राजस्थान की पावन ‘देव नगरी’ (Dev Nagari) यानी दौसा का इतिहास बेहद गौरवशाली है। कछवाहा राजवंश का प्रारंभिक मुख्यालय (Headquarters) रहा यह प्राचीन नगर आज भी सैलानियों को वास्तविक ग्रामीण अनुभव (Rural Experience) प्रदान करता है। इस विस्तृत लेख में जानिए भारत की सबसे गहरी और भव्य चाँद बावड़ी (Chand Baori) की जादुई वास्तुकला, उल्लास की देवी हर्षद माता मंदिर (Harshad Mata Temple) और देश-विदेश में प्रसिद्ध मेहंदीपुर बालाजी मंदिर (Mehandipur Balaji Temple) की चमत्कारी मान्यताओं का पूरा सच। इसके साथ ही जानिए तिरंगे झंडे का अनोखा दौसा कनेक्शन, ‘आभानेरी महोत्सव’ (Abhaneri Festival) की रौनक और भांडारेज सभ्यता का महाभारत कालीन इतिहास। संपूर्ण गाइड के साथ प्लान करें अपनी अगली आध्यात्मिक और ऐतिहासिक यात्रा!
दौसा का इतिहास पर फैक्ट फाइल
- संस्कृत नाम (Sanskrit Name) ‘‘ढौ-सा’’ (Dhau-sa), जिसका अर्थ है – ‘सुन्दर जैसे स्वर्ग’ (Beautiful like Heaven)
- अन्य नाम / उपनाम (Nicknames) ‘देव नगरी’ (Dev Nagari) (लगभग 300 मंदिरों की उपस्थिति के कारण)
- भौगोलिक स्थिति (Location) जयपुर से लगभग 55 किलोमीटर की दूरी पर, राष्ट्रीय राजमार्ग 11 (NH-11) पर स्थित
- ऐतिहासिक महत्व (Historical Importance) यह कच्छवाहा राजपूत राजवंश (Kachwaha Rajput Dynasty) का प्रारंभिक मुख्यालय था
- मुख्य पर्यटन आकर्षण (Main Attraction) चाँद बावड़ी – आभानेरी (13 मंजिला गहरी और 1000 कलात्मक सीढ़ियों वाली भारत की सबसे गहरी बावड़ियों में से एक)
- प्रमुख वार्षिक उत्सव (Annual Festival) ‘आभानेरी महोत्सव’ (Abhaneri Festival) – पर्यटन विभाग द्वारा प्रत्येक वर्ष सितम्बर-अक्टूबर में आयोजित
- प्रमुख वार्षिक उत्सव (Annual Festival) ‘आभानेरी महोत्सव’ (Abhaneri Festival) – पर्यटन विभाग द्वारा प्रत्येक वर्ष सितम्बर-अक्टूबर में आयोजित
- धार्मिक आस्था का केंद्र (Religious Hub) मेहंदीपुर बालाजी मंदिर (Mehandipur Balaji Temple) – देश-विदेश में प्रसिद्ध हनुमान जी का चमत्कारी मंदिर
- प्राचीन सभ्यता स्थल (Ancient Site) भांडारेज (Bhandarej) – महाभारत काल में ‘भद्रावती’ नाम से प्रसिद्ध, जहाँ की मूर्तियाँ और कालीन विख्यात हैं
- ग्रामीण पर्यटन गढ़ (Rural Tourism) लोट्वाड़ा (Lotwara) – 17वीं शताब्दी में ठाकुर गंगासिंह द्वारा निर्मित गढ़
- ब्रिटिश कालीन धरोहर (British Heritage) बांदीकुई (Bandikui) – रोमन शैली का चर्च और ब्रिटिश समय का रेलवे निर्माण
- निकटतम हवाई अड्डा (Nearest Airport) जयपुर हवाई अड्डा (Jaipur Airport) – लगभग 62 कि.मी. की दूरी पर
दौसा के मुख्य दर्शनीय स्थल (Major Tourist Places in Dausa)
चाँद बावड़ी और आभानेरी (Chand Baori and Abhaneri)
दौसा जिले के सिकंदरा से कुछ दूरी पर स्थित आभानेरी (Abhaneri) गाँव यहाँ का सबसे बड़ा आकर्षण है। राजा चंद्र (King Chandra) द्वारा स्थापित इस जगह का असली नाम ‘आभा नगरी’ (Abha Nagari) था, जिसका अर्थ होता है ‘चमकता हुआ नगर’, जो समय के साथ आम बोलचाल में आभानेरी बन गया।
अद्भुत वास्तुकला: यहाँ स्थित चाँद बावड़ी (Chand Baori) भारत की सबसे गहरी और विशाल बावड़ियों (Deepest Stepwells) में से एक है। आठवीं शताब्दी (8th Century) में निर्मित यह बावड़ी लगभग 19.5 मीटर चौड़ी है और 13 मंज़िलों (13 Storeys) तक नीचे फैली हुई है। इसमें नीचे उतरने के लिए लगभग 1000 छोटी और बेहद कलात्मक सीढ़ियाँ (Artistic Steps) बनी हुई हैं, जो स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नमूना हैं।
आभानेरी महोत्सव (Abhaneri Festival): राजस्थान पर्यटन विभाग (Department of Tourism) द्वारा यहाँ हर साल सितंबर-अक्टूबर के महीने में दो दिवसीय ‘आभानेरी महोत्सव’ का भव्य आयोजन किया जाता है। इस उत्सव में देशी-विदेशी पर्यटकों के मनोरंजन के लिए पारंपरिक राजस्थानी खाना (Rajasthani Food) और लोक कलाकारों (Folk Artists) द्वारा शानदार लोक गीत व नृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं। उत्सव के दौरान पर्यटकों को ऊँट सफारी (Camel Safari) के जरिए पूरे गाँव की सैर भी कराई जाती है।
हर्षद माता मंदिर, आभानेरी (Harshad Mata Temple, Abhaneri)
चाँद बावड़ी परिसर (Chand Baori Complex) के ठीक पास में ही यह प्राचीन मंदिर स्थित है, जो हर्षद माता (Harshad Mata) को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हर्षद माता को ‘उल्लास की देवी’ (Goddess of Joy) कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि मंदिर में स्थापित देवी की प्रतिमा हमेशा हँसमुख प्रतीत होती है और यहाँ आने वाले सभी भक्तों को हमेशा खुश रहने का आशीर्वाद (Blessing) प्रदान करती है। इस मंदिर की शानदार स्थापत्य कला (Architecture) प्राचीन भारतीय शिल्पकारी को दर्शाती है।
भांडारेज (Bhandarej)
दौसा से मात्र 10 किलोमीटर की दूरी पर जयपुर-आगरा राजमार्ग (Jaipur-Agra Highway) पर स्थित भांडारेज (Bhandarej) का इतिहास महाभारत काल (Mahabharata Period) से जुड़ा है, तब इसे ‘भद्रावती’ (Bhadravati) के नाम से जाना जाता था।
ऐतिहासिक घटना: 11वीं शताब्दी (11th Century) में कछवाहा कबीले के मुखिया दूल्हा राय (Dulha Rai) ने यहाँ के बड़गुर्जर राजा को हराकर भांडारेज पर विजय प्राप्त की थी, जिसके बाद से इसका आधुनिक इतिहास शुरू होता है।
प्राचीन सभ्यता: यहाँ खुदाई और खोजों में मिली प्राचीन मूर्तियां, सजावटी जालियां, बर्तन और टैराकोटा का सामान (Terracotta Items) इसकी प्राचीन व समृद्ध संस्कृति (Rich Culture) की गवाही देते हैं। इसके अलावा, भांडारेज में बने उत्कृष्ट क़ालीन (Carpets) आज भी दूर-दूर तक प्रसिद्ध हैं।
मेहंदीपुर बालाजी मंदिर (Mehandipur Balaji Temple)
दौसा के मेहंदीपुर गाँव में स्थित भगवान हनुमान को समर्पित मेहंदीपुर बालाजी मंदिर (Mehandipur Balaji Temple) पूरे भारत में अपनी चमत्कारी शक्तियों के लिए विख्यात है। यहाँ की लोक मान्यता (Popular Belief) के अनुसार, मानसिक रूप से बीमार और संकट से ग्रस्त लोग बालाजी के दरबार में लाए जाते हैं, जो बालाजी महाराज के आशीर्वाद से पूरी तरह ठीक होकर लौटते हैं। धार्मिक और आध्यात्मिक यात्रा (Spiritual Tourism) के लिहाज से यह दौसा का सबसे व्यस्त स्थल है।
झाझीरामपुरा (Jhajhirampura)
दौसा से लगभग 45 किलोमीटर दूर बसवा-बांदीकुई (Baswa-Bandikui) की ओर पहाड़ियों और प्राकृतिक जल स्रोतों (Natural Water Springs) के बीच बसा झाझीरामपुरा (Jhajhirampura) एक बेहद शांत और सुरम्य स्थान है। प्राकृतिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध यह क्षेत्र भगवान रुद्र (शिव) (Lord Shiva), बालाजी (हनुमान जी) और अन्य देवी-देवताओं के प्राचीन मंदिरों के लिए जाना जाता है।
लोट्वाड़ा (Lotwara
जयपुर से लगभग 110 किलोमीटर दूर स्थित लोट्वाड़ा (Lotwara) ग्रामीण पर्यटन का एक और प्रमुख केंद्र है। यहाँ एक भव्य गढ़ (Fort) स्थित है, जिसका निर्माण 17वीं शताब्दी (17th Century) में ठाकुर गंगासिंह (Thakur Ganga Singh) द्वारा करवाया गया था। यहाँ की लहलहाती फसलें और शुद्ध ग्रामीण संस्कृति पर्यटकों का मन मोह लेती हैं। आभानेरी से बस यात्रा (Bus Travel) के माध्यम से यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है।
बांदीकुई (Bandikui)
दौसा से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित बांदीकुई (Bandikui) का ब्रिटिश काल से गहरा नाता रहा है। यह स्थान भारतीय रेलवे (Indian Railways) के एक बड़े ऐतिहासिक जंक्शन के रूप में जाना जाता है, जहाँ आज भी ब्रिटिश काल के रेलवे क्वार्टर और कर्मचारियों के बड़े-बड़े बंगले (British Era Houses) देखे जा सकते हैं। इसके अलावा, यहाँ प्रोटेस्टेंट ईसाइयों (Protestant Christians) के लिए रोमन शैली में बना एक बेहद खूबसूरत चर्च (Roman Style Church) यहाँ का मुख्य आकर्षण है।
दौसा कैसे पहुँचें? (How to Reach Dausa?)
हवाई मार्ग द्वारा (By Air): दौसा का निकटतम हवाई अड्डा जयपुर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (Jaipur International Airport) है, जो यहाँ से लगभग 62 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। वहाँ से आप टैक्सी या बस के जरिए आसानी से दौसा पहुँच सकते हैं।
सड़क मार्ग द्वारा (By Road): जयपुर और आगरा के बीच सुगम सड़क परिवहन के लिए शानदार लेन निर्धारित (Dedicated Lanes) की गई हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित होने के कारण नियमित सरकारी बसें (Government Buses), निजी बसें और टैक्सी (Taxis) हर समय उपलब्ध रहती हैं।
रेल मार्ग द्वारा (By Rail): दौसा का अपना रेलवे स्टेशन (Dausa Railway Station) है, जो उत्तर-पश्चिम रेलवे नेटवर्क के माध्यम से दिल्ली, जयपुर, आगरा और देश के अन्य प्रमुख रेल मार्गों से भली-भांति जुड़ा हुआ है।
देश के मान-सम्मान से जुड़ा तथ्य: तिरंगे का दौसा कनेक्शन
बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत के राष्ट्रीय ध्वज (National Flag) यानी तिरंगे का दौसा से एक बेहद अटूट और गौरवशाली संबंध है।दौसा ज़िले का एक छोटा सा गाँव है ‘अलूदा’ (Aluda)।स्वतंत्रता आंदोलन के समय और आज़ादी के ठीक बाद, खादी के जिस कपड़े से देश के शुरुआती राष्ट्रीय ध्वज बनाए गए थे, उसका एक बड़ा हिस्सा इसी अलूदा गाँव के बुनकरों द्वारा अपने हाथों से काता और बुना गया था।आज भी यहाँ के बुने खादी के कपड़े को इसकी शुद्धता के लिए विशेष सम्मान दिया जाता है।
खानवा के युद्ध का वो ऐतिहासिक मोड़: ‘चूड़ा की छतरी’
सन् 1527 में जब मुग़ल बादशाह बाबर और महाराणा सांगा के बीच खानवा का प्रसिद्ध युद्ध (Battle of Khanwa) हुआ था, तब युद्ध के मैदान में घायल होने के बाद महाराणा सांगा को इलाज के लिए इसी बसवा (दौसा) लाया गया था।यहीं पर उनका प्राथमिक उपचार हुआ था और आज भी उनकी याद में यहाँ एक ऐतिहासिक ‘चूड़ा की छतरी’ (Cenotaph) बनी हुई है, जो मेवाड़ और ढूँढाड़ के ऐतिहासिक मिलन को दर्शाती है।
ऐतिहासिक हिंगलाज माता का मंदिर और सैन समाज का उद्गम
मेहंदीपुर के अलावा, दौसा के खवारावजी (Khawaraoji) के पास पहाड़ियों पर स्थित हिंगलाज माता का मंदिर एक बहुत बड़ा सांस्कृतिक केंद्र है।यह मंदिर मूल रूप से बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में स्थित मुख्य हिंगलाज शक्तिपीठ की ही एक शाखा माना जाता है।इसके ठीक पास ‘गिरिराज धरण मंदिर’ है। मान्यता है कि इसी क्षेत्र से ‘सैन समाज’ (Sain Community) के आराध्य संत सैन जी महाराज का भी गहरा ऐतिहासिक नाता रहा है।
लुप्त होती लोक कला: ‘हेला ख्याल’ (Hela Khyal) दंगल
यह एक तरह का लोक नाट्य (Folk Theatre) होता है, जिसमें ग्रामीण कलाकार बिना किसी आधुनिक माइक या लाउडस्पीकर के, अपनी आवाज़ की ऊंची तान (जिसे ‘हेला देना’ कहते हैं) के ज़रिए पौराणिक और समसामयिक मुद्दों पर मुकाबला करते हैं।दौसा, लालसोट और इसके आस-पास के इलाकों में मुख्य रूप से गणगौर और अन्य त्योहारों पर पूरी-पूरी रात यह दंगल चलता है, जो पूरे राजस्थान में सिर्फ इसी बेल्ट की खासियत है।
भूलभुलैया जैसी बावड़ियों का हब: केवल चाँद बावड़ी ही नहीं!
भांडारेज की बावड़ी: यहाँ की बड़ी बावड़ी के अंदर गुप्त सुरंगें बनी हुई हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे पुराने समय में युद्ध के दौरान राजाओं के छिपने और निकलने के काम आती थीं।सिकंदरा और लोटवाड़ा की बावड़ियाँ: इन छोटे कस्बों में भी स्थापत्य कला के ऐसे नायाब अजूबे छिपे हैं, जहाँ गर्मियों के दिनों में प्राकृतिक रूप से तापमान बाहर के मुकाबले 5 से 7 डिग्री कम रहता है।
दौसा के मेहंदीपुर बालाजी मंदिर (Mehandipur Balaji Temple) की क्या मान्यता है?
: दौसा जिले के मेहंदीपुर गाँव में स्थित भगवान हनुमान को समर्पित ‘मेहंदीपुर बालाजी मंदिर’ (Mehandipur Balaji Temple) अपनी अलौकिक और चमत्कारी शक्तियों के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध है। यहाँ की बेहद मजबूत धार्मिक मान्यता (Religious Belief) के अनुसार, गंभीर बीमारियों और मानसिक विकारों (Psychological Issues) से पीड़ित लोग दूर-दूर से यहाँ लाए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि संकट से घिरे ये लोग बिना किसी दवा के, केवल संकटमोचन बालाजी महाराज के दिव्य आशीर्वाद (Blessing) और पवित्र भभूत से पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने घर लौटते हैं। आध्यात्मिक यात्रा (Spiritual Journey) के लिए यह एक प्रमुख केंद्र है।
महाभारत काल से जुड़े दौसा के ‘भांडारेज’ (Bhandarej) गाँव का क्या इतिहास है?
जयपुर-आगरा राजमार्ग पर स्थित भांडारेज गाँव का इतिहास बेहद प्राचीन है, जिसे महाभारत काल (Mahabharata Period) में ‘भद्रावती’ (Bhadravati) के नाम से जाना जाता था। इस स्थान का ऐतिहासिक महत्व तब और बढ़ गया जब 11वीं शताब्दी (11th Century) में कछवाहा कबीले के मुखिया दूल्हा राय (Dulha Rai) ने यहाँ के बड़गुर्जर राजा को हराकर इस पर अधिकार कर लिया था। यहाँ की प्राचीन मूर्तियाँ, सजावटी जालियाँ और टेराकोटा का सामान (Terracotta Items) इसकी समृद्ध संस्कृति (Rich Culture) को दर्शाते हैं। इसके अलावा, वर्तमान समय में भांडारेज में निर्मित होने वाले हस्तनिर्मित कालीन (Handmade Carpets) पूरी दुनिया में अपनी खास पहचान रखते हैं।
पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित ‘आभानेरी महोत्सव’ (Abhaneri Festival) का क्या महत्व है?
: राजस्थान सरकार के पर्यटन विभाग (Department of Tourism) द्वारा प्रत्येक वर्ष सितंबर-अक्टूबर के महीने में दो दिवसीय ‘आभानेरी महोत्सव’ (Abhaneri Festival) का भव्य आयोजन किया जाता है। इस सांस्कृतिक उत्सव (Cultural Festival) का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण पर्यटन (Rural Tourism) और स्थानीय लोक कलाओं को बढ़ावा देना है। इस महोत्सव के दौरान देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के मनोरंजन के लिए पारंपरिक राजस्थानी खाना (Rajasthani Food) परोसा जाता है और प्रसिद्ध लोक कलाकारों (Folk Artists) द्वारा रंगारंग नृत्य व गायन के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इसके साथ ही पर्यटकों को रोमांचक ऊँट सफारी (Camel Safari) द्वारा पूरे गाँव की सैर कराई जाती है।
आभानेरी की चाँद बावड़ी (Chand Baori) की वास्तुकला की क्या विशेषताएं हैं?
आठवीं शताब्दी (8th Century) में राजा चंद्र द्वारा निर्मित आभानेरी की चाँद बावड़ी भारत की सबसे गहरी और विशाल बावड़ियों (Deepest Stepwells) में से एक मानी जाती है। वास्तुकला (Architecture) की दृष्टि से यह अनूठी संरचना लगभग 19.5 मीटर चौड़ी है और 13 मंजिलों (13 Storeys) तक गहराई में फैली हुई है। इस बावड़ी की सबसे बड़ी विशेषता इसमें बनी 1000 छोटी और बेहद कलात्मक सीढ़ियाँ (Artistic Steps) हैं, जो एक जादुई भूलभुलैया जैसा दृश्य उत्पन्न करती हैं। यह अद्भुत ऐतिहासिक स्थल अपनी बेजोड़ कारीगरी के कारण दुनिया भर के पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र है।
संस्कृत में दौसा का नाम क्या है और इसका ऐतिहासिक महत्व क्या है?
संस्कृत भाषा (Sanskrit Language) में दौसा का नाम ‘‘ढौ-सा’’ (Dhau-sa) है, जिसका बेहद खूबसूरत अर्थ ‘सुन्दर जैसे स्वर्ग’ (Beautiful like Heaven) होता है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह शहर अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्राचीन काल में कछवाहा राजपूत राजवंश (Kachwaha Rajput Dynasty) का पहला मुख्यालय (First Headquarters) था। इसके अलावा, पूरे दौसा जिले में लगभग 300 मंदिर (300 Temples) स्थित हैं, जिसकी वजह से इस पूरे क्षेत्र को राजस्थान राज्य के सबसे पवित्रतम स्थानों (Holiest Places) में से एक माना जाता है और इसे बड़े आदर से ‘देव नगरी’ भी कहा जाता है।


