रिखिया भक्त कौन हैं? जानिए बाबा रामदेव जी के परम प्रिय रिखिया भक्तों का इतिहास, कामड़ पंथ की मान्यता और जम्मा जागरण में मेघवाल समाज के विशेष महत्व के बारे में।
रिखिया भक्त कौन हैं
लोक देवता बाबा रामदेव जी के सबसे प्रिय, अनन्य और पारंपरिक भक्तों को ‘रिखिया’ कहा जाता है। ‘रिखिया’ शब्द की उत्पत्ति ‘ऋषि’ शब्द से हुई है। बाबा रामदेव जी ने समाज से छुआछूत मिटाने के लिए ‘कामड़ पंथ’ की स्थापना की थी। इस पंथ की दीक्षा लेने वाले मुख्य रूप से मेघवाल (मेघवंशी) समाज के अनन्य भक्तों को ही रिखिया कहा जाता है। बाबा की परम शिष्या डाली बाई भी इसी समाज से थीं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब तक ये रिखिया भक्त तंदूरे और मंजीरे के साथ बाबा का ‘जम्मा जागरण’ नहीं लगाते, तब तक बाबा की मन्नत पूरी नहीं मानी जाती।
रिखिया का अर्थ क्या है
लोक संस्कृति में ‘रिखिया’ शब्द की उत्पत्ति मूल रूप से संस्कृत के ‘ऋषि’ शब्द से हुई है. राजस्थानी और मारवाड़ी बोली में ऋषि शब्द अपभ्रंश होकर ‘रिखिया’ या ‘रखी’ बन गया. इसका सीधा अर्थ है—सात्विक, पवित्र और ईश्वर भक्ति में लीन रहने वाला संत या महात्मा.
लोक देवता बाबा रामदेव जी ने समाज के वंचित और शोषित वर्ग (मुख्य रूप से मेघवाल समाज) के उन अनन्य भक्तों को ‘रिखिया’ की उपाधि दी थी, जो अपनी पवित्रता और अटूट आस्था के कारण ऋषियों के समान पूजनीय थे. आज बाबा रामदेव जी के इन पारंपरिक और दीक्षा प्राप्त भक्तों को ही आदरपूर्वक ‘रिखिया’ कहा जाता है.
रिखिया भक्त मेघवाल समाज और बाबा रामदेव जी का इतिहास
बाबा रामदेव जी और मेघवाल समाज का संबंध अटूट और ऐतिहासिक है। 15वीं शताब्दी में बाबा रामदेव जी ने समाज से छुआछूत, जातिवाद और ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाने के लिए ‘कामड़ पंथ’ की स्थापना की थी। उन्होंने मेघवाल समाज को अपना सबसे निकटतम और अनन्य भक्त माना, जिन्हें उन्होंने आदरपूर्वक ‘रिखिया’ (ऋषि) की उपाधि दी।
बाबा की सबसे परम शिष्या और मानस पुत्री डाली बाई मेघवाल समाज से ही थीं, जिन्होंने बाबा से एक दिन पहले जीवित समाधि ली थी। आज भी यह अटूट धार्मिक मान्यता है कि मेघवाल समाज के रिखिया भक्तों द्वारा ‘जम्मा जागरण’ और पाट पूजा किए बिना बाबा की आराधना पूरी नहीं मानी जाती।
रामसरोवर की पाल के प्राचीन भजन
जैसलमेर के रामदेवरा (रुणिचा) स्थित रामसरोवर तालाब की पाल और घाटों पर गाए जाने वाले भजनों का लोक संस्कृति में विशेष महत्व है। भादवा मेले के दौरान यहाँ रिखिया (पारंपरिक भक्त) और श्रद्धालु जुटते हैं। वे बिना किसी आधुनिक लाउडस्पीकर के, केवल तंदूरे (चौतारे) और मंजीरों की झंकार पर विशुद्ध देसी शैली में बाबा रामदेव जी की महिमा गाते हैं। इन भजनों में बाबा के २४ पर्चों (चमत्कारों), उनके विवाह प्रसंग (ब्यावले), और कष्ट मिटाने की पुकार (हेला) का समावेश होता है। यह सदियों पुरानी गायकी श्रद्धालुओं को गहरी आध्यात्मिक शांति और भक्ति का अनुभव कराती है।
कामड़िया पंथ के 12 नियम
बाबा रामदेव जी द्वारा स्थापित कामड़िया पंथ मूल रूप से सामाजिक समरसता, उच्च नैतिकता और शुद्ध आचरण का संदेश देता है। इस पंथ के अनुयायियों के लिए बारह कड़े नियम निर्धारित हैं, जिनमें केवल एक निराकार अलख पुरुष की भक्ति करना, जीवन में सत्य व ईमानदारी अपनाना और मन-कर्म से अहिंसा का पालन करना मुख्य है। यह पंथ जाति-पाति व छुआछूत का पूरी तरह त्याग कर समाज में समानता लाता है। इसके साथ ही अनुयायियों के लिए पूर्ण नशामुक्ति, शुद्ध शाकाहार, सदाचार, अतिथि सत्कार और जीव दया अनिवार्य है। वे नियमित रूप से जम्मा जागरण (पाट पूजा) करते हैं और लोभ-लालच छोड़कर संतोष व गुरु मर्यादा के साथ जीवन जीते हैं।
रिखिया रा देव रामदेवजी भजन लिरिक्स
- स्थायी: खम्मा खम्मा हो धणिया, रुणिचा रा धणिया, थाने तो ध्यावे आखो मारवाड़ जी, आखो गुजरात जी, अजमल जी रा कंवर, मैणादे रा लाल जी, ओ जी म्हारा रिखिया रा देव रामदेवजी।
- अंतरा 1: पिछम धरा सूं पीर जी पधारिया, उंडू काश्मीर माहीं अवतार लियो जी। माता मैणादे झूलावे थने पारणियो, ओ जी म्हारा रिखिया रा देव रामदेवजी।
- अंतरा 2: पोकरण गढ़ के माहीं भैरव राक्षस रेवे था, प्रजा ने दुःख देवे रातो दिन जी। भैरव ने मार मुकती थे देवाई, ओ जी म्हारा रिखिया रा देव रामदेवजी।
- अंतरा 3: डाली बाई थारी अनन्य शिष्या कहवाई, समाधि थारे सूं पहली भाई लीनी जी। रिखिया री अरज पीर जी थे सुणजो, ओ जी म्हारा रिखिया रा देव रामदेवजी।
- अंतरा 4: कामड़ पंथ चलाय ने सरब समता दिखाई, जात-पात रो भेद थे मिटायो जी। ‘रिखिया’ गावे थारा चरणां में ब्यावला, ओ जी म्हारा रिखिया रा देव रामदेवजी।
कामड़ पंथ (कामड़िया पंथ) और रिखिया भक्त
कामड़ पंथ (कामड़िया पंथ) की स्थापना 15वीं शताब्दी में लोक देवता बाबा रामदेव जी ने राजस्थान में की थी। इस पंथ की शुरुआत मुख्य रूप से तत्कालीन समाज में व्याप्त छुआछूत, जातिवाद और ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाने तथा सामाजिक समरसता स्थापित करने के लिए की गई थी। बाबा रामदेव जी ने समाज के अंतिम पायदान पर खड़े शोषित वर्ग (विशेषकर मेघवाल समाज) के लोगों को गले लगाया और उन्हें ‘रिखिया’ (ऋषि) की उपाधि देकर इस पंथ में दीक्षित किया। कामड़ पंथ के लोग एकेश्वरवाद (अलख पुरुष) की पूजा करते हैं, कठिन नैतिक नियमों का पालन करते हैं, और इसकी महिलाएं विश्व प्रसिद्ध ‘तेरहताली’ नृत्य के माध्यम से बाबा की आराधना करती हैं।
जम्मा जागरण रिखिया मान्यता
बाबा रामदेव जी के ‘जम्मा जागरण’ में मेघवाल (रिखिया) समाज के भक्तों की उपस्थिति और भागीदारी अनिवार्य मानी जाती है। धार्मिक लोक मान्यता के अनुसार, बाबा रामदेव जी ने अपनी अनन्य शिष्या डाली बाई और रिखिया भक्तों को वचन दिया था कि उनके द्वारा अलख जगाए बिना कोई भी जम्मा पूरा नहीं माना जाएगा। जम्मे के दौरान रिखिया भक्त ही मुख्य रूप से ‘पाट पूजा’ (घट स्थापना) की पवित्र तांत्रिक व आध्यात्मिक विधि संपन्न करते हैं। तंदूरे और मंजीरों के साथ रातभर बाबा के ‘ब्यावले’ और ‘बाणियाँ’ गाना इन्हीं रिखियों का विशेषाधिकार है, जिसके बिना श्रद्धालुओं की मन्नत पूरी नहीं मानी जाती।
“बाबा के असली रिखिया कौन हैं?”
बाबा रामदेव जी के असली रिखिया मुख्य रूप से मेघवाल (मेघवंशी) और कामड़ समाज के वे अनन्य श्रद्धालु हैं, जिन्होंने बाबा द्वारा स्थापित ‘कामड़ पंथ’ की दीक्षा ली थी। 15वीं शताब्दी में जब समाज में गहरा जातिगत भेदभाव था, तब बाबा ने इस वर्ग की निश्छल भक्ति से प्रसन्न होकर इन्हें गले लगाया और समाज में ऋषियों जैसा आदरणीय स्थान देने के लिए ‘रिखिया’ (ऋषि) की उपाधि दी। बाबा की परम शिष्या डाली बाई भी इसी समाज से थीं। आज भी केवल इसी दीक्षा प्राप्त और पारंपरिक समाज के भक्तों को ही बाबा का ‘असली रिखिया’ माना जाता है।
रिखिया भक्त पर लिखा यह आर्टिकल आपको कैसा लगा? बाबा रामदेव जी महाराज की जय।



