सालिम सिंह की हवेली जैसलमेर: इतिहास, क्रूरता और एक अनसुलझा रहस्य!

सालिम सिंह की हवेली जैसलमेर का इतिहास और कुलधरा गांव का रहस्य जानिए। क्या सच में राजा ने दीवान की इस 9 मंजिला हवेली की ऊपरी दो मंजिलें तुड़वा दी थीं?

सालिम सिंह की हवेली जैसलमेर का इतिहास (History of Salim Singh Ki Haveli)

इस हवेली का इतिहास जितना इसकी वास्तुकला से जुड़ा है, उतना ही जैसलमेर के सबसे क्रूर और शक्तिशाली प्रधानमंत्री (दीवान) के राजनीतिक रसूख से भी जुड़ा हुआ है।

दीवान सालिम सिंह मेहता कौन था? (Who was Diwan Salim Singh Mehta?)

सालिम सिंह मेहता जैसलमेर रियासत के राजा महारावल मूलराज भाटी (Maharawal Mulraj Bhati) के शासनकाल में राज्य के प्रधानमंत्री यानी दीवान (Prime Minister / Diwan) थे। सालिम सिंह का परिवार पीढ़ियों से शाही दरबार में उच्च पदों पर आसीन था। उनके पिता सरूप सिंह मेहता (Sarup Singh Mehta) भी जैसलमेर के दीवान थे।

इतिहासकारों के अनुसार, सरूप सिंह मेहता के कुकर्मों और अत्याचारी स्वभाव के कारण भाटी राजपूत राजकुमारों और सामंतों ने दरबार में उनकी सरेआम हत्या कर दी थी। उस समय सालिम सिंह बहुत छोटे थे, लेकिन उनके दिल में भाटी राजवंश के प्रति बदले की आग सुलग रही थी। जब सालिम सिंह अपनी चालाकी और कूटनीति के बल पर जैसलमेर के दीवान बने, तो उन्होंने सत्ता की सारी बागडोर अपने हाथ में ले ली और राजा को महज एक कठपुतली बनाकर रख दिया।

सालिम सिंह की हवेली का निर्माण और राजनीतिक उद्देश्य (Construction & Political Ambition of Salim Singh Ki Haveli)

सालिम सिंह ने अपने रहने के लिए सन् 1815 ईस्वी (1815 AD) में इस भव्य हवेली का आधुनिक और विशाल स्वरूप तैयार करवाया। वह अपनी ताकत और रसूख को राजा के महल से भी बड़ा दिखाना चाहता था। यही कारण था कि उसने इस हवेली को इतना ऊंचा और भव्य रूप दिया कि यह सीधे सोनार किले (Jaisalmer Fort) के शाही महलों को चुनौती देने लगी।

सालिम सिंह की हवेली जैसलमेर टिकट और कैमरा चार्ज (Salim Singh Ki Haveli Entry Fee & Camera Charges)

भारतीय पर्यटक (Indian Tourists): ₹100 प्रति व्यक्ति.विदेशी पर्यटक (Foreign Tourists): ₹100 प्रति व्यक्ति.नोट: कुछ सरकारी टूरिज्म वेबसाइटों पर इसका बेस सरकारी शुल्क ₹20 से ₹50 भी लिखा मिलता है, लेकिन वर्तमान में ग्राउंड रियलिटी और Tripadvisor Reviews के अनुसार पर्यटकों से रख-रखाव शुल्क (Maintenance Fee) मिलाकर ₹100 प्रति व्यक्ति का टिकट ही लिया जा रहा है.स्टिल कैमरा शुल्क (Still Camera Fee): ₹50.वीडियो कैमरा शुल्क (Video/Camcorder Fee): ₹100.मोबाइल कैमरा (Mobile Photography): ₹20 (कुछ मामलों में स्मार्टफोन से फोटो खींचने या वीडियो बनाने पर ₹20 की अतिरिक्त रसीद काटी जाती है).

क्या सालिम सिंह की हवेली जैसलमेर के अंदर जाना वर्जित है?

सालिम सिंह की हवेली जैसलमेर एक निजी संपत्ति है, जिसके जर्जर ढांचे और मधुमक्खियों के कारण ऊपरी मंजिलें पर्यटकों के लिए प्रतिबंधित हैं। ट्रिपएडवाइजर के अनुसार, ₹100 के टिकट के बावजूद आगंतुकों को केवल निचले स्तर तक सीमित रखा जाता है, हालांकि बाहरी वास्तुकला सड़क से मुफ्त देखी जा सकती है। आप ट्रिपएडवाइजर पर इस स्थान की अधिक समीक्षाएं पढ़ सकते हैं।

डार्क हिस्ट्री: कुलधरा गांव का शापित रहस्य (Dark History: The Mystery of Kuldhara Village)

दीवान सालिम सिंह की क्रूरता के कारण ही सन् 1825 में खुशहाल कुलधरा गांव वीरान हुआ। सालिम सिंह गांव के मुखिया की खूबसूरत बेटी को जबरन हासिल करना चाहता था और इनकार करने पर भारी टैक्स लगाने की धमकी दी। आत्मसम्मान की रक्षा के लिए कुलधरा सहित 84 गांवों के पालीवाल ब्राह्मणों ने एक ही रात में चुपचाप पलायन कर लिया। जाते-जाते उन्होंने इस भूमि को कभी न बसने का श्राप दिया, जिससे यह आज भारत की सबसे भूतिया जगहों में गिना जाता है।

सालिम सिंह की हवेली की ऊपरी मंजिलों का रहस्य: राजा की ईर्ष्या (The Mystery of Demolished Floors)

दीवान सालिम सिंह ने अपनी हवेली को मूल रूप से 9 मंजिला बनवाया था, जिसकी ऊपरी दो लकड़ी की मंजिलें ‘रंगमहल’ और ‘शीशमहल’ थीं। राजा के महल (सोनार किला) से ऊंचा होने के कारण यह निर्माण शाही नियमों का उल्लंघन और राजपूती स्वाभिमान को चुनौती था। जब घमंडी सालिम सिंह ने इसे छोटा करने से मना किया, तो उसकी मौत के बाद राजा के आदेश पर ऊपरी दोनों मंजिलों को तुड़वा दिया गया, जिससे यह आज केवल 7 मंजिला ही बची है।

सालिम सिंह की हवेली की वास्तुकला की मुख्य विशेषताएं क्या हैं?

यह हवेली अपनी विशिष्ट वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। इसके ऊपरी हिस्से को ‘जहाज महल’ या ‘मोती महल’ कहा जाता है, क्योंकि इसकी बनावट किसी तैरते हुए जहाज या मोर जैसी दिखती है। हवेली का नीचे का हिस्सा काफी संकरा है, लेकिन जैसे-जैसे यह ऊपर बढ़ती है, यह फैलती जाती है। इसमें कुल 38 झरोखे (खिड़कियां) हैं, जिन पर नीले रंग की बेहद खूबसूरत और बारीक नक्काशी की गई है। हवेली के पत्थरों को जोड़ने के लिए सीमेंट या चूने के बजाय लोहे की छड़ों और कड़ियों का इस्तेमाल किया गया है, जो उस समय की अद्भुत इंजीनियरिंग को दर्शाता है

सालिम सिंह की हवेली को ‘जहाज महल’ क्यों कहा जाता है?

इस हवेली को ‘जहाज महल’ इसके अनोखे स्थापत्य डिजाइन के कारण कहा जाता है। जब आप इस हवेली को दूर से या इसके ठीक नीचे से ऊपर की ओर देखते हैं, तो इसका सबसे ऊपरी हिस्सा एक बड़े समुद्री जहाज के अग्रभाग (आगे के हिस्से) की तरह दिखाई देता है। ऐसा लगता है मानो कोई विशाल जहाज रेगिस्तान के समंदर में तैर रहा हो। इसकी इसी अद्भुत बनावट, फैलाव और राजसी लुक के कारण स्थानीय लोग और पर्यटक इसे प्यार से ‘जहाज महल’ या ‘मोती महल’ के नाम से भी पुकारते हैं।

सालिम सिंह की हवेली की ऊपरी मंजिलों को गिराए जाने के पीछे क्या ऐतिहासिक कहानी है?

इतिहासकारों के अनुसार, सालिम सिंह ने इस हवेली को मूल रूप से 7 या 9 मंजिला बनवाया था। वह इसकी ऊंचाई को जैसलमेर के महाराजा के महल (राजमहल) के बराबर या उससे भी ऊंचा ले जाना चाहता था, जो राजा के सम्मान के खिलाफ था। सालिम सिंह की इस बढ़ती उद्दंडता और ताकत से नाराज होकर जैसलमेर के तत्कालीन राजा ने हवेली की ऊपरी दो मंजिलों को गिराने का आदेश दे दिया था। कुछ कहानियों में यह भी कहा जाता है कि वे मंजिलें लकड़ी की बनी थीं और उन्हें सुरक्षा कारणों से खुद सालिम सिंह ने बाद में हटवा दिया था।

क्या सालिम सिंह की हवेली के अंदर कोई गुप्त सुरंग भी मौजूद है?

जी हां, स्थानीय लोककथाओं और इतिहास के अनुसार, इस हवेली के भीतर एक गुप्त तहखाना और सुरंग मौजूद है। ऐसा माना जाता है कि दीवान सालिम सिंह ने अपनी सुरक्षा और आपातकाल में महल से सुरक्षित बाहर निकलने के लिए इस सुरंग का निर्माण करवाया था। यह गुप्त रास्ता हवेली से शुरू होकर सीधे जैसलमेर किले (सोनार किला) तक जाता था। सुरक्षा और रख-रखाव के अभाव के कारण वर्तमान में इस सुरंग के प्रवेश द्वार को पर्यटकों के लिए पूरी तरह से बंद कर दिया गया है, लेकिन यह आज भी कौतूहल का विषय है।

सालिम सिंह की हवेली का स्वामित्व (Ownership) किसके पास है—सरकार या कोई निजी परिवार?

सालिम सिंह की हवेली वर्तमान में एक निजी संपत्ति (Private Property) है। हालांकि यह जैसलमेर के ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों में से एक है, लेकिन इसका स्वामित्व और रख-रखाव आज भी दीवान सालिम सिंह मेहता के वंशजों (मेहता परिवार) के पास है। इसी वजह से हवेली के कुछ चुनिंदा हिस्सों को ही पर्यटकों के देखने के लिए खोला गया है, जबकि इसके बाकी अंदरूनी कमरों और निजी हिस्सों में आम जनता का प्रवेश वर्जित है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) या राजस्थान सरकार इस धरोहर का सीधा संचालन नहीं करती है, बल्कि यह पूरी तरह से एक निजी विरासत के रूप में सहेजी गई है।

सालिम सिंह की क्रूरता का इतिहास सालिम सिंह की हवेली और जैसलमेर से कैसे जुड़ा है?

दीवान सालिम सिंह जैसलमेर के इतिहास का एक ऐसा काला अध्याय है, जिसे उसकी बेइंतहा क्रूरता, लालच और दमन के लिए जाना जाता है। जब वह महज 11 साल का था, तभी उसके पिता की हत्या कर दी गई थी, जिसका बदला लेने की जिद के साथ वह दीवान की गद्दी पर बैठा। सत्ता पाते ही उसने जनता पर भारी टैक्स थोप दिए और उन पर घोर अत्याचार करने लगा। उसके इसी खौफ और जुल्म से तंग आकर वहां के अमीर ‘पालीवाल ब्राह्मणों’ ने स्वाभिमान की खातिर एक ही रात में अपने सभी 84 गांवों को खाली कर दिया। इसी सामूहिक पलायन के कारण कुलधरा जैसा खुशहाल गांव हमेशा के लिए उजाड़ और भूतिया बन गया। सालिम सिंह की यह आलीशान हवेली उसी असीमित तानाशाही, आतंक और खौफनाक इतिहास की मूक गवाह है।

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