हरजी भाटी रामदेव जी की समाधि के 300 साल बाद कैसे मिले !

“क्या वाकई बाबा रामदेव जी अपनी समाधि के 300 साल बाद हरजी भाटी से मिले थे? जानिए लिखित इतिहास और लोक मान्यताओं के मतभेद का पूरा सच और इस अलौकिक कहानी का इतिहास।”

हरजी भाटी का इतिहास और जीवनी

जन्म स्थान: ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, हरजी भाटी का जन्म फलोदी जिले के चाडी गांव में हुआ था.

बचपन और परवरिश: बचपन में ही माता-पिता का साया सिर से उठ जाने के कारण वे अपने ननिहाल बैठवासिया गांव (पंडित जी री ढाणी, ओसियां, आ गए और यहीं पले-बढ़े.

सदी: हरजी भाटी 18वीं सदी के संत और कवि थे. उनका जन्म विक्रम संवत 1735 (लगभग 1678 ईस्वी) के आस-पास माना जाता है. उन्होंने 103 वर्ष की लंबी आयु जी और विक्रम संवत 1838 में पुष्कर (कार्तिक पूर्णिमा) में उनका देवलोकगमन हुआ.

बाबा रामदेव जी और हरजी भाटी का इतिहास (समय का मतभेद)

तस्वीरों और भजनों में हमेशा बाबा रामदेव जी के ठीक पीछे हरजी भाटी को चंवर ढालते हुए दिखाया जाता है. लेकिन लिखित इतिहास और वैज्ञानिक कालक्रम (Timeline) में दोनों के बीच लगभग 300 वर्षों का अंतर है:

बाबा रामदेव जी का समय: बाबा रामदेव जी का जन्म विक्रम संवत 1409 या 1442 (14वीं सदी) में हुआ था और उन्होंने 1459 ईस्वी (15वीं सदी) में जीवित समाधि ली थी.

लोक मान्यताओं में यह मिलन कैसे संभव है?

परचा और अलौकिक साक्षात दर्शन: लोक मान्यता है कि हरजी भाटी की अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर बाबा रामदेव जी ने अपनी समाधि के 300 साल बाद उन्हें साक्षात पर्चा (चमत्कार) और दर्शन दिए थे. भगवान के लिए समय की कोई सीमा नहीं होती, इसलिए आध्यात्मिक रूप से हरजी भाटी को बाबा का समकालीन और अनन्य सखा माना गया.

आरती के रचयिता: बाबा रामदेव जी की सबसे प्रसिद्ध आरती (“पिछम धरा सूं म्हारा पीर जी पधारिया…”) की रचना स्वयं हरजी भाटी ने की थी. इस आरती की आखिरी पंक्ति में वे लिखते हैं—”लाछा सुगना करे हरी री आरती, हरजी भाटी चंवर ढोले”। इसी अमर रचना के कारण हर पेंटिंग और मूर्ति में उन्हें बाबा के साथ दर्शाया जाता है.

हरजी भाटी का समाधि स्थल और मुख्य मंदिर

मुख्य स्थान: हरजी भाटी की समाधि, पंडित जी की ढाणी, बैठवासिया गांव, ओसियां, जोधपुर (राजस्थान – 342303)।

विशेषता: हरजी भाटी का मूल ठिकाना होने के कारण ही बैठवासिया गांव को पंडित जी री ढाणी के नाम से जाना जाने लगा। यहाँ उनके समाधि स्थल पर बाबा रामदेव जी और हरजी भाटी का भव्य मंदिर बना हुआ है।

प्रमुख आयोजन: यहाँ हर साल भादवा (भाद्रपद) और माघ महीने की शुक्ल एकादशी (चानणी ग्यारस) को विशाल धार्मिक मेला आयोजित होता है, जहाँ हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए जुटते हैं।

रामदेवरा मिलन स्थली: इसके अलावा मुख्य रामदेवरा धाम (जैसलमेर) के पास ‘परचा तालाब’ के पास भी बाबा रामदेव जी और हरजी भाटी की ऐतिहासिक मिलन स्थली पर एक श्रद्धा केंद्र और पगल्या मंदिर बना हुआ है।

बाबा रामदेव जी और हरजी भाटी की मार्बल मूर्तियां (Moorti)

मूर्तियों का विकल्प: थार और मारवाड़ क्षेत्र के मूर्तिकार विशेष रूप से सफेद मकराना मार्बल से तैयार सुंदर रंगीन और नक्काशीदार मूर्तियां बनाते हैं। इसमें बाबा रामदेव जी के साथ हाथ में तंबूरा (एकतारा) लिए बैठे भक्त हरजी भाटी की प्रतिमा का पूरा सेट मिलता है।

कस्टम डिजाइन: इन मूर्तियों को ऑर्डर देकर अपनी जरूरत के अनुसार छोटे आकार (घर के लिए) या बड़े आकार (मंदिर के लिए) में कस्टमाइज्ड रूप से तैयार करवाया जा सकता है।

कहाँ से खरीदें: आप पूरे भारत में सुरक्षित होम डिलीवरी और कस्टमाइज्ड साइज के लिए निर्माता और सप्लायर्स की सूची इंडियामार्ट बाबा रामदेव मार्बल मूर्ति लिस्टिंग पर ऑनलाइन चेक कर सकते हैं। इसके अलावा जयपुर और अलवर के मार्बल मार्केट में भी ये मूर्तियां सीधे तौर पर उपलब्ध रहती हैं।

बाबा रामदेव जी और हरजी भाटी का प्रथम मिलन

लोक मान्यताओं के अनुसार, एक बार हरजी भाटी जंगल में गायें चरा रहे थे, तभी बाबा रामदेव जी एक तेजस्वी घुड़सवार के रूप में वहां से गुजरे। बाबा ने हरजी की परीक्षा लेने के लिए उनसे दूध मांगा। हरजी ने जब गायों के कुंवारी होने के कारण दूध न होने की बात कही, तो बाबा के आदेश पर उन्होंने जैसे ही एक सूखी गाय का थन छुआ, उसमें से दूध की धार बहने लगी। इस अद्भुत चमत्कार (पर्चे) को देख हरजी भाटी तुरंत समझ गए कि यह कोई साधारण पुरुष नहीं बल्कि साक्षात ईश्वर हैं और वे उसी क्षण अपना पूरा जीवन बाबा के चरणों में समर्पित कर संत बन गए।

जोधपुर जेल का पर्चा: जब बाबा ने निभाया सखा धर्म

इस मिलन के बाद बाबा रामदेव जी हमेशा अदृश्य रूप से हरजी भाटी के साथ रहे। इसका सबसे बड़ा प्रमाण तब मिला जब जोधपुर के हाकिम ने हरजी भाटी को कैद कर लिया था।जेल में जब हरजी ने बाबा को पुकारा, तो बाबा रामदेव जी ने अपनी शक्ति से जेल के ताले और बेड़ियां तोड़ दी थीं। इस घटना ने साबित कर दिया कि समाधि के सदियों बाद भी बाबा अपने इस भक्त के लिए सदैव हाजिर रहते थे।

भजन साहित्य में हरजी भाटी का योगदान

भक्तराज हरजी भाटी एक उच्च कोटि के लोक-कवि थे, जिन्होंने मारवाड़ी और राजस्थानी भाषा में सैकड़ों भजनों (सायल) की रचना की। आज भी बाबा रामदेव जी के जागरण (जमा) उनके भजनों के बिना अधूरे माने जाते हैं। मारवाड़ की ठेठ मिट्टी की सुगंध से सराबोर उनके भजनों में गहरी विनम्रता और आत्म-समर्पण का भाव झलकता है। वे हमेशा हाथ में तंबूरा (एकतारा) लेकर झूमते हुए भजन गाते थे और उनके भजनों में ‘हरजी भाटी चरणा में ठाडो’ जैसे सरल शब्दों का उपयोग उनकी अटूट भक्ति को दर्शाता है।

बाबा रामदेव जी की मुख्य आरती किसने लिखी थी?

बाबा रामदेव जी की सबसे प्रसिद्ध मुख्य आरती “पिछम धरा सूं म्हारा पीर जी पधारिया…” की रचना स्वयं भक्तराज हरजी भाटी ने की थी।

हरजी भाटी का सबसे प्रसिद्ध चमत्कार (पर्चा) कौन सा है?

हाकिम री जेल (जोधपुर जेल) का प्रसंग बाबा रामदेव जी और उनके अनन्य भक्त हरजी भाटी की अटूट आस्था का प्रतीक है। लोक मान्यताओं के अनुसार, हरजी भाटी को झूठे आरोपों के तहत जोधपुर की सख्त जेल में कैद कर दिया गया था। भारी लोहे की बेड़ियों और मजबूत तालों में जकड़े हरजी ने संकट के समय अपने आराध्य बाबा रामदेव जी को सच्चे मन से याद किया। भक्त की पुकार सुनते ही बाबा ने चमत्कार दिखाया। बिना किसी चाबी के जेल के सभी ताले स्वतः टूट गए और बेड़ियां पिघल गईं। यह अलौकिक चमत्कार देख प्रहरी दंग रह गए।

हरजी भाटी की जाति

लोक-मान्यताओं और ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, भक्तराज हरजी भाटी जन्म से एक क्षत्रिय भाटी राजपूत थे। उनका जन्म राजस्थान के एक प्रतिष्ठित राजपूत परिवार में हुआ था और उनके पिता का नाम उगमसिंह जी भाटी था। हालांकि, भक्ति मार्ग अपनाने के बाद समाज में वे ‘संत’ और ‘भक्तराज’ के रूप में पूजे गए।

बाबा रामदेव ब्यावलो (थाने रामदेव परणावे):

हरजी भाटी द्वारा रचित ‘बाबा रामदेव ब्यावलो’ बाबा रामदेव जी और माता नेतलदे के दिव्य विवाह को दर्शाती एक पवित्र मारवाड़ी रचना है। इसका प्रसिद्ध पद ‘थाने रामदेव परणावे’ राजस्थान और गुजरात के रातीजोगों और भजनों में बड़े चाव से गाया जाता है। यह अमर कथा हरजी भाटी की भक्ति और जन-जन की आस्था का सजीव चित्रण करती है।

हरजी भाटी को जोधपुर जेल में क्यों बंद किया गया था?

लोक मान्यताओं के अनुसार, कुछ ईर्ष्यालु विरोधियों ने स्थानीय हाकिम (शासक) के कान भर दिए थे और हरजी भाटी पर झूठे राजकीय नियमों के उल्लंघन या टैक्स न चुकाने का झूठा आरोप लगवाकर उन्हें कैद करवा दिया था।

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