“जानिए राजा रूपसिंह चौहान खाटू श्याम का वो अनसुना इतिहास जो 99% भक्त नहीं जानते। बाबा श्याम का पहला मंदिर किसने और क्यों बनवाया? श्याम कुंड की असली कहानी यहाँ पढ़ें।”
राजा रूपसिंह चौहान का सपना क्या था? (The Divine Dream)
इतिहास के अनुसार, 1027 ईस्वी (1027 AD) में खाटू नगर पर राजा रूपसिंह चौहान (Roopsingh Chauhan King) का शासन था। वे एक न्यायप्रिय राजा थे। एक रात उनकी पत्नी रानी नर्मदा कंवर को एक बहुत ही चमत्कारी सपना आया।
सपने में साक्षात भगवान श्री कृष्ण (वीर बर्बरीक के रूप में) प्रकट हुए। उन्होंने रानी से कहा कि खाटू नगर के एक विशेष स्थान पर गायें अपने आप दूध की धारा गिरा रही हैं, उस जमीन के नीचे मेरा शीश (सिर) दबा हुआ है। बाबा ने आदेश दिया कि उस शीश को बाहर निकालकर वहां एक मंदिर का निर्माण करवाया जाए।
खाटू श्याम जी का सिर किसे मिला था और श्याम कुंड का इतिहास
अगली सुबह रानी नर्मदा कंवर ने राजा रूपसिंह चौहान का सपना क्या था, यह पूरी बात विस्तार से राजा को बताई। राजा रूपसिंह तुरंत अपनी सेना लेकर सपने में बताए गए स्थान पर पहुँचे।
जब उस जगह की खुदाई शुरू की गई, तो वहां से बाबा श्याम का दिव्य और मुस्कुराता हुआ शीश प्रकट हुआ। राजा रूपसिंह चौहान ने बेहद आदर और भक्ति भाव से उस शीश को अपने हाथों में उठा लिया। जिस पवित्र स्थान से बाबा का यह सिर मिला था, उस गड्ढे ने आगे चलकर एक पवित्र सरोवर का रूप ले लिया, जिसे आज हम ‘श्याम कुंड’ के नाम से जानते हैं। माना जाता है कि इस कुंड में स्नान करने से भक्तों के सभी रोग दूर हो जाते हैं।
खाटू श्याम जी का पहला मंदिर किसने बनाया? (The First Temple Construction)
शीश मिलने के बाद, राजा रूपसिंह चौहान ने खाटू धाम में एक सुंदर और भव्य मंदिर का निर्माण कार्य शुरू करवाया। Roopsingh Chauhan King history के अनुसार, उन्होंने फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को बाबा के इस दिव्य शीश को मंदिर के गर्भगृह में स्थापित किया। यही कारण है कि आज भी हर साल फाल्गुन एकादशी को खाटू धाम में सबसे बड़ा मेला लगता है।
बाद में 1720 ईस्वी में मारवाड़ के शासक अभय सिंह के आदेश पर इस मंदिर का जीर्णोद्धार (दोबारा निर्माण) कराया गया, जो आज हमें आधुनिक रूप में दिखाई देता है। लेकिन मूल मंदिर और श्याम कुंड की खोज का श्रेय राजा रूपसिंह चौहान को ही जाता है।
राजा रूपसिंह चौहान खाटू श्याम की अटूट आस्था ने ही कलयुग के राजा खाटू श्याम जी के दिव्य शीश को संसार के सामने प्रकट किया। बाबा के प्रति उनका निश्छल प्रेम और समर्पण आज भी करोड़ों भक्तों के दिलों में श्रद्धा, विश्वास और अटूट विश्वास की अलख जगाता है।
शीश असल में रानी नर्मदा कंवर को सौंपा गया था या राजा रूपसिंह चौहान खाटू श्याम को
आम तौर पर लोग सोचते हैं कि जब खाटू नगर के रेतीले टीले (पीपल के पेड़ के पास) से बाबा श्याम का शीश मिला, तो वह सीधे राजा को दे दिया गया। लेकिन मारवाड़ के स्थानीय इतिहास के अनुसार, जब ग्वाले को वह दिव्य शीश मिला, तो राजा रूपसिंह ने उसे अपनी बेहद धार्मिक प्रवृत्ति वाली पत्नी रानी नर्मदा कंवर को आदरपूर्वक सौंप दिया था। महल में कई दिनों तक उस शीश की गुप्त रूप से सेवा और देखरेख स्वयं रानी नर्मदा कंवर ने अपने हाथों से की थी।
राजा राजा रूपसिंह चौहान (खाटू श्याम) और रानी नर्मदा कंवर दोनों को अलग-अलग सपने आए थे क्या?
कुछ ग्रंथों में माना जाता है कि सपना सिर्फ रानी को आया था और कुछ में राजा का जिक्र है। लेकिन लोक मान्यताओं की गहराई में जाएं तो दोनों को अलग-अलग संकेत मिले थे। रानी नर्मदा कंवर को सपने में साक्षात मूर्ति को जमीन से बाहर निकालने का आदेश मिला था, जबकि राजा रूपसिंह चौहान को सपने में उस शीश के लिए एक भव्य मंदिर का ढांचा खड़ा करने और उसकी प्राण-प्रतिष्ठा करने की दिव्य आज्ञा मिली थी।
रूपवती नदी में बहाए गए शीश की खोज का रहस्य
महाभारत युद्ध के अंत में भगवान श्री कृष्ण ने वीर बर्बरीक के शीश को रूपवती नदी में प्रवाहित कर दिया था। समय के साथ वह नदी लुप्त हो गई और वह शीश खाटू की रेतीली भूमि में समा गया। राजा रूपसिंह चौहान का राज्य उसी ऐतिहासिक भूमि पर था। उनके समय में जब एक गाय रोजाना एक निश्चित स्थान पर अपने आप दूध की धारा गिराने लगी, तब राजा रूपसिंह ने उस लुप्त नदी के बहाव क्षेत्र वाले टीले की पहचान की और वहीं खुदाई करवाई, जिससे श्याम कुंड का निर्माण हुआ।
चौहान वंश के ‘कुलदेवता’ बने बाबा श्याम राजा राजा रूपसिंह चौहान (खाटू श्याम) के कारण
राजा रूपसिंह चौहान के इस महान कार्य के बाद, खाटू श्याम जी केवल उस क्षेत्र के राजा नहीं रहे, बल्कि सीकर और उसके आस-पास के कई राजपूत चौहान परिवारों ने बाबा श्याम को अपना ‘कुलदेवता’ (Family Deity) स्वीकार कर लिया। आज भी चौहान वंश के कई परिवारों में कोई भी शुभ कार्य होने पर सबसे पहले खाटू धाम जाकर राजा रूपसिंह चौहान द्वारा स्थापित किए गए उसी मूल विग्रह के सामने ढोक लगाने की परंपरा है।
खाटू श्याम जी के जन्मदिवस से राजा राजा रूपसिंह चौहान (खाटू श्याम) का संबंध
लोग अक्सर फाल्गुन मेले की एकादशी को ही सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं। लेकिन राजा रूपसिंह और रानी नर्मदा कंवर ने जब 1027 ईस्वी में मूल मंदिर का निर्माण पूरा किया, तो उन्होंने उस दिव्य शीश को कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवउठनी एकादशी) के दिन गर्भगृह में सुशोभित किया था। यही पवित्र दिन आज भी खाटू श्याम जी के जन्मदिवस के रूप में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।
राजा रूपसिंह चौहान खाटू श्याम ने 1027 ईस्वी में प्रथम खाटू श्याम मंदिर का निर्माण कराया था। दिव्य स्वप्न से प्रेरित होकर उन्होंने पवित्र शीश की स्थापना कर आस्था के इस महान केंद्र की नींव रखी। सनातन संस्कृति और श्याम भक्ति को अमर बनाने का उनका यह ऐतिहासिक कार्य अत्यंत प्रशंसनीय और वंदनीय है।



