“मूमल की मेड़ी जैसलमेर का रहस्य: जहाँ आज भी गूंजती है मूमल-महेंद्र की अमर प्रेम कहानी!”

जैसलमेर का वो ऐतिहासिक महल जहाँ एक सच्चे प्यार ने दम तोड़ दिया! जानिए मूमल की मेड़ी जैसलमेर की पूरी दास्तान और मूमल-महेंद्र की अमर प्रेम कहानी का वो काला सच।

मूमल और महेंद्र की प्रेम कहानी ‘मूमल की मेड़ी जैसलमेर से प्रेम बीज अंकुरण

जैसलमेर के लौद्रवा की बेहद खूबसूरत राजकुमारी मूमल और अमरकोट के राजकुमार महेंद्र की प्रेम कहानी अमर है। एक बार शिकार के दौरान महेंद्र मूमल के महल ‘मूमल की मेड़ी’ पहुंचे, जहां दोनों को पहली नजर में प्यार हो गया। इसके बाद, महेंद्र हर रात अपने जादुई ऊंट ‘चीतल’ पर बैठकर मूमल से मिलने आते थे।

एक रात महेंद्र को आने में देर हो गई। मूमल का दिल बहलाने के लिए उसकी बहन सुमल ने पुरुषों के कपड़े पहने और दोनों साथ सो गईं। जब महेंद्र वहां पहुंचे, तो पुरुष वेश में सुमल को देखकर उन्होंने इसे धोखा समझा और गुस्से में अपनी छड़ी छोड़कर चले गए। सच जानने पर मूमल उन्हें मनाने अमरकोट पहुंचीं, लेकिन महेंद्र के न मानने पर उन्होंने तड़पकर दम तोड़ दिया। मूमल की मौत की खबर सुनते ही महेंद्र भी उनके गम में पागल हो गए और दम तोड़ दिया।

महेंद्र के जादुई ऊंट ‘चीतल’ का रहस्य

महेंद्र का ऊंट ‘चीतल’ कोई साधारण जीव नहीं, बल्कि एक जादुई और बेहद तेज रफ्तार ऊंट था। वह हवा से भी तेज दौड़ता था। इसी चीतल की बदौलत महेंद्र हर रात अमरकोट (पाकिस्तान) से 150 किलोमीटर दूर जैसलमेर के लौद्रवा मूमल से मिलने आते थे और सुबह होने से पहले वापस घर लौट जाते थे।

मूमल की मेढ़ी जैसलमेर का रहस्य’ (‘काक महल’)

जैसलमेर के प्राचीन शहर लोद्रवा (लौद्रवा) में काक नदी के किनारे स्थित राजकुमारी मूमल का महल, जिसे ‘मूमल की मेढ़ी’ या ‘काक महल’ कहा जाता है, अपने समय का सबसे बड़ा जादुई और रहस्यमयी तिलिस्म (भूलभुलैया) माना जाता था। मूमल ने प्रतिज्ञा की थी कि वह उसी पुरुष से विवाह करेगी जो अपनी बुद्धिमत्ता और साहस से इस महल के रहस्यों को सुलझाकर उस तक पहुंचेगा।

मूमल का काक महल (मूमल की मेढ़ी) स्थापत्य कला और विज्ञान का एक अद्भुत जादुई तिलिस्म था। राजकुमारी मूमल से विवाह की इच्छा रखने वाले राजकुमारों को इस महल की पांच कठिन पहेलियों को पार करना होता था। महल के मुख्य आंगन में नीले संगमरमर का ऐसा फर्श था, जो धूप और चांदनी में उफनती हुई गहरी नदी का दृष्टि-भ्रम (मृगतृष्णा) पैदा करता था। इसके गलियारों में लगे दर्पणों का जाल इंसानी परछाइयों को दुश्मनों के रूप में दिखाता था, जिससे वीर योद्धा अपनी ही छाया से लड़कर थक जाते थे। महल के जादुई बाग में हवा से हिलने और दहाड़ने वाले नकली हिंसक पशुओं के पुतले रखे थे, जो लोगों को डराकर भगा देते थे। सुंदर फूलों की सेज के नीचे गहरे गुप्त कुएं छिपे थे, जहाँ एक गलत कदम मौत का कारण बन सकता था। यह पूरा महल सिर्फ एक मजबूत खंभे पर टिका हुआ दिखता था, जिसके सबसे ऊंचे सुरक्षित कक्ष (मेढ़ी) में मूमल रहती थी। इस पूरे रहस्यमयी भ्रम को अमरकोट के राजा महेंद्र ने अपनी बुद्धिमत्ता से तोड़कर मूमल का दिल जीता था।

मूमल की मेड़ी जैसलमेर :महेंद्र ने कैसे तोड़ा यह तिलिस्म?

अमरकोट (अब पाकिस्तान) के राजा महेंद्र सोढ़ा जब शिकार करते हुए काक नदी के तट पर पहुंचे, तो उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता से इस महल के सभी भ्रमों को पहचान लिया। जब उन्होंने संगमरमर के फर्श को देखा, तो डरने के बजाय अपनी छड़ी (लाठी) से फर्श को ठोककर चेक किया और जान गए कि यह पानी नहीं बल्कि पत्थर है। वे बिना डरे मूमल की मेढ़ी तक पहुँचने वाले पहले और इकलौते राजकुमार बने।

मूमल की मेड़ी जैसलमेर की आज क्या स्थिति है?

वर्तमान में जैसलमेर के लोद्रवा में काक नदी सूख चुकी है और मूमल का वह जादुई काक महल अब केवल खंडहरों (अवशेषों) के रूप में बचा हुआ है। देश-विदेश से आने वाले पर्यटक आज भी इन पत्थरों को देखकर उस दौर के जादुई विज्ञान और अमर प्रेम कहानी की कल्पना करते हैं।

मूमल की मेढ़ी जैसलमेर’ और ‘इकथंभीया-महल’ का रहस्य

राजस्थानी भाषा में ‘मेढ़ी’ का अर्थ महल के सबसे ऊपरी हिस्से या छत पर बने सुरक्षित और ऊंचे कमरे से होता है, जहाँ राजकुमारी मूमल निवास करती थीं। इस ऐतिहासिक और अद्भुत महल को ‘इकथंभीया-महल’ के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा इसलिए था क्योंकि इस पूरे महल का एक मुख्य और बड़ा हिस्सा सिर्फ एक मजबूत खंभे पर टिका हुआ प्रतीत होता था, जो देखने वाले सभी लोगों को हैरान कर देता था। काक नदी के सुंदर तट पर बना यह स्थान प्राचीन स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नमूना था। इसी ऊंचे कक्ष में बैठकर मूमल महल की पहेलियां रचती थीं और महेंद्र का इंतजार करती थीं।

मूमल और महेंद्र की जुदाई और मौत की पूरी कहानी

मूमल और महेंद्र की अमर प्रेम कहानी का अंत एक भयानक गलतफहमी के कारण बहुत दर्दनाक हुआ। महेंद्र रोज रात को अपने तेज रफ्तार ‘चीतल’ ऊँट पर बैठकर मूमल से मिलने लोद्रवा आते थे। एक रात महेंद्र को आने में देर हो गई। मूमल का मन बहलाने के लिए उनकी बहन सुमल पुरुषों के कपड़े पहनकर उनके पास सो गई। जब महेंद्र वहां पहुंचे, तो उन्होंने सुमल को मूमल का कोई दूसरा प्रेमी समझ लिया। वे नाराज होकर अपना कोड़ा वहीं छोड़कर लौट गए। मूमल ने अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए अमरकोट जाकर महेंद्र से मिन्नतें कीं, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। निराश होकर मूमल ने आग में कूदकर जान दे दी और उनके वियोग में महेंद्र भी तड़पकर मर गए।

मूमल लोकगीत

मूमल’ राजस्थान का एक अत्यंत लोकप्रिय और पारंपरिक लोकगीत है, जो विरह और सौंदर्य का अनूठा संगम है। यह गीत मुख्य रूप से जैसलमेर और वागड़ क्षेत्र में गाया जाता है। इस गीत के माध्यम से लोद्रवा की राजकुमारी मूमल के सिर से लेकर पैर तक के अद्भुत सौंदर्य (नख-शिख वर्णन) का बहुत सुंदर बखान किया जाता है। साथ ही, इसमें राजा महेंद्र के वियोग में तड़पती मूमल की पीड़ा और उनके गहरे प्रेम को दर्शाया जाता है। मूमल गीत में राजस्थानी संस्कृति, पहनावे और आभूषणों की झलक मिलती है। जैसलमेर के मशहूर मरु महोत्सव (Desert Festival) में आज भी यह गीत बड़े चाव से गाया जाता है।

राजकुमारी मूमल के नख-शिख सौंदर्य और महेंद्र की मनुहार का वर्णन करने वाले इस प्रसिद्ध राजस्थानी लोक गीत के संपूर्ण बोल आप यहाँ देख सकते हैं:

मूमल की मेढ़ी जैसलमेर (लोद्रवा) में स्थित स्थापत्य कला का एक अद्भुत और ऐतिहासिक प्रतीक है। काक नदी के तट पर बना यह महल अपने जादुई तिलिस्म और भूलभुलैया के लिए प्रसिद्ध था। यहाँ की कठिन पहेलियों को केवल अमरकोट के राजा महेंद्र ही पार कर पाए थे। आज यह ऐतिहासिक स्थल राजकुमारी मूमल और महेंद्र की अमर मगर दर्दनाक प्रेम कहानी की याद दिलाता है।

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