रींगस से खाटू श्याम जी निशान यात्रा का वो सच जो कोई नहीं बताता! जानें 18 किमी नंगे पैर चलने का वैज्ञानिक रहस्य

अंधभक्ति या विज्ञान? रींगस से खाटू श्याम जी निशान यात्रा के वो नियम, रहस्य और वैज्ञानिक महत्व जो डॉक्टरों को भी चौंकाते हैं। क्लिक कर पढ़ें पूरी सच।

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रींगस से खाटू श्याम जी निशान यात्रा में पैरों में छाले क्यों नहीं होते”?

मस्तिष्क का जादुई केमिकल लोचा (एंडोर्फिन और फ्लो स्टेट)जब श्याम भक्त चंग और धमाल की थाप पर “जय श्री श्याम” गाते हुए रींगस से आगे बढ़ते हैं, तो उनका दिमाग ‘फ्लो स्टेट’ (गहरे ध्यान की स्थिति) में चला जाता है। इस चरम आनंद में मस्तिष्क एंडोर्फिन (Endorphins) और डोपामाइन जैसे हार्मोन्स का भारी रिसाव करता है। विज्ञान में एंडोर्फिन को ‘प्राकृतिक मॉर्फिन’ कहा जाता है। यह शरीर का अपना इन-बिल्ट पेनकिलर है, जो पैरों के दर्द के सिग्नल्स को रीढ़ की हड्डी के रास्ते दिमाग तक पहुंचने ही नहीं देता, जिससे बिना किसी तनाव के पैर आगे बढ़ते रहते हैं।

कंकड़-पत्थरों से मिला नेचुरल एक्यूप्रेशर और अर्थिंगराजस्थान की सड़कों पर नंगे पैर चलने के पीछे एक बेहतरीन फिजियोलॉजिकल साइंस है। हमारे तलवों में हजारों तंत्रिकाएं और एक्यूप्रेशर पॉइंट्स होते हैं, जो कंकड़-पत्थरों और मिट्टी के सीधे संपर्क में आने से लगातार एक्टिवेट होते हैं। इससे पैरों में रक्त संचार (Blood Circulation) अचानक बहुत तेज हो जाता है, जो मांसपेशियों को जकड़ने नहीं देता। साथ ही, जमीन से सीधे जुड़ने के कारण ‘अर्थिंग’ (Earthing) की प्रक्रिया होती है, जो शरीर की सूजन और स्ट्रेस हार्मोन को कम करके छालों के असर को न के बराबर कर देती है।

एड्रेनालाईन रश और सामूहिक इच्छाशक्ति का तगड़ा कॉकटेल : जब लाखों लोग एक ही दिशा में, एक जैसी सकारात्मक ऊर्जा के साथ कदम बढ़ाते हैं, तो शरीर में एड्रेनालाईन (Adrenaline) हार्मोन का स्तर आसमान छूने लगता है। विज्ञान मानता है कि एड्रेनालाईन रश के दौरान मानव शरीर अपनी सामान्य क्षमता से 10 गुना ज्यादा काम कर सकता है। आस्था से भरा यह माहौल भक्त के अवचेतन मन (Subconscious Mind) को इतना फौलादी बना देता है कि 18 किलोमीटर की यह कठिन दूरी पैरों के लिए एक सामान्य अभ्यास जैसी बन जाती है और थकान कोसों दूर रहती है।

रींगस से खाटू श्याम जी निशान यात्रा के दौरान क्या खाना चाहिए और क्या नहीं?”/निशान यात्रा डाइट चार्ट

निशान यात्रा में तुरंत एनर्जी के लिए केला, खजूर, मिश्री और मखाना खाएं। डिहाइड्रेशन और मांसपेशियों की ऐंठन (Cramps) से बचने के लिए हर 2-3 किमी पर ORS या नींबू-पानी पीते रहें। रास्ते में मिलने वाले भारी, तली-भुनी चीजें (समौसा, कचौरी) खाने से बचें, क्योंकि ये पाचन को धीमा कर सुस्ती लाती हैं। अत्यधिक चाय-कॉफी से भी बचें, यह शरीर को जल्दी डिहाइड्रेट करती है।

खाटू श्याम जी निशान यात्रा के चमत्कार: आस्था और हीलिंग (Faith Healing) का सच

मानसिक शक्ति से शारीरिक बीमारी पर विजय: कई ऐसे प्रामाणिक मामले देखे गए हैं जहाँ क्रॉनिक पेन (पुरानी बीमारियों के दर्द) या अवसाद (Depression) से जूझ रहे लोग इस यात्रा को पूरा करने के बाद स्वस्थ महसूस करते हैं।

• विज्ञान क्या कहता है? जब किसी व्यक्ति का अवचेतन मन (Subconscious Mind) पूरी तरह यह स्वीकार कर लेता है कि “बाबा के दरबार में कदम रखते ही मैं ठीक हो जाऊँगा”, तो मस्तिष्क का Prefrontal Cortex शरीर के इम्यून सिस्टम (Immune System) को अत्यधिक सक्रिय कर देता है। यह तीव्र इच्छाशक्ति शरीर की कोशिकाओं को री-जेनरेट (Cell Regeneration) करने और सूजन/दर्द को तेजी से ठीक करने में मदद करती है।

बिना थके पैदल यात्रा कैसे करें खाटू श्याम जी निशान यात्रा

• माइंड को 3 हिस्सों में बांटें (Chunking Technique): मनोविज्ञान में बड़ी चुनौतियों को छोटे हिस्सों में बांटने की सलाह दी जाती है। 18 किमी को एक साथ न सोचें। अपने दिमाग को टारगेट दें: पहले 6 किमी (रींगस से तोरण द्वार का शुरुआती रास्ता), अगले 6 किमी (मध्य मार्ग), और अंतिम 6 किमी (खाटू कस्बा और मुख्य मंदिर)। हर हिस्सा पूरा होने पर मस्तिष्क को जीत का अहसास होता है और डोपामाइन रिलीज होता है।

• चाल की लय (Rhythm of Strides): शुरुआत में बहुत तेज भागने की गलती न करें। अपनी सांसों की गति और भजनों की बीट्स (थाप) के साथ अपने कदमों को सिंक (Sync) करें। एक स्थिर गति (Constant Pace) से चलने पर शरीर कम थकता है।

सूती मोज़ों का प्रयोग (यदि नंगे पैर चलने में दिक्कत हो): यदि त्वचा बहुत संवेदनशील है, तो बिना जूते-चप्पल के दो जोड़ी मोटे सूती (Cotton) मोज़े पहनकर चलें। यह सड़क के सीधे घर्षण (Friction) को रोकता है और पैरों को छालों से बचाता है।

“खाटू श्याम निशान यात्रा का वैज्ञानिक महत्व

• अर्थिंग और बायो-इलेक्ट्रिकल संतुलन (Earthing Science): चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, जब मानव शरीर सीधे पृथ्वी (मिट्टी या सड़क) के संपर्क में आता है, तो जमीन से मुक्त इलेक्ट्रॉन्स शरीर में प्रवेश करते हैं। इसे ‘Grounding’ या ‘Earthing’ कहा जाता है। यह प्रक्रिया शरीर के भीतर मौजूद फ्री रेडिकल्स को न्यूट्रलाइज करती है, जिससे मानसिक तनाव (Stress Level) कम होता है और पैरों की अंदरूनी सूजन (Inflammation) काफी हद तक नियंत्रित रहती है। यही कारण है कि इतनी लंबी दूरी तय करने के बाद भी शरीर में वो जकड़न नहीं होती, जो सामान्य दिनों में होती है।

• रीढ़ की हड्डी और फेफड़ों का पोस्चर विज्ञान (Spine & Core Mechanics): यात्रा का सबसे कड़ा नियम यह है कि पवित्र निशान को कभी भी जमीन पर नहीं रखा जाता और न ही उसे झुकाया जाता है। भौतिक और शारीरिक विज्ञान (Biomechanics) के दृष्टिकोण से देखें तो हाथ में एक निश्चित वजन (ध्वज) को सीधे थामकर लगातार चलने से आपकी रीढ़ की हड्डी (Spine) बिल्कुल सीधी रहती है। यह पोस्चर कोर मसल्स को मजबूत करता है और फेफड़ों (Lungs) को पूरी तरह फैलने की जगह देता है। इससे शरीर में ऑक्सीजन का स्तर (Oxygen Saturation) हमेशा हाई रहता है और भक्त बिना हांफे लंबी दूरी आसानी से तय कर लेते हैं।

ध्वनि तरंगों का न्यूरोलॉजिकल प्रभाव (Acoustic & Vagus Nerve Science): यात्रा के दौरान लगातार बजने वाले चंग, ढोल और एक ही लय में होने वाला “जय श्री श्याम” का संकीर्तन शरीर की Vagus Nerve (वेगस तंत्रिका) को उत्तेजित करता है। ध्वनि विज्ञान (Sound Therapy) के अनुसार, एक निश्चित फ्रीक्वेंसी पर बार-बार होने वाला उच्चारण हृदय गति (Heart Rate) और ब्लड प्रेशर को संतुलित रखता है। यह मानसिक शांति देता है और शरीर में लैक्टिक एसिड (थकान पैदा करने वाला एसिड) बनने की प्रक्रिया को बहुत धीमा कर देता है, जिससे पैरों को लगातार आगे बढ़ने की ऊर्जा मिलती रहती है।

खाटू श्याम जी निशान पर नारियल क्यों बांधते हैं”

खाटू श्याम जी के निशान पर नारियल (श्रीफल) बांधना परम आत्मसमर्पण का प्रतीक है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, नारियल को ‘मानव शीश’ (सिर) माना जाता है। चूंकि बर्बरीक ने धर्म की रक्षा के लिए अपना शीश दान किया था, इसलिए निशान पर नारियल बांधकर भक्त बाबा के चरणों में अपना अहंकार और शीश समर्पित करते हैं। वैज्ञानिक रूप से, यह हवा के दबाव को संतुलित कर ध्वज का संतुलन बनाए रखता है।

निशान यात्रा में वॉशरूम जाने का नियम क्या है?

यात्रा के दौरान वॉशरूम जाने से पहले पवित्र निशान किसी अन्य शुद्ध और स्नान किए हुए श्याम भक्त को सौंप देना चाहिए। वॉशरूम का उपयोग करने के बाद सीधे निशान को हाथ न लगाएं। अच्छी तरह से हाथ-पैर धोकर (संभव हो तो स्नान करके) और पवित्र जल या गंगाजल छिड़क कर खुद का शुद्धिकरण करें, इसके बाद ही दोबारा निशान थामें। अकेले होने पर रास्ते के सेवा शिविरों (कैंपों) के सेवादारों को निशान संभलाया जा सकता है।

निशान को जमीन पर क्यों नहीं रखते और गलती से छू जाए तो क्या करें?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, निशान बाबा श्याम के ‘शीश’ और विजय का प्रतीक है, इसलिए इसे जमीन पर रखना उनका अनादर माना जाता है। वैज्ञानिक रूप से भी, इसे लगातार उठाए रखने से रीढ़ की हड्डी सीधी रहती है जिससे थकान कम होती है। यदि अनजाने में निशान जमीन से छू जाए, तो घबराएं नहीं। तुरंत बाबा से मन ही मन क्षमा याचना मांगें, निशान को गंगाजल से शुद्ध करें और “जय श्री श्याम” का जयकार लगाकर यात्रा आगे बढ़ाएं।

रात में निशान यात्रा करने के क्या नियम हैं और क्या यह सुरक्षित है?

रींगस से खाटू धाम के बीच रात में निशान यात्रा करना शत-प्रतिशत सुरक्षित और बेहद सुखद है। रात के समय धूप न होने से शरीर जल्दी डिहाइड्रेट नहीं होता। मेले के दौरान पूरे रास्ते में हाई-मास्ट लाइटें, सीसीटीवी कैमरे, पुलिस बल और रातभर सेवा शिविर (भंडारे) खुले रहते हैं। नियम के तौर पर रात की यात्रा में भी संकीर्तन करते हुए निरंतर आगे बढ़ना चाहिए और रास्तों की सुरक्षा गाइडलाइंस का पालन करना चाहिए।

चांदी के निशान की कीमत क्या है?

रींगस के बाजारों में सामान्य कपड़े के अलावा चांदी के विशेष निशान भी मिलते हैं। हल्के चांदी की परत वाले या छोटे निशान ₹1,200 से ₹3,000 के बीच आसानी से मिल जाते हैं। वहीं, शुद्ध बीआईएस हॉलमार्क (Pure Silver) वाले प्रीमियम डिजाइन के बड़े निशान धातु के वजन और बनावट के अनुसार ₹4,000 से ₹15,000 या उससे अधिक के बजट में आते हैं।

निशान चढ़ाने के बाद उस झंडे का क्या होता है?

मंदिर में चढ़ाए गए लाखों निशानों के प्रबंधन के लिए श्री श्याम मंदिर कमेटी की सुव्यवस्थित व्यवस्था है। निशानों से बांस, लकड़ी या लोहे की छड़ें अलग की जाती हैं, जिनका उपयोग मंदिर की बैरिकेडिंग या भंडारों में ईंधन के रूप में होता है। पवित्र कपड़ों को बेहद सम्मानपूर्वक इकट्ठा करके उनसे मंदिर की पोटली या स्मृति चिन्ह तैयार किए जाते हैं, अथवा हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार उन्हें आदरपूर्वक भू-विसर्जन या जल-विसर्जन कर दिया जाता है।

क्या निशान को मंदिर में छुआकर घर वापस ला सकते हैं?

रींगस से जो निशान आप मन्नत या बाबा के नाम का संकल्प लेकर उठाते हैं, उसे अनिवार्य रूप से मंदिर में ही अर्पित (दान) करना होता है, उसे घर वापस नहीं ला सकते। यदि आप घर के लिए निशान चाहते हैं, तो बाजार से एक अतिरिक्त (दूसरा) निशान खरीदें। अपनी यात्रा पूरी होने पर उस दूसरे निशान को मुख्य मंदिर में बाबा के चरणों से स्पर्श (छुआकर) करवाएं और उसे आशीर्वाद स्वरूप अपने घर के मंदिर या छत पर लगाने के लिए वापस ला सकते हैं।

रींगस में फ्री निशान पूजा की थाली कहाँ मिलती है?

रींगस रेलवे स्टेशन से लेकर खाटू मार्ग पर बने विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के बड़े सेवा शिविरों (भंडारों) में भक्तों के लिए निशान पूजन की थाली (रोली, चावल, इत्र और जोत) पूरी तरह से निःशुल्क (फ्री) उपलब्ध कराई जाती है। इसके अलावा, रींगस बाजार की दुकानों पर पैकेज सिस्टम चलता है, जहाँ यदि आप उनसे निशान खरीदते हैं, तो वे निशान पूजन की सेवा अपनी तरफ से मुफ्त में शामिल कर देते हैं।

सफेद रंग के निशान का महत्व और सूरजगढ़ के निशान का इतिहास क्या है?

झुंझुनू जिले के सूरजगढ़ से आने वाला सफेद निशान खाटू धाम का सबसे प्राचीन निशान माना जाता है, जिसकी परंपरा 350 से अधिक वर्षों से चली आ रही है। सफेद रंग सत्य, शांति और पूर्ण आत्मसमर्पण का प्रतीक है। खाटू धाम का यह कड़ा नियम है कि फाल्गुन मेले की द्वादशी को जब तक सूरजगढ़ का यह ऐतिहासिक सफेद निशान मुख्य मंदिर के शिखर (गुंबद) पर नहीं चढ़ाया जाता, तब तक मेले की पूर्ण आहुति नहीं मानी जाती।

खाटू श्याम जी का पहला निशान किसने चढ़ाया था? जानें मोरछड़ी छूते ही सरकारी ताला टूटने का वो ऐतिहासिक सच!

खाटू श्याम जी का पहला निशान आज से करीब 381 वर्ष पहले खंडेला (सीकर) के परम भक्त श्री तुलछाराम जी इंदौरिया ने चढ़ाया था। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, उन्होंने खंडेला से खाटू धाम तक पहली बार नंगे पैर पदयात्रा कर बाबा के चरणों में ध्वज अर्पित किया था। इसके बाद तुलछाराम जी सूरजगढ़ आ गए और यहीं से ‘सूरजगढ़ निशान यात्रा’ के स्वर्णिम इतिहास की शुरुआत हुई। इस परंपरा को सबसे बड़ा ऐतिहासिक गौरव ब्रिटिश काल में मिला, जब अंग्रेजों ने भीड़ और सुरक्षा का हवाला देकर खाटू श्याम मंदिर के द्वारों पर सरकारी ताला लगवा दिया था। तब सूरजगढ़ के परम भक्त श्री मंगलाराम जी अपने हाथ में पवित्र सफेद निशान लेकर पैदल खाटू धाम पहुंचे और बाबा का जयकारा लगाते हुए जैसे ही अपनी मोरछड़ी ताले पर छुआई, वह भारी-भरकम ताला स्वतः ही टूटकर गिर गया। इस अद्भुत चमत्कार के आगे ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा। इसी महान इतिहास के कारण आज भी यह स्थाई नियम है कि हर साल फाल्गुन मेले की मुख्य द्वादशी को सबसे पहले सूरजगढ़ का प्राचीन सफेद निशान ही मुख्य मंदिर के शिखर (गुंबद) पर चढ़ाया जाता है, जो सालभर वहां लहराता रहता है।

निशान हाथ में, बाबा साथ में।”

हाथों में उठाकर श्याम नाम का पवित्र निशान, रींगस से खाटू धाम की ओर निकल पड़े हैं श्याम के दीवाने। पैरों के छालों का अब कोई दर्द नहीं, क्योंकि दिल में बस बाबा श्याम का अटूट विश्वास है। कलयुग के अवतारी, हारे के सहारे के चरणों में शीश नवाने की ऐसी लगन लगी है कि हर मुश्किल राह आसान हो गई है। बोलो जय श्री श्याम, खाटू नरेश की जय!

निशान यात्रा पदयात्रियों के लिए भावुक और दिल को छूने वाली शायरी (Emotional & Devotional)

“पैरों में भले ही छाले हों, पर चेहरे पर मुस्कान होती है,जब खाटू की गलियों में, श्याम भक्तों की निशान यात्रा होती है।”

“हारे का सहारा है वो, हर डूबती कश्ती का किनारा है वो,उठा लो निशान बाबा का, क्योंकि कलयुग का राजा हमारा है वो।”

“रास्ता कितना भी लंबा हो, श्याम प्रेमी थकते नहीं,हाथ में थामकर निशान, वो किसी के आगे झुकते नहीं।”

रींगस से खाटू श्याम जी निशान यात्रा कोट्स

“ना किसी के आगे झुकते हैं, ना राहों में हम रुकते हैं,हाथ में लेकर श्याम का निशान, हम तो शान से खाटू चलते हैं।”

“दुनिया के आगे जो हार जाते हैं, वो बाबा के दर पर आते हैं,उठाकर हाथों में श्याम का निशान, अपनी सोई किस्मत जगाते हैं।

“रींगस की वो पावन धरा, और भक्तों की वो कतार,हाथ में बाबा का निशान हो, तो मिल जाता है सारा संसार।”

“पैरों के छाले भी रो पड़े यह देखकर,कि भक्त श्याम के निशान को सीने से लगाए नाच रहे हैं।”

“ना थके हैं पैर कभी, ना ही हिम्मत हारी है,हाथ में थामकर निशान, अबकी बार खाटू जाने की बारी है।

खाटू श्याम जी के निशान के रंगों का महत्व (Khatu Shyam Nishan Colors Meaning)

• केसरिया/नारंगी और लाल रंग: यह बाबा श्याम के प्रति अटूट भक्ति, वैराग्य और शौर्य का प्रतीक है। महाभारत काल में वीर बर्बरीक के महान बलिदान और त्याग की याद दिलाने के कारण इसे सबसे उत्तम माना जाता है।

नीला रंग: श्याम बाबा को ‘नीले घोड़े का सवार’ कहा जाता है। नीले रंग का निशान चढ़ाना बाबा के प्रिय स्वरूप से सीधे जुड़ने और उनके प्रति पूर्ण समर्पण को दर्शाता है।

• सफेद रंग: यह शांति, पवित्रता और आत्मशुद्धि का प्रतीक है। जब भक्त अहंकार छोड़ निश्छल मन से बाबा की शरण में आता है, तब सफेद निशान चढ़ाया जाता है।

• पीला रंग: यह ज्ञान, समृद्धि और मंगल का प्रतीक है, जो जीवन में खुशहाली की प्रार्थना के लिए अर्पित होता है।

शास्त्रों के अनुसार, पंचरंगे (पांच रंग) के बजाय किसी भी एक शुद्ध रंग का निशान चढ़ाना सबसे फलदायी माना जाता है।

खाटू श्याम जी को किस रंग का।निशान चढ़ाने से क्या फल मिलता है?

खाटू श्याम जी को विभिन्न रंगों के निशान अर्पित करने से विशेष फलों की प्राप्ति होती है। जहाँ केसरिया या लाल निशान चढ़ाने से साहस मिलता है और अटकी मन्नतें पूरी होती हैं, वहीं नीला निशान जीवन के संकटों से मुक्ति दिलाकर बाबा की विशेष कृपा बरसाता है। मानसिक शांति, आत्मशुद्धि और अहंकार के नाश के लिए सफेद निशान अर्पित किया जाता है, जबकि पीला निशान घर में सुख-समृद्धि, खुशहाली और व्यापार में वृद्धि लेकर आता है। ध्यान रखें कि हमेशा पंचरंगे के बजाय एक ही शुद्ध रंग का निशान चढ़ाना सबसे फलदायी होता है।

रात में खाटू श्याम निशान यात्रा करने के नियम और सुरक्षा

जरूरी नियम और मर्यादा : हाथ में उठाया गया पवित्र निशान कभी भी जमीन से नहीं छूना चाहिए। आराम करते समय इसे ऊंचे स्टैंड पर रखें। निशान हाथ में होने पर खाने-पीने से बचें और पूरी सात्विकता के साथ ‘जय श्री श्याम’ का जाप करते रहें। ध्यान रहे, परिवार में सूतक-पातक होने पर निशान उठाना वर्जित है।

दुर्घटनाओं और जंगली जानवरों से बचने के लिए हमेशा मुख्य पैदल मार्ग (पेडेस्ट्रियन कॉरिडोर) पर ही चलें और शॉर्टकट रास्तों से बचें। रात में वाहनों को दूर से दिखने के लिए कपड़ों या बैग पर रिफ्लेक्टिव बैंड जरूर लगाएं। हमेशा समूह में ही चलें।

मन्नत पूरी होने पर या नई मन्नत मांगने के लिए कौन सा निशान चढ़ाना चाहिए

मन्नत पूरी होने या नई मन्नत मांगने के लिए सबसे उत्तम केसरिया या लाल रंग का निशान माना जाता है। यह रंग वीर बर्बरीक के महान त्याग और शौर्य का प्रतीक है, जो बाबा श्याम को अत्यधिक प्रिय है।इसके अलावा, यदि आप विशेष रूप से संकटों से मुक्ति की मन्नत मांग रहे हैं, तो बाबा के नीले घोड़े के प्रतीक स्वरूप ‘नीला निशान’ चढ़ाना भी बेहद फलदायी और शुभ होता है।

पंचरंगा निशान चढ़ाना सही है या गलत?

खाटू श्याम जी की यात्रा में कई भक्त अपनी अज्ञानता के कारण पांच रंगों वाला (पंचरंगा) निशान उठा लेते हैं, जिसे शास्त्रों और मंदिर के नियमों के अनुसार सही नहीं माना जाता है। मान्यता है कि पंचरंगा ध्वज धार्मिक रूप से अन्य देवी-देवताओं या विशिष्ट अनुष्ठानों के लिए होता है। बाबा श्याम को प्रसन्न करने के लिए हमेशा किसी भी एक शुद्ध रंग (जैसे विशेष रूप से केसरिया, लाल या नीला) का ही एकल निशान चढ़ाना सबसे फलदायी और उत्तम माना जाता है।

रींगस प्राचीन श्याम मंदिर निशान पूजा विधि

रींगस स्थित 400 साल पुराने प्राचीन श्याम मंदिर से निशान यात्रा की प्रामाणिक शुरुआत सही पूजा विधि के साथ होती है। भक्त सबसे पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और अपने निशान पर सूखा नारियल, मिश्री का पैकेट व मोरपंख पवित्र मौली से बांधते हैं। इसके बाद मुख्य पुजारी से निशान का पूजन करवाकर कुमकुम-अक्षत से तिलक लगाया जाता है और बाबा के सामने मनोकामना का संकल्प लिया जाता है। अंत में धूप-आरती उतारकर, “जय श्री श्याम” के जयकारे के साथ निशान को दाहिने हाथ में थामकर बिना जमीन पर छुए यात्रा शुरू की जाती है।

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