खाटू श्याम जी का सांवला रंग क्यों है? जानिए बर्बरीक सांवले कैसे हुए और उनका नाम श्याम कैसे पड़ा। श्री कृष्ण के उस वरदान की अनसुनी कहानी जो बहुत कम लोग जानते हैं!
बर्बरीक का जन्म और शीश का दान
बर्बरीक महाबली भीम के पोते और घटोत्कच के पुत्र थे। जन्म से ही वे बहुत तेजस्वी थे और उनके बाल शेर की तरह घने थे। उन्होंने देवी आदिशक्ति की तपस्या करके तीन अमोघ बाण प्राप्त किए थे, जिससे वे पल भर में पूरा युद्ध खत्म कर सकते थे। जब महाभारत का युद्ध शुरू हुआ, तो वे अपनी माता को दिए वचन के कारण हारने वाले का साथ देने निकल पड़े। लेकिन भगवान श्री कृष्ण जानते थे कि अगर बर्बरीक युद्ध में उतरे, तो पांडवों की हार निश्चित है। इसलिए कृष्ण ने एक ब्राह्मण का रूप धरकर बर्बरीक से उनका शीश दान में मांग लिया। धर्म की रक्षा के लिए बर्बरीक ने हंसते-हंसते अपना सिर काट कर दान कर दिया। इसी कारण उन्हें शीश के दानी भी कहा जाता है।”
बर्बरीक सांवले कैसे हुए? गोरे से ‘श्यामल’ होने का रहस्य
बर्बरीक के इस परम त्याग से भगवान श्री कृष्ण अत्यंत भावुक और प्रसन्न हो गए। श्री कृष्ण ने बर्बरीक के कटे हुए शीश को अपने हाथों में उठाया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जैसे ही श्री कृष्ण ने बर्बरीक के शीश को स्पर्श किया, एक अद्भुत दिव्य घटना घटी:
श्री कृष्ण के तेज का समाहित होना: श्री कृष्ण का अपना रंग ‘श्यामल’ (सांवला) था, जिसे शास्त्रों में ‘घनश्याम’ (बादल जैसा सांवला) कहा गया है। जब कृष्ण ने बर्बरीक के शीश को चूमा और आशीर्वाद दिया, तो श्री कृष्ण के दिव्य शरीर का सांवला तेज बर्बरीक के चेहरे पर फैल गया।
रूप परिवर्तन: भगवान का स्पर्श पाते ही बर्बरीक का गोरा रंग पूरी तरह से बदलकर श्री कृष्ण के रंग जैसा सांवला (श्यामल) हो गया।
‘श्याम’ नाम का वरदान: श्री कृष्ण ने बर्बरीक से कहा, “हे बर्बरीक! तुमने धर्म की रक्षा के लिए अपने शीश का दान दिया है। कलयुग में तुम मेरे सांवले रूप और मेरे सबसे प्रिय नाम ‘श्याम’ से पूजे जाओगे। जो भी भक्त सच्चे मन से तुम्हारा नाम लेगा, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी।”
यही कारण है कि आज कलयुग में उन्हें खाटू श्याम कहा जाता है और खाटू श्याम जी का सांवला रंग क्यों है, इसका सीधा संबंध श्री कृष्ण के इसी वरदान और स्पर्श से है।
खाटू श्याम जी की मूर्ति (विग्रह) सांवली क्यों है?
पौराणिक कथा के अनुसार, जब श्री कृष्ण ने बर्बरीक के कटे हुए शीश को अपने हाथों में उठाया, तो भगवान के शरीर का दिव्य ‘श्यामल तेज’ बर्बरीक के शीश में समा गया। इसी कारण उनका रंग सांवला हो गया और आज खाटू धाम में उनके सांवले रूप की पूजा होती है।
बर्बरीक का नाम श्याम कैसे पड़ा
महाभारत युद्ध से पहले, भीम के पौत्र बर्बरीक ने भगवान श्री कृष्ण को ब्राह्मण रूप में देखकर खुशी-खुशी अपने शीश (सिर) का दान दे दिया। इस महान त्याग से प्रसन्न होकर श्री कृष्ण ने उनके कटे शीश को गले लगाया और वरदान दिया, “कलयुग में तुम मेरे ही सांवले रूप में पूजे जाओगे और संसार तुम्हें मेरे सबसे प्रिय नाम ‘श्याम’ से जानेगा।” चूंकि उन्होंने माता को हारे हुए का साथ देने का वचन दिया था, इसलिए कृष्ण ने उन्हें ‘हारे का सहारा’ नाम भी दिया। यही कारण है कि आज उन्हें खाटू श्याम जी कहा जाता है।
बर्बरीक का असली रूप क्या था
महाभारत काल में पांडव भीम के पोते और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक जन्म से ही बहुत असाधारण थे। जन्म के समय उनका शारीरिक रंग बहुत साफ और बिल्कुल गोरा था, और उनके सिर पर बब्बर शेर की तरह घने व घुंघराले बाल थे, जिसके कारण उनका नाम ‘बर्बरीक’ पड़ा। वे बचपन से ही एक अजेय योद्धा थे, जिन्होंने अपनी माता अहिलावती से अद्भुत युद्ध कला सीखी थी। उनकी शक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने भगवान शिव और नवदुर्गा की कठिन तपस्या करके तीन ऐसे चमत्कारी बाण प्राप्त किए थे, जो पूरी दुनिया की सेना को पल भर में समाप्त कर सकते थे। इसी दिव्य और पराक्रमी रूप के कारण उन्हें ‘तीन बाण धारी’ के नाम से भी जाना जाता था।
बर्बरीक सांवले कैसे हुए? गोरे जन्म से अत्यंत गोरे बर्बरीक का रूप श्री कृष्ण के स्पर्श और वरदान से सांवला (श्यामल) हुआ. जब उन्होंने अपना शीश दान किया, तो भगवान कृष्ण ने प्रसन्न होकर अपना दिव्य रूप, रंग और ‘श्याम’ नाम उन्हें सौंप दिया. यही खाटू श्याम जी के सांवले रूप का असली रहस्य है.



