गिरी सुमेल युद्ध का सच :एक मुट्ठी बाजरा और खो जाती दिल्ली की गद्दी!

गिरी सुमेल युद्ध (1544) इतिहास की वो सनसनीखेज जंग थी, जिसमें मारवाड़ के वीर जैता और कूंपा के पराक्रम ने दिल्ली के सुल्तान शेरशाह सूरी को कांपने पर मजबूर कर दिया था। जानिए इस युद्ध की तारीख, कारण, परिणाम और शेरशाह के उस प्रसिद्ध कथन का पूरा सच जिसने हिंदुस्तान की बादशाहत को दांव पर लगा दिया था।

“गिरी सुमेल का युद्ध किस-किस के बीच हुआ””

दिल्ली के अफगान सुल्तान शेरशाह सूरी और मारवाड़ (जोधपुर) के शासक राव मालदेव राठौड़ की सेनाओं के बीच लड़ा गया था।

एक तरफ (अफगान सेना): दिल्ली सल्तनत का सुल्तान शेरशाह सूरी। इस युद्ध में मालदेव से बदला लेने के लिए बीकानेर के राव कल्याणमल और मेड़ता के वीरमदेव ने भी शेरशाह सूरी का साथ दिया था। अंतिम समय में शेरशाह के आरक्षित सेनापति जलाल खां जलवानी ने आकर युद्ध का पासा पलटा था।

दूसरी तरफ (राजपूत सेना): मारवाड़ के राजा मालदेव के पीछे हट जाने के बाद, यह युद्ध मुख्य रूप से मालदेव के दो अत्यंत पराक्रमी और वफादार सेनापतियों—जैता और कूंपा के नेतृत्व में मुट्ठी भर (लगभग 12,000) राठौड़ राजपूत सैनिकों द्वारा लड़ा गया था।

यह ऐतिहासिक युद्ध वर्तमान राजस्थान के पाली जिले की जैतारण तहसील में गिरी और सुमेल गांवों के पास लड़ा गया था, जिसमें जैता और कूंपा वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे।

“गिरी सुमेल का युद्ध किस वर्ष में लड़ा गया था

इस युद्ध की सटीक तारीख 5 जनवरी 1544 थी। यह ऐतिहासिक टकराव वर्तमान राजस्थान के पाली जिले की जैतारण तहसील में स्थित गिरी और सुमेल गांवों के मैदान में हुआ था।

गिरी सुमेल युद्ध के मुख्य कारण

यह युद्ध दोनों शासकों की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं का परिणाम था, जिसकी सीमाएं आपस में टकरा रही थीं। राव मालदेव से असंतुष्ट बीकानेर के कल्याणमल और मेड़ता के वीरमदेव ने शेरशाह सूरी से हाथ मिलाकर उसे मारवाड़ पर आक्रमण के लिए उकसाया। साथ ही, दिल्ली की गद्दी को सुरक्षित रखने के लिए शेरशाह के लिए मालदेव की बढ़ती सैन्य शक्ति को रोकना अनिवार्य सामरिक आवश्यकता बन चुका था।

सेनाओं का पड़ाव और गिरी सुमेल युद्ध का मैदान

1543 के अंत में शेरशाह सूरी करीब 1 लाख की सेना लेकर मारवाड़ की ओर बढ़ा, जिसके जवाब में राव मालदेव 50,000 राठौड़ सैनिकों के साथ आगे आए। दोनों सेनाएं पाली के गिरी और सुमेल गांवों के बीच आमने-सामने डट गईं। राजपूतों की मजबूत व्यूह रचना और हौसले को देखकर चतुर शेरशाह समझ गया कि सीधे युद्ध में इन्हें हराना नामुमकिन है।

गिरी सुमेल युद्ध का सजीव चित्रण: जब मौत भी कांप उठी

5 जनवरी 1544 की सुबह जैता और कूंपा के नेतृत्व में मुट्ठी भर राजपूतों ने अफगान सेना पर ऐसा आत्मघाती हमला किया कि शेरशाह के पैर उखड़ गए और वह मैदान में ही नमाज पढ़ने लगा। लेकिन तभी शेरशाह के आरक्षित सेनापति जलाल खां जलवानी की ताजादम टुकड़ी ने आकर पासा पलट दिया। थक चुके राजपूत सैनिकों को चारों तरफ से घेर लिया गया और जैता-कूंपा समेत सभी 12,000 वीर योद्धा आखिरी सांस तक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिंदुस्तान की बादशाहत खो देता

युद्ध समाप्त हो चुका था। मैदान लाशों से पटा पड़ा था। शेरशाह सूरी जीत तो गया था, लेकिन यह जीत उसकी जिंदगी की सबसे महंगी और डरावनी जीत थी। जब उसने अपने हजारों सर्वश्रेष्ठ अफगान सैनिकों की लाशें देखीं और जैता-कूंपा के कटे हुए शरीरों को देखा, तो उसका पूरा अहंकार चूर-चूर हो गया।

उसी समय उसने मैदान की मिट्टी को हाथ में लेकर वो ऐतिहासिक शब्द कहे, जो आज भी इतिहास के पन्नों में गूंजते हैं:

“बोल्यो सूरी बाण यों, गिरी सुमेल के काज।एक मुट्ठी बाजरा खातर, खो देतो हिंदवाण पतसाह।।”(अर्थात: खुदा का शुक्र है कि जलाल खां समय पर आ गया और मैं किसी तरह जीत गया, वरना मैं मारवाड़ के एक मुट्ठी बाजरे (सूखे और कम उपजाऊ क्षेत्र) के चक्कर में पूरे हिंदुस्तान की बादशाहत खो देता।)

गिरी सुमेल युद्ध के प्रमुख परिणाम:

युद्ध के बाद शेरशाह सूरी ने जोधपुर (मेहरानगढ़ किले) पर अधिकार कर खवास खां और ईसा खां को सूबेदार नियुक्त किया, जबकि राव मालदेव को सिवाना के पहाड़ों में शरण लेनी पड़ी। हालांकि, सूरी वंश का यह प्रभाव अस्थायी रहा। मात्र एक वर्ष बाद (1545 ईस्वी) कालिंजर दुर्ग के घेरे में तोप फटने से शेरशाह की मृत्यु हो गई, जिसके बाद मालदेव ने पर्वतों से लौटकर 1546 ईस्वी में जोधपुर पर पुनः पूर्ण अधिकार जमा लिया।

“गिरी-सुमेल के युद्ध में बीकानेर के किस शासक ने शेरशाह की सहायता की थी”?

गिरी-सुमेल के युद्ध (1544) में बीकानेर के शासक राव कल्याणमल ने शेरशाह सूरी की सहायता की थी। राव मालदेव ने पाहोबा के युद्ध (1541) में कल्याणमल के पिता राव जैतसी को मारकर बीकानेर छीन लिया था। इसी प्रतिशोध और राज्य वापसी के लिए कल्याणमल ने शेरशाह से हाथ मिलाया था।

“राव मालदेव युद्ध छोड़कर सिवाना क्यों गए”

शेरशाह सूरी ने कूटनीति से राव मालदेव के शिविर में फर्जी पत्र गिरवा दिए। इन जाली पत्रों के कारण मालदेव को अपने सबसे वफादार सेनापतियों, जैता और कूंपा पर शेरशाह से मिले होने का संदेह हो गया। इस गहरे अविश्वास और पराजय की आशंका के चलते मालदेव युद्ध का मैदान छोड़ सुरक्षित सिवाना के पहाड़ों की ओर चले गए।

“वीरमदेव मेड़तिया और शेरशाह सूरी का संबंध”

वीरमदेव मेड़तिया और शेरशाह सूरी के बीच राजनैतिक शत्रुता और प्रतिशोध का गहरा संबंध था। राव मालदेव ने मेड़ता पर आक्रमण कर वीरमदेव का राज्य छीन लिया था। अपनी मातृभूमि को वापस पाने और मालदेव से बदला लेने के लिए वीरमदेव शेरशाह सूरी की शरण में चले गए। गिरी-सुमेल युद्ध में वीरमदेव ने शेरशाह का साथ दिया, मारवाड़ के गुप्त रास्ते बताए और मालदेव के खिलाफ फर्जी पत्र तैयार करने के षड्यंत्र में मुख्य भूमिका निभाई।

“जैता और कूंपा की वीरता की कहानी

1544 के गिरी-सुमेल युद्ध में शेरशाह सूरी के फर्जी पत्रों के कारण जब राव मालदेव ने जैता और कूंपा पर संदेह किया, तो वे सेना सहित पीछे हट गए। अपने ऊपर लगे इस कलंक को धोने के लिए दोनों वीरों ने मात्र 12,000 सैनिकों के साथ शेरशाह की 80,000 की सेना पर ऐसा भीषण आक्रमण किया कि सुल्तान हार के डर से नमाज पढ़ने लगा। हालांकि, अंतिम समय में जलाल खां जलवानी की आरक्षित अफगान टुकड़ी ने आकर पासा पलट दिया, जिसके बाद जैता और कूंपा आखिरी सांस तक वीरता से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

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