बूंदी की कजली तीज (Kajli Teej) क्यों कहलाती है बूढ़ी तीज? जानिए इस पावन व्रत का महत्व, सत्तू का भोग (Offering of Sattu) और हाड़ौती के इस सबसे बड़े सांस्कृतिक उत्सव (Cultural Festival) की अनूठी परंपराएं।
फैक्ट फाइल: बूंदी की कजली तीज (Fact File: Historic Kajli Teej of Bundi)
- त्योहार का नाम (Festival Name) कजली तीज (Kajli Teej) / कजरी तीज / बूढ़ी तीज / सातुड़ी तीज
- मुख्य केंद्र (Main Destination) बूंदी जिला, राजस्थान (Bundi District, Rajasthan)
- कब मनाया जाता है? (Timing) हर साल भाद्रपद महीने की कृष्ण पक्ष तृतीया को
- मुख्य देवता (Presiding Deity) भगवान शिव और माता पार्वती (तीज माता)
- शुरुआत/इतिहास (Origin & History) 17वीं शताब्दी में, बूंदी के राव राजा बुद्ध सिंह के शासनकाल से
- मुख्य मिठाई/प्रसाद (Special Sweet) सत्तू (Sattu) – चने, चावल या गेहूं के आटे से निर्मित
- शाही मूर्ति (The Golden Idol): बूंदी की तीज माता की सवारी में जिस मूर्ति को निकाला जाता है, वह सोने और चांदी की नक्काशी (Gold & Silver Emboss Work) से बनी एक बेहद बेशकीमती और ऐतिहासिक मूर्ति है।
- सत्तू का नियम (Rule of Sattu): इस दिन विवाहित महिलाएं जब तक चांद को अर्घ्य (Moon Worship) नहीं दे देतीं, तब तक वे पानी की एक बूंद भी नहीं पीतीं। व्रत खोलने के लिए ‘सत्तू’ खाना अनिवार्य माना जाता है।
- नीम की पूजा (Neem Tree Worship): पूरे राजस्थान में केवल कजली तीज ही ऐसा त्योहार है जहाँ नीम के पेड़ (Neem Tree) को पवित्र मानकर उसकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
- अंतरराष्ट्रीय पहचान (International Tourism): इस उत्सव के दौरान राजस्थानी लोक संस्कृति के शुद्धतम रूप को देखने के लिए बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक (Foreign Tourists) भी बूंदी पहुंचते हैं।
बूंदी में कजली तीज का इतिहास (History of Kajli Teej in Bundi
बूंदी में कजली तीज मनाने की परंपरा सदियों पुरानी है। इतिहासकार बताते हैं कि 17वीं शताब्दी (17th Century) में बूंदी के तत्कालीन राजा राव राजा बुद्ध सिंह (Rao Raja Budh Singh) के शासनकाल में इस भव्य उत्सव की शुरुआत हुई थी
कहा जाता है कि बूंदी के शासक जयपुर की तीज माता की मूर्ति से बेहद प्रभावित थे। वे उस मूर्ति को बूंदी लाना चाहते थे, लेकिन जब ऐसा संभव नहीं हुआ, तो उन्होंने बूंदी में ही एक भव्य स्वर्ण और चांदी की तीज माता की मूर्ति (Golden and Silver Idol of Goddess Teej) बनवाई। तब से हर साल राजसी ठाट-बाट (Royal Splendor) के साथ माता की सवारी निकालने की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी अनवरत जारी है।
बूंदी की कजली तीज का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व (Religious and Cultural Significance)
कजली तीज का त्योहार मुख्य रूप से पति-पत्नी के अटूट प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, यह त्योहार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया (Third day of Bhadrapada dark fortnight) को मनाया जाता है।
अखंड सौभाग्य का व्रत (Fast for Marital Bliss): इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत (Waterless Fast) रखती हैं।
नीम पूजा का विधान (Worship of Neem Tree): शाम के समय महिलाएं एकत्रित होकर नीम के पौधे की पूजा करती हैं। तालाब के किनारे या घरों में कृत्रिम तालाब बनाकर (Artificial Pond) दीपदान किया जाता है।
सत्तू का भोग (Offering of Sattu): इस त्योहार पर चने, चावल या गेहूं के आटे को सेक कर, उसमें घी और ड्राई फ्रूट्स मिलाकर सत्तू (Sweet Flour Balls) बनाया जाता है। चांद को अर्घ्य (Offering water to the Moon) देने के बाद महिलाएं इस सत्तू को खाकर अपना व्रत खोलती हैं।
कजली तीज बूंदी का मुख्य आकर्षण: तीज माता की भव्य सवारी (The Grand Procession of Teej Mata)
. राजसी वैभव का नजारा (Glance of Royal Grandeur)तीज माता की पालकी को बेहद खूबसूरती से सजाया जाता है। इस जुलूस में सजे-धजे हाथी (Decorated Elephants), घोड़े, ऊंट, विंटेज कारें और पारंपरिक पोशाक पहने राजपूती सैनिक शामिल होते हैं।
. लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां (Performances by Folk Artists)सवारी के आगे पूरे राजस्थान और पड़ोसी राज्यों से आए लोक कलाकार (Folk Artists) अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। इसमें कालबेलिया नृत्य (Kalbelia Dance), चरी नृत्य (Chari Dance), गैर और कच्छी घोड़ी नृत्य मुख्य आकर्षण होते हैं। बैंड-बाजे और नगाड़ों की गूंज से पूरा माहौल गुंजायमान हो उठता है।
सवारी का मार्ग (Route of the Procession)यह ऐतिहासिक जुलूस बूंदी के राजमहल (Royal Palace) से शुरू होकर शहर के प्रमुख बाजारों (Main Markets) से होता हुआ कुंभा स्टेडियम (Kumbha Stadium) तक जाता है। सड़क के दोनों ओर और छतों पर हजारों पर्यटकों (Tourists) और स्थानीय लोगों की भीड़ माता के दर्शन के लिए उमड़ती है।
बूंदी की कजली तीज मेला और सांस्कृतिक संध्या (Kajli Teej Fair and Cultural Evenings)
सवारी के साथ ही बूंदी में 15 दिवसीय भव्य मेले (15-Day Grand Fair) की शुरुआत होती है। जिला प्रशासन (District Administration) और पर्यटन विभाग (Tourism Department) मिलकर इसका आयोजन करते हैं।
हस्तशिल्प और हाट बाजार (Handicraft and Haat Bazaar): मेले में ग्रामीण अंचल के दस्तकार अपनी कलाकृतियों, राजस्थानी जूतियों, लाख की चूड़ियों (Lac Bangles) और पारंपरिक कपड़ों की दुकानें लगाते हैं।
सांस्कृतिक कार्यक्रम (Cultural Programs): मेले के दौरान हर शाम कुंभा स्टेडियम में सांस्कृतिक संध्या (Cultural Evenings) का आयोजन होता है, जिसमें देश के जाने-माने कवि, गायक और डांसर हिस्सा लेते हैं। कवि सम्मेलन (Poets’ Conference) और बॉलीवुड नाइट (Bollywood Night) इस मेले के मुख्य आकर्षण होते हैं।
पर्यटकों के लिए क्यों खास है बूंदी की कजली तीज? (Why is it Special for Tourists?)
यदि आप राजस्थान के असली ग्रामीण परिवेश (Rural Landscape) और समृद्ध इतिहास को करीब से देखना चाहते हैं, तो कजली तीज के दौरान बूंदी आना सबसे बेहतरीन विकल्प है।
फोटोग्राफी के लिए स्वर्ग (Paradise for Photography): रंग-बिरंगी पोशाकें, ऐतिहासिक इमारतें और लोक कलाकारों के भाव फोटोग्राफर्स के लिए एक बेहतरीन विजुअल ट्रीट (Visual Treat) होते हैं।
हाड़ौती की मेहमाननवाज़ी (Hospitality of Hadoti): इस दौरान सैलानियों को स्थानीय व्यंजनों जैसे दाल-बाटी-चूरमा (Dal-Bati-Churma) और विशेष सत्तू का स्वाद चखने को मिलता है।
हेरिटेज वॉक (Heritage Walk): त्योहार के साथ-साथ सैलानी बूंदी के तारागढ़ किले (Taragarh Fort), सुख महल (Sukh Mahal) और यहाँ की प्रसिद्ध बावलियों (Stepwells) जैसे कि ‘रानी जी की बावड़ी’ का दीदार भी कर सकते हैं।
हरियाली तीज और कजली तीज में मुख्य अंतर
राजस्थान की अनूठी संस्कृति में हरियाली तीज (छोटी तीज) और कजली तीज (बड़ी तीज) दोनों का ही अपना विशेष महत्व है, लेकिन इन दोनों में महीना, तिथि, क्षेत्र और व्यंजनों का मुख्य अंतर होता है। हरियाली तीज श्रावण (सावन) मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है और यह मुख्य रूप से जयपुर जिले की प्रसिद्ध है। इस दिन पारंपरिक मिठाई घेवर (Ghewar) खाने और बांटने की विशेष परंपरा है।
इसके ठीक 15 दिन बाद कजली तीज आती है, जो भाद्रपद (भादो) मास की कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। समय के इसी अंतराल के कारण इसे ‘बड़ी तीज’ या ‘बूढ़ी तीज’ भी कहा जाता है। कजली तीज मुख्य रूप से बूंदी जिले में बेहद भव्य रूप से मनाई जाती है। इस दिन का मुख्य आकर्षण माता की शाही सवारी और विशेष पकवान सत्तू (Sattu) होता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘सातू’ कहते हैं। सुहागिनें रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर इसी सत्तू से अपना व्रत खोलती हैं।
कजली तीज कहाँ की प्रसिद्ध है और इसका मुख्य केंद्र कौन सा है? (Kajli Teej Famous Place: Bundi)
कजली तीज मुख्य रूप से राजस्थान के बूंदी जिले (Bundi District) की सबसे प्रसिद्ध है। वैसे तो यह त्योहार पूरे राजस्थान में मनाया जाता है, लेकिन बूंदी में तीज माता की दो दिवसीय पारंपरिक राजसी सवारी (Royal Procession) और ऐतिहासिक कुंभा स्टेडियम में लगने वाला 15 दिवसीय भव्य मेला इसे पूरे भारत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान दिलाता है।
कजली तीज किस हिंदी महीने और तिथि को मनाई जाती है? (Bhadrapada Krishna Tritiya)
कजली तीज हर साल भाद्रपद मास (भादो) की कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि (Bhadrapada Krishna Tritiya) को मनाई जाती है। यह अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार अक्सर अगस्त या सितंबर के महीने में आती है। इसे ‘बड़ी तीज’, ‘सातुड़ी तीज’ या ‘बूढ़ी तीज’ के नाम से भी जाना जाता है।
कुंभा स्टेडियम बूंदी मेला ग्राउंड का एड्रेस (Kumbha Stadium Bundi Mela Ground Address) क्या है और वहाँ कैसे पहुँचें?
कजली तीज मेले का मुख्य आयोजन स्थल कुंभा स्टेडियम (Kumbha Stadium) है। इसका पूरा पता “कुंभा स्टेडियम रोड, नवल सागर झील के पास, विकास नगर, बूंदी, राजस्थान – 323001” है। यह मैदान बूंदी शहर के केंद्र में स्थित है और मुख्य बस स्टैंड से मात्र 2 से 3 किलोमीटर की दूरी पर है। तीज माता की शाही सवारी इसी मैदान में आकर समाप्त होती है, जिसके बाद यहाँ बने विशाल रंगमंच पर 15 दिनों तक सांस्कृतिक कार्यक्रमों और हाट-बाजार का आयोजन किया जाता है। स्थानीय ऑटो और टैक्सियों के जरिए यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है।
बूंदी की कजली तीज माता की सवारी का सही टाइम टेबल (Bundi Teej Procession Timings) क्या है?
बूंदी की कजली तीज माता की प्रसिद्ध सवारी मुख्य रूप से दो दिनों तक निकाली जाती है। वर्ष 2026 में मुख्य सवारी 31 अगस्त (तीज के दिन) और 1 सितंबर (बूढ़ी तीज के दूसरे दिन) को निकाली जाएगी। दोनों ही दिन शाही जुलूस का समय शाम 4:00 बजे से लेकर रात 8:00 बजे तक रहता है। यह जुलूस शाम को बूंदी के ऐतिहासिक राजमहल (Royal Palace) के चौक से पूरे राजसी ठाट-बाट, ऊंट-घोड़ों और लोक कलाकारों के साथ शुरू होता है और मुख्य बाजारों से गुजरते हुए देर शाम तक मेला ग्राउंड पहुंचता है।
जयपुर की तीज माता की मूर्ति को बूंदी के राजा क्यों लूट कर लाए थे? इसके पीछे क्या कहानी है?
ऐतिहासिक लोककथाओं के अनुसार, 17वीं शताब्दी में बूंदी के हाड़ा शासक जयपुर की तीज माता की स्वर्ण मूर्ति (Golden Idol of Teej) और वहां के उत्सव से बेहद प्रभावित थे। वे वैसी ही भव्यता बूंदी में चाहते थे। एक बार राजसी दुश्मनी और प्रतिष्ठा की लड़ाई के दौरान, बूंदी के बलवान सेनापति/राजा जयपुर के जुलूस पर धावा बोलकर माता की मूल स्वर्ण मूर्ति को सम्मानपूर्वक अपने साथ बूंदी ले आए। जयपुर के लिए यह एक बड़ा झटका था। तब से जयपुर में नई मूर्ति बनाकर छोटी तीज मनाई जाने लगी, जबकि बूंदी के राजाओं ने उसी लूटी हुई मूल ऐतिहासिक मूर्ति की स्थापना कर बूंदी में भव्य कजली तीज (Grand Kajli Teej) के मेले और शाही सवारी (Royal Procession) की शुरुआत की, जो आज भी जारी है।
कजली तीज को ‘बूढ़ी तीज’ या ‘सातुड़ी तीज’ क्यों कहा जाता है?
कजली तीज को ‘बूढ़ी तीज’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह ‘छोटी तीज’ (हरियाली तीज) के ठीक 15 दिन बाद आती है। उम्र और समय के इस अंतराल के कारण इसे बड़ी या बूढ़ी तीज का नाम दिया गया। वहीं, इसे ‘सातुड़ी तीज’ कहे जाने के पीछे इस दिन बनने वाला मुख्य पकवान है। इस व्रत में चने, चावल, गेहूं और मेवों को मिलाकर सत्तू (Sattu) बनाया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘सातू’ कहते हैं। सुहागिन महिलाएं पूरा दिन निर्जला व्रत रखने के बाद, रात को चंद्रमा को अर्घ्य (Offering water to the Moon) देकर इसी सत्तू को खाकर अपना व्रत खोलती हैं। पकवान की इस मुख्य परंपरा के कारण ही इसे सातुड़ी तीज कहा जाता है।
कजली तीज 2026 की सही तारीख और शुभ मुहूर्त (Kajli Teej 2026 Date & Muhurat) क्या है?
साल 2026 में कजली तीज (कजरी तीज) का मुख्य त्योहार 31 अगस्त 2026 (सोमवार) को मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग (Hindu Panchang) के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि (Tritiya Tithi) 30 अगस्त 2026 को सुबह 09:36 बजे शुरू होगी और 31 अगस्त 2026 को सुबह 08:50 बजे समाप्त होगी। चूंकि सनातन धर्म में उदयातिथि (Udayatithi) का विशेष महत्व है, इसलिए व्रत और मुख्य अनुष्ठान 31 अगस्त को ही किए जाएंगे। सुहागिन महिलाएं इसी दिन पूरे नियम और श्रद्धा के साथ निर्जला व्रत (Nirjala Fast) रखेंगी।
कजली तीज की व्रत कथा और नीमड़ी माता की पूजा विधि (Kajli Teej Vrat Katha & Neem Puja Vidhi) क्या है?
इस दिन माता पार्वती और शिव जी की पूजा के साथ-साथ नीमड़ी माता (Goddess Nimdi) की पूजा का विशेष विधान है। दीवार पर गोबर और मिट्टी से एक छोटा तालाब (Artificial Pond) बनाया जाता है, जिसके किनारे नीम की एक डाली (Neem Branch) रोपी जाती है। तालाब में कच्चा दूध और पानी डाला जाता है। इसके बाद नीमड़ी माता को मेहंदी, मोली, सिंदूर, अक्षत और सत्तू अर्पित किया जाता है। महिलाएं तालाब के पानी में दिए का दीपक और अपने गहनों का प्रतिबिंब (Reflection) देखती हैं। पूजा के बाद सभी महिलाएं मिलकर कजली तीज की पौराणिक व्रत कथा (Vrat Katha) सुनती हैं।
कजली तीज के लिए पारंपरिक सत्तू बनाने का तरीका (Sattu Recipe for Teej) क्या है?
तीज का विशेष प्रसाद यानी सातुड़ी सत्तू (Satudi Sattu) मुख्य रूप से भुने हुए चने (Roasted Gram), चावल, या गेहूं के आटे से बनाया जाता है। इसे बनाने के लिए सबसे पहले भुने हुए चनों के छिलके निकालकर उन्हें मिक्सी में बारीक पीस लिया जाता है। इसके बाद, पीसे हुए आटे में बराबर मात्रा में बूरा या पिसी हुई चीनी (Powdered Sugar) मिलाई जाती है। स्वाद और खुशबू के लिए इसमें इलायची पाउडर (Cardamom Powder) और बारीक कटे हुए मेवे (Dry Fruits) डाले जाते हैं। अंत में, पिघला हुआ शुद्ध देसी घी (Desi Ghee) मिलाकर मिश्रण को अच्छी तरह बांधते हुए गोल बड़े आकार के सत्तू के पिंड बना लिए जाते हैं
बूंदी की कजली तीज राजस्थान के समृद्ध इतिहास और अटूट सांस्कृतिक आस्था का जीवंत प्रमाण है। माता की भव्य राजसी सवारी (Royal Procession), लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां और सत्तू का पारंपरिक स्वाद इस उत्सव को अद्वितीय बनाता है। यदि आप हाड़ौती के असली सांस्कृतिक वैभव (Cultural Grandeur) को महसूस करना चाहते हैं, तो इस ऐतिहासिक मेले का हिस्सा जरूर बनें।


