बाबा रामदेव जी की पत्नी रानी नेतलदे की अनसुनी कहानी और इतिहास (Rani Netalde Story and History in Hindi)

रानी नेतलदे की अनसुनी कहानी है यह।राजस्थान की पावन धरा पर कई लोक-देवताओं ने जन्म लिया है, जिनमें बाबा रामदेव जी रूणेचा वाले (Baba Ramdev Ji Runecha) का नाम सबसे प्रमुखता से लिया जाता है। बाबा रामदेव जी को कलयुग का अवतार और पीरों का पीर (Ramapir) कहा जाता है। बाबा रामदेव जी के चमत्कारों और उनकी महिमा से तो हर कोई वाकिफ है, लेकिन क्या आप उनकी अर्धांगिनी रानी नेतलदे की कहानी (Rani Netalde ki kahani) और उनसे जुड़े महान चमत्कारों के बारे में जानते हैं?

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रानी नेतलदे का परिचय और इतिहास (Introduction and History of Rani Netalde)

यदि हम नेतलदे का इतिहास और चमत्कार (Netalde history in hindi) टटोलें, तो हमें पता चलता है कि माता नेतलदे वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित अमरकोट (Amarkot) की रहने वाली थीं। वे अमरकोट के राजा दलजी सोढा की पुत्री (Amarkot raja Dalji Sodha daughter) थीं।रानी नेतलदे बचपन से ही बहुत धार्मिक और शांत स्वभाव की थीं, लेकिन वे शारीरिक रूप से दिव्यांग थीं। जन्म से ही उनके दोनों पैर काम नहीं करते थे और वे चल-फिर नहीं सकती थीं। इसके बावजूद, उनके चेहरे पर एक अलौकिक तेज था।

बाबा रामदेव जी और रानी नेतलदे का विवाह (Ramdev ji aur Netalde vivah katha)

जब राजकुमारी नेतलदे विवाह योग्य हुईं, तो राजा दलजी सोढा उनके भविष्य को लेकर बेहद चिंतित रहने लगे। उस समय पोकरण और रूणेचा में बाबा रामदेव जी के चमत्कारों की गूंज चारों तरफ फैल चुकी थी। राजा दलजी ने बाबा रामदेव जी की महिमा सुनकर उनके पास विवाह का प्रस्ताव (Marriage proposal) भेजा।

बाबा रामदेव जी तो अंतर्यामी थे, वे जानते थे कि नेतलदे के साथ उनका पूर्वजन्म का संबंध है। इसलिए उन्होंने इस विवाह प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया। जब विवाह की तिथि निश्चित हुई, तो बाबा रामदेव जी अपनी बारात लेकर अमरकोट पहुंचे।

रानी नेतलदे के विवाह मंडप में हुआ सबसे बड़ा चमत्कार (The Miracle in the Marriage Mandap)

रामदेव जी और नेतलदे का विवाह (Ramdev ji aur Netalde vivah) इतिहास के सबसे अनोखे विवाहों में से एक माना जाता है। जब फेरों (Wedding rounds) का समय आया, तो एक बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो गई। रानी नेतलदे अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकती थीं, इसलिए वे फेरे कैसे लेतीं?

विवाह मंडप में मौजूद सभी लोग चिंतित थे और राजा दलजी सोढा की आंखों में आंसू थे। तभी बाबा रामदेव जी ने मुस्कुराते हुए पाणिग्रहण संस्कार (Wedding ritual) के समय माता नेतलदे का हाथ अपने हाथ में लिया।

जैसे ही बाबा रामदेव जी का दिव्य हाथ माता नेतलदे के हाथ से स्पर्श हुआ, वैसे ही एक अद्भुत चमत्कार (Divine miracle) हुआ। माता नेतलदे के पैरों में अचानक जान आ गई और वे अपने पैरों पर खड़ी हो गईं। बाबा रामदेव जी के इस चमत्कार को देखकर विवाह मंडप में मौजूद सभी राजा-महाराजा और प्रजा “बाबा रामदेव जी की जय” के जयकारे लगाने लगे। इसके बाद दोनों ने अत्यंत हर्षोल्लास के साथ सात फेरे पूरे किए।

रानी नेतलदे का त्याग और समाधि (Sacrifice and Samadhi of Rani Netalde)

विवाह के बाद रानी नेतलदे रूणेचा आईं और उन्होंने बाबा रामदेव जी के सामाजिक सुधार के कार्यों (Social welfare works) में उनका पूरा साथ दिया। जब बाबा रामदेव जी ने पृथ्वी पर अपने अवतार का उद्देश्य पूरा कर लिया, तो उन्होंने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को जीवित समाधि (Living Samadhi) लेने का निर्णय किया।

बाबा रामदेव जी के समाधि लेने के अगले ही दिन, उनकी अनन्य भक्त डाली बाई ने भी समाधि ली। बाबा रामदेव जी के जाने के बाद रानी नेतलदे यादों की अग्नि में जलने लगीं क्योंकि बाबा रामदेव के प्रति अगाध प्रेम था। उन्होंने भी बाबा रामदेव जी के ठीक पीछे अपनी जीवित समाधि (Rani Netalde Samadhi Ramdevra) ली। आज भी रामदेवरा मंदिर में बाबा की समाधि के पास ही माता नेतलदे की समाधि स्थित है, जहाँ लाखों भक्त शीश नवाते हैं।

बाबा रामदेव जी की पत्नी रानी नेतलदे की अनसुनी कहानी

बाबा रामदेव जी और रानी नेतलदे के कितने बच्चे थे? (Children of Ramdev Ji and Netalde)

लोक-कथाओं के अनुसार बाबा रामदेव जी और रानी नेतलदे के दो पुत्र (Ramdev ji had two sons) सादा जी और देवराज जी थे, जबकि उनके समाधि लेने के बाद पुत्री चांद कंवर (Chandrakunvarba) का जन्म हुआ। बड़े पुत्र सादा जी ने रामदेवरा से 15 किमी दूर अपना अलग ‘सादा’ गांव बसाया जहां आज भी उनका परिवार रहता है, वहीं छोटे भाई देवराज जी के वंशज वर्तमान में मुख्य रामदेवरा मंदिर की देखरेख और पूजा-पाठ का पूरा कार्य संभालते हैं।

‘नेतलदे री कथा’ (मारवाड़ी भाषा में) का धार्मिक महत्व क्या है और इसे कब सुना जाता है

मारवाड़ी या क्षेत्रीय राजस्थानी भाषा में कही जाने वाली ‘नेतलदे री कथा’ का बाबा रामदेव जी के भक्तों के बीच बहुत बड़ा धार्मिक महत्व है। इस कथा में माता नेतलदे के पूर्वजन्म (शेषनाग की पुत्री सुलोचना के अवतार), उनके पैर से अपंग होने के कारण, और विवाह मंडप में बाबा रामदेव जी द्वारा किए गए दिव्य चमत्कार का पूरा वर्णन संगीतमय रूप में किया जाता है। मुख्य रूप से भाद्रपद महीने (भादवा मास) में बाबा रामदेव जी के मेले के दौरान और घरों में आयोजित होने वाले ‘जम्मा जागरण’ (रात के जागरण) में इस कथा को ऑडियो या वीडियो के माध्यम से विशेष रूप से सुना और सुनाया जाता है। मान्यता है कि इस कथा को सुनने से वैवाहिक जीवन के कष्ट दूर होते हैं।

राजस्थानी भजनों में बाबा रामदेव जी को ‘नेतलदे रा भरतार’ क्यों कहा जाता है और इसका क्या महत्व है?

राजस्थानी और मारवाड़ी भाषा में ‘भरतार’ शब्द का अर्थ ‘पति’ या ‘स्वामी’ होता है। चूंकि बाबा रामदेव जी का विवाह अमरकोट की राजकुमारी माता नेतलदे के साथ हुआ था, इसलिए लोक-साहित्य और भजनों में उन्हें बड़े आदर के साथ ‘नेतलदे रा भरतार’ (Mata Netalde के पति) कहकर पुकारा जाता है। राजस्थान के लोक कलाकार जब भी बाबा रामदेव जी की महिमा गाते हैं, तो वे ‘खम्मा खम्मा ओ कंवर अजमाल जी रा कंवर, नेतलदे रा भरतार’ पंक्तियों का उपयोग करते हैं। यह नाम बाबा के वैवाहिक जीवन और माता नेतलदे के प्रति उनके अगाध प्रेम व सम्मान को दर्शाता है। आज भी भक्त इस नाम के स्टेटस और रिंगटोन इंटरनेट पर बहुत श्रद्धा से खोजते हैं।

रानी नेतलदे की असली फोटो और युगल वॉलपेपर (Rani Netalde Real Photo & Wallpaper)

लगभग 600 वर्ष से अधिक पुराना (विक्रम संवत 1426) इतिहास होने के कारण माता नेतलदे की कोई वास्तविक “कैमरा फोटो” उपलब्ध नहीं है। इंटरनेट और रामदेवरा बाजार में मिलने वाले चित्र पौराणिक कथाओं और राजस्थानी चित्रकला (Marwar School of Painting) पर आधारित हैं। इन तस्वीरों में भक्त बाबा रामदेव जी को उनके प्रिय ‘लीले घोड़े’ पर सवार और उनके पास पारंपरिक पोशाक व गहनों में सजी माता नेतलदे को खड़ी मुद्रा में या सिंहासन पर बैठी युगल जोड़ी (Divine Couple Wallpaper) के रूप में देखते हैं, जिनके चेहरे पर एक अलौकिक तेज दिखाई देता है।

रानी नेतलदे की समाधि के दर्शन का कड़ा नियम (Darshan Rules of Rani Netalde Samadhi)

रामदेवरा आने वाले श्रद्धालुओं और पुजारियों के अनुसार माता नेतलदे की समाधि के दर्शन का एक अनिवार्य नियम है। इस नियम के तहत भक्तों को सबसे पहले बाबा रामदेव जी की मुख्य समाधि के दर्शन करने होते हैं और उसके बाद ही माता नेतलदे के मंदिर की ओर बढ़ा जाता है। लोक मान्यता है कि बाबा की समाधि के बाद जब तक भक्त माता नेतलदे और डाली बाई की समाधि पर शीश नहीं नवा लेते, तब तक उनकी यह धार्मिक यात्रा अधूरी और निष्फल मानी जाती है।

रानी नेतलदे का मंदिर कहाँ है? (Rani Netalde Temple Location)

रानी नेतलदे का मुख्य मंदिर और पवित्र समाधि राजस्थान के जैसलमेर जिले के प्रसिद्ध रामदेवरा (रूणेचा) मुख्य मंदिर परिसर के भीतर ही स्थित है। जैसे ही आप बाबा रामदेव जी के मुख्य समाधि मंदिर में प्रवेश करते हैं, तो बाबा की मुख्य समाधि के बिल्कुल नजदीक (ठीक पीछे की तरफ) माता नेतलदे का भव्य मंदिर दिखाई देता है। इसके अलावा, पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित उनके मायके अमरकोट (उमरकोट) में भी इनका एक ऐतिहासिक मंदिर बना हुआ है, जहाँ सीमा पार के लाखों श्रद्धालु धोक लगाने आते हैं।

बाबा रामदेव जी ने नेतलदे के पैर कैसे ठीक किए? विवाह मंडप की दिव्य कहानी (How Ramdev Ji cured Netalde’s legs?)

राजस्थानी बियावलों में प्रसिद्ध बाबा रामदेव जी और माता नेतलदे के विवाह की कथा उनके सबसे बड़े पर्चों (चमत्कारों) में से एक है। विक्रम संवत 1426 में जब बाबा की बारात अमरकोट पहुंची, तो फेरों (Wedding rounds) के समय राजा दलजी सोढा चिंतित हो गए क्योंकि राजकुमारी नेतलदे पैर से अपंग थीं। तब अंतर्यामी बाबा ने मुस्कुराते हुए पाणिग्रहण संस्कार के समय नेतलदे का हाथ थामा, जिससे पूर्वजन्म का श्राप तत्काल समाप्त हो गया और उनके शरीर में बिजली जैसी दिव्य ऊर्जा दौड़ी। जो राजकुमारी कभी बैठ भी नहीं पाती थी, वह अचानक खड़ी हो गई और इस महाचमत्कार के बीच दोनों ने हर्षोल्लास से सात फेरे पूरे किए।

रानी नेतलदे पैर से अपंग क्यों थीं? इसके पीछे का पौराणिक प्रसंग (Why was Rani Netalde handicapped?)

राजस्थानी लोक-साहित्य और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रानी नेतलदे का पैर से अपंग होना कोई साधारण शारीरिक दोष नहीं था, बल्कि इसके पीछे उनके पूर्वजन्म का एक गहरा प्रसंग जुड़ा हुआ था।

शेषनाग की पुत्री सुलोचना का अवतार: धार्मिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में जब भगवान विष्णु ने कृष्ण अवतार लिया, तब उनके साथ शेषनाग के अंश बलराम जी भी धरती पर आए। माता नेतलदे को पूर्वजन्म में शेषनाग की पुत्री ‘सुलोचना’ माना जाता है।

अपंग होने का कारण: पूर्वजन्म में एक बार भगवान कृष्ण (जो कलयुग में बाबा रामदेव जी के रूप में अवतरित हुए) और सुलोचना के बीच किसी बात को लेकर दिव्य संवाद चल रहा था। उस समय सुलोचना ने अनजाने में भगवान के सामने अपने पैरों को इस तरह रखा जो मर्यादा के विरुद्ध था। इस मर्यादा भंग के कारण उन्हें श्राप मिला कि जब वे मृत्युलोक (धरती) पर मानव रूप में जन्म लेंगी, तो उनके पैर काम नहीं करेंगे।

श्राप का निवारण: जब सुलोचना ने क्षमा मांगी, तो भगवान कृष्ण ने कहा कि कलयुग में जब मैं ‘तंवर वंश’ में बाबा रामदेव के रूप में अवतार लूंगा, तब अमरकोट के राजा दलजी सोढा के घर तुम्हारा जन्म नेतलदे के रूप में होगा। तुम्हारे पैरों की यह लाचारी केवल मेरे हाथों से ही दूर होगी और मैं स्वयं तुम्हारा पाणिग्रहण (विवाह) कर तुम्हें इस श्राप से मुक्त करूँगा। इसी कारण माता नेतलदे जन्म से ही पैरों से लाचार थीं ताकि भगवान का वह वचन पूरा हो सके।

रानी नेतल को परचा: गर्भ से ही पुत्र ‘सादा जी’ के बोलने का महाचमत्कार (The Miracle of Child Speaking from the Womb)

राजस्थानी लोक-साहित्य में ‘रानी नेतल को परचा’ (Rani Netal ko parcha katha) नाम से एक बेहद प्रसिद्ध और चमत्कारी कहानी मिलती है। मान्यता है कि जब माता नेतलदे गर्भवती थीं और उनके गर्भ में सादा जी थे, तब एक बार रानी नेतलदे के मन में बाबा रामदेव जी की दिव्य शक्तियों और उनके अवतार होने को लेकर थोड़ी शंका उत्पन्न हुई।

तभी उनके गर्भ में पल रहे शिशु (सादा जी) ने गर्भ के भीतर से ही अपनी माता से बात की और उन्हें बाबा रामदेव जी की साक्षात ईश्वर होने की महिमा बताई। गर्भ से ही बच्चे की आवाज और ज्ञानमयी बातें सुनकर माता नेतलदे का सारा संशय दूर हो गया और वे बाबा के चरणों में गिर पड़ीं। इस अलौकिक घटना को बाबा रामदेव जी के प्रमुख 24 पर्चों (चमत्कारों) में से एक माना जाता है।

रामदेव जी और नेतलदे की शादी का साल और तिथि क्या थी? (Ramdev Ji Marriage Year and Samvat)

धार्मिक ग्रंथों और बियावलों (विवाह के लोकगीत) के अनुसार, बाबा रामदेव जी और माता नेतलदे का विवाह विक्रम संवत 1426 (V.S. 1426) में संपन्न हुआ था। बाबा रामदेव जी ने इससे ठीक एक वर्ष पूर्व यानी संवत 1425 में रूणेचा (रामदेवरा) नगर की स्थापना की थी और वहां अपने माता-पिता के साथ रहने लगे थे। माता मैणादे की इच्छा और कुल की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए ज्येष्ठ सुदी सप्तमी के पावन दिन अमरकोट में यह दिव्य विवाह रचाया गया था, जिसे आज भी राजस्थानी संस्कृति में बड़े चाव से गाया जाता है।

रानी नेतलदे का मायका कहाँ था? (Rani Netalde’s Maternal Home & Amarkot History)

रानी नेतलदे का मायका वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित अमरकोट (उमरकोट) में था। वे वहाँ के सोढा राजपूत राजा दलजी सोढा की पुत्री थीं। ऐतिहासिक दृष्टि से अमरकोट रियासत का राजपूत इतिहास में बहुत बड़ा स्थान रहा है।विवाह के समय बाबा रामदेव जी मारवाड़ (राजस्थान) से अपनी भव्य बारात लेकर अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार अमरकोट पहुंचे थे। यही कारण है कि आज भी पाकिस्तान के सिंध प्रांत में रहने वाले हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदाय के लोग बाबा रामदेव जी को ‘रामसा पीर’ के रूप में बेहद श्रद्धा से पूजते हैं।

राजस्थानी लोक-संस्कृति में गाए जाने वाले ‘बियावल’ क्या हैं और इनका रानी नेतलदे से क्या संबंध है?

राजस्थानी संस्कृति में ‘बियावल’ (Byavala) उन विशेष मंगल गीतों और लोक-भजनों को कहा जाता है, जिनमें किसी लोक-देवता के विवाह प्रसंग का पूरा वर्णन होता है। बाबा रामदेव जी और रानी नेतलदे के विवाह पर आधारित बियावल पूरे राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में बहुत प्रसिद्ध हैं। इन गीतों में अमरकोट में बारात जाने से लेकर, विवाह मंडप की सजावट, तोरण मारने की रस्म और विवाह वेदी पर रानी नेतलदे के पैर ठीक होने के महाचमत्कार को संगीत के माध्यम से विस्तार से गाया जाता है। भजनों में बाबा को ‘नेतलदे रा भरतार’ कहकर संबोधित किया जाता है। भाद्रपद के महीने में घरों और मंदिरों में इन बियावलों को गाना और सुनना बेहद शुभ माना जाता है।

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