जालौर का किला (सुवर्णगिरि) का इतिहास और रहस्य जानिए। राजा कान्हड़देव चौहान के शौर्य, अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण और इस अजेय दुर्ग के प्रमुख आकर्षणों की पूरी जानकारी।
जालौर का किला फैक्ट फाइल
- अन्य नाम: सुवर्णगिरि, सोनगढ़, जाबालिपुर दुर्ग, कंचन गिरि।
- स्थान: जालौर जिला, राजस्थान (जोधपुर से लगभग 140 किमी दूर)।
- भौगोलिक स्थिति: अरावली श्रृंखला की सोनगिरि पहाड़ी पर स्थित।
- आकार: यह दुर्ग लगभग 800 गज लंबा और 400 गज चौड़ा है।
- निर्माण काल: 8वीं से 10वीं शताब्दी के मध्य।
- निर्माता: अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार इसका निर्माण परमार राजाओं द्वारा करवाया गया था, जबकि कुछ मत इसे प्रतिहार शासक नागभट्ट प्रथम से जोड़ते हैं।
- प्रमुख शासक राजवंश: प्रतिहार, परमार, चालुक्य (सोलंकी), सोनगरा चौहान और राठौड़ राजवंश।
- सोनगरा शाखा: इसी सोनगिरि पहाड़ी के नाम पर यहाँ के चौहान शासक ‘सोनगरा चौहान’ कहलाए।
- प्रसिद्ध युद्ध: 1311 ईस्वी में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण।
- वीर नायक: जालौर के प्रतापी शासक राव कान्हड़देव चौहान और उनके पुत्र वीरमदेव सोनगरा।
- ऐतिहासिक साका (1311 ई.): बीका दहिया नामक राजपूत के विश्वासघात के कारण खिलजी की सेना गुप्त रास्ते से किले में घुसी। कान्हड़देव लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और वीरांगनाओं ने जौहर किया।
- अजेय दुर्ग: हसन निजामी के ग्रंथ ‘ताज-उल-मासिर’ के अनुसार, “यह एक ऐसा किला है जिसका दरवाजा कभी कोई आक्रमणकारी खोल नहीं पाया।” दुश्मन हमेशा छल से ही इसे जीत पाए।
- चार मुख्य पोल (प्रवेश द्वार): सूरज पोल, ध्रुव पोल, चांद पोल और सिरे पोल।
- सुरक्षा प्राचीर: किले की बाहरी दीवार बेहद चौड़ी है और इस पर प्राचीन तोपें रखने के लिए बुर्ज बने हुए हैं।
- तोपखाना मस्जिद: राजा भोज द्वारा निर्मित पूर्व ‘संस्कृत पाठशाला’ जिसे मुस्लिम काल में तोपखाने और मस्जिद में बदला गया।
- मलिक शाह की दरगाह: अलाउद्दीन खिलजी द्वारा बनवाई गई बगदाद के सुल्तान मलिक शाह की प्रसिद्ध मजार
- जैन मंदिर: भगवान पार्श्वनाथ और महावीर स्वामी के सफेद संगमरमर के नक्काशीदार प्राचीन मंदिर।
- राजप्रासाद के अवशेष: राजा वीरमदेव और चौहाण शासकों के प्राचीन महलों के खंडहर।
- जलाशय: पानी की कमी से निपटने के लिए बनाए गए सोहन बावड़ी और प्राचीन जल टैंक।
- “राई के भाव रात ही बीते”: अलाउद्दीन खिलजी ने किले की दीवार का कमजोर हिस्सा (मिट्टी की दीवार) ढूंढने के लिए रात में पूरे शहर की राई ऊंचे दामों पर खरीद ली थी, क्योंकि राई नमी वाली जगह पर तुरंत उग आती है। सुबह जब अन्य लोगों को पता चला तो वे राई बेचने आए, तब राजा के सैनिकों ने कहा कि अब जरूरत नहीं है, राई के भाव रात में ही बीत गए।
- टिकट: प्रवेश बिल्कुल निःशुल्क (Free) है।
- समय: सुबह 5:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक (चढ़ाई के लिए सुबह का समय सबसे उत्तम है)।
- दूरी और चढ़ाई: मुख्य मार्ग से पैदल ऊपर जाने में लगभग 1 घंटा (करीब 2-3 किमी की घुमावदार चढ़ाई) लगता है।
- बलिदान – कान्हड़देव चौहान वीरता से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और वीरांगनाओं ने जौहर किया, जिसे ‘जालौर का साका’ कहा जाता है। [
जालौर दुर्ग का निर्माण (निर्माता विवाद और प्रमाण)
प्रतिहार मत (डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार): इसका निर्माण 8वीं शताब्दी में प्रतिहार शासक नागभट्ट प्रथम ने जाबालिपुर (जालौर) में अपने साम्राज्य की सुरक्षा के लिए करवाया था।
परमार मत: स्थानीय ख्यातों और गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार, इसका मूल आधुनिक स्वरूप परमार राजाओं (जैसे धारावर्ष या मुंज) ने तैयार करवाया था।
जालौर का किला की भौगोलिक स्थिति (नदी और पहाड़ी)
पहाड़ी: यह अरावली की सोनगिरि (या सुवर्णगिरि) पहाड़ी पर स्थित है। इसी के नाम पर यहाँ का चौहान वंश सोनगरा चौहान कहलाया।नदी: यह दुर्ग सूकड़ी नदी के दक्षिण में स्थित है, जो लूनी नदी की एक सहायक नदी है।
जालौर का किला के उपनाम (Alternative Names)
इसे सुवर्णगिरि, सोनगढ़, कंचन गिरि, और प्राचीन काल में जाबालिपुर दुर्ग के नाम से जाना जाता था।
नोट: ‘सुवर्णगिरि’ जालौर का किला है, जबकि ‘स्वर्णगिरि’ (Sonargarh) जैसलमेर के किले को कहा जाता है। छात्र अक्सर इन दोनों नामों में भ्रमित (Confuse) हो जाते हैं।
हसन निजामी का प्रसिद्ध कथन जालौर के दुर्ग पर
प्रसिद्ध इतिहासकार हसन निजामी ने अपनी पुस्तक ‘ताज-उल-मासिर’ में लिखा है: “यह एक ऐसा शक्तिशाली और अजेय किला है, जिसके फाटक को कभी कोई भी आक्रमणकारी (अपने बल से) नहीं खोल पाया।” (खिलजी ने भी इसे धोखे से ही जीता था)।
जालौर दुर्ग की ‘तोपखाना मस्जिद’ पूर्व में क्या थी?
जालौर दुर्ग की ‘तोपखाना मस्जिद’ मूल रूप से 11वीं सदी में परमार राजा भोज द्वारा निर्मित एक भव्य ‘संस्कृत पाठशाला’ और सरस्वती मंदिर थी। 1311 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने इस ऐतिहासिक धरोहर को तोड़कर मस्जिद का रूप दे दिया। बाद में, 18वीं-19वीं शताब्दी में मारवाड़ के राठौड़ राजाओं (विशेषकर महाराजा मानसिंह) ने इसकी मजबूत बनावट को देखते हुए इसे राजकीय तोपखाने (गोला-बारूद डिपो) के रूप में इस्तेमाल किया, जिससे इसका नाम ‘तोपखाना’ पड़ा। आज भी इसके प्रांगण में खड़े 80 से अधिक नक्काशीदार खंभे इसकी प्राचीन हिंदू-परमार वास्तुकला की गवाही देते हैं।
जालौर दुर्ग का प्रसिद्ध साका कब हुआ और उस समय शासक कौन था?
जालौर दुर्ग का ऐतिहासिक साका दिसंबर 1311 ईस्वी में शासक राव कान्हड़देव चौहान और उनके पुत्र कुँवर वीरमदेव के समय हुआ था। अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने महीनों की घेराबंदी के बाद बीका दहिया नामक सैनिक के विश्वासघात से किले का गुप्त रास्ता ढूंढ लिया। पराजय निश्चित देख महारानी जैतलदे के नेतृत्व में सैकड़ों वीरांगनाओं ने ‘जौहर’ (अग्नि स्नान) किया। इसके बाद राजपूत वीरों ने केसरिया बाना पहनकर आत्मघाती हमला किया, जहाँ कान्हड़देव वीरता से लड़ते हुए शहीद हुए और वीरमदेव ने स्वाभिमान की रक्षा के लिए कुलदेवी के सामने प्राण न्योछावर कर दिए।
खिलजी ने जालौर को जीतकर उसका नाम क्या रखा था?
1311 ईस्वी में जालौर दुर्ग पर विजय के बाद सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने इसका नाम बदलकर ‘जलालाबाद’ रख दिया था। मध्यकाल में हिंदू राज्यों की प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान मिटाकर सल्तनत का वर्चस्व स्थापित करने की नीति के तहत ऐसा किया गया। यह नाम खिलजी के शाही नाम ‘जलाल-उद-दीन’ से प्रेरित था। जीत के बाद उसने यहाँ के समृद्ध मंदिरों को नष्ट कर इसे दिल्ली सल्तनत का प्रशासनिक केंद्र बनाया और किले के भीतर मलिक शाह पीर की दरगाह व मस्जिद का निर्माण करवाया। हालाँकि, बाद में राजपूतों ने इस पर पुनः अधिकार कर इसका मूल नाम ‘जालौर’ बहाल किया।
बीका दहिया का विश्वासघात और जालौर का किला (गद्दार की कहानी)
महीनों की असफल घेराबंदी के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर दुर्ग को जीतने के लिए कूटनीति से सैनिक बीका दहिया को राजा बनाने का लालच दिया। लालच में आकर बीका ने किले की कमजोर मिट्टी वाली दीवार और गुप्त सुरंग का रास्ता खिलजी को बता दिया। जब उसने यह बात अपनी देशभक्त पत्नी हीरादे को बताई, तो उन्होंने राष्ट्रद्रोह के अपराध में तुरंत तलवार उठाकर अपने ही पति बीका दहिया का सिर धड़ से अलग कर दिया। हीरादे राजा कान्हड़देव को सचेत करने दौड़ीं, लेकिन तब तक खिलजी की सेना किले के भीतर प्रवेश कर चुकी थी।
कान्हड़देव चौहान और वीरमदेव सोनगरा का इतिहास
राव कान्हड़देव चौहान और उनके पुत्र कुँवर वीरमदेव सोनगरा ने दिल्ली सल्तनत की गुलामी स्वीकार न करते हुए मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। युद्ध के अंतिम दिनों में राव कान्हड़देव वीरता से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनके बाद साढ़े तीन दिन तक अकेले मोर्चा संभालने वाले वीरमदेव ने दुश्मनों के हाथों बंदी बनने के बजाय अपनी कुलदेवी आशापुरा माता के सामने आत्मोसर्ग कर दिया। खिलजी की बेटी शहजादी फिरोजा, जो वीरमदेव से एकतरफा प्रेम करती थी, ने दिल्ली में उनके कटे सिर का हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किया और स्वयं यमुना नदी में कूदकर सती हो गई।
अलाउद्दीन खिलजी का जालौर पर आक्रमण (युद्ध की पूरी कहानी)
जालौर युद्ध के पीछे मुख्य कारण अलाउद्दीन खिलजी का साम्राज्य विस्तार और व्यक्तिगत प्रतिशोध था। पहला कारण 1298 ईस्वी का रास्ते का विवाद था, जब कान्हड़देव चौहान ने सोमनाथ मंदिर लूटकर लौट रही खिलजी की सेना को रास्ता देने से मना कर राजपूतों सहित हमला कर मूर्तियां आजाद करवा ली थीं। दूसरा कारण खिलजी की बेटी शहजादी फिरोजा का कान्हड़देव के पुत्र वीरमदेव से एकतरफा प्रेम था। जब वीरमदेव ने अपने कुल के स्वाभिमान की रक्षा के लिए फिरोजा के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया, तो क्रोधित होकर खिलजी ने जालौर पर आक्रमण कर दिया।
जालौर दुर्ग का साका (1311 ईस्वी)
साका क्या होता है?: राजपूत इतिहास में ‘साका’ उसे कहते हैं जहाँ पुरुष ‘केसरिया’ (मरने-मारने के संकल्प के साथ युद्ध में कूदना) करते हैं और महिलाएँ अपने सम्मान की रक्षा के लिए ‘जौहर’ (अग्नि कुंड में कूदना) करती हैं।
घटना: यह जालौर के इतिहास का एकमात्र और सबसे प्रसिद्ध साका था। जब अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने गद्दारी के दम पर किले का गुप्त रास्ता ढूंढ लिया, तब दुर्ग की रक्षा की कोई उम्मीद नहीं बची थी।
बलिदान: किले के भीतर मौजूद कान्हड़देव चौहान की रानी जैतलदे के नेतृत्व में सैकड़ों राजपूत वीरांगनाओं ने धधकती अग्नि की लपटों में कूदकर जौहर किया। इसके तुरंत बाद, बचे हुए राजपूत सैनिकों ने केसरिया बाना पहनकर किले के द्वार खोल दिए और भूखे शेरों की तरह खिलजी की विशाल सेना पर टूट पड़े।
जालौर किले की चढ़ाई और सीढ़ियों का सच
जालौर किले (सुवर्णगिरि) की चढ़ाई मध्यम से कठिन श्रेणी में आती है, जो अरावली की एक खड़ी और घुमावदार पहाड़ी पर स्थित है। तलहटी से मुख्य द्वार तक पहुँचने के लिए लगभग 1,400 से 1,500 सीढ़ियाँ और बीच-बीच में ढलान वाले रैंप पार करने पड़ते हैं। एक सामान्य व्यक्ति को ऊपर पहुँचने में 1 से 1.5 घंटे का समय लगता है। रास्ते में पानी और छांव की कमी के कारण पर्यटकों को अपने साथ पानी की बोतल और ग्लूकोज रखने की सलाह दी जाती है, क्योंकि बुजुर्गों के लिए यह चढ़ाई अत्यधिक थका देने वाली हो सकती है।
Jalore Fort Timings and Entry Fee (जालौर का किला प्रवेश समय और टिकट)
प्रवेश शुल्क (Entry Fee): जालौर किले में प्रवेश पूरी तरह से निःशुल्क (FREE) है। यहाँ भारतीय या विदेशी पर्यटकों के लिए कोई टिकट नहीं लगता।
समय (Timings): आधिकारिक रूप से किला सुबह 5:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक ही चढ़ाई के लिए खुला रहता है।
जोधपुर से जालौर की दूरी और पहुँचने का मार्ग
जोधपुर से जालौर की कुल दूरी लगभग 140 किलोमीटर है। यहाँ पहुँचने के तीन बेहतरीन तरीके हैं:
सड़क मार्ग द्वारा (By Road – सबसे सुविधाजनक): जोधपुर से पाली होकर या वाया रोहट-आहोर होते हुए जालौर के लिए सीधी राजस्थान रोडवेज और प्राइवेट बसें चलती हैं। कार/टैक्सी से जाने में लगभग 2.5 से 3 घंटे का समय लगता है। सड़क की स्थिति काफी अच्छी है।
रेल मार्ग द्वारा (By Train): जोधपुर जंक्शन (JU) से जालौर (JOR) के लिए सीधी ट्रेनें उपलब्ध हैं (जैसे जोधपुर-भीलड़ी पैसेंजर या एक्सप्रेस ट्रेनें)। ट्रेन से पहुँचने में लगभग 2.5 घंटे लगते हैं। जालौर रेलवे स्टेशन से किला मात्र 3-4 किमी दूर है।
हवाई मार्ग (By Air): निकटतम हवाई अड्डा जोधपुर एयरपोर्ट (JDH) ही है, जहाँ से आप सीधे टैक्सी या बस ले सकते हैं।
जालौर और आसपास घूमने की अन्य प्रमुख जगहें
सुंधा माता मंदिर (Sundha Mata Temple): यह जालौर जिले के दांतलावास (भीनमाल) में स्थित एक बेहद प्रसिद्ध और पवित्र मंदिर है। यह पहाड़ी पर स्थित है और यहाँ राजस्थान का पहला ‘रोपवे’ (Ropeway) बनाया गया था। यहाँ चामुंडा माता के शीश की पूजा होती है और प्राकृतिक झरने भी देखने को मिलते हैं।
सिरे मंदिर (Sire Mandir): जालौर शहर के पास ही कालकाजी पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर नाथ संप्रदाय के प्रसिद्ध महर्षि जाबालि की तपोभूमि है। यहाँ की शांति और पहाड़ी वास्तुकला अद्भुत है।
जहाज मंदिर, मांडवला (Jahaz Mandir): जालौर से कुछ दूरी पर स्थित यह जैन मंदिर पूरी तरह से एक विशाल जहाज (Ship) के आकार में सफेद संगमरमर से बनाया गया है, जो अपनी भव्यता के लिए पर्यटकों के बीच आकर्षण का केंद्र है।
मलिक शाह पीर की दरगाह और तोपखाना: जैसा कि पहले चर्चा की गई, ये दोनों स्थान किले के अंदर ही स्थित मुख्य ऐतिहासिक स्थल हैं।
जालौर का किला इतिहास में किस किस कारण प्रसिद्ध है, कॉमेंट कर बता दीजिए। जय श्री सा। खम्मा घणी सा पाठक गण ने।


