लोक देवता बाबा रामदेव जी के ‘पगलिया’ का धार्मिक महत्व, इतिहास और भक्तों के घर कुमकुम के पैर छपने के चमत्कार का असली रहस्य।
बाबा रामदेव जी के मंदिरों में मूर्ति की जगह पगलिया की पूजा क्यों होती है?
१४वीं सदी के महान कवि और समाज सुधारक बाबा रामदेव जी ने निराकार ईश्वर की भक्ति पर बल देते हुए अंधविश्वास और मूर्ति पूजा का कड़ा विरोध किया था, यही कारण है कि उनके मंदिरों में मानव मूर्ति के स्थान पर उनके चरण चिह्नों (पगलिया) को पूजा जाता है। समाज से छुआछूत मिटाने के लिए ‘कामड़िया पंथ’ शुरू करने वाले बाबा के ये पदचिह्न विनम्रता और सामाजिक समानता के प्रतीक हैं, जहाँ जाति, धर्म या अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं रहता। यह पवित्र प्रतीक भक्तों को हमेशा बाबा द्वारा दिखाए गए सत्य, अहिंसा और सांप्रदायिक सौहार्द के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
कुमकुम के पगलिया का चमत्कार (पर्चा) क्या है?
बाबा रामदेव जी के अलौकिक चमत्कारों को लोक भाषा में ‘पर्चा’ कहते हैं, जिनमें “कुमकुम रा पगलिया” का पर्चा सबसे अद्भुत है। मान्यता है कि जब भी कोई सच्चा भक्त अनन्य भाव से भजन गाता है या घर में ‘जम्मा’ (रात्रि जागरण) रखता है, तब बाबा वहां अदृश्य रूप में पधारते हैं और उनकी उपस्थिति के प्रमाण स्वरूप साफ आंगन या पूजा स्थल पर अचानक लाल कुमकुम के पदचिह्न उभर आते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, समाधि के बाद बाबा ने परम भक्त हरजी भाटी और धर्म-बहन डाली बाई को सांत्वना देने हेतु सर्वप्रथम उनके आंगन में कुमकुम के पैर उकेरे थे। आज भी भाद्रपद मास या एकादशी के दिन भक्तों के घरों में इन पवित्र पदचिह्नों का स्वतः बनना उनकी जीती-जागती उपस्थिति और अटूट कृपा का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है।
बाबा रामदेव जी के पगलिया की HD फोटो और वॉलपेपर
पवित्र पत्थरों पर अद्भुत नक्काशी: बाबा रामदेव जी के मंदिरों (देवरा) में उनके पूजनीय चरण चिह्नों को संगमरमर, चमकीले मकराना के पत्थर या जैसलमेर के प्रसिद्ध पीले बलुआ पत्थर पर बेहद खूबसूरती के साथ उकेरा जाता है.पगलिया पर धार्मिक कलाकृति: इन उच्च गुणवत्ता (HD) वाले वॉलपेपर और तस्वीरों में पगलिया के साथ-साथ भगवान विष्णु के प्रतीक जैसे स्वास्तिक, सूर्य, चंद्रमा, शंख, चक्र और गदा की बारीक नक्काशी साफ दिखाई देती है.डाउनलोड का उद्देश्य: भक्त इन तस्वीरों को अपने मोबाइल स्क्रीन के वॉलपेपर, व्हाट्सएप डीपी (DP) या घरों के डिजिटल मंदिर में फ्रेम करवाने के लिए इंटरनेट पर “HD Quality Photos” के रूप में सर्च करते हैं.
बाबा रामदेव जी के पगलिया केवल पत्थर पर उकेरी गई कोई कलाकृति नहीं हैं, बल्कि वे हिंदू-मुस्लिम एकता, जातिविहीन समाज और शुद्ध भक्ति के जीवंत प्रतीक हैं। राजस्थानी लोक गायकी में भी पगलिया का बहुत बड़ा स्थान है। जब गायक ऊंचे स्वर में गाता है— “प्यारा घणा लागे बाबा कुमकुम रा पगलिया…” तो हर श्रोता का मन श्रद्धा से भर उठता है।
घर के मंदिर में बाबा रामदेव जी के पगलिया कैसे स्थापित करें?
घर के मंदिर में बाबा रामदेव जी के पगलिया (चरण-चिन्ह) स्थापित करने के लिए गुरुवार या दूज (शुक्ला द्वितीया) का दिन सबसे उत्तम माना जाता है। स्थापना से पहले मंदिर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) को गंगाजल से पवित्र करें। इसके बाद पगलिया को कच्चे दूध और गंगाजल से स्नान कराकर पीले या लाल कपड़े पर रखें। पगलिया का रुख इस तरह हो कि पूजा करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर की ओर रहे। प्रतिदिन उन पर कुमकुम (सिंदूर) का तिलक लगाएं, अक्षत (चावल) चढ़ाएं और बाबा की प्रिय मिश्री या चूरमे का भोग लगाकर घी का दीपक जलाएं।
घर के मुख्य द्वार, चौखट या मंदिर में कुमकुम से बाबा रामदेव जी के पगल्या मांडने (चरण-चिन्ह बनाने) की विधि
घर के मुख्य द्वार, चौखट या मंदिर में कुमकुम से पगल्या मांडने (चरण-चिन्ह बनाने) के लिए सबसे पहले एक कटोरी में शुद्ध कुमकुम लें और उसमें थोड़ा सा गंगाजल या गुलाब जल मिलाकर गाढ़ा घोल तैयार कर लें। अब अपनी दोनों हथेलियों की बाहरी किनारों (मुट्ठी बंद करके नीचे का हिस्सा) को इस घोल में डुबोएं और ज़मीन पर एक साथ छापें, जिससे पैर के तलवे की आकृति बन जाएगी। इसके बाद अनामिका उंगली (Ring finger) की मदद से दोनों छापों के आगे ऊपर की तरफ पाँच-पाँच छोटी बिंदियाँ लगा दें, जो पैर की उंगलियाँ दर्शाती हैं। अंत में इन पर अक्षत (चावल) चढ़ाकर बाबा रामदेव जी का ध्यान करें।
घर के मंदिर के लिए बाबा रामदेव जी के पगलिया
घर के मंदिर के लिए बाबा रामदेव जी के पगलिया मुख्य रूप से संगमरमर (मकरान मार्बल) और शुद्ध चांदी में सबसे ज़्यादा पसंद किए जाते हैं। चांदी के पगलिया पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा लाते हैं, जिन्हें बाबा की तस्वीर के आगे रखा जाता है। वहीं, मकराना संगमरमर के पगलिया अपने टिकाऊपन, सुंदर नक्काशी और आसान साफ-सफाई के कारण भक्तों की पहली पसंद हैं।
पगलिया क्या है?
राजस्थानी भाषा और संस्कृति में ‘पगलिया’ का शाब्दिक अर्थ पैरों के निशान या ‘पद-चिन्ह’ (Footprints) होता है। यह केवल एक सामान्य शब्द नहीं, बल्कि राजस्थान की धार्मिक और लोक-संस्कृति का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है।
लोक कला (मांडणा): शुभ अवसरों जैसे दिवाली, विवाह, नवजात के आगमन या धार्मिक पर्वों पर घरों के मुख्य द्वार और आंगन में गेरू व खड़िया से माँ लक्ष्मी या देवी-देवताओं के चरण-चिन्ह बनाए जाते हैं, जिन्हें ‘पगलिया मांडणा’ कहा जाता है।
एकमात्र लोकदेवता: इस दोहे को लेकर भी लोग जानकारी ढूंढते हैं—”और देवां का तो माथा पूजीजे, मारे देव रा पगलिया पूजीजे” (अर्थात अन्य देवताओं के शीश पूजे जाते हैं, पर बाबा रामदेव के केवल चरण चिन्ह पूजे जाते हैं)।
छोटा छोटा पगलिया’
‘छोटा छोटा पगलिया’ देवीदास वैष्णव द्वारा गाया गया एक अत्यंत प्रिय और भावपूर्ण राजस्थानी भजन है। यह भजन प्रभु के बाल स्वरूप (विशेषकर बाबा रामदेव जी और भगवान श्री कृष्ण) के आगमन और उनके नन्हे-नन्हे चरण-चिन्हों (पगलिया) की अपार महिमा का बखान करता है।भक्ति रस: इसमें एक भक्त का अपने आराध्य के प्रति निश्चल वात्सल्य और अपार प्रेम झलकता है।सांस्कृतिक जुड़ाव: भजन में घर के आंगन में प्रभु के छोटे-छोटे कुमकुम रूपी पगल्या पड़ने से आने वाली खुशहाली और पवित्रता का जीवंत वर्णन मिलता है।लोकप्रियता: अपनी सरल शब्दावली और मधुर धुन के कारण यह हर धार्मिक आयोजन और प्रभात फेरी में भक्तिमय माहौल कायम कर देता है।
“कुमकुम रा पगलिया
कुमकुम रा पगलिया” बाबा रामदेव जी का एक अत्यंत लोकप्रिय और पारंपरिक राजस्थानी भजन है, जिसे मुख्य रूप से प्रसिद्ध लोक गायक प्रकाश माली और महेंद्र सिंह राठौड़ ने अपनी जादुई आवाज़ दी है। इस भजन की मुख्य पंक्ति “हो रामदेव कंकुरा (कुमकुम) पगल्या मांडिया” भक्तों के दिलों में गहरे तक उतरती है।यह गीत उस पावन और आनंदमयी पल का वर्णन करता है जब बाबा रामदेव जी के स्वागत में भक्त अपने घर-आंगन और चौखट पर कुमकुम (सिंदूर) से उनके पवित्र चरण-चिन्ह (पगलिया) मांडते हैं। राजस्थान के लोक-उत्सवों, जागरण (जम्मा) और भादवा सुदी दूज के मेलों में यह भजन हर पंडाल और घर में गूंजता है, जो भक्तों में अटूट श्रद्धा और भक्ति का संचार करता है।
“रामदेव जी बाबा थारा पूजूं रे पगलिया
रामदेव जी बाबा थारा पूजूं रे पगलिया” राजस्थान का एक अत्यंत पारंपरिक और मर्मस्पर्शी लोक-भजन है, जिसे सुप्रसिद्ध लोक गायिका चम्पा मेती ने अपनी सुरीली और सुगठित आवाज़ में गाया है। यह भजन पूरी तरह से बाबा रामदेव जी के पावन चरण-चिन्हों (पगलिया) के प्रति अटूट विश्वास और पूर्ण समर्पण को समर्पित है।इस गीत के माध्यम से भक्त बाबा के चरणों में शीश नवाकर अपनी मनोकामनाएं पूरी करने की प्रार्थना करते हैं। मारवाड़ और पूरे राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में होने वाले रात्रिकालीन जागरणों (जम्मा) में यह भजन विशेष रूप से गाया जाता है। इसकी सरल राजस्थानी शब्दावली और सुगम लय सीधे श्रोताओं के दिलों को छूती है और पूजा के माहौल को पूरी तरह भक्तिमय बना देती है।


