इंटरनेट और सोशल मीडिया पर बाबा श्याम की कथाओं और भजनों की तो भरमार है, लेकिन खाटू श्याम जी मंदिर परिसर में मौजूद पुराने और लुप्तप्राय शिलालेखों के संदेश पर प्रामाणिक जानकारी न के बराबर मिलती है। इतिहास के ये प्राचीन पत्थर और शिलापट्ट सिर्फ मंदिर की उम्र ही नहीं बताते, बल्कि उस समय के राजाओं, शिल्पकारों और मुगलों के कालखंड में हुए संघर्षों की गवाही भी देते हैं।
खाटू श्याम मंदिर परिसर में मौजूद पुराने और लुप्तप्राय शिलालेखों के संदेश
1. विक्रम संवत 1027 का शिलालेख: राजा रूपसिंह चौहान का संदेश
खाटू श्याम जी मंदिर परिसर में मौजूद पुराने और लुप्तप्राय शिलालेखों के संदेश का सबसे पहला और प्राचीन प्रमाण आज से 1,000 साल पुराना है।
क्या लिखा है पत्थर पर?: अभिलेखों के अनुसार, विक्रम संवत 1027 (973 ईस्वी) में खाटू के राजा रूपसिंह चौहान की पत्नी को स्वप्न आया। इसके बाद श्याम कुंड से बाबा का शीश निकाला गया।
2. सन 1720 का शिलालेख: मारवाड़ के दीवान अभय सिंह का योगदान
मुगल काल में मंदिर को हुई क्षति के बाद, सन 1720 ईस्वी (विक्रम संवत 1777) में मंदिर का भव्य पुनरुद्धार किया गया।
क्या लिखा है पत्थर पर?: मंदिर के पुराने प्रवेश द्वार के पत्थरों पर मौजूद खाटू श्याम जी मंदिर परिसर में मौजूद पुराने और लुप्तप्राय शिलालेखों के संदेश को देखें, तो इसमें मारवाड़ (जोधपुर) के दीवान अभय सिंह और राजपूत कारीगरों के नाम दर्ज हैं।
भव्य स्वरूप की शुरुआत: आज मंदिर का जो संगमरमर वाला सुंदर रूप हम देखते हैं, उसकी स्थापत्य कला और निर्माण की तारीखें इसी शिलालेख में सुरक्षित हैं।
3. श्याम कुंड की सीढ़ियों पर खुदे गुप्त संदेश
जहाँ बाबा श्याम का शीश प्रकट हुआ था, उस श्याम कुंड के प्राचीन घाटों की दीवारों पर भी कई संदेश उकेरे गए थे।
क्या लिखा है पत्थर पर?: पुरानी देवनागरी और शेखावाटी भाषा में लिखे इन संदेशों में उन राजाओं और जमींदारों के नाम थे, जिन्होंने कुंड के निर्माण के लिए दान दिया था।
लुप्त होने की वजह: लगातार पानी के संपर्क में रहने और घिस जाने के कारण ये ऐतिहासिक संदेश अब लगभग लुप्तप्राय हो चुके हैं।
क्या खाटू श्याम जी मंदिर के किसी प्राचीन पत्थर या शिलालेख पर नील घोड़े (नीले घोड़े) पर सवार योद्धा का रहस्यमयी चित्र या संदेश खुदा हुआ है?”
नहीं, खाटू श्याम जी मंदिर के किसी भी प्राचीन पत्थर या ऐतिहासिक शिलालेख पर “नीले घोड़े पर सवार योद्धा” का कोई रहस्यमयी चित्र या संदेश नहीं खुदा हुआ है।
इंटरनेट, यूट्यूब वीडियो और सोशल मीडिया पर यह दावा बहुत वायरल है, लेकिन ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से यह पूरी तरह से एक अफवाह (Myth) है।
नीला घोड़ा” (लीला घोड़ा) की मान्यता कहाँ से आई?
चूँकि पत्थरों पर ऐसा कोई चित्र नहीं है, तो लोग इसे इतना सर्च क्यों करते हैं? इसके पीछे गहरे सांस्कृतिक कारण हैं:
पौराणिक कथा का आधार: महाभारत काल की मान्यताओं के अनुसार, घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक के पास एक अलौकिक, नीले रंग का दिव्य घोड़ा था जिसका नाम ‘लीला’ (Leela) था। जब वे तीन बाण लेकर कुरुक्षेत्र के लिए निकले, तो इसी घोड़े पर सवार थे।
भजनों और लोक-संस्कृति का प्रभाव: राजस्थानी लोक-संस्कृति और श्याम भजनों में बाबा श्याम को “नीले घोड़े रा असवार” (नीले घोड़े के सवार) कहकर पुकारा जाता है। इसी वजह से भक्तों के मन में यह छवि बैठ गई है और वे गूगल पर इसके ऐतिहासिक सबूत या पत्थरों पर चित्र ढूंढने की कोशिश करते हैं।
सूरजगढ़ का ऐतिहासिक निशान (The 300-Year-Old Flag)
चित्र पत्थरों पर भले न हो, लेकिन कपड़ों पर इसका एक ऐतिहासिक प्रमाण जरूर मिलता है:
खाटू श्याम जी के फाल्गुन मेले में सूरजगढ़ (झुंझुनू) से आने वाला सफेद रंग का निशान (ध्वज) पिछले 300 से अधिक वर्षों से मंदिर के शिखर पर फहराया जाता है।
इस विशेष और ऐतिहासिक कपड़े के निशान पर नीले घोड़े का चित्र अंकित होता है। मुगलों और ब्रिटिश काल के दौरान भी इस परंपरा को जीवित रखा गया था।
कहाँ दर्ज है खाटू श्याम जी का असली इतिहास? जानिए उन किताबों और शिलालेखों के नाम”।
बाबा श्याम (बर्बरीक) के इतिहास और शीश दान की कथा का सबसे पहला लिखित प्रमाण हिंदू धर्मग्रंथों में मिलता है:
स्कंद पुराण (कौमारिका खंड): यदि कोई पूछे कि बर्बरीक की पूरी कहानी विस्तार से कहाँ लिखी है, तो वह स्कंद पुराण है। इसमें उनके जन्म, तीन बाणों की प्राप्ति, देवी चंडिका की साधना और भगवान कृष्ण को शीश दान करने का पूरा प्रसंग संस्कृत श्लोकों में लिखा गया है
राजा रूपसिंह चौहान के समय का रिकॉर्ड (1027 ईस्वी): खाटू के तत्कालीन शासक राजा रूपसिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कंवर द्वारा जब पहला मंदिर बनवाया गया, तब वहां एक स्थापना लेख उत्कीर्ण हुआ।
दीवान अभय सिंह का शिलालेख (1720 ईस्वी): मारवाड़ (जोधपुर) के दीवान अभय सिंह द्वारा जब मंदिर का भव्य पुनरुद्धार कराया गया, तो मंदिर की दीवारों और मुख्य द्वारों के पत्थरों पर मारवाड़ रियासत के इतिहास और कारीगरों के नाम लिखे गए।
कर्नल जेम्स टॉड (Annals and Antiquities of Rajasthan): राजस्थान के इतिहास के जनक माने जाने वाले कर्नल टॉड ने शेखावाटी के राजपूतों और खंडेला/खाटू क्षेत्र के ऐतिहासिक संघर्षों (जैसे 1779 का खाटू का युद्ध) का लिखित विवरण ब्रिटिश दस्तावेजों में दर्ज किया।
स्थानीय चारण लेखन और भाटों की बहियाँ: राजस्थान के पारंपरिक इतिहास लेखक अपनी हस्तलिखित बहियों (धार्मिक डायरियों) में पीढ़ियों से खाटू श्याम मंदिर, वहां के पुजारियों (चौहान वंश) और श्याम कुंड के प्रकट होने की तारीखें लिखते आ रहे हैं।
दुर्गा दास माथुर (श्याम पचीसी): 17वीं-18वीं शताब्दी के दौरान स्थानीय विद्वानों ने ब्रज और राजस्थानी भाषा में काव्य रूप में बाबा श्याम का इतिहास और महिमा लिखी।
खाटू श्याम जी में इत्र चढ़ाने की परंपरा कब शुरू हुई और 3 बोतल का रहस्य
खाटू श्याम जी में इत्र चढ़ाने की परंपरा कब शुरू हुई? ऐतिहासिक रूप से यह प्रथा सन 1720 ईस्वी में मारवाड़ रियासत द्वारा मंदिर के पुनरुद्धार और बाबा श्याम के ‘राजसी ठाट-बाठ’ वाले श्रृंगार के साथ शुरू हुई थी । पौराणिक मान्यता है कि बाल रूप में बर्बरीक को गुलाब के फूल बेहद प्रिय थे, इसलिए भक्त यहाँ शुद्ध गुलाब और चंदन का इत्र चढ़ाते हैं।
आजकल खाटू धाम में भक्तों के बीच 3 बोतल इत्र चढ़ाने का रहस्य बहुत लोकप्रिय है। पहली बोतल का इत्र बाबा श्याम के विग्रह के दिव्य स्नान और उनके राजसी श्रृंगार के लिए मुख्य पुजारी को सौंप दिया जाता है।
दूसरी बोतल को खोलकर मंदिर की मुख्य चौखट या गर्भगृह के आस-पास छिड़का जाता है, जिसे बाबा तक अपनी सीधी अर्जी पहुंचाना माना जाता है। वहीं तीसरी बोतल को बाबा के चरणों से स्पर्श करवाकर भक्त आशीर्वाद के रूप में अपने घर वापस ले आते हैं।
खाटू श्याम जी मंदिर परिसर में मौजूद पुराने और लुप्तप्राय शिलालेखों के संदेश और उनका असली इतिहास कैसा लगा?
इतिहास के अलावा जानिए खाटू श्याम जी की ये 4 अनोखी परंपराएं”।
1. पैदल निशान यात्राभक्त रींगस से खाटू धाम तक 17 किलोमीटर की दूरी नंगे पैर नाचते हुए तय करते हैं। झुंझुनू के सूरजगढ़ का 300 साल पुराना सफेद निशान सबसे पहले शिखर पर फहराया जाता है।
2. सवा मणि भोगबड़ी मन्नत पूरी होने पर भक्त बाबा श्याम को 51 किलो (सवा मणि) का विशेष भोग लगाते हैं। इसमें शुद्ध घी का चूरमा शामिल होता है, जिसे श्रद्धालुओं में बांट दिया जाता है।
3. शीश स्नान और चरणामृतहर सुबह बाबा के शीश को दूध, गंगाजल और औषधियों से स्नान कराया जाता है। इस पवित्र चरणामृत को पीने से शारीरिक कष्ट और बीमारियां दूर होने की मान्यता है।
4. दिव्य इत्र सेवाबाबा को राजा की तरह रखने के लिए भक्त कीमती गुलाब और चंदन का इत्र चढ़ाते हैं। इसी वजह से मंदिर परिसर चौबीसों घंटे अलौकिक सुगंध से महकता रहता है।


