इटली का वो विदेशी विद्वान जो बीकानेर की माटी का होकर रह गया: डॉ. एल. पी. तेस्सितोरी की अनसुनी कहानी (The Untold Story of Dr. L.P. Tessitori)

डॉ. एल. पी. तेस्सितोरी,इटली का वह महान भाषाशास्त्री (Italian Philologist) जो महाराजा गंगासिंह (Maharaja Ganga Singh) के बुलावे पर बीकानेर आया और यहीं की मरुधरा से मोहब्बत कर बैठा। जानिए डॉ. एल. पी. तेस्सितोरी की अनसुनी दास्तान, जिन्होंने ऊँट पर घूमकर प्राचीन पांडुलिपियों (Manuscripts) को नष्ट होने से बचाया। इस बड़े आर्टिकल में आपको घग्गर नदी के किनारे कालीबंगा (Kalibangan Discovery) के टीलों की पहली खोज, बीकानेर राजकीय संग्रहालय (Ganga Government Museum) की स्थापना और राज्य अभिलेखागार की ‘तेस्सितोरी गैलरी’ (L.P. Tessitori Gallery) के बारे में सब कुछ जानने को मिलेगा। हमारी टीम ने एक्सपर्ट और विद्वान बुजुर्गों से मिली अनूठी इनसाइट्स को इस लेख में शामिल किया है, जो इतिहास प्रेमियों को जरूर पसंद आएगी।

फैक्ट फाइल: डॉ. एल. पी. तेस्सितोरी Comprehensive Fact File L.P. Tessitori

  • पूरा नाम (Full Name) डॉ. लुइगी पियो तेस्सितोरी (Dr. Luigi Pio Tessitori)
  • जन्म तिथि और स्थान 13 दिसंबर 1887, उडीने (Udine) शहर, इटली (Italy)
  • निधन तिथि और स्थान 22 नवंबर 1919 (मात्र 31 वर्ष की अल्पायु में), बीकानेर, राजस्थान
  • निधन का मुख्य कारण बीकानेर में फैले भयानक इन्फ्लूएंजा (Influenza Epidemic) रोग के संक्रमण के कारण
  • मुख्य पहचान (Identity) इतालवी भाषाशास्त्री (Italian Philologist), इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता
  • भारत आगमन (Arrival) 08 अप्रैल 1914 को वे जलमार्ग से थॉमस कुक के जहाज द्वारा मुंबई (बॉम्बे) पहुंचे थे
  • मुख्य कर्मस्थली (Workplace) बीकानेर (Bikaner) और मारवाड़ (Marwar) का क्षेत्र, राजस्थान
  • सौंपा गया मुख्य कार्य राजस्थान के ‘चारण साहित्य के सर्वेक्षण एवं संग्रह’ (Survey of Bardic Literature) का जिम्मा
  • भाषाई वर्गीकरण (Classification) राजस्थानी काव्य को वैज्ञानिक आधार पर डिंगल (Dingal) और पिंगल (Pingal) में बांटा
  • प्रमुख शोध पत्रिका (Journal) “इंडियन एंटिक्वेरी” (Indian Antiquary – 1914-1916 ई.) में उनके शोध लेख छपे
  • पुरातात्विक खोज (Archaeology) सर जॉन मार्शल और अमलानंद घोष से पहले कालीबंगा (Kalibangan) के प्राचीन टीलों की पहचान की
  • संग्रहालय में योगदान उनके द्वारा एकत्रित मूर्तियों और शिलालेखों से बीकानेर राजकीय संग्रहालय (Ganga Museum) की स्थापना हुई
  • अंतिम विश्राम स्थल (Memorial) राजकीय श्मशान भूमि के पास बनी ‘तेस्सितोरी की छतरी / समाधि’ (Tessitori Memorial), बीकानेर
  • दस्तावेजी दीर्घा (Gallery) “राजस्थान राज्य अभिलेखागार” (State Archives, Bikaner) में स्थित ‘एल.पी. तेस्सितोरी गैलरी’

डॉ. एल. पी. तेस्सितोरी के 5 सबसे बड़े योगदान जिसने राजस्थान के इतिहास को बदल दिया (Top 5 Contributions of Dr. Tessitori

पश्चिमी राजस्थानी व्याकरण का निर्माण (Creation of Western Rajasthani Grammar)

डॉ. तेस्सितोरी ने राजस्थानी भाषाशास्त्र (Rajasthani Philology) का सबसे पहला और वैज्ञानिक अध्ययन (Scientific Study) प्रस्तुत किया। उन्होंने पुरानी राजस्थानी की पश्चिमी विभाषा (मारवाड़ी) का गहरा विश्लेषण किया। उनके इस ऐतिहासिक कार्य को “पश्चिमी राजस्थानी व्याकरण” (A Progressive Grammar of the Western Rajasthani) के नाम से जाना जाता है, जो आज भी भाषा के शोधार्थियों के लिए एक प्रामाणिक ग्रंथ (Authentic Text) है। उनका यह शोध प्रसिद्ध शोध पत्रिका “इंडियन एंटिक्वेरी” (Indian Antiquary – 1914-1916 ई.) में भी प्रकाशित हुआ था।

चारण साहित्य का ऐतिहासिक सर्वे (Historical Survey of Bardic Literature

बीकानेर के दूरदर्शी महाराजा गंगासिंह (Maharaja Ganga Singh) ने डॉ. तेस्सितोरी की अद्भुत भाषाई क्षमता को देखते हुए उन्हें राजस्थान के चारण साहित्य के सर्वेक्षण एवं संग्रह (Survey and Collection of Bardic Literature) का कार्य सौंपा था। तेस्सितोरी ने ऊँटों पर सवार होकर सुदूर मरुस्थलीय गाँवों, किलों और गढ़ों का दौरा किया। उन्होंने धूल खा रही प्राचीन पांडुलिपियों (Manuscripts) को खोज निकाला और “राजस्थानी चारण साहित्यः एक ऐतिहासिक सर्वे” (A Sketch of Bardic and Historical Literature) नामक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की।

पृथ्वीराज राठौड़ को “डिंगल का हेरोस” उपाधि देना (Title of “Hero of Dingal” to Prithviraj Rathore)

चारण साहित्य के वैज्ञानिक वर्गीकरण (Scientific Classification) के दौरान तेस्सितोरी बीकानेर के राठौड़ राजा पृथ्वीराज के वीर रस और लेखन शैली से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने ही पृथ्वीराज राठौड़ को “डिंगल का हेरोस” (Hero of Dingal) यानी डिंगल भाषा का महानायक कहा था। तेस्सितोरी ने ही पृथ्वीराज राठौड़ के अमर ग्रंथ “वेली क्रिसन रुकमणी री” (Veli Krisan Rukmani Ri) को शुद्ध पाठ और अंग्रेजी अनुवाद (English Translation) के साथ संपादित (Edit) करके दुनिया के सामने पेश किया। इसके अलावा उन्होंने “छंद राउ जैतसी रौ” (Chhand Rau Jaitasi Rau) का भी संपादन किया।

कालीबंगा सभ्यता की सबसे पहली पहचान (First Identification of Kalibangan Civilization)

आमतौर पर लोग सर जॉन मार्शल या अमलानंद घोष को ही पुरातत्व खोजों का श्रेय देते हैं, लेकिन ऐतिहासिक सच यह है कि सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) के प्रसिद्ध स्थल कालीबंगा (Kalibangan) के प्राचीन थेरों (टीलों) को सबसे पहले डॉ. तेस्सितोरी ने ही पहचाना था। उन्होंने घग्गर नदी (Ghaggar River) के किनारे घूमते हुए पुरातत्व महत्व (Archaeological Importance) की वस्तुओं को खोजा और ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’ (ASI) को इसकी शुरुआती रिपोर्ट भेजी थी।

बीकानेर राजकीय संग्रहालय की स्थापना (Establishment of Bikaner Government Museum)

बीकानेर का प्रसिद्ध संग्रहालय इन्हीं की देन है। अपने ऐतिहासिक सर्वे (Historical Survey) के दौरान डॉ. तेस्सितोरी को गुप्तकालीन मूर्तियां, प्राचीन सिक्के, शिलालेख (Inscriptions) और जैन शैली की दुर्लभ सामग्रियां मिली थीं। इन सभी ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने महाराजा गंगासिंह के सहयोग से बीकानेर राजकीय संग्रहालय (Ganga Government Museum) की नींव रखने में मुख्य भूमिका निभाई।

उदीने और बीकानेर जुड़वां शहर

उदीने के पूर्व मेयर फुरियो होनसेल (Furio Honsell) और इतालवी सरकार ने डॉ. तेसितोरी के कार्यों और यादों को जीवित रखने के लिए उदीने और बीकानेर को जुड़वां शहर (Twin Cities) के रूप में जोड़ने की पहल की थी।इसका मुख्य उद्देश्य दोनों शहरों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान, ऐतिहासिक शोध और पर्यटन को बढ़ावा देना था।

सर जॉन मार्शल और अमलानंद घोष से भी पहले, कालीबंगा स्थल को सबसे पहले किसने और कब पहचाना था?

सिंधु घाटी सभ्यता के प्रसिद्ध स्थल ‘कालीबंगा’ (Kalibangan) के पुरातात्विक महत्व को सर जॉन मार्शल और अमलानंद घोष से भी पहले, सबसे पहले इतालवी विद्वान डॉ. एल. पी. तेस्सितोरी (Dr. L.P. Tessitori) ने पहचाना था। वर्ष 1914 से 1919 के बीच बीकानेर में रहते हुए उन्होंने हनुमानगढ़ के पास घग्गर नदी (प्राचीन सरस्वती) के किनारे स्थित इन प्राचीन थेरों (टीलों) का दौरा किया था। तेस्सितोरी ने स्पष्ट किया था कि ये टीले प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Era) के हैं और यहाँ एक अत्यंत प्राचीन सभ्यता दफन है। उन्होंने इसकी जानकारी ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’ (ASI) को भी दी थी, लेकिन उनकी अल्पायु में मृत्यु हो जाने के कारण इस पर आगे काम नहीं हो सका। बाद में 1951 में अमलानंद घोष ने इसकी आधिकारिक खोज की।

“पश्चिमी राजस्थानी व्याकरण किसने लिखी?”

“पश्चिमी राजस्थानी व्याकरण डॉ. एल. पी. तेस्सितोरी ने लिखी।

व्याकरण का नाम: इस ऐतिहासिक ग्रंथ का पूरा नाम “ए प्रोग्रेसिव ग्रामर ऑफ द प्रोविंशियल वेस्टर्न राजस्थानी” (A Progressive Grammar of the Provincial Western Rajasthani) है, जिसे आमतौर पर ‘पश्चिमी राजस्थानी व्याकरण’ (Western Rajasthani Grammar) कहा जाता है।

यह क्यों खास है? यह राजस्थानी भाषा (विशेषकर मारवाड़ी और पुरानी गुजराती के भाषाई रूप) का पहला वैज्ञानिक और तुलनात्मक व्याकरण (Scientific Grammar) था। तेस्सितोरी ने इटली से भारत आकर, बीकानेर को अपनी कर्मस्थली बनाया और यहाँ की स्थानीय बोलियों को समझकर इस व्याकरण को तैयार किया, जो आज भी भाषाशास्त्रियों के लिए एक मील का पत्थर है।

डॉ. एल. पी. तेस्सितोरी और वेली क्रिसन रुकमणी री (Veli Krisan Rukmani Ri

पृथ्वीराज राठौड़ ने डिंगल भाषा में एक अमर ग्रंथ लिखा था, जिसका नाम था ‘वेली क्रिसन रुकमणी री’। इस ग्रंथ को पढ़कर कवि दुरसा आढ़ा ने इसे “पाँचवाँ वेद और उन्नीसवाँ पुराण” कहा था। डॉ. तेस्सितोरी ने ही सबसे पहले इस महान ग्रंथ को संपादित (Edit) करके दुनिया के सामने प्रकाशित किया था।

डॉ. एल. पी. तेस्सितोरी ने पृथ्वीराज राठौड़ को डिंगल का हेरोस क्यों कहा?

डॉ. एल. पी. तेस्सितोरी ने जब राजस्थान के चारण साहित्य का सर्वेक्षण किया, तो वे पृथ्वीराज राठौड़ की लेखन शैली, वीर रस और डिंगल भाषा (पुरानी पश्चिमी राजस्थानी) पर उनकी पकड़ से बेहद प्रभावित हुए। इसी कारण उन्होंने पृथ्वीराज को “डिंगल का हेरोस” (Hero of Dingal) यानी डिंगल भाषा का नायक/वीर कहकर पुकारा।

. एल. पी. तेस्सितोरी (Dr. L.P. Tessitori) केवल एक विदेशी भाषाशास्त्री (Italian Philologist) नहीं थे, बल्कि वे राजस्थान की आत्मा को समझने वाले एक सच्चे साधक थे। इटली की सुख-सुविधाओं को छोड़कर बीकानेर की मरुधरा को अपनी कर्मस्थली बनाना और मात्र 31 वर्ष की उम्र में अपनी अंतिम सांस तक राजस्थानी चारण साहित्य (Bardic Literature) की सेवा करना, उनके अगाध प्रेम को दर्शाता है।

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