दत्ताणी का युद्ध (1583 ई.) राजस्थान के इतिहास का वह विरला और गौरवशाली पन्ना है, जिसे “सिरोही का हल्दीघाटी युद्ध” भी कहा जाता है। जहाँ एक तरफ दिल्ली का बादशाह अकबर पूरे भारत को अपने कदमों में झुकाने पर आमादा था, वहीं अरावली की गोद में बसे सिरोही राज्य के महाराव सुरताण देवड़ा ने अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अकबर की शाही फौज को ऐसी करारी शिकस्त दी कि मुगलों के पैर उखड़ गए। आइए इस ऐतिहासिक महासंग्राम के हर उस पहलू को गहराई से जानते हैं।
“दत्ताणी का युद्ध कब हुआ”
दत्ताणी का युद्ध 17 अक्टूबर 1583 ईस्वी को हुआ था। हिंदू पंचांग के अनुसार यह भीषण संघर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन लड़ा गया था।
“दत्ताणी का युद्ध किस-किस के बीच हुआ
दत्ताणी का युद्ध सिरोही के महाराव सुरताण देवड़ा और अकबर की शाही मुगल सेना के बीच हुआ था। इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप के विद्रोही भाई जगमाल सिसोदिया, मारवाड़ के राव रायसिंह और कोली सिंह कर रहे थे। लोग आश्चर्य करते हैं कि एक छोटी सी रियासत के अकेले शासक का मुगलों की इतनी बड़ी संयुक्त सेना से टकराना और उन्हें हराना बेहद विरला था।
सिरोही का हल्दीघाटी युद्ध किसे कहते हैं” (Which battle is called the Haldighati of Sirohi?)
दत्ताणी के युद्ध (1583 ई.) को “सिरोही का हल्दीघाटी युद्ध” कहा जाता है क्योंकि यह ऐतिहासिक संघर्ष कई मायनों में हल्दीघाटी से मिलता-जुलता था। हल्दीघाटी की ही तरह यह युद्ध भी अरावली की संकरी पहाड़ियों में लड़ा गया, जहाँ सिरोही के महाराव सुरताण देवड़ा ने महाराणा प्रताप की तरह ही ‘छापामार युद्ध नीति’ का इस्तेमाल करके अकबर की विशाल सेना के छक्के छुड़ा दिए थे। इसके अलावा, हल्दीघाटी की तरह यहाँ भी पारिवारिक टकराव देखने को मिला, जहाँ महाराणा प्रताप के विद्रोही भाई जगमाल सिसोदिया स्वयं मुगलों की तरफ से इस युद्ध का नेतृत्व कर रहे थे।
जगमाल की मृत्यु किस युद्ध में हुई थी” (In which battle did Jagmal die?)
महाराणा प्रताप के विद्रोही भाई जगमाल सिसोदिया की मृत्यु 1583 ईस्वी में ‘दत्ताणी के युद्ध’ में हुई थी। अकबर ने जगमाल को सिरोही का आधा राज्य देने का लालच देकर सेनापति बनाकर भेजा था। इस युद्ध में सिरोही के शासक महाराव सुरताण देवड़ा की तलवार से जगमाल रणभूमि में ही मारे गए और अकबर की संयुक्त सेना को करारी हार का सामना करना पड़ा।
दत्ताणी का युद्ध :दोनों पक्ष और प्रमुख सेनापति (The Combatants)
दत्ताणी का युद्ध एक बेहद असमान और विरला मुकाबला था, जहाँ सिरोही साम्राज्य के महाराव सुरताण देवड़ा और उनके मुख्य सेनापति समरा देवड़ा ने मुगलों की एक विशाल संयुक्त महासेना का सामना किया था। अकबर की इस आक्रमणकारी सेना में तीन अलग-अलग क्षेत्रों के शक्तिशाली सेनापति शामिल थे—मेवाड़ से महाराणा प्रताप के विद्रोही भाई जगमाल सिसोदिया, मारवाड़ से राव रायसिंह और गुजरात सीमांत से कोली सिंह दातीवारा। इन तीनों महारथियों के खिलाफ सिरोही के मुट्ठी भर वीरों ने अद्भुत कौशल दिखाते हुए ऐतिहासिक विजय प्राप्त की।
वीर समरा देवड़ा कौन थे और उनकी छतरी कहाँ है?
समरा देवड़ा (समरसिंह डूंगरावत) दत्ताणी के युद्ध में सिरोही सेना के मुख्य सेनापति थे। वे मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। उनकी ‘वीर छतरी’ (स्मारक) आज भी दत्ताणी गाँव (सिरोही) में स्थित है।
राष्ट्रकवि दुरसा आढ़ा का दत्ताणी के युद्ध से क्या संबंध है?
दुरसा आढ़ा ने इस युद्ध में सिरोही के सेनापति समरा देवड़ा की अदम्य वीरता को अपनी आंखों से देखा था। उन्होंने समरा देवड़ा के सर्वोच्च बलिदान और महाराव सुरताण के स्वाभिमान पर डिंगल भाषा में अमर दोहे लिखे, जो आज भी राजस्थान के साहित्य में प्रसिद्ध हैं।
दत्ताणी के युद्ध में महाराव सुरताण देवड़ा की जीत का मुख्य कारण क्या था?
सुरताण देवड़ा की जीत का मुख्य कारण उनकी बेजोड़ छापामार और पहाड़ी युद्ध नीति (Guerrilla Warfare) थी। उन्होंने अरावली की संकरी पहाड़ियों और सिरोही के भूगोल का चतुराई से उपयोग कर मुगलों की विशाल सेना को एक जाल में फंसाकर पूरी तरह नष्ट कर दिया।
क्या दत्ताणी के युद्ध के बाद अकबर ने सिरोही पर दोबारा अधिकार कर लिया था?
नहीं, इस युद्ध में मुगलों के तीनों बड़े सेनापतियों (जगमाल, रायसिंह और कोली सिंह) के मारे जाने के बाद मुगल सेना पूरी तरह हताश हो गई थी। महाराव सुरताण देवड़ा ने सिरोही की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखा और वे अपने जीवनकाल में अजेय रहे।
साहित्य और लोक-कथाओं में दत्ताणी के युद्ध का गौरव
इस युद्ध का प्रभाव इतना व्यापक था कि डिंगल साहित्य के प्रसिद्ध राष्ट्रकवि दुरसा आढ़ा ने सेनापति समरा की शहादत पर यह अमर दोहा लिखा:
- “धर रावां जश डूंगरां, व्रद पोतां सत्र हाण।””समरे मरण सुधारियो, चहु थोकां चहुआण।।”(अर्थात: वीर समरा ने चारों दिशाओं से शत्रुओं का संहार करते हुए अपना मरण सुधारा, अपने वंश का गौरव बढ़ाया और सिरोही की पहाड़ियों को हमेशा के लिए अमर कर दिया।)
वहीं, महाराव सुरताण देवड़ा की अडिगता के लिए मारवाड़ और सिरोही में आज भी यह कहावत शान से दोहराई जाती है:
- “अवर नृप पतशाह अगे, होय नृप जोड़े हाथ।””नाथ उदयपुर नी नमियों, नमियों नी अरबुदनाथ।”(अर्थात: दिल्ली के पातशाह अकबर के सामने भारत के अन्य राजा भले ही हाथ जोड़ते हों, लेकिन न तो उदयपुर के नाथ (महाराणा प्रताप) कभी झुके और न ही अरबुदनाथ यानी सिरोही के राव सुरताण झुके!)



