घेवर माता का इतिहास और राजसमंद झील निर्माण की चमत्कारी कहानी जानें। जानिए क्यों इन्हें राजस्थान की एकमात्र बिना पति के सती होने वाली लोक देवी कहा जाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background)
इस मंदिर का इतिहास मेवाड़ के महाराणा राजसिंह (Maharana Rajsingh of Mewar) के काल से जुड़ा है। सन 1662 में महाराणा राजसिंह ने अकाल राहत कार्यों (Famine Relief Works) के तहत और गोमती नदी के पानी को रोकने के लिए एक विशाल झील के निर्माण का संकल्प लिया, जिसे आज हम राजसमंद झील के नाम से जानते हैं।
राजसमंद झील की पाल रात में क्यों टूट जाती थी?
कहा जाता है कि महाराणा के शिल्पी (Architects) और कारीगर दिनभर झील की पाल (Embankment) का निर्माण करते थे, लेकिन रात होते ही वह पाल अपने आप ढह जाती थी। कई प्रयासों के बाद भी जब सफलता नहीं मिली, तो तांत्रिकों और ज्योतिषियों (Astrologers) से इसका समाधान पूछा गया।
ज्योतिषियों ने बताया कि इस झील का निर्माण तभी पूरा हो सकता है, जब कोई ऐसी पवित्र स्त्री इसकी पहली नींव (Foundation Stone) रखे जिसके बाएँ गाल पर आँख के नीचे कुदरती तिल (Natural Mole) हो और वह स्त्री ‘माली’ (Gardener) जाति की हो।
घेवर बाई की खोज और त्याग । बिना पति के सती होने वाली देवी
महाराणा राजसिंह ने पूरे राजपूताना और मालवा साम्राज्य में ऐसी कन्या की खोज करवाई। अंततः मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र से घेवर बाई नाम की कन्या मिली, जिसमें ये सभी लक्षण मौजूद थे।
घेवर बाई को आदरपूर्वक मेवाड़ लाया गया। उन्होंने लोक कल्याण (Public Welfare) की भावना से प्रेरित होकर अपने हाथों से राजसमंद झील की पाल की पहली नींव रखी। इसके तुरंत बाद, उन्होंने प्रजा के हित के लिए जीवित सती (Living Sati) होने का निर्णय लिया। घेवर बाई अविवाहित थीं, इसलिए वे बिना पति के ही इस पवित्र स्थान पर चिता पर बैठ गईं।
घेवर माता का मंदिर कहाँ है ?
घेवर बाई के सती होने के बाद, राजसमंद झील की पाल का निर्माण बिना किसी बाधा के सफलतापूर्वक पूरा हो गया। महाराणा राजसिंह ने घेवर बाई के इस महान त्याग और भक्ति का सम्मान करने के लिए उसी स्थान पर एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया, जिसे आज घेवर माता मंदिर के नाम से जाना जाता है।
वास्तुकला (Architecture): यह मंदिर राजसमंद झील की ‘नौचौकी पाल’ (Nauchoki Pal) के पास स्थित है। मंदिर की नक्काशी (Carvings) और प्रतिहार कालीन शैली की झलक पर्यटकों को आकर्षित करती है।
धार्मिक महत्व (Religious Significance): स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के बीच घेवर माता के प्रति गहरी आस्था (Deep Faith) है। लोग यहाँ आकर अपनी मन्नतें (Wishes) मांगते हैं।
राजसमंद झील की नौचौकी पाल कैसे पहुँचें?
राजसमंद झील की नौचौकी पाल पहुँचने के लिए सबसे अच्छा विकल्प सड़क मार्ग है। यह स्थान राष्ट्रीय राजमार्ग 8 (NH 8) से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। यदि आप फ्लाइट से आ रहे हैं, तो निकटतम हवाई अड्डा उदयपुर का महाराणा प्रताप एयरपोर्ट (डबोक) है, जो यहाँ से करीब 75 किलोमीटर दूर है। ट्रेन के माध्यम से आने के लिए उदयपुर सिटी रेलवे स्टेशन सबसे पास है, जहाँ से कैब या बस द्वारा करीब 68 किलोमीटर की दूरी तय करके नौचौकी पाल आसानी से पहुँचा जा सकता है। राजसमंद बस स्टैंड से मुख्य पाल के लिए स्थानीय ऑटो और ई-रिक्शा भी हर समय उपलब्ध रहते हैं।
घेवर माता मंदिर के खुलने और बंद होने का समय (Timings) क्या है?
राजसमंद झील किनारे स्थित घेवर माता मंदिर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के दर्शन के लिए सप्ताह के सातों दिन खुला रहता है। इस मंदिर के नियमित खुलने का समय सुबह 06:00 बजे से शाम 06:00 बजे तक निर्धारित है। माता की मंगला आरती सुबह के समय और संध्या आरती सूर्यास्त के समय होती है, जिसमें शामिल होना अत्यंत शुभ माना जाता है। वैसे तो यहाँ सालभर श्रद्धालु आते हैं, लेकिन शुक्रवार की दोपहर और रविवार की सुबह यहाँ सामान्य दिनों की तुलना में अधिक चहल-पहल और भीड़ देखने को मिलती है। नवरात्रि के दौरान यहाँ विशेष उत्सव मनाया जाता है।
उदयपुर से घेवर माता मंदिर की दूरी कितनी है?
लेक सिटी उदयपुर से घेवर माता मंदिर की कुल दूरी लगभग 67 किलोमीटर है। उदयपुर शहर से राष्ट्रीय राजमार्ग 8 (NH 8) के रास्ते कार, टैक्सी या राज्य परिवहन (RSRTC) की बसों द्वारा राजसमंद तक का सफर आसानी से तय किया जा सकता है। सामान्य यातायात (Traffic) की स्थिति में उदयपुर से गाड़ी द्वारा इस मंदिर तक पहुँचने में लगभग 1 घंटे 30 मिनट से 2 घंटे का समय लगता है। यह सड़क मार्ग बेहद सुगम और चारों तरफ अरावली की पहाड़ियों से घिरे होने के कारण काफी सुंदर व मनोरम है।
घेवर माता मंदिर के पास स्थित अन्य पर्यटन स्थल (जैसे द्वारकाधीश मंदिर, अंबा माता मंदिर)
घेवर माता मंदिर के ठीक पास दस भुजाओं वाली अम्बा माता का मंदिर स्थित है, जो दोनों एक ही परिसर का हिस्सा हैं। इसके अलावा, राजसमंद झील के ठीक दूसरी तरफ कांकरोली में भगवान कृष्ण को समर्पित प्रसिद्ध श्री द्वारकाधीश मंदिर है, जहाँ से झील का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। यहाँ की नौचौकी पाल स्वयं अपनी बेहतरीन संगमरमर की कलाकृति, उत्कृष्ट नक्काशीदार छतरियों और मेवाड़ के इतिहास को दर्शाते शिलालेखों के लिए प्रसिद्ध है। थोड़ी दूरी पर ऐतिहासिक राजनगर का चारभुजा मंदिर भी दर्शन के लिए एक प्रमुख स्थान है।
घेवर माता का मंदिर कहाँ है (Ghevar Mata Temple Location)?
अम्बे माता – घेवर माता मंदिर मुख्य रूप से राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित है। यह पवित्र मंदिर राजसमंद शहर के पास बनी सुप्रसिद्ध और ऐतिहासिक राजसमंद झील की मुख्य पाल (बांध के किनारे) पर स्थापित है। भौगोलिक दृष्टि से यह स्थान राजस्थान के दक्षिणी हिस्से (मेवाड़ क्षेत्र) में आता है। यह एक शांत और सुरम्य पहाड़ी की तलहटी में बना हुआ है, जहाँ मंदिर के सामने झील का विशाल जलक्षेत्र दिखाई देता है। स्थानीय प्रशासन और धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर यह स्थान राजसमंद जिला मुख्यालय का सबसे प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है।
घेवर माता कहाँ की रहने वाली थीं?
काफी खोजबीन करने के बाद, यह विशेष तिल और गुण राजपूताना में कहीं नहीं मिले। अंततः राजा के दूतों को मालवा, मध्य प्रदेश में एक कन्या मिली जिसका नाम घेवर बाई था। उनके चेहरे पर ठीक वही निशान था जो ज्योतिषियों ने बताया था। महाराणा राजसिंह ने उन्हें पूरे सम्मान के साथ ससम्मान मेवाड़ (राजसमंद) आमंत्रित किया।
घेवर माता को राजस्थान की अनूठी लोक देवी क्यों माना जाता है?
घेवर माता राजस्थान की एकमात्र ऐसी लोक देवी हैं जो बिना पति के (कुंवारी अवस्था में) सती हुई थीं। उन्होंने किसी विवाह के बिना, केवल लोक कल्याण और राजसमंद झील के निर्माण को सफल बनाने के लिए जीवित सती होने का निर्णय लिया था।
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