ली के लाल किले पर ऐतिहासिक विजय प्राप्त करने के बाद, वे मुगलों के तोशखाने (खजाने) से माता की मूर्ति को मुक्त कराकर भरतपुर लाए थे और यहाँ विधि-विधान से मंदिर की स्थापना की थी।
भरतपुर राजवंश की कुलदेवी कौन हैं?
भरतपुर के सिनसिनवार जाट राजवंश की कुलदेवी मुख्य रूप से माता राजराजेश्वरी (राजेश्वरी माता) को माना जाता है। हालांकि, कुछ ऐतिहासिक संदर्भों में बाण माता का नाम भी आदर से लिया जाता है, लेकिन भरतपुर राजघराने के इतिहास, राजसी प्रतीकों और परंपराओं के अनुसार राजराजेश्वरी माता ही उनकी मुख्य कुलदेवी और परम आराध्य शक्ति हैं।
राजराजेश्वरी माता भरतपुर :कनक-दंडवत की अनोखी परंपरा और त्योहार (Traditions & Festivals)
नवरात्रि का महाउत्सव: वर्ष में दो बार आने वाले चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रों के दौरान यहाँ पैर रखने की जगह नहीं होती। नौ दिनों तक माता का भव्य छप्पन भोग, अखंड कीर्तन और विशेष अलौकिक शृंगार किया जाता है।
कनक-दंडवत यात्रा: राजराजेश्वरी माता को ‘हाथ के हाथ चमत्कार दिखाने वाली देवी’ माना जाता है। यहाँ संतान प्राप्ति, व्यापार में वृद्धि और मुकदमों में विजय के लिए मन्नतें मांगी जाती हैं। मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु अपने घर से या सुजान गंगा नहर के घाट से पेट के बल रेंगते हुए (दंडवत करते हुए) मुख्य मंदिर के गर्भगृह तक की कठिन यात्रा पूरी करते हैं।
दिल्ली अभियान और महाराजा जवाहर सिंह का स्वप्न और राजराजेश्वरी माता (The Divine Dream)
ऐतिहासिक दिल्ली विजय (1765 ई.): महाराजा सूरजमल की मृत्यु के बाद, उनके प्रतापी पुत्र महाराजा जवाहर सिंह ने मुगलों से बदला लेने के लिए दिल्ली पर एक विशाल सैन्य चढ़ाई की। इस ऐतिहासिक ‘दिल्ली अभियान’ में जाट सेना ने मुगलों को धूल चटा दी और लाल किले पर अधिकार कर लिया।
खजाने की लूट और भरतपुर आगमन: विजयी होकर लौटते समय महाराजा जवाहर सिंह लाल किले के अष्टधातु के मजबूत दरवाजे और मुगलों का पूरा शाही तोशखाना (खजाना) ऊंटों और बैलगाड़ियों पर लादकर भरतपुर ले आए। शुरुआत में किसी को भी नहीं पता था कि सोने-चांदी के सिक्कों के बीच साक्षात देवी की मूर्ति भी छिपी हुई है।
माता का स्वप्न आदेश: जनश्रुति के अनुसार, भरतपुर पहुँचने के बाद माता राजराजेश्वरी ने महाराजा जवाहर सिंह को स्वप्न में साक्षात दर्शन दिए। माता ने राजा को बताया कि वे मुगलों के खजाने में एक लोहे के बक्से के भीतर बंद हैं। उन्होंने आदेश दिया कि उस संदूक को खोलकर उनकी मूर्ति को बाहर निकाला जाए और सम्मान सहित स्थापित किया जाए। सुबह उठते ही राजा ने वैसा ही किया और पूरी निष्ठा के साथ इस मंदिर का निर्माण करवाया।
लोहागढ़ दुर्ग (भरतपुर) के प्रमुख मंदिर
बांके बिहारी मंदिर: यह मंदिर लोहागढ़ किले के भीतर स्थित है। यह वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर की वास्तुकला से प्रेरित है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान कृष्ण और राधा जी की अत्यंत सुंदर और शांत प्रतिमाएं स्थापित हैं। इसकी दीवारों पर की गई कलात्मक नक्काशी और कांच का काम पर्यटकों को बेहद आकर्षित करता है।
राजराजेश्वरी माता मंदिर: यह मंदिर किले की सुरक्षा करने वाली सुजान गंगा नहर के खिरनी घाट के पास स्थित है। माता राजराजेश्वरी को भरतपुर के सिनसिनवार जाट राजवंश की कुलदेवी माना जाता है। इस मंदिर की मूर्ति को महाराजा जवाहर सिंह 1765 ईस्वी में दिल्ली विजय के बाद मुगलों के शाही खजाने से मुक्त कराकर यहाँ लाए थे।
गंगा मंदिर और लक्ष्मण मंदिर: हालांकि ये दोनों भव्य मंदिर किले के मुख्य परिसर से कुछ ही दूरी पर (भरतपुर शहर के केंद्र में) स्थित हैं, लेकिन इनका ऐतिहासिक संबंध लोहागढ़ दुर्ग और राजघराने से बेहद गहरा है। लक्ष्मण जी को भरतपुर राजवंश का मूल कुलदेवता माना जाता है।
राजराजेश्वरी माता भरतपुर के दर्शन के साथ-साथ भरतपुर में और कौन-से प्रमुख ऐतिहासिक व प्राकृतिक स्थल देखे जा सकते हैं?
राजराजेश्वरी माता मंदिर के दर्शन के बाद आप भरतपुर की कई अन्य प्रसिद्ध धरोहरों को देख सकते हैं। मंदिर के बिल्कुल पास ही लोहागढ़ दुर्ग स्थित है, जिसे भारत का एकमात्र ‘अजेय किला’ कहा जाता है। किले के भीतर भरतपुर राजकीय संग्रहालय (गवर्नमेंट म्यूजियम) है, जहाँ प्राचीन हथियार और कलाकृतियाँ मौजूद हैं। इसके अलावा, भरतपुर का विश्व प्रसिद्ध केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (घाना पक्षी अभयारण्य) यहाँ से मात्र 5 किलोमीटर दूर है, जो एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है और सर्दियों में हजारों प्रवासी पक्षियों का घर बनता है। साथ ही आप पास में स्थित गंगा मंदिर और लक्ष्मण मंदिर के दर्शन भी कर सकते हैं।
राजराजेश्वरी माता भरतपुर की प्रतिमा की क्या शारीरिक विशेषताएँ हैं और गर्भगृह का वातावरण कैसा है?
मंदिर के गर्भगृह में स्थापित माता राजराजेश्वरी की प्रतिमा अत्यंत प्राचीन, अष्टभुजी (आठ भुजाओं वाली) और दिव्य है। यह मूर्ति श्वेत और श्याम पत्थरों के सुंदर संयोजन से निर्मित प्रतीत होती है, जिसमें माता का मुखमंडल अत्यंत शांत, करुणामयी और ओजस्वी दिखाई देता है। माता के हाथों में विभिन्न प्रकार के दिव्य अस्त्र-शस्त्र और आशीर्वाद की मुद्रा सुशोभित है। मंदिर का गर्भगृह पारंपरिक राजस्थानी नक्काशी से सजाया गया है। यहाँ सुबह-शाम होने वाली आरती के समय बजने वाले शंख और घंटों की गूंज भक्तों को एक गहरे आध्यात्मिक और अलौकिक आनंद की अनुभूति कराती है।
क्या राजराजेश्वरी माता मंदिर के पास स्थित ‘सुजान गंगा नहर’ और लोहागढ़ दुर्ग का भी कोई ऐतिहासिक महत्व है?
हाँ, राजराजेश्वरी माता मंदिर लोहागढ़ दुर्ग की प्रसिद्ध ‘सुजान गंगा नहर’ के खिरनी घाट के पास स्थित है, जिसका अपना एक महान सैन्य इतिहास है। महाराजा सूरजमल ने लोहागढ़ किले को अजेय बनाने के लिए इसके चारों तरफ 100 फीट चौड़ी और 60 फीट गहरी ‘सुजान गंगा नहर’ बनवाई थी। इस नहर में मोती झील से बाणगंगा और रूपारेल नदी का पानी लाया जाता था। युद्ध के समय इस नहर में पानी भरकर मगरमच्छ छोड़ दिए जाते थे, जिससे दुश्मन सेना किले तक न पहुँच सके। माता का मंदिर इसी ऐतिहासिक और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण नहर के किनारे स्थित है।
भरतपुर के सिनसिनवार जाट राजवंश के लिए राजराजेश्वरी माता का क्या धार्मिक और सामाजिक महत्व है?
राजराजेश्वरी माता को भरतपुर के सिनसिनवार जाट राजवंश की कुलदेवी और परम आराध्य के रूप में पूजा जाता है। भरतपुर राजघराने के इतिहास में इस मंदिर का स्थान अत्यंत सर्वोच्च है। भूतकाल में राजा-महाराजा (जैसे महाराजा सूरजमल और महाराजा जवाहर सिंह) किसी भी नए सैन्य अभियान, संधि या शुभ कार्य को शुरू करने से पहले माता के चरणों में शीश नवाकर आशीर्वाद लेते थे। आज भी राजपरिवार के सदस्य किसी भी विशेष पारिवारिक उत्सव, त्योहार या मांगलिक कार्य के अवसर पर सबसे पहले लोहागढ़ दुर्ग के पास स्थित इस पावन धाम में आकर ढोक लगाते हैं।
पृथ्वीराज चौहान की इष्टदेवी राजराजेश्वरी माता भरतपुर
अंतिम हिंदू सम्राट वीर पृथ्वीराज चौहान की इष्टदेवी के रूप में माता राजराजेश्वरी (राजेश्वरी माता) का इतिहास अत्यंत गौरवशाली है। प्राचीन लोक मान्यताओं के अनुसार, पृथ्वीराज चौहान माता राजराजेश्वरी को अपनी परम आराध्य शक्ति मानते थे। वे किसी भी बड़े युद्ध अभियान पर जाने से पहले माता के चरणों में शीश नवाकर विजय का आशीर्वाद प्राप्त करते थे।
तराइन के युद्ध के बाद जब दिल्ली पर मुस्लिम शासकों और मुगलों का अधिकार हुआ, तो उन्होंने इस चमत्कारी मूर्ति को जनता से दूर करने के लिए लोहे के एक भारी संदूक में बंद करके शाही खजाने (तोशखाने) में छुपा दिया था। सदियों बाद, 1765 ईस्वी में भरतपुर के प्रतापी महाराजा जवाहर सिंह दिल्ली विजय के दौरान मुगलों के इसी खजाने से माता की दिव्य प्रतिमा को मुक्त कराकर भरतपुर लाए और लोहागढ़ दुर्ग के पास खिरनी घाट पर इसे सम्मान सहित स्थापित किया।
राजराजेश्वरी माता भरतपुर पर लिखा यह आर्टिकल आपको कैसा लगा?



