महाराणा राज सिंह और चारुमती का विवाह पर लिखा यह आर्टिकल आपको बताएगा कि राजस्थान का इतिहास केवल किलों और महलों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह स्वाभिमान, धर्म रक्षा और अमर बलिदानों की भूमि है। मेवाड़ के इतिहास में यूँ तो कई युद्ध और संधियाँ हुईं, लेकिन सन 1660 में हुआ एक विवाह इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों से दर्ज हो गया। यह विवाह था—मेवाड़ के पराक्रमी महाराणा राज सिंह प्रथम और किशनगढ़ की राजकुमारी चारुमती का।
पृष्ठभूमि: किशनगढ़ की राजकुमारी चारुमती और उनका संकल्प
इस पूरी कहानी का केंद्र बिंदु किशनगढ़ (रूपनगढ़) राज्य था। वहाँ के राजा रूपसिंह की पुत्री चारुमती अपनी अद्वितीय सुंदरता, कुशाग्र बुद्धि और परम वैष्णव भक्ति के लिए जानी जाती थीं।
औरंगजेब का चित्र फाड़ना प्रसंग :एक बार दिल्ली से एक वृद्ध महिला महलों में सुंदर चित्र बेचने आई। उस महिला के पास मुगल बादशाह औरंगजेब का भी एक भव्य चित्र था। जब चारुमती ने औरंगजेब का चित्र देखा, तो उनके मन में मुगलों की हिंदू विरोधी नीतियों और मंदिरों को तोड़ने की हरकतों के प्रति तीव्र घृणा जाग उठी। उन्होंने तुरंत औरंगजेब के चित्र को अपने पैरों से कुचल दिया और उसे फाड़ डाला। यह घटना सामान्य नहीं थी; यह सीधे तौर पर दिल्ली सल्तनत को चुनौती थी।
संकट की शुरुआत: औरंगजेब का विवाह प्रस्ताव चारुमति के भाई को
जब औरंगजेब तक यह खबर पहुँची कि किशनगढ़ की राजकुमारी ने उसका चित्र फाड़ा है, तो उसका अहंकार चोटिल हो गया। साथ ही, चारुमती के सौंदर्य की चर्चा सुनकर वह उसे अपने हरम की शोभा बनाना चाहता था।
भाई मानसिंह की बेबसी :राजा रूपसिंह की मृत्यु के बाद चारुमती के भाई मानसिंह किशनगढ़ की गद्दी पर बैठे थे। औरंगजेब ने मानसिंह को संदेश भेजा कि या तो वे अपनी बहन चारुमती का विवाह उससे करवाएं, या फिर मुगलों के भीषण आक्रमण का सामना करने के लिए तैयार रहें।किशनगढ़ एक छोटी रियासत थी, जो मुगलों की विशाल सेना का सामना नहीं कर सकती थी। मुगलों के विनाशकारी रूप से डरकर भाई मानसिंह ने भारी मन से इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया और विवाह की तैयारियां शुरू हो गईं।
चारुमती का पत्र राजसिंह के नाम : “हंसिनी कभी बगुले के साथ नहीं रह सकती”
जब चारुमती को पता चला कि उनका विवाह एक क्रूर और विधर्मी मुगल शासक से तय कर दिया गया है, तो उन्होंने हार मानने के बजाय प्राण त्यागने का संकल्प लिया। लेकिन मरने से पहले उन्होंने अपनी संस्कृति और धर्म को बचाने का एक अंतिम प्रयास किया
उन्होंने मेवाड़ के वीर महाराणा राज सिंह प्रथम को एक अत्यंत गुप्त और भावुक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने लिखा:
“क्या हंसिनी कभी बगुले के साथ रह सकती है? क्या राजपूती रक्त किसी मुगल के हरम की शोभा बनेगा? हे मेवाड़ नरेश! जिस प्रकार द्वापर युग में शिशुपाल से रुक्मिणी की रक्षा के लिए भगवान श्रीकृष्ण आए थे, उसी प्रकार आज आपको मेरी और मेरे धर्म की रक्षा के लिए आना होगा। यदि आप नहीं आए, तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगी, लेकिन किसी म्लेच्छ (विधर्मी) के गले में वरमाला नहीं डालूँगी।”
महाराणा राज सिंह का साहसी निर्णय:महाराणा राज सिंह और चारुमती का विवाह
जब महाराणा राज सिंह को यह पत्र मिला, तो वे गहरी चिंता में पड़ गए। मेवाड़ अभी-अभी मुगलों के साथ लंबी संधियों और संघर्षों से उबर रहा था। औरंगजेब से सीधा पंगा लेने का मतलब था—मेवाड़ पर एक और महाविनाशकारी युद्ध को न्योता देना।लेकिन मेवाड़ का इतिहास कभी कायरता का नहीं रहा। महाराणा राज सिंह ने क्षत्रिय धर्म और शरणागत की रक्षा को सर्वोपरि माना। उन्होंने तुरंत संदेश भिजवाया: “राजकुमारी, घबराओ मत। जब तक राज सिंह के शरीर में रक्त की एक भी बूंद है, औरंगजेब तुम्हें छू भी नहीं पाएगा।”
चूंडावत रतन सिंह और सहजल कंवर की अमर गाथा
मुगल सेना को रोकने के लिए महाराणा राज सिंह ने सलूंबर के रावत रतन सिंह चूंडावत को ‘देसुरी की नाल’ पर तैनात किया। युद्धभूमि में जाते समय नई-नवेली पत्नी के मोह में फंसे रतन सिंह ने जब रानी से कोई ‘निशानी’ (सेनानी) मांगी, तो बूंदी की राजकुमारी हाड़ी रानी (सहजल कंवर) तुरंत समझ गईं कि पति का यह सांसारिक मोह उन्हें मातृभूमि की रक्षा में कमजोर कर देगा। क्षत्रिय धर्म निभाते हुए उन्होंने एक ऐसा अभूतपूर्व और आत्मघाती कदम उठाया जिसकी मिसाल इतिहास में कहीं नहीं मिलती; रानी ने अपने ही हाथों से अपना शीश काटकर थाल में सजा दिया। पत्नी का कटा सिर देखकर स्तब्ध रावत रतन सिंह का मोह क्षण भर में महाक्रोध में बदल गया, और उन्होंने रानी के कटे सिर को गले में बांधकर मुगलों पर ऐसा काल बनकर आक्रमण किया कि शत्रु सेना को वहीं थमने पर मजबूर होना पड़ा।
चूंडावत मांगी सेनानी, सिर काट दे दियो क्षत्राणी”
मेघराज मुकुल की कविता ‘सेनानी’ हाड़ी रानी सहजल कंवर के अदम्य बलिदान की अमर शौर्यगाथा है, जो युद्धभूमि में अपने पति राव रतन सिंह की मोह-ग्रस्त मानसिकता को खत्म करने के लिए अपना शीश अर्पित कर देती हैं । यह अमर गाथा नारी के अदम्य साहस और कर्तव्य परायणता की एक विलक्षण मिसाल है, जो मातृभूमि के लिए व्यक्तिगत प्रेम का बलिदान करने वाली वीरांगनाओं का सम्मान करती है ।
चारुमती राजसिंह विवाह वर्ष (1660)
एक तरफ देसुरी के दर्रे पर राजपूत सैनिक मुगलों का खून बहा रहे थे, दूसरी तरफ महाराणा राज सिंह अपनी चुनिंदा सेना के साथ किशनगढ़ (रूपनगढ़) पहुँचे। सन 1660 में पूरे हिंदू रीति-रिवाज के साथ महाराणा राज सिंह और चारुमती का विवाह संपन्न हुआ।चारुमती का स्वाभिमान जीत गया और औरंगजेब हाथ मलता रह गया। विवाह के बाद महाराणा राज सिंह महारानी चारुमती को ससम्मान लेकर मेवाड़ की राजधानी उदयपुर लौट आए।
महाराणा राज सिंह और चारुमती का विवाह और दूरगामी परिणाम: मेवाड़-मुगल स्थायी शत्रुता
इस विवाह ने औरंगजेब के घमंड को चूर-चूर कर दिया। वह इस अपमान को कभी भूल नहीं पाया। इस घटना के बाद मेवाड़ और मुगलों के संबंध हमेशा के लिए बिगड़ गए:जजिया कर का कड़ा विरोध: जब औरंगजेब ने हिंदुओं पर दोबारा ‘जजिया कर’ लगाया, तो महाराणा राज सिंह ने उसे एक बेहद तीखा और ऐतिहासिक पत्र लिखकर इस कर का खुलकर विरोध किया था।सांस्कृतिक और धार्मिक राष्ट्रवाद: औरंगजेब ने जब मथुरा और वृंदावन के मंदिरों को तोड़ना शुरू किया, तो सिहाड़ (वर्तमान नाथद्वारा) में श्रीनाथजी की मूर्ति और कांकरोली में द्वारकाधीश की मूर्ति को महाराणा राज सिंह ने ही अपने राज्य में शरण दी और भव्य मंदिरों का निर्माण करवाया।
महाराणा राज सिंह और चारुमती का विवाह केवल एक प्रेम कहानी या पारिवारिक गठबंधन नहीं था। यह औरंगजेब की उस साम्राज्यवादी और कट्टर सोच पर करारा तमाचा था, जो समझती थी कि वे किसी भी हिंदू राजकुमारी या राज्य को अपनी उंगलियों पर नचा सकते हैं। इस घटनाक्रम में जहाँ चारुमती का अटूट संकल्प दिखता है, वहीं राज सिंह की वीरता और हाड़ी रानी का सर्वोच्च बलिदान भारतीय इतिहास को हमेशा गौरवान्वित करता रहेगा।


