घटोत्कच-मोरवी विवाह का रहस्य, वो अनोखी पहेली और इसके पीछे छिपी भगवान श्रीकृष्ण की मंशा। जानिए कैसे श्रीकृष्ण की दूरगामी रणनीति से वीर बर्बरीक का जन्म हुआ।
मोरवी की कठिन प्रतिज्ञा (The Vow)
अपने राज्य और पराक्रम की रक्षा के लिए मोरवी ने एक बेहद कठिन प्रण ले रखा था। उसने घोषणा की थी कि जो भी पुरुष उसे बाहुबल (युद्ध) और बुद्धि (शास्त्रार्थ) दोनों में परास्त करेगा, वह उसी से विवाह करेगी। यदि कोई असफल रहता, तो उसे अपने प्राण गंवाने पड़ते थे। उसके महल के द्वार पर उन योद्धाओं की मुंडमालाएं लटकी थीं जो परीक्षा में असफल होकर मारे गए थे।
घटोत्कच और मोरवी की बुद्धि परीक्षा: वो गुप्त पहेली और घटोत्कच-मोरवी विवाह
मायावी अस्त्रों के भयंकर युद्ध के बाद, जब राजकुमारी मोरवी घटोत्कच के बाहुबल को देखकर चकित रह गई, तब उसने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार शास्त्रार्थ (बुद्धि की परीक्षा) शुरू की। मोरवी अपनी राजसभा के ऊंचे सिंहासन पर बैठी और गर्व से मुस्कुराते हुए बोली।
- राजकुमारी मोरवी: “हे घटोत्कच! तुमने युद्ध के मैदान में अपनी शक्ति तो सिद्ध कर दी, लेकिन मेरे स्वामी बनने के लिए तुम्हें बुद्धि के रणक्षेत्र में भी जीतना होगा। यदि तुम मेरे इस एक प्रश्न (पहेली) का उत्तर शास्त्रों के अनुसार सही-सही दे पाए, तभी यह विवाह संभव है। अन्यथा तुम्हें बंदी बना लिया जाएगा।”
महाबली घटोत्कच: (हाथ जोड़कर, शांत भाव से) “हे देवी! आपकी यह चुनौती मुझे स्वीकार है। मेरे पथ-प्रदर्शक स्वयं भगवान जनार्दन (श्रीकृष्ण) हैं, इसलिए आप निसंकोच अपना प्रश्न पूछिए।”
राजकुमारी मोरवी: (गंभीर स्वर में पहेली पूछते हुए) “तो सुनो घटोत्कच! एक कामुक व्यक्ति एक वेश्या के जाल में फंस जाता है और उनके अनैतिक संबंधों से एक पुत्री का जन्म होता है। समाज के डर से वह वेश्या उस नवजात बच्ची को छोड़कर कहीं भाग जाती है। वह कामुक व्यक्ति उस अनाथ बच्ची का पालन-पोषण करता है, लेकिन समाज के सामने झूठ बोल देता है कि यह उसके मृत पड़ोसी की बेटी है। जब वह लड़की बड़ी होकर अत्यंत रूपवती हो जाती है, तो वही व्यक्ति कामवासना के वश में आकर (यह जानते हुए भी कि वह उसकी अपनी ही खून है) उससे शारीरिक संबंध बना लेता है। उन दोनों के इस संबंध से एक और बालिका का जन्म होता है। अब बताओ घटोत्कच, शास्त्रों के नियमों के अनुसार वह नवजात बालिका उस व्यक्ति की पुत्री कहलाएगी या नातिन (दौहित्री)?”
घटोत्कच ने एक क्षण के लिए आंखें बंद कीं और द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया। प्रभु की कृपा से उसके मन में ज्ञान की ज्योति जली और उसने मुस्कुराते हुए उत्तर देना शुरू किया।
महाबली घटोत्कच: “हे राजकुमारी! आपका यह प्रश्न जितना उलझा हुआ दिखाई देता है, शास्त्रों के अनुसार इसका उत्तर उतना ही सीधा और स्पष्ट है। आपने पूछा कि वह नवजात बालिका उस पुरुष की पुत्री कहलाएगी या नातिन? मेरा उत्तर है—वह दोनों में से कुछ भी नहीं कहलाएगी! शास्त्रों के अनुसार उस बालिका का उस पुरुष से कोई पवित्र या वैध संबंध बनता ही नहीं है।”
राजकुमारी मोरवी: (हैरान होते हुए) “यह कैसे संभव है घटोत्कच? वह बालिका उसी पुरुष के वीर्य और खून से जन्मी है, तो उसका संबंध कैसे नहीं हुआ? अपने उत्तर को सिद्ध करो!”
महाबली घटोत्कच: “देवी! सनातन धर्म और शास्त्रों के अनुसार, किसी भी संतान का माता या पिता से पवित्र संबंध तभी स्थापित होता है जब वह संबंध ‘धर्म और विधि’ (विवाह) के नियमों के अधीन बना हो। उस पुरुष ने न तो उस वेश्या से धर्म सम्मत विवाह किया था और न ही अपनी उस अभागिन पुत्री से। अधर्म, पाप और घोर वासना के दलदल से उत्पन्न हुई संतान केवल और केवल ‘पाप की छाया’ होती है। ऐसी संतान का उस पुरुष से न तो पुत्री का नाता हो सकता है और न ही नातिन का। वह पूरी तरह शास्त्र विहीन और संबंध विहीन है।”
घटोत्कच का यह अकाट्य और शास्त्र सम्मत उत्तर सुनते ही पूरी सभा ‘साधु-साधु’ के जयकारों से गूंज उठी। राजकुमारी मोरवी का सारा अहंकार पल भर में चूर-चूर हो गया। वह समझ गई कि घटोत्कच के पीछे साक्षात नारायण की बुद्धि काम कर रही है। वह अपने सिंहासन से उतरी और अत्यंत आदर के साथ घटोत्कच के सामने आकर खड़ी हो गई।
राजकुमारी मोरवी: (विनम्रता से सिर झुकाकर) “हे भीम पुत्र! आप न केवल महाबली हैं बल्कि परम ज्ञानी भी हैं। मैं अपनी हार स्वीकार करती हूँ और आपको अपना स्वामी मानती हूँ।”
श्रीकृष्ण ने घटोत्कच को मोरवी से शादी करने की आज्ञा क्यों दी
भगवान श्रीकृष्ण ने घटोत्कच को मोरवी से विवाह करने की आज्ञा एक दिव्य और दूरगामी महा-रणनीति के तहत दी थी। श्रीकृष्ण भली-भांति जानते थे कि भविष्य में होने वाले महाभारत के महायुद्ध को संतुलित करने और आगे चलकर कलयुग के उद्धार के लिए ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली योद्धा की आवश्यकता होगी।
घटोत्कच स्वयं महाबली भीम और मायावी असुर माता हिडिंबा के परम प्रतापी पुत्र (असुर अंश) थे। वहीं, राजकुमारी मोरवी (अहिलावती) दिव्य विद्याओं और तंत्र-मंत्र की परम ज्ञाता एक महामायाविनी नागकन्या थी। श्रीकृष्ण की मंशा थी कि इन दो असाधारण और अद्वितीय शक्तियों के महामिलन से एक ऐसा अजेय वीर अवतरित हो, जो धर्म की रक्षा कर सके। इसी दिव्य योजना के फलस्वरूप वीर बर्बरीक (खाटू श्याम जी) का जन्म हुआ, जो आगे चलकर कलयुग में ‘हारे का सहारा’ कहलाए।
श्रीकृष्ण और मोरवी का युद्ध क्यों हुआ था?”
h
क्या घटोत्कच और मोरवी (अहिलावती) के विवाह के समय पांडव उपस्थित थे?
पौराणिक कथाओं और बी.आर. चोपड़ा की महाभारत के दृश्यों के अनुसार, घटोत्कच और मोरवी का विवाह इंद्रप्रस्थ में आयोजित किया गया था। इस विवाह में भगवान श्रीकृष्ण के साथ-साथ माता कुंती और सभी पांडव (युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव) साक्षात उपस्थित थे। सभी ने मिलकर घटोत्कच और नई बहू मोरवी को आशीर्वाद दिया था।
वन में दादी हिडिंबा द्वारा बहू मोरवी के स्वागत (आरती उतारने) का क्या प्रसंग है?
विवाह संपन्न होने के बाद, घटोत्कच अपनी नई नवेली दुल्हन मोरवी को लेकर वन में अपनी माता हिडिंबा के पास पहुंचते हैंऔर कहते हैं, “माता श्री, मैं आपके लिए आपकी बहू लाया हूँ”, तब हिडिंबा बेहद भावुक होकर मोरवी को गले लगा लेती हैं और कहती हैं कि “अगर केशव (श्रीकृष्ण) ने तुम्हारे लिए किसी कन्या को चुना है, तो वह जरूर चांद का टुकड़ा होगी।” इस मिलन के बाद वन में अकेले रह रही हिडिंबा का अकेलापन दूर हो जाता है।
श्रीकृष्ण ने घटोत्कच और मोरवी के विवाह के पीछे क्या उद्देश्य बताया था?
यह विवाह किसी कहानी का अंत नहीं, बल्कि एक नए अध्याय का प्रारंभ है। महाबली घटोत्कच और महामायाविनी मोरवी का यह मिलन कुरुक्षेत्र के युद्ध की परछाइयों को बदलने और संसार के सबसे शक्तिशाली बालक वीर बर्बरीक (खाटू श्याम जी) को अवतरित करने के लिए बेहद आवश्यक था।


