13 मंजीरों का जादू! राजस्थान का प्रसिद्ध तेरहताली नृत्य | Terah Taali Dance

क्या आप राजस्थान के प्रसिद्ध तेरहताली नृत्य का इतिहास जानते हैं? जानिए कैसे कामड़ जाति की महिलाएं शरीर पर 13 मंजीरे बांधकर यह अद्भुत नृत्य करती हैं। पूरी जानकारी के लिए अभी पढ़ें!

“कामड़ जाति और तेरहताली नृत्य का इतिहास”

तेरहताली नृत्य मुख्य रूप से राजस्थान की व्यावसायिक और भक्तिप्रेमी कामड़ जाति द्वारा किया जाता है, जो लोक देवता बाबा रामदेव जी के परम अनुयायी हैं। इस नृत्य की शुरुआत कामड़ महिलाओं द्वारा बाबा रामदेव जी की आराधना में गाए जाने वाले भजनों (व्यावले) के साथ हुई थी। मूल परंपरा के अनुसार, इस वैश्विक लोक कला को केवल समाज की विवाहित महिलाएँ ही मंजीरों की थाप पर प्रस्तुत करती हैं, जबकि पुरुष चौतारा और ढोलक जैसे वाद्य यंत्र बजाते हैं।

तेरहताली नृत्य का उद्गम (Origin) कहाँ से हुआ?

तेरहताली नृत्य का उद्गम राजस्थान के पाली जिले के पादरला गाँव से माना जाता है। पादरला गाँव को इस अद्भुत लोक कला की जन्मस्थली होने का गौरव प्राप्त है। इसी गाँव से कामड़ जाति के कलाकारों ने इस नृत्य की शुरुआत की थी, जिसे बाद में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नृत्यांगना मांगी बाई ने वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई। आज भी कला प्रेमी इस पारंपरिक नृत्य के मूल इतिहास को समझने के लिए पादरला गाँव का संदर्भ देते हैं।

13 मंजीरे शरीर पर कहाँ बाँधे जाते हैं? (The Layout of 13 Manjiras)

तेरहताली नृत्य की मुख्य विशेषता शरीर पर बंधे 13 मंजीरे हैं। इनका सटीक विभाजन इस प्रकार है: 9 मंजीरे दाएँ पैर पर (घुटने से टखने तक), 2 मंजीरे दोनों कोहनियों के ऊपर, और 2 मंजीरे दोनों हथेलियों में होते हैं, जिनसे बाकी मंजीरों पर प्रहार किया जाता है। नृत्य के दौरान नृत्यांगना बाएँ पैर को मोड़कर बैठती हैं, इसलिए बाएँ पैर पर कोई मंजीरा नहीं बाँधा जाता है।

तेरहताली नृत्य कैसे किया जाता है?

तेरहताली नृत्य भारत के उन अनूठे लोक नृत्यों में से है जो ज़मीन पर बैठकर किया जाता है। इसमें कामड़ महिलाएँ चौतारा और ढोलक की थाप पर अविर्णनीय गति से हाथ चलाकर मंजीरे बजाती हैं। नृत्य के दौरान वे मुँह में तलवार दबाना, सिर पर जलते दीपक व चरी (बर्तन) संभालना और बिना हाथों के मुँह से ज़मीन पर रखा रुमाल या पैसा उठाना जैसे कठिन स्टंट और संतुलन का प्रदर्शन करती हैं।

तेरहताली नृत्य के मुख्य वाद्य यंत्र (Musical Instruments Used)

चौतारा / तंबूरा (Chautara / Tambura): यह चार तारों वाला एक तंतु वाद्य (String Instrument) है। यह इस नृत्य का मुख्य आधार है जो भक्तिमय संगीत की लय तय करता है।

ढोलक (Dholak): यह नृत्य की गति (Rhythm) और थाप को नियंत्रित करता है। जैसे-जैसे ढोलक की गति बढ़ती है, नृत्यांगनाओं के मंजीरा बजाने की गति भी तेज़ होती जाती है।

मंजीरा (Manjira): जैसा कि आपने पहले बताया, नृत्यांगनाओं के शरीर पर बंधे 13 मंजीरे खुद एक प्रमुख घन वाद्य (Metallic Instrument) की तरह काम करते हैं।

हारमोनियम (Harmonium): यह भजन और लोक गीतों को मधुर स्वर (Melody) प्रदान करने के लिए बजाया जाता है।

‘तेरहताली’ शब्द का वास्तविक अर्थ (Meaning of Terah Taali)

तेरहताली’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है— ‘तेरह’ (13) और ‘ताली’ (ताल या ध्वनि)। इसके दो मुख्य अर्थ निकलते हैं:

13 ताल/शैलियाँ (13 Rhythm Styles): नृत्य के दौरान महिलाएँ बैठकर मंजीरों की सहायता से 13 अलग-अलग प्रकार की ताल या गतियाँ (Choreographic Steps) उत्पन्न करती हैं। इसमें हाथ की सफाई और गति देखने लायक होती है।

13 मंजीरों का संगम: शरीर के 13 अलग-अलग स्थानों पर मंजीरे बांधकर जो ध्वनि तरंगें पैदा की जाती हैं, उसे ही ‘तेरहताली’ का नाम दिया गया है।

तेरहताली नृत्य के मुख्य कलाकार कौन हैं?

माँगी बाई (Mangi Bai): इन्हें तेरहताली नृत्यकी ‘अंतर्राष्ट्रीय पहचान’ कहा जाता है। उदयपुर के पदराला गाँव की माँगी बाई को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। इन्होंने गाड़िया लोहार सम्मेलन (1955) में पंडित जवाहरलाल नेहरू के सामने भी प्रस्तुति दी थी।

नारायणी देवी (Narayani Devi): माँगी बाई की ही तरह इन्होंने भी इस नृत्य शैली को जीवित रखने और इसके प्रचार-प्रसार में बहुत बड़ा योगदान दिया।

लक्ष्मण दास कामड़ (Laxman Das Kamad): इस नृत्य में पुरुषों की भूमिका मुख्य रूप से वाद्य यंत्र बजाने और गायन की होती है। लक्ष्मण दास जी इसके एक बेहतरीन पुरुष कलाकार और गुरु रहे हैं।

तेरहताली नृत्य किस राज्य का है

तेरहताली नृत्य मुख्य रूप से भारत के राजस्थान राज्य का एक अत्यंत प्रसिद्ध और अनूठा लोक नृत्य है। इस पारंपरिक नृत्य की उत्पत्ति राजस्थान के पाली जिले के पादरला गाँव से हुई थी। इसे राजस्थान की कामड़ जाति की महिलाओं द्वारा बाबा रामदेव जी की आराधना में प्रस्तुत किया जाता है।

तेरहताली नृत्य की विशेषताएँ

बैठकर प्रस्तुति: यह अनूठा नृत्य खड़े होकर नहीं, बल्कि ज़मीन पर बैठकर चित्त मुद्रा में किया जाता है।

13 मंजीरों का तालमेल: नृत्यांगनाएँ शरीर के 13 अंगों (9 दाएँ पैर पर, 2 कोहनियों पर, 2 हाथों में) पर मंजीरे बाँधकर तीव्र गति से ध्वनि उत्पन्न करती हैं।

कठिन संतुलन कला: नृत्य के दौरान महिलाएँ मुँह में नग्न तलवार दबाना और सिर पर जलते दीपकों के साथ चरी (बर्तन) को संतुलित करने जैसे जोखिम भरे स्टंट करती हैं।

भक्तिमय आधार: यह नृत्य कामड़ जाति द्वारा लोक देवता बाबा रामदेव जी की आराधना में किया जाता है।

उदयपुर में तेरहताली नृत्य कहाँ देखें?”

बागोर की हवेली (उदयपुर) में ‘धरोहर’ लोक नृत्य शो रोजाना शाम 7:00 से 8:00 बजे तक होता है (सर्दियों में दूसरा शो 8:00 से 9:00 बजे भी चलता है)। सबसे आगे की सीट के लिए शाम 6:15 बजे पहुंचना बेहतर है। टिकट की कीमत भारतीय वयस्कों के लिए ₹125, बच्चों के लिए ₹75, विदेशियों के लिए ₹250 और कैमरा शुल्क ₹125 है। ऑफलाइन टिकट काउंटर शाम 6:15 बजे खुलता है, लेकिन लंबी लाइनों से बचने के लिए इसकी आधिकारिक वेबसाइट से एडवांस बुकिंग सबसे आसान तरीका है।

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