बरियादेव और खाटू श्याम में क्या संबंध है? जानिए महाभारत का वो छिपा इतिहास

बरियादेव और खाटू श्याम में क्या संबंध है? जानिए महाभारत के वीर बर्बरीक की वो पौराणिक कथा, लांभा मंदिर का 9 दिनों का चमत्कार और उनके गुजरात पहुँचने का इतिहास।

बरियादेव और खाटू श्याम का संबंध”/ क्या बर्बरीक ही बरियादेव हैं?

हाँ, यह सौ प्रतिशत सच है। महाभारत काल के महान योद्धा, भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र वीर बर्बरीक ही गुजरात में ‘बळियादेव बापजी’ के नाम से पूजे जाते हैं।

जब वीर बर्बरीक ने भगवान श्री कृष्ण के मांगने पर धर्म की रक्षा के लिए अपने शीश का दान दे दिया, तो श्री कृष्ण ने उन्हें कलयुग में अपने नाम ‘श्याम’ से पूजे जाने का वरदान दिया। इसी वरदान के बाद, उनके दिव्य मस्तक के अलग-अलग चमत्कारी पड़ावों के कारण वे राजस्थान में ‘खाटू श्याम’ और गुजरात में ‘बरियादेव’ कहलाए। दोनों ही स्वरूपों में केवल उनके ‘शीश’ (मस्तक) की पूजा होना इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है।

महाभारत के बर्बरीक गुजरात कैसे पहुंचे? (रूपावती नदी का रहस्य)

महाभारत युद्ध के समाप्त होने के पश्चात भगवान श्री कृष्ण के निर्देशानुसार वीर बर्बरीक के दिव्य मस्तक को पवित्र रूपावती नदी में प्रवाहित किया गया था, जो बहते हुए गुजरात के अहमदाबाद के पास लांभा क्षेत्र तक पहुँचा। जल में इस चमत्कारी और प्रकाशमयी मस्तक के दर्शन करने के उपरांत स्थानीय ग्रामीणों ने बर्बरीक की असीम वीरता के कारण उन्हें ‘बळियादेव’ (बलवान देव) के रूप में स्थापित किया

तीन बाण धारी बलियादेव की कथा

गुजरात के बरियादेव मंदिरों में आप जब भी जाएंगे, आपको बाबा के मस्तक के साथ तीन बाण (तीर) जरूर दिखाई देंगे। इसके पीछे की कथा खाटू श्याम जी के ‘तीन बाणधारी’ स्वरूप की याद दिलाती है।बर्बरीक ने देवी कामाख्या की घोर तपस्या करके तीन ऐसे चमत्कारी बाण प्राप्त किए थे, जो पूरी दुनिया को नष्ट करने की ताकत रखते थे। उनका पहला बाण शत्रुओं को चिह्नित करता था, दूसरा बाण मित्रों को बचाता था, और तीसरा बाण पलक झपकते ही सभी शत्रुओं का संहार करके वापस आ जाता था। इसी ‘तीन बाण’ की अजेय शक्ति के कारण गुजरात के लोग उन्हें “तीन बाण धारी बळियादेव बापजी” कहते हैं, जो अपने भक्तों के बड़े से बड़े संकट को सिर्फ एक बाण से टाल देते हैं।

अहमदाबाद लांभा बलियादेव मंदिर का इतिहास (Lambha Temple History)

अहमदाबाद से करीब 14 किलोमीटर दूर स्थित लांभा बलियादेव मंदिर पूरे गुजरात में आस्था का एक बहुत बड़ा केंद्र है। यह भव्य मंदिर महाभारत के महान योद्धा वीर बर्बरीक (खाटू श्याम जी) के बाल स्वरूप को समर्पित है। इस पावन धाम की स्थापना के पीछे करीब 80-90 साल पुरानी एक सच्ची ऐतिहासिक घटना है:

महामारी का प्रकोप: बात करीब आठ दशक पहले की है, जब लांभा एक छोटा और शांत गांव हुआ करता था। उस दौरान वहां अचानक चेचक (स्मॉलपॉक्स/खसरा) जैसी भयंकर संक्रामक बीमारी महामारी बनकर फैली। गांव के मासूम बच्चे लगातार इस बीमारी की चपेट में आकर तड़प रहे थे।

शीश की स्थापना: गांव के एक प्रतिष्ठित निवासी पुरुषोत्तमदास का पुत्र भी इस बीमारी से गंभीर रूप से बीमार हो गया। तब उन्होंने अपने मित्र खोदाभाई के साथ मिलकर गांव में वीर बर्बरीक (बलियादेव दादा) के मस्तक (शीश) की स्थापना की और पूरे गांव ने मिलकर सामूहिक प्रार्थना शुरू की।

9 दिनों का महा-चमत्कार: मन्नत और सामूहिक पूजा का ऐसा चमत्कारी असर हुआ कि मात्र 9 दिनों के भीतर गांव के सभी बच्चे पूरी तरह से स्वस्थ हो गए! इस महान चमत्कार के बाद, साल 1996 में यहां एक बेहद खूबसूरत और भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया।

मोटा बळियादेव मंदिर पोर (वडोदरा) की कहानी

वडोदरा के पोर गांव में स्थित ‘मोटा बळियादेव मंदिर’ का संबंध सीधा स्कंद पुराण से है, जहाँ खाटू धाम की तरह वीर बर्बरीक के केवल मस्तक (शीश) की पूजा होती है। स्थानीय भाषा में ‘मोटा’ का अर्थ ‘महान’ होता है। यहाँ मन्नत मांगने से त्वचा रोग पूरी तरह ठीक हो जाते हैं, और चैत्र मास में बाबा के मस्तक को शीतलता देने के लिए पारंपरिक ठंडे पेय ‘ताड़ा’ का भोग लगाया जाता है।

लांभा बलियादेव मंदिर अहमदाबाद: दर्शन और आरती का समय

अहमदाबाद का लांभा बलियादेव मंदिर भक्तों के लिए रोजाना सुबह 06:30 बजे से रात 08:00 बजे तक खुला रहता है, जहाँ सुबह और शाम को आरती का समय निर्धारित है। विशेष रूप से रविवार और मंगलवार को यहाँ भीड़ रहती है, क्योंकि इन दिनों मंदिर में ‘बूंदी के लड्डू’ चढ़ाने और पिछले दिन का बना ‘ठंडा भोजन’ ग्रहण करने की अनोखी परंपरा है।

बळियादेव बापजी का इतिहास

गुजरात में पूजे जाने वाले ‘बळियादेव बापजी’ वास्तव में महाभारत काल के वीर बर्बरीक ही हैं, जिनका मस्तक रूपावती नदी में प्रवाहित होकर गुजरात के लांभा क्षेत्र में पहुँचा था। स्थानीय स्तर पर केवल उनके मस्तक की पूजा की जाती है और इन्हें बच्चों का रक्षक तथा त्वचा रोगों को ठीक करने वाला देवता माना जाता है।

बलियादेव दादा की मन्नत कैसे रखते हैं

बलियादेव दादा (खाटू श्याम जी के बाल स्वरूप) की मन्नत रखने की परंपरा बहुत ही पवित्र है। गुजरात में बच्चे की सेहत और बीमारियों से रक्षा के लिए “बलियादेव दादा की मानती” रखने का विशेष रिवाज है, जिसमें बच्चे के हाथ पर रक्षासूत्र बांधा जाता है। मन्नत पूरी होने पर भक्त रविवार या मंगलवार को अहमदाबाद के लांभा मंदिर जाते हैं। वहाँ दादा के चरणों में श्रीफल, बाजरी का रोटला और विशेष रूप से “सुखड़ी का प्रसाद” चढ़ाकर मन्नत का धागा खोला जाता है।

रविवार और मंगलवार को बरियादेव मंदिर में क्या प्रसाद चढ़ता है?

रविवार और मंगलवार को गुजरात के बरियादेव (बलियादेव) मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, क्योंकि ये दोनों दिन दादा के विशेष दिन माने जाते हैं। इन दिनों बाबा को मुख्य रूप से गुड़ और घी से बना गुजरात का प्रसिद्ध ‘सुखड़ी का प्रसाद’ चढ़ाया जाता है। इसके साथ ही श्रीफल (नारियल) और पारंपरिक बाजरी का रोटला अर्पित करने का भी विधान है। बच्चों की मन्नत पूरी होने पर कई भक्त मिट्टी या प्लास्टिक के छोटे खिलौने और पालने भी चढ़ाते हैं। रविवार और मंगलवार को मंदिर परिसर में पिछले दिन का बना ‘ठंडा भोजन’ (जैसे थेपला, दही वड़ा) ग्रहण करने की भी एक बेहद अनोखी परंपरा है।

मोटा बळियादेव मंदिर पोर वडोदरा की कहानी

वडोदरा के पोर गांव में स्थित ‘मोटा बळियादेव मंदिर’ का सीधा संबंध स्कंद पुराण से है और यहाँ खाटू धाम की तरह वीर बर्बरीक के विशाल मस्तक की पूजा की जाती है। यह मंदिर त्वचा रोगों और चेचक जैसी बीमारियों को ठीक करने के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ मन्नत पूरी होने पर बाबा को शीतल पेय ‘ताड़ा’ और दही का भोग लगाया जाता है।

बरियादेव और खाटू श्याम में क्या संबंध है? पर लिखा यह आर्टिकल आपको कैसा लगा? खाटू श्याम बाबा की जय।

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