कजली तीज बूंदी मेला के पुराने शाही वैभव, नवल सागर से कुंभा स्टेडियम तक निकलने वाली पारंपरिक सवारी, सत्तू के महत्व और लोक गीतों की पूरी जानकारी यहाँ पढ़ें।
कजली तीज बूंदी का इतिहास क्या है?
बूंदी में कजली तीज की शुरुआत का इतिहास बेहद दिलचस्प है और यह हाड़ा राजवंश के राव राजा बुद्ध सिंह के काल से जुड़ा है। लोककथा के अनुसार, पहले बूंदी के राजा जयपुर की कजली तीज की सवारी देखने वहां जाते थे। एक बार राव बुद्ध सिंह के भाई, जो बेहद पराक्रमी थे, जयपुर से तीज माता की मूल प्रतिमा को सम्मानपूर्वक बूंदी ले आए। इसके बाद से बूंदी में स्वतंत्र रूप से कजली तीज मनाने की परंपरा शुरू हुई। यह ऐतिहासिक घटना बूंदी के आत्मसम्मान और सांस्कृतिक स्वाभिमान का प्रतीक बन गई, जिसने इस पर्व को स्थानीय लोक संस्कृति का मुख्य हिस्सा बना दिया।
बूंदी कजली तीज मेला 2026
वर्ष 2026 में राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार, बूंदी कजली तीज मेला 31 अगस्त से शुरू होकर 14 सितंबर 2026 (कृष्ण जन्माष्टमी) तक आयोजित होगा. पर्यटकों के लिए इस 15 दिवसीय ऐतिहासिक मेले का मुख्य आकर्षण शुरुआती दो दिन (31 अगस्त और 1 सितंबर) रहेगा, जब नवल सागर से कुंभा स्टेडियम तक माता की भव्य शाही सवारी (शोभायात्रा) निकाली जाएगी. इसके बाद कुंभा स्टेडियम के मेला मंच पर रोजाना रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे, जिसमें राजस्थान के प्रसिद्ध लोक कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे. पर्यटन विभाग द्वारा विशेष रूप से लोक नृत्य और भवाई जैसी कलाओं से सजी सांस्कृतिक संध्या का आयोजन भी इसी दौरान किया जाएगा.
कजली तीज की कथा क्या है?
कजली तीज की पौराणिक कथा एक गरीब ब्राह्मण की कहानी है, जिसने पत्नी का व्रत पूरा करने के लिए साहूकार के यहां चोरी की। ब्राह्मण की सत्यता और गरीबी से प्रभावित होकर, साहूकार ने उसे चने का सत्तू और अन्य आवश्यक वस्तुएं भेंट कीं। नीमड़ी माता की कृपा से ब्राह्मण परिवार का जीवन बदल गया, और तभी से सुहाग और सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।
कजली तीज बूंदी पूजा विधि क्या है?
पूजा विधि के अनुसार, घर के आंगन में मिट्टी या गोबर से एक छोटा तालाब बनाया जाता है, जिसमें नीम की डाल रोपी जाती है। इसके किनारे दूध, जल और दही चढ़ाया जाता है। माता को रोली, अक्षत, काजल और मेहंदी अर्पित कर दीप प्रज्वलित किया जाता है। तालाब के पानी में दीपक और अपनी गहनों की छाया देखने की विशेष परंपरा है। अंत में रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर सत्तू का प्रसाद खाया जाता है
कजली तीज बूंदी के व्रत के मुख्य नियम क्या हैं? क्या गर्भवती महिलाएं यह व्रत रख सकती हैं?
यह व्रत सामान्यतः निर्जला (बिना पानी के) रखा जाता है।गर्भवती महिलाओं के लिए नियम: गर्भवती स्त्रियां इस दौरान फलाहार (फल आदि का सेवन) कर सकती हैं।उद्यापन के बाद: यदि व्रत का उद्यापन हो चुका है और उसके बाद संपूर्ण उपवास रखना संभव न हो, तो भी फलाहार किया जा सकता है।
कजली तीज बूंदी पर नीमड़ी माता की पूजा की मुख्य विधि क्या है?
सर्वप्रथम नीमड़ी माता को जल व रोली के छींटे देकर अक्षत (चावल) अर्पित करें। इसके बाद माता के पीछे दीवार पर उंगली से मेहंदी, रोली और काजल की 13-13 बिंदियां लगाएं, जिसमें मेहंदी व रोली की बिंदी अनामिका उंगली से और काजल की बिंदी तर्जनी उंगली से लगानी चाहिए। फिर मोली चढ़ाने के बाद माता को मेहंदी, काजल और वस्त्र अर्पित करें तथा दीवार पर लगी बिंदियों के सहारे लच्छा (कलावा) लगाएं। इसके बाद कोई फल और दक्षिणा चढ़ाएं और पूजा के कलश पर रोली का टीका लगाकर लच्छा बांधें। अंत में, तालाब के किनारे जल रहे दीपक के उजाले में नींबू, ककड़ी, नीम की डाली, नाक की नथ और साड़ी का पल्ला आदि चीजें देखें और इसके बाद ही चंद्रमा को अर्घ्य दें।
कजली तीज पर नीमड़ी माता की पूजा के लिए ‘तालाब’ कैसे बनाया जाता है और इसमें क्या चढ़ाया जाता है?
तालाब बनाना: मिट्टी और गोबर की मदद से दीवार के सहारे एक तालाब जैसी आकृति बनाई जाती है (घी और गुड़ से पाल बांधकर)। इसके पास नीम की एक टहनी रोपी जाती है।तालाब में क्या डालें: तालाब के भीतर कच्चा दूध और जल डाला जाता है और किनारे पर एक दीपक जलाकर रखा जाता है।पूजा की थाली: थाली में नींबू, ककड़ी, केला, सेब, सत्तू, रोली, मौली और अक्षत आदि सामग्री रखी जाती है।
कजली तीज बूंदी पर गाय की पूजा कैसे की जाती है?
इस दिन गायों की विशेष रूप से पूजा करने का विधान है। आटे की सात लोइयां बनाकर उन पर घी और गुड़ रखा जाता है। इन लोइयों को गाय को खिलाने के बाद ही खुद भोजन ग्रहण किया जाता है।
कजली तीज को ‘सातुड़ी तीज’ क्यों कहते हैं?
कजली तीज को ‘सातुड़ी तीज’ इसलिए कहते हैं क्योंकि इस दिन सत्तू (सातू) का विशेष महत्व होता है। महिलाएं चने, जौ, गेहूं या चावल के आटे को घी, चीनी और मेवों के साथ मिलाकर बड़े-बड़े पिंड (सातुड़ी) बनाती हैं। रात को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद इसी सत्तू को खाकर व्रत खोला जाता है। साथ ही, बेटियों के पीहर से ससुराल सत्तू भेजने की भी खास परंपरा है।
कजली तीज का व्रत क्यों रखा जाता है और इसके क्या लाभ हैं?
सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए यह व्रत रखती हैं, जबकि कुंवारी कन्याएं अच्छे वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत को करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, विधि-विधान से व्रत रखने से परिवार में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है।
बूंदी की कजली तीज सामान्य सावन की तीज से किस प्रकार अलग है?
: पूरे उत्तर भारत और राजस्थान में मुख्य रूप से श्रावण (सावन) मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को छोटी या हरियाली तीज मनाई जाती है। इसके विपरीत, बूंदी की कजली तीज सावन में न होकर, उसके 15 दिन बाद भाद्रपद (भादो) मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है। जहां अन्य जगहों पर तीज का उत्सव केवल एक या दो दिनों में समाप्त हो जाता है, वहीं बूंदी में कजली तीज के दिन से एक विशाल मेला शुरू होता है जो कृष्ण जन्माष्टमी तक लगभग 15 दिनों तक लगातार चलता है।
कजली तीज के दौरान बूंदी में निकलने वाली शाही सवारी का रूट क्या है?
: बूंदी की प्रसिद्ध कजली तीज माता की शाही सवारी (शोभायात्रा) का पारंपरिक रूट शहर के ऐतिहासिक वैभव को दर्शाता है। यह जुलूस बेहद खूबसूरत नवल सागर झील (बालचंद पाड़ा) के तट से भव्य रूप से सजी-धजी पालकी के साथ शुरू होता है。 इसके बाद यह शाही जुलूस पुराने शहर के संकरे और ऐतिहासिक रास्तों, पारंपरिक मुख्य बाजारों और प्राचीन रानी जी की बावड़ी के सामने से गुजरता है। अंत में, विभिन्न लोक कलाकारों की शानदार सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और झांकियों के साथ यह जुलूस कुंभा स्टेडियम (आजाद पार्क) पर जाकर समाप्त होता है।
कजली तीज के त्योहार में ‘सत्तू’ (सातुड़ी) का क्या महत्व है?
कजली तीज को स्थानीय स्तर पर ‘सातुड़ी तीज’ भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन सत्तू का धार्मिक और व्यावहारिक महत्व सबसे अधिक होता है। महिलाएं जौ, चने, गेहूं या चावल के आटे को सेक कर उसमें शुद्ध देशी घी, चीनी और सूखे मेवे मिलाकर बड़े-बड़े पिंड (लड्डू) तैयार करती हैं। पूरे दिन निर्जला व्रत रखने के बाद, शाम को नीमड़ी माता की पूजा की जाती है और रात में चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद महिलाएं अपने पति के हाथों से जल ग्रहण कर इसी सत्तू (सातुड़ी) को खाकर अपना व्रत खोलती हैं।
कजली तीज के दौरान बूंदी मेले में कौन से मुख्य आकर्षण होते हैं?
बूंदी कजली तीज मेले का 15 दिवसीय आयोजन विविध आकर्षणों से भरा होता है। कुंभा स्टेडियम में सटने वाले इस मेले में राजस्थानी हस्तशिल्प, पारंपरिक परिधान और सुंदर लाख की चूड़ियों के अनगिनत स्टॉल लगते हैं। मनोरंजन के लिए झूले, मरणोपरांत रोमांच से भरा ‘मौत का कुआं’ और जादू के शो होते हैं। सांस्कृतिक मंच पर कवि सम्मेलन और सुप्रसिद्ध कलाकारों की ‘स्टार नाइट्स’ मुख्य आकर्षण होती हैं। इसके साथ ही सैलानियों के लिए पारंपरिक राजस्थानी व्यंजनों, विशेष रूप से बूंदी के प्रसिद्ध सत्तू और मालपुए के फूड स्टॉल (चौपाटी) भी लगाए जाते हैं।
कजली तीज बूंदी पर महिलाओं के लिए ‘सोलह श्रृंगार’ और ‘लहरिया’ का क्या महत्व है?
: कजली तीज का पर्व सौंदर्य, प्रेम और सुहाग के उल्लास का प्रतीक है, इसलिए इस दिन सोलह श्रृंगार का विशेष महत्व है। महिलाएं अपने हाथों और पैरों में सुंदर मेहंदी रचाती हैं, जो वैवाहिक सुख और समृद्धि को दर्शाती है। इस दिन विशेष रूप से ‘लहरिया’ (रंग-बिरंगी लहरदार डिजाइन वाली राजस्थानी साड़ी या ओढ़नी) पहनने की परंपरा है, जो सावन-भादो की सुखद वर्षा ऋतु और प्रकृति के उमंग को प्रदर्शित करती है। रंग-बिरंगे पारंपरिक लहंगे और गहनों से सजी महिलाएं त्योहार की रंगत को कई गुना बढ़ा देती हैं।
कजली तीज को ‘कजली’ या ‘कजरी’ नाम क्यों दिया गया है?
इस विशेष तीज को ‘कजली’ या ‘कजरी’ कहने के पीछे मुख्य रूप से दो कारण हैं। पहला कारण बादलों का रंग है; भाद्रपद मास के दौरान आसमान में काले-कजरारे (कजली) बादल छाए रहते हैं, जो वर्षा ऋतु के चरम को दर्शाते हैं। दूसरा कारण मध्य भारत और राजस्थान के कजरी वन (क्षेत्र) से जुड़ा है, जहाँ सावन-भादो में गाए जाने वाले विशेष लोक गीतों को ‘कजरी गीत’ कहा जाता है। चूंकि इस व्रत और त्योहार में महिलाएं कजरी गीत गाती हैं और सुखद मौसम का जश्न मनाती हैं, इसलिए इसे लोक-परंपरा में कजली तीज कहा जाने लगा।
कजली तीज माता की मूर्ति का ऐतिहासिक रहस्य क्या है?
लोक मान्यताओं और इतिहास के अनुसार, बूंदी रियासत के गोठड़ा के जागीरदार बलवंत सिंह हाड़ा जयपुर की प्रसिद्ध और सोने से निर्मित तीज माता की मूल प्रतिमा को शौर्यपूर्वक जीत कर लाए थे। बाद में महाराव राजा राम सिंह इस दिव्य प्रतिमा को बूंदी ले आए, जहां पारंपरिक रूप से सवारी निकाली जाने लगी। रियासत काल में पहले केवल राजमहलों में ही इसकी सवारी निकलती थी। बाद में आम जनता के दर्शनों के लिए हूबहू दूसरी सुंदर प्रतिमा तैयार करवाई गई। आज भी लोकतंत्र में उसी वैभवशाली पारंपरिक प्रतिमा की शोभायात्रा शहर की नगर परिषद द्वारा निकाली जाती है।
क्या कजली तीज का व्रत कुंवारी कन्याएं भी रख सकती हैं और इसके क्या लाभ हैं?
: हाँ, कजली तीज का व्रत केवल सुहागिन महिलाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कुंवारी कन्याएं भी इसे पूरी श्रद्धा के साथ रख सकती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कड़ा तप और व्रत किया था। इसी कारण कुंवारी कन्याएं इस दिन सुयोग्य, संस्कारी और मनचाहा वर पाने की कामना के साथ यह उपवास रखती हैं। वहीं विवाहित महिलाओं के लिए यह व्रत उनके दांपत्य जीवन में आपसी प्रेम बढ़ाने, पति की दीर्घायु सुनिश्चित करने और घर में सुख-समृद्धि का वरदान लेकर आता है।
कजली तीज मेले के दौरान पर्यटकों को बूंदी में और क्या देखना चाहिए?
यदि आप कजली तीज मेला देखने वर्ष 2026 में बूंदी आ रहे हैं, तो आपको यहाँ की ऐतिहासिक स्थापत्य कला को भी जरूर देखना चाहिए। बूंदी को ‘बावड़ियों का शहर’ (City of Stepwells) कहा जाता है, जहाँ की रानी जी की बावड़ी विश्व प्रसिद्ध है। इसके अलावा पहाड़ी पर स्थित राजसी तारागढ़ किला, महलों के उत्कृष्ट भित्तिचित्रों (Frescoes) से सजी चित्रशाला, सुख महल और जैत सागर झील बेहद दर्शनीय स्थल हैं। मेले का लुत्फ उठाने के साथ-साथ इन प्राचीन धरोहरों को देखना आपकी सांस्कृतिक यात्रा को बेहद यादगार और मुकम्मल बना देगा।
कजली तीज बूंदी के व्रत में ‘दीपक की लौ की छाया’ देखने की परंपरा क्या है?
कजली तीज (सातुड़ी तीज) की पूजा में तालाब के पानी में छाया देखना सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य अनुष्ठान माना जाता है। शाम को जब महिलाएं दीवार के सहारे मिट्टी का कृत्रिम तालाब बनाकर नीमड़ी माता की पूजा करती हैं, तब तालाब के पानी और दूध के मिश्रण में जलते हुए शुद्ध घी के दीपक की लौ की छाया देखी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस पानी में केवल दीपक ही नहीं, बल्कि अपने सोने के आभूषण (नथ या चूड़ी) और सुहाग सामग्री की छाया देखना अखंड सौभाग्य, वैवाहिक सुख और परिवार में समृद्धि लेकर आता है।
क्या कजली तीज के दिन सत्तू (सातू) को बिना पूजा किए खाया जा सकता है?
शास्त्र और लोक-परंपरा के अनुसार, कजली तीज के दिन बने सत्तू को बिना पूजा और बिना चंद्र दर्शन के खाना पूरी तरह वर्जित माना जाता है। यह एक कड़ा धार्मिक नियम है कि इस दिन महिलाएं सुबह से निर्जला व्रत रखती हैं। शाम को नीमड़ी माता की पूजा के दौरान सत्तू के पिंडे पर रोली-अक्षत चढ़ाकर उसका भोग लगाया जाता है। इसके बाद रात में जब आकाश में चंद्रमा के दर्शन होते हैं, तब उन्हें अर्घ्य देने के बाद ही इस पूजित सत्तू को काटकर प्रसाद के रूप में खाया जाता है और व्रत का पारण होता है।
कजली तीज (बड़ी तीज) और हरियाली तीज (छोटी तीज) में मुख्य अंतर क्या है?
हरियाली तीज और कजली तीज में तिथि, प्रकृति और पूजा के नियमों का मुख्य अंतर होता है। हरियाली तीज श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को आती है, जो चारों तरफ फैली हरियाली और झूले झूलने का उत्सव है। इसके ठीक 15 दिन बाद भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को कजली तीज (बड़ी तीज) मनाई जाती है। छोटी तीज में जहां झूला झूलने और घेवर का महत्व है, वहीं बड़ी तीज (कजली तीज) में नीमड़ी माता की पूजा, सत्तू के प्रसाद और रात को चंद्रमा को अर्घ्य देने का कड़ा नियम होता है।
कजली तीज बूंदी मेला आपको कैसा लगता है?


