भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने अपनी पूरी संपत्ति और प्राण देश के नाम कर दिए। बीकानेर की मिट्टी में जन्मे अमरचंद बांठिया (Amar Chand Banthia) एक ऐसे ही महान क्रांतिकारी थे, जिन्हें ‘राजस्थान का मंगल पांडे’ भी कहा जाता है। हमारी टीम को इनके गौरवशाली इतिहास को समझने का अवसर मिला और हम उनके इस बलिदान की गाथा को आपके साथ साझा कर रहे हैं।
अमरचंद बांठिया का जीवन परिचय
- जन्म: 1793 में बीकानेर के एक जैन ओसवाल परिवार में।
- उपाधि: ग्वालियर रियासत के खजाने के रक्षक होने के कारण उन्हें ‘नगरसेठ’ (Nagarseth) कहा जाता था।
- महान दान: रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे की सेना को संकट के समय ग्वालियर का राजकोष (Gangajali) सौंप दिया।
- बलिदान दिवस (Martyrdom Day) 22 जून, 1858
- फांसी का स्थान (Execution Spot) सराफा बाजार, ग्वालियर (Saraf Bazar, Gwalior)
- पेड़ का प्रकार (Type of Tree) नीम का पेड़ (Neem Tree)
अमरचंद बांठिया: राजस्थान का मंगल पांडे (The Mangal Pandey of Rajasthan)
जिस प्रकार 1857 की क्रांति की पहली चिंगारी बैरकपुर में मंगल पांडे ने जलाई थी और वे इस विद्रोह के प्रथम शहीद बने थे, ठीक उसी प्रकार राजस्थान की मिट्टी से ताल्लुक रखने वाले अमरचंद बांठिया 1857 की क्रांति के दौरान फांसी पर चढ़ने वाले राजस्थान के पहले व्यक्ति थे।
प्रथम बलिदान (First Martyrdom): राजस्थान के किसी भी स्वतंत्रता सेनानी द्वारा दिया गया यह पहला बड़ा बलिदान था।
क्रांति को दिशा देना: उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना उस सेना की मदद की, जो अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रही थी।
राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम में स्थान अमरचंद बांठिया का स्थान (Position in Rajasthan’s Freedom Struggle)
क्रांति के ‘भामाशाह’ (Bhamashah of the Revolt): महाराणा प्रताप की मदद करने वाले दानवीर भामाशाह की तरह ही, बांठिया जी ने रानी लक्ष्मीबाई को अपना सर्वस्व दान कर दिया।मारवाड़ का गौरव (Pride of Marwar): बीकानेर (Marwar Region) से होने के कारण वे पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा के स्रोत बने।प्रतीक चिन्ह (Symbol of Resistance): आज भी राजस्थान में उन्हें एक ऐसे नायक के रूप में पूजा जाता है, जिन्होंने व्यापारियों के लिए ‘देशभक्ति’ की एक नई परिभाषा लिखी।
अमरचंद बांठिया को फांसी का खौफनाक मंजर
22 जून 1858 को अंग्रेजों ने बांठिया जी को राजद्रोह (Treason) का दोषी पाया। ग्वालियर के सराफा बाजार (Bullion Market) में, उनके घर के पास ही स्थित एक विशाल नीम के पेड़ को फांसी के लिए चुना गया।
अंतिम समय: गवाह बताते हैं कि मौत के सामने खड़े होने के बावजूद बांठिया जी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उन्हें सरेआम फांसी पर लटका दिया गया।
अंग्रेजों की बर्बरता: लोगों के मन में ब्रिटिश हुकूमत का खौफ पैदा करने के लिए उनके शव को लगातार तीन दिनों तक उसी नीम के पेड़ पर लटका रहने दिया गया। प्रशासन का सख्त आदेश था कि कोई भी उनके पार्थिव शरीर को नीचे नहीं उतारेगा।
अमरचंद बांठिया जी के बलिदान के बाद
बांठिया जी के बलिदान के बाद ग्वालियर और राजस्थान में विद्रोह की आग और भड़क उठी:लोकनायक का दर्जा: जिस सराफा बाजार में वे व्यापार करते थे, वही जगह उनकी शहादत की वजह से एक तीर्थ बन गई।व्यापारी वर्ग में चेतना: बांठिया जी ने यह साबित कर दिया कि देश की आजादी की लड़ाई केवल सैनिकों की नहीं, बल्कि हर नागरिक की है।आज का स्वरूप: आज उसी स्थान पर उनकी भव्य प्रतिमा स्थापित है। हर साल 22 जून को स्थानीय लोग और प्रशासन उन्हें श्रद्धांजलि देने वहां एकत्रित होते हैं।
1857 की क्रांति के प्रथम शहीद
1857 की क्रांति के दौरान जहाँ पूरा देश अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उबल रहा था, वहीं राजस्थान की मिट्टी के लाल अमरचंद बांठिया ने अपनी शहादत से इतिहास के पन्नों में अपना नाम अमर कर दिया। बीकानेर में जन्मे बांठिया जी ग्वालियर रियासत के ‘नगरसेठ’ और शाही खजाने के रक्षक थे। उन्होंने जानते हुए भी कि इसका परिणाम मृत्यु होगा, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे की सेना को ग्वालियर का राजकोष सौंप दिया।
उनका यह योगदान केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि अद्वितीय नैतिक साहस का उदाहरण था। एक सफल व्यापारी (Merchant) होने के बावजूद उन्होंने ऐशो-आराम के बजाय देश सेवा को चुना। उनके द्वारा दी गई वित्तीय सहायता (Financial Aid) ही वह आधार थी, जिसके दम पर रानी लक्ष्मीबाई की सेना अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा खोल सकी। 22 जून 1858 को उन्हें ग्वालियर के सराफा बाजार में सरेआम फांसी दी गई, जिससे वे 1857 की क्रांति में बलिदान होने वाले ‘राजस्थान के प्रथम शहीद’ और ‘राजस्थान के मंगल पांडे’ कहलाए। उनकी शहादत आज भी देशभक्ति की मिसाल है।
अमरचंद बांठिया ‘नगरसेठ’ और ‘गंगाजली’ के रक्षक (The Title of ‘Nagarseth’)
अमरचंद बांठिया जी की व्यापारिक कुशलता और अटूट ईमानदारी की चर्चा जब ग्वालियर के तत्कालीन दीवान राव और महाराजा जयाजीराव सिंधिया तक पहुँची, तो उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ आया। महाराजा उनकी कार्यशैली से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें सिंधिया रियासत के प्रसिद्ध शाही खजाने ‘गंगाजली’ (Gangajali Treasury) का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया।इसी दौरान उन्हें ‘नगरसेठ’ की प्रतिष्ठित उपाधि से सम्मानित किया गया, जो उस समय किसी भी आम नागरिक के लिए सर्वोच्च सम्मान था। ‘पर्ल किंग्स’ (Moti Raja) के नाम से विख्यात सिंधिया शासकों के बेशकीमती खजाने की सुरक्षा करना बांठिया जी के लिए गौरव का विषय था, जिसे उन्होंने अपनी अंतिम सांस तक निभाया।
ग्वालियर का व्यापारी अमरचंद बांठिया और नीम के पेड़ की शहादत (The Story of the Merchant and the Neem Tree)
1857 की क्रांति में राजस्थान की मिट्टी के लाल अमरचंद बांठिया ने अपनी तिजोरी और प्राण दोनों देश पर न्योछावर कर दिए। जब 1858 में रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे की सेना ग्वालियर पहुँची, तो उनके पास सैनिकों के वेतन और रसद (Food) के लिए धन की भारी कमी थी। सेना बिखरने की कगार पर थी, तभी ग्वालियर रियासत के खजांची अमरचंद जी ने एक साहसिक निर्णय लेते हुए शाही खजाने ‘गंगाजली’ की चाबियाँ रानी को सौंप दीं।
जब अंग्रेजों ने ग्वालियर पर पुनः अधिकार किया, तो बांठिया जी पर राजद्रोह का मुकदमा चला। खौफ पैदा करने के लिए अंग्रेजों ने उन्हें ग्वालियर के सराफा बाजार में एक पुराने नीम के पेड़ (Neem Tree) पर सरेआम फांसी दे दी। क्रूरता की हद तो तब हुई जब उनके शव को तीन दिनों तक उसी पेड़ पर लटका रहने दिया गया। आज वह स्थान एक तीर्थ है, जहाँ उनकी प्रतिमा स्थापित है। ग्वालियरवासी उन्हें ‘व्यापारियों का मंगल पांडे’ और ‘क्रांति का भामाशाह’ मानकर गर्व से याद करते हैं।
कैसे पड़ा बांठिया’ नाम? (Origin of the Name)
अमरचंद जी के पूर्वज बीकानेर के संपन्न ओसवाल जैन व्यापारी थे। मारवाड़ में अकाल या संकट के समय यह परिवार अपने अन्न भंडार और तिजोरियाँ गरीबों के लिए खोल देता था। दीन-दुखियों में खुले दिल से संपत्ति और भोजन बांटने की इसी अद्भुत उदारता के कारण स्थानीय लोग उन्हें आदर से ‘बांठिया’ (अर्थात—सब कुछ बांट देने वाला) कहने लगे। समय के साथ यह सम्मानजनक शब्द ही उनके परिवार का आधिकारिक उपनाम (Surname) बन गया, जो आज भी त्याग और परोपकार का प्रतीक है।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ नायक ऐसे हैं जिन्होंने अपनी कलम या तलवार से ज्यादा अपनी त्याग भावना से अंग्रेजों की जड़ें हिला दीं। अमरचंद बांठिया (Amar Chand Banthia) एक ऐसा ही नाम है, जिन्हें ‘राजस्थान का मंगल पांडे’ कहा जाता है।



