ओम प्रकाश शर्मा बिहारी जी खाटू वाले कहाँ के थे? जानिए प्रसिद्ध भजन लेखक ओम प्रकाश शर्मा जी का जीवन परिचय, उनकी डायरी के सुपरहिट भजनों का हिंदी भावार्थ और अनसुने चमत्कार।
ओम प्रकाश शर्मा बिहारी जी खाटू वाले कहाँ के रहने वाले थे?
प्रसिद्ध श्याम भक्त और कालजयी भजन लेखक ओम प्रकाश शर्मा ‘बिहारी जी’ मूल रूप से कोलकाता (पश्चिम बंगाल) के रहने वाले थे। वे कोलकाता के बड़ाबाजार इलाके के प्रवासी मारवाड़ी समाज से जुड़े थे। उन्होंने ‘श्री श्याम मित्र मंडल, कोलकाता’ के माध्यम से दशकों तक बाबा श्याम की सेवा की और अपनी डायरी से अद्भुत भजनों की रचना की।
लीले घोड़े का राजस्थानी भजनों में क्या अर्थ है
राजस्थानी भजनों में ‘लीला’ शब्द का अर्थ ‘नीला’ (Blue) होता है। ग्रामीण राजस्थान में नीली या सलेटी आभा वाले सफेद घोड़े को ‘लीला घोड़ा’ कहा जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्याम बाबा (बर्बरीक) के उस तीव्र गति वाले दिव्य वाहन का प्रतीक है, जो हवा से भी तेज दौड़ता है। भजनों में “लीले चढ़कर आजा” गाने का भाव यह है कि बाबा अपने भक्त के संकट को तुरंत काटने के लिए सबसे तेज गति से प्रकट हों।
मशहूर श्याम भक्त ओम प्रकाश शर्मा बिहारी जी का जीवन परिचय
मशहूर श्याम भक्त और कालजयी भजन लेखक ओम प्रकाश शर्मा ‘बिहारी जी’ का जन्म एक साधारण मारवाड़ी परिवार में हुआ था। वे मूल रूप से कोलकाता (पश्चिम बंगाल) के रहने वाले थे और वहां के प्रसिद्ध बड़ाबाजार इलाके से जुड़े थे। बाबा श्याम को अपना सखा मानने के कारण उन्होंने अपने लेखन का उपनाम ‘बिहारी’ रखा था। वे ‘श्री श्याम मित्र मंडल, कोलकाता’ के मुख्य स्तंभ थे, जिसने 1950 के दशक से खाटू धाम की सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बिहारी जी कोई व्यावसायिक गायक नहीं थे; वे खाटू धाम या कीर्तन मंडलियों में भक्तों की अर्जी और बाबा के साक्षात चमत्कारों को देखकर तुरंत अपनी डायरी में भजन लिख देते थे। उनके लिखे “थारो मर्म न पायो कोई” और “लीले घोड़े रा असवार” जैसे सदाबहार भजन आज भी हर श्याम कीर्तन की जान हैं।
ओम प्रकाश शर्मा बिहारी जी के भजनों की सच्ची कहानी
श्याम भक्त ओम प्रकाश शर्मा ‘बिहारी जी’ के भजनों की रचना किसी कल्पना पर नहीं, बल्कि बाबा श्याम के साक्षात चमत्कारों और सच्ची घटनाओं पर आधारित है। 1980 के दशक में कोलकाता के एक कर्ज में डूबे और निराश व्यापारी की मार्मिक दशा को खाटू धाम के गर्भगृह के सामने देखकर बिहारी जी की आँखों में आँसू आ गए थे। उन्होंने उसी समय मंदिर के फर्श पर बैठकर प्रसिद्ध भजन “थारो मर्म न पायो कोई, थे तो कलयुग का अवतारी” लिखा था। इसी तरह, एक बार फाल्गुन मेले के दौरान जब भक्तों की ट्रेन रात में एक सुनसान स्टेशन पर रुक गई, तब बिहारी जी ने व्याकुल होकर बाबा को पुकारा और जन्म हुआ “लीले घोड़े रा असवार, थारी जय-जयकार” का। उनके भजन भक्तों की सच्ची अर्जियों और बाबा की पर्चियों का जीवंत दस्तावेज हैं।
ओम प्रकाश शर्मा बिहारी जी के भजनों का हिंदी भावार्थ
ओम प्रकाश शर्मा ‘बिहारी जी’ के भजनों का हिंदी भावार्थ पूरी तरह से महाभारत, श्रीमद्भागवत और अटूट समर्पण के दर्शन पर आधारित है। उनका प्रसिद्ध भजन “थारो मर्म ना पायो कोई, थे तो कलयुग का अवतारी” यह संदेश देता है कि बाबा श्याम का स्वरूप इंसानी बुद्धि और बड़े-बड़े ज्ञानियों की समझ से परे (अथाह) है। बिहारी जी के भजनों में प्रयुक्त मारवाड़ी और ब्रजभाषा के शब्दों का मूल भावार्थ यह है कि जब मनुष्य संसार के हर दरवाजे से निराश होकर, पूरी तरह ‘हार’ मानकर बाबा की चौखट पर आता है, तब बाबा कृष्ण के वरदान स्वरूप उसे जीत का आशीर्वाद देते हैं। उनके भजनों का मुख्य भाव व्यापारिक नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा से सीधा और अत्यंत भावुक संवाद है।
श्याम बाबा के पुराने भजनों के पीछे के चमत्कार
श्याम बाबा के पुराने भजनों के पीछे भक्तों की अटूट आस्था और बाबा श्याम के साक्षात चमत्कारों की एक लंबी श्रृंखला जुड़ी हुई है। पुराने समय में जब कीर्तन मंडलियाँ रात-रात भर बाबा का गुणगान करती थीं, तब कई बार भक्तों के संकट टालने के लिए धार्मिक मान्यता है कि स्वयं खाटू नरेश को चमत्कार दिखाने पड़े। जब ट्रेनें सुनसान जंगलों में बिना किसी तकनीकी खराबी के अचानक रुक जाती थीं, तो भक्तों की सामूहिक पुकार और “बेगा आइजो बाबा” के भजनों के गूंजते ही ट्रेनें स्वतः चल पड़ती थीं। कई पीड़ित मरीजों और दिवालिया हो चुके व्यापारियों ने जब इन पुराने भजनों को अपनी अंतिम अर्जी मानकर रोते हुए गाया, तो उनके जीवन का रुख ही बदल गया। ये सदाबहार भजन केवल गीत नहीं हैं, बल्कि हर एक पंक्ति बाबा के किसी न किसी जीवित चमत्कार (पर्ची) की गवाह है।
ओम प्रकाश शर्मा बिहारी जी कोलकाता वाले श्याम भजन डायरी रहस्य”
‘बिहारी जी कोलकाता वाले’ यानी ओम प्रकाश शर्मा की श्याम भजन डायरी का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि इसके शब्द पूर्व-नियोजित नहीं थे। जब भी वे खाटू धाम के गर्भगृह के सामने या कोलकाता की कीर्तन मंडलियों में बैठते, तो भावुक होकर आँखें बंद कर लेते और उनकी कलम स्वतः चलने लगती थी। इस पवित्र डायरी में कई ऐसे दुर्लभ और अनसुने भजन आज भी हस्तलिखित रूप में सुरक्षित हैं, जिन्हें कभी किसी मंच पर गाया ही नहीं गया।
“श्री श्याम मित्र मंडल कोलकाता और बिहारी जी का इतिहास
श्री श्याम मित्र मंडल, कोलकाता और मशहूर भजन लेखक ओम प्रकाश शर्मा ‘बिहारी जी’ का इतिहास खाटू श्याम भक्ति आंदोलन का मुख्य आधार स्तंभ है। 1950 के दशक में स्थापित यह मंडल कोलकाता के बड़ाबाजार के प्रवासी मारवाड़ी समाज का केंद्र था, जिसने खाटू धाम को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। बिहारी जी इस मंडल के मुख्य प्राण थे। जब कोलकाता में मंडल के भव्य कीर्तन होते थे, तब बिहारी जी वहीं बैठकर साक्षात भाव में डूबकर भजनों की रचना करते थे। इस ऐतिहासिक मंडल और बिहारी जी के सामूहिक प्रयासों से ही मारवाड़ी संस्कृति के अनमोल श्याम भजन देश के कोने-कोने तक पहुँचे।
“थारो मर्म ना पायो कोई ओम प्रकाश शर्मा बिहारी जी भजन के पीछे की सच्ची कहानी”
प्रसिद्ध भजन “थारो मर्म ना पायो कोई” 1980 के दशक की एक सच्ची और भावुक घटना से जुड़ा है। कोलकाता के एक कर्ज में डूबे श्याम भक्त की दयनीय स्थिति देखकर लेखक ओम प्रकाश शर्मा ‘बिहारी जी’ उन्हें खाटू धाम लेकर आए थे। बाबा के दर्शन के दौरान उस भक्त की व्यथा और खाटू श्याम जी की मुस्कुराती मूर्ति को देखकर बिहारी जी के मन में ये मार्मिक भाव आए और उन्होंने तुरंत यह भजन रच दिया।
ओम प्रकाश शर्मा ‘बिहारी जी’ के भजनों के पीछे की सच्ची कहानियाँ और चमत्कार
श्याम जगत में ओम प्रकाश शर्मा ‘बिहारी जी’ को केवल एक लेखक नहीं, बल्कि बाबा श्याम का ‘डाकिया’ माना जाता था। वे कहते थे कि उनके भजन वे खुद नहीं लिखते, बल्कि खाटू नरेश खुद उनकी उँगलियाँ पकड़कर लिखवाते हैं। यही कारण है कि उनकी डायरी का हर एक हिट भजन किसी न किसी सच्ची घटना या बाबा के साक्षात चमत्कार (पर्ची) का परिणाम है।
1. भजन: “खाटू के बाबा श्याम जी कलयुग के अवतारी…”
यह बात 1980 के दशक की है। कोलकाता (बड़ाबाजार) में रहने वाले एक श्याम भक्त का व्यापार पूरी तरह ठप हो गया था और उन पर भारी कर्ज हो गया था। समाज में प्रतिष्ठा दांव पर थी और वे डिप्रेशन में आ चुके थे। वह रोते हुए बिहारी जी के पास पहुंचे और कहा, “बिहारी जी, लोग कहते हैं कि महाभारत में तो कृष्ण भगवान थे, इस कलयुग के पत्थर में क्या शक्ति है? मेरा तो सब लुट गया।”
बिहारी जी उस भक्त को लेकर खाटू धाम पहुंचे। जब वे मंदिर के गर्भगृह के सामने खड़े थे, तो उस रोते हुए भक्त की दशा और बाबा श्याम के मुस्कुराते हुए विग्रह को देखकर बिहारी जी की आँखों में आँसू आ गए। वे वहीं मंदिर के फर्श पर बैठ गए और अपनी जेब से कागज-पेन निकालकर तुरंत यह लाइनें लिखीं:
थारो मर्म न पायो कोई, थे तो कलयुग का अवतारी…”
चमत्कार: बिहारी जी ने वह कागज उस रोते हुए भक्त के हाथ में थमा दिया और कहा, “इसे बाबा की अर्जी समझकर रोज गाओ, वो पत्थर नहीं कलयुग के साक्षात मालिक हैं।” कहा जाता है कि अगले 6 महीने के भीतर उस भक्त का सारा कर्ज उतर गया और उसका बिजनेस पहले से दोगुना हो गया। इसी घटना के बाद इस भजन में यह पंक्ति जुड़ी—”हारे का सहारा बाबा, तू ही है विधाता।”
2. भजन: “लीले घोड़े रा असवार, थारी जय-जयकार…”
पुराने समय में जब कोलकाता से भक्त खाटू धाम (राजस्थान) की यात्रा करते थे, तो यातायात के साधन बहुत सीमित थे। एक बार फाल्गुन मेले के दौरान बिहारी जी और उनके साथ जा रही कीर्तन मंडली की ट्रेन बीच रास्ते में एक सुनसान स्टेशन पर तकनीकी खराबी के कारण रुक गई। रात के 2 बज रहे थे, चारों तरफ सन्नाटा था और भक्तों में डर का माहौल था कि वे समय पर बाबा के फाल्गुन मेले में नहीं पहुँच पाएंगे।
सभी भक्त व्याकुल होकर पटरी के किनारे बैठकर रोने लगे और कीर्तन करने लगे। तभी बिहारी जी ने भावुक होकर बाबा को पुकारा कि “हे बाबा, हमारी ट्रेन तो रुक गई, अब आप ही अपने उस घोड़े पर बैठकर आओ जो हवा से तेज भागता है।” इसी तड़प और व्याकुलता के बीच उनके दिल से शब्द निकले:
“लीले घोड़े रा असवार, थारी जय-जयकार… बेगा आइजो बाबा।”
चमत्कार: स्थानीय बुजुर्ग भक्तों के अनुसार, उस सुनसान स्टेशन पर भजन पूरा होते ही कुछ ही मिनटों में अचानक बिना किसी तकनीकी काम के ट्रेन की लाइटें जल गईं और ट्रेन हरी झंडी मिलने से पहले ही धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। ट्रेन सीधे रींगस जाकर ही रुकी। भक्तों का मानना था कि खुद श्याम बाबा ने उस रात ‘लीले घोड़े’ की रफ्तार से उनकी ट्रेन को खींचकर खाटू पहुँचाया था।
भजन: “शीश के दानी का जग में डंका बाज रहा…”
बिहारी जी ने यह भजन खाटू धाम के रींगस रोड पर लगने वाले ‘निशान मेले’ की अद्भुत भीड़ और भक्तों के पैरों के छालों को देखकर लिखा था। एक बार रींगस से खाटू तक की 17 किलोमीटर की पैदल यात्रा में उन्होंने देखा कि एक बुजुर्ग महिला, जिसके पैर से खून बह रहा था, हाथ में भारी निशान (ध्वजा) लिए पेट के बल लेटकर (दंडवत प्रणाम करते हुए) आगे बढ़ रही थी।
बिहारी जी ने उस महिला से पूछा, “माता जी, इतना कष्ट क्यों उठा रही हो?” उस महिला ने रोते हुए मुस्कुराकर जवाब दिया, “बेटा, कष्ट कहाँ है? मेरा श्याम जब अपनी मोरछड़ी से झाड़ा देगा, तो सारे जनम-जनम के कष्ट कट जाएंगे। उसकी चौखट का तो डंका बजता है।” उस अनपढ़ महिला के मुंह से ‘डंका’ और ‘मोरछड़ी’ शब्द सुनकर बिहारी जी स्तब्ध रह गए। उन्होंने उसी रात धर्मशाला में बैठकर इस कालजयी भजन की रचना की:
शीश के दानी का जग में डंका बाज रहा… मोरछड़ी वाले का जग में डंका बाज रहा।”
कोलकाता वाले मशहूर श्याम भक्त ओम प्रकाश शर्मा ‘बिहारी जी’ की भजन डायरी के रहस्य और ‘लीले घोड़े’ का वास्तविक अर्थ हमें बाबा श्याम के प्रति अनन्य समर्पण सिखाता है। उनके भजनों की सच्ची कहानियाँ यह साबित करती हैं कि खाटू नरेश आज भी कलयुग के साक्षात अवतारी और हर हारे हुए भक्त का एकमात्र सहारा हैं।
यह वेबसाइट सामान्य सूचनात्मक और धार्मिक उद्देश्यों के लिए है। इसमें शामिल ओम प्रकाश शर्मा ‘बिहारी जी’ की डायरी, जीवन परिचय और भजनों की कहानियाँ लोक-मान्यताओं तथा कीर्तन मंडलियों के मौखिक इतिहास पर आधारित हैं। हम इसकी शत-प्रतिशत सटीकता का कोई कानूनी दावा नहीं करते। हमारा उद्देश्य किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना नहीं है। यह ब्लॉग किसी मंदिर समिति या बिहारी जी के परिवार से संबद्ध नहीं है।


