बागोर सभ्यता का इतिहास और महत्वपूर्ण तथ्य: नए जिला गठन के बाद क्या बदला? | Bagor Sabhyata in Hindi

भारत में पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य और महासतियों का टीला कहाँ है? जानिए भीलवाड़ा की प्रसिद्ध बागोर सभ्यता (Bagor Civilization) का संपूर्ण इतिहास हिंदी में।

फैक्ट फाइल: बागोर सभ्यता (Bagor Civilization)

  • वर्तमान जिला: भीलवाड़ा, राजस्थान (मंडल तहसील)
  • संबंधित नदी: कोठारी नदी (बनास नदी की सहायक)
  • काल/समय: मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age) — लगभग ईसा पूर्व 4000 से 5000 वर्ष पुराना
  • उत्खननकर्ता: डॉ. वीरेंद्र नाथ मिश्र (V.N. Misra) एवं डॉ. एल. एस. लेश्निक
  • उत्खनन का वर्ष: 1967 से 1970 (पूना विश्वविद्यालय और राजस्थान पुरातत्व विभाग के सहयोग से)
  • महासतियों का टीला’ (उत्खनन का मुख्य केंद्र)’आदिम संस्कृति का संग्रहालय’ (Museum of Primitive Culture) उपनाम है।
  • सबसे बड़ा साक्ष्य: भारत में कृषि और पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य यहीं से मिले हैं।

प्रमुख अवशेष: माइक्रोलिथ्स (पत्थरों के छोटे व बारीक औजार), तांबे की छेद वाली सुई और घरेलू फर्श के नीचे दफन मानव कंकाल।

बागोर सभ्यता किस जिले में है?

बागोर सभ्यता राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में स्थित है। भीलवाड़ा को राजस्थान की ‘वस्त्र नगरी’ भी कहा जाता है, लेकिन प्राचीन इतिहास के पन्नों में इसकी पहचान बागोर जैसे महान पुरातात्विक स्थल के कारण है।

नोट: कई बार लोग उदयपुर की प्रसिद्ध ‘बागोर की हवेली’ और भीलवाड़ा की ‘बागोर सभ्यता’ के बीच भ्रमित हो जाते हैं। ध्यान रहे कि बागोर की हवेली उदयपुर में स्थित एक पर्यटन स्थल है, जबकि बागोर सभ्यता भीलवाड़ा का एक प्रागैतिहासिक स्थल है।‌

बागोर सभ्यता किस नदी के किनारे है?

यह प्राचीन सभ्यता कोठारी नदी के तट पर विकसित हुई थी। प्राचीन काल में नदियाँ ही मानव बस्तियों के बसने का मुख्य आधार होती थीं, क्योंकि जल की उपलब्धता और उपजाऊ भूमि जीवनयापन को सुगम बनाती थी। कोठारी नदी के किनारे अनुकूल वातावरण होने के कारण ही यहाँ मध्यपाषाण काल के मानव ने अपनी बस्ती बसाई थी।

बागोर सभ्यता के उत्खननकर्ता कौन हैं?

बागोर के इस ऐतिहासिक टीले को दुनिया के सामने लाने का श्रेय प्रसिद्ध पुरातत्वविद् डॉ. वीरेंद्र नाथ मिश्र (V.N. Misra) और उनके सहयोगियों को जाता है।उत्खनन का समय: इस स्थल पर वैज्ञानिक उत्खनन का कार्य वर्ष 1967 से 1970 के दौरान किया गया था।सहयोग: इस ऐतिहासिक खोज में पूना विश्वविद्यालय और राजस्थान सरकार के पुरातत्व विभाग ने मुख्य भूमिका निभाई थी। यहाँ व्यापक खुदाई के बाद मानव सभ्यता के क्रमिक विकास के तीन अलग-अलग चरणों (Phases) के अवशेष प्राप्त हुए।

बागोर सभ्यता की मुख्य विशेषताएँ और साक्ष्य

बागोर सभ्यता प्राचीन भारतीय इतिहास की एक अनमोल धरोहर है। मुख्य रूप से मध्यपाषाण काल से संबंधित यह पुरातात्विक स्थल आदिम मानव के क्रमिक विकास की जीवंत कहानी बयां करता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ से भारत में कृषि और पशुपालन के प्राचीनतम व अकाट्य साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, जो दर्शाते हैं कि यहाँ का मानव शिकारी जीवन छोड़ एक जगह बसने लगा था। उत्खनन के दौरान ‘महासतियों के टीले’ से प्रचुर मात्रा में माइक्रोलिथ्स (पत्थरों के अत्यंत छोटे व बारीक औजार) मिले हैं, जिसके कारण इसे ‘आदिम संस्कृति का संग्रहालय’ भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त, यहाँ के ऊपरी स्तरों से ताम्रपाषाणिक अवशेष भी मिले हैं, जिनमें शीर्ष पर छेद वाली तांबे की विशिष्ट सुई मुख्य है। यहाँ मिले मानव कंकालों को मकानों के फर्श के नीचे ही दफनाया जाता था।

महासतियों का टीला’ (Mahasati Mound) कहाँ स्थित है?

महासतियों का टीला’ (Mahasati Mound) राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में कोठारी नदी के तट पर स्थित प्रसिद्ध बागोर पुरातात्विक स्थल का मुख्य केंद्र है। इसी ऐतिहासिक टीले की वैज्ञानिक खुदाई के दौरान भारत की सबसे प्राचीन मध्यपाषाण कालीन सभ्यता के अवशेष दुनिया के सामने आए थे। इतिहास और पुरातत्व के दृष्टिकोण से इस विशिष्ट टीले का अत्यधिक महत्व है, क्योंकि यहीं व्यापक उत्खनन करने पर भारत में पशुपालन और आदिम कृषि के सबसे पहले और ठोस प्रमाण मिले थे। इसके अलावा यहाँ से भारी मात्रा में प्राचीन पत्थरों के छोटे औजार यानी माइक्रोलिथ्स प्राप्त हुए हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के उम्मीदवारों के लिए यह स्थल बेहद महत्वपूर्ण जीके फैक्ट है।

“भारत में पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य कहाँ मिले?”

भारत में पशुपालन के प्राचीनतम और सबसे ठोस साक्ष्य राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में स्थित बागोर सभ्यता से प्राप्त हुए हैं। कोठारी नदी के तट पर विकसित हुए इस ऐतिहासिक स्थल पर जब ‘महासतियों के टीले’ की खुदाई की गई, तो वहाँ ईसा पूर्व लगभग 4000 से 5000 वर्ष पुराने पालतू जानवरों के अवशेष मिले। इतिहास के अनुसार, बागोर का आदिम मानव मुख्य रूप से गाय, बैल, भेड़, बकरी और सूअर जैसे पशुओं को पालता था। यह पुरातात्विक खोज साबित करती है कि मध्यपाषाण काल में यहाँ का मानव केवल शिकारी नहीं था, बल्कि उसने एक व्यवस्थित जीवन जीना शुरू कर दिया था।

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