क्या थी बाबा रामदेव जी की ‘दड़ी’ की सच्चाई? जिससे कांप उठा था भैरव राक्षस!

जानिए बाबा रामदेव जी की दड़ी और गेड़ा का ऐतिहासिक महत्व। पोकरण के जंगलों में दड़ी जाने और भैरव राक्षस के वध की प्रामाणिक कथा विस्तार से पढ़ें।

बाबा रामदेव जी की दड़ी क्या है? (दड़ी-गेड़ा का खेल)

राजस्थानी संस्कृति में प्राचीन समय से ही ‘दड़ी-गेड़ा’ खेल का विशेष महत्व रहा है। यह खेल आधुनिक क्रिकेट या हॉकी से मिलता-जुलता एक पारंपरिक खेल है, जिसमें कपड़े या लकड़ी की बनी गेंद (दड़ी) को एक लाठी या बल्ले (गेड़ा) से मारा जाता है।

बाबा रामदेव जी अपने बाल्यकाल में बाड़मेर के शिव तहसील के ऊँडूकासमेर (उनका जन्मस्थान) में अपने मित्रों (सखाओं) के साथ प्रतिदिन दड़ी-गेड़ा खेला करते थे। आज भी ऊँडूकासमेर में वह पावन स्थान ‘दड़ी कुंड’ के नाम से विख्यात है, जहाँ बाबा अपने साथियों संग बाल लीलाएं रचाते थे।

भैरव राक्षस और बाबा रामदेव जी की दड़ी की कथा

पोकरण के जंगलों में दड़ी का जाना : लोक मान्यताओं और हरजी भाटी की वाणियों के अनुसार, जब बाबा रामदेव जी सात वर्ष के थे, तब वे अपने सखाओं के साथ खेल रहे थे। खेलते-खेलते बाबा ने दड़ी को इतनी जोर से मारा कि वह उड़ती हुई मीलों दूर पोकरण के घने जंगलों में जाकर गिर गई।उस समय पोकरण के जंगलों में जाना साक्षात मृत्यु को बुलावा देने जैसा था, क्योंकि वहां भैरव राक्षस का वास था।

भैरव राक्षस का आतंक और गुरु बालीनाथ जी की शरण। : भैरव राक्षस एक क्रूर तांत्रिक था, जिसने अपनी तांत्रिक शक्तियों से पूरे पोकरण क्षेत्र में आतंक मचा रखा था। वह मनुष्यों और पशुओं को मारकर खा जाता था। उसके डर से लोग पोकरण छोड़कर भाग चुके थे।जब बाबा रामदेव जी अपनी दड़ी ढूंढने के बहाने पोकरण के जंगलों में पहुंचे, तो वहां उनकी मुलाकात गुरु बालीनाथ जी से हुई। बालीनाथ जी पोकरण के एक आश्रम में रहते थे और अपनी सिद्धियों से भैरव राक्षस से सुरक्षित थे। बालीनाथ जी ने एक छोटे बालक को अकेले जंगल में देखकर कहा, “बेटा! यहाँ से तुरंत भाग जाओ, यहाँ एक आदमखोर राक्षस रहता है, जो तुम्हें मार डालेगा।”

गुफा में छिपना और राक्षस का आगमन

बाबा रामदेव जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि वे केवल अपनी खेल की दड़ी लेने आए हैं। इसी बीच भैरव राक्षस के आने की आहट सुनाई दी। गुरु बालीनाथ जी ने बालक रामदेव को सुरक्षित रखने के लिए अपने आश्रम की गुफा में छुपा दिया और ऊपर से अपनी दैवीय गुदड़ी (कंबल) ढंक दी।

भैरव राक्षस जब आश्रम आया, तो उसे एक मनुष्य की गंध आई। उसने बालीनाथ जी से पूछा कि यहाँ कौन छिपा है? जब उसने गुफा की ओर बढ़ने का प्रयास किया, तो बाबा रामदेव जी ने गुदड़ी हटाकर साक्षात नारायण के रूप में दर्शन दिए।

भैरव राक्षस का वध (मुक्ति)

बाबा रामदेव जी के अलौकिक तेज को देखकर भैरव राक्षस घबरा गया। वह अपनी जान बचाकर भागने लगा। बाबा रामदेव जी ने अपने धनुष-बाण संभाले और उसका पीछा किया। अंततः, पोकरण की पहाड़ियों में बाबा ने भैरव राक्षस का वध कर दिया। कुछ कथाओं में यह भी माना जाता है कि बाबा ने उसका वध नहीं किया, बल्कि उसे अपनी शक्ति से परास्त कर पाताल लोक भेज दिया और वचन लिया कि वह कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाएगा।

वर्तमान में बाबा रामदेव जी की दड़ी के दर्शन और धार्मिक महत्व

भैरव राक्षस का अंत कर बाबा रामदेव जी ने रूणेचा (रामदेवरा) नगरी बसाई। आज भी मुख्य मंदिर परिसर में पर्चा बावड़ी के पास बाबा की ऐतिहासिक ‘दड़ी’ सुरक्षित है। श्रद्धालु बाबा के जन्मस्थान ऊँडूकासमेर स्थित ‘दड़ी कुंड’ की पवित्र मिट्टी में भी धोक लगाते हैं। भादवा मेले में देश-विदेश से आने वाले लाखों जातरू इस चमत्कारी दड़ी के विशेष दर्शन करते हैं। मान्यता है कि इसके दर्शन मात्र से जीवन के सभी संकट और नकारात्मक शक्तियां दूर हो जाती हैं।

रामदेवरा में बाबा की दड़ी कहाँ रखी है

रामदेवरा (रूणेचा धाम) के मुख्य मंदिर परिसर में बाबा रामदेव जी की ऐतिहासिक दड़ी मुख्य समाधि स्थल के समीप और प्रसिद्ध पर्चा बावड़ी के पास दर्शनार्थ रखी गई है। श्रद्धालु कतार में दर्शन करते समय इस पावन काष्ठ व धागों से निर्मित दड़ी को देख सकते हैं।

पर्चा बावड़ी और दड़ी का संबंध

पर्चा बावड़ी और बाबा रामदेव जी की दड़ी दोनों रामदेवरा के मुख्य चमत्कारों (पर्चों) के प्रतीक हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, बालक रामदेव जी की दड़ी पोकरण के जंगलों में जाने के बाद ही भैरव राक्षस का अंत हुआ था। वर्तमान में रामदेवरा मंदिर परिसर में प्रसिद्ध पर्चा बावड़ी के ठीक समीप ही इस ऐतिहासिक दड़ी को श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ सुरक्षित रखा गया है, जहाँ भक्त दोनों के एक साथ दर्शन करते हैं।

रामदेव जी की दड़ी के दर्शन के नियम/समय

बाबा रामदेव जी की दड़ी के दर्शन का समय रोजाना सुबह 4:00 बजे मंगला आरती से रात 9:00 बजे शयन आरती तक रहता है, जबकि भादवा मेले के दौरान मंदिर 24 घंटे खुला रहता है। श्रद्धालु मंदिर परिसर में पर्चा बावड़ी के पास कतार के नियमों का पालन करते हुए इस पावन दड़ी के दर्शन कर सकते हैं। दर्शन के दौरान स्वच्छता बनाए रखना और फोटो खींचने या मोबाइल का उपयोग न करना अनिवार्य नियम है।

रामदेवरा पर्चा बावड़ी का इतिहास

रामदेवरा की प्रसिद्ध पर्चा बावड़ी का इतिहास बाबा रामदेव जी के अलौकिक चमत्कार से जुड़ा है। जब बाबा ने सेठ बोहिताराज की डूबती व्यापारिक नाव को सुरक्षित बाहर निकाला, तो सेठ ने कृतज्ञता में बाबा के आदेशानुसार यहाँ एक बावड़ी का निर्माण करवाया। मरुभूमि के बीच स्थित इस बावड़ी का जल अत्यंत मीठा और गंगाजल के समान पवित्र है। मान्यता है कि मंदिर के पास स्थित इस पर्चा बावड़ी के चमत्कारी जल में स्नान करने से सभी चर्म रोग और शारीरिक बीमारियां हमेशा के लिए दूर हो जाती हैं।

रामदेव जी की बाल लीला

रामदेव जी की सबसे प्रसिद्ध बाल लीलाओं में माता मैणादे को खौलते दूध को शांत कर साक्षात नारायण रूप में दर्शन देना और दर्जी द्वारा दिए गए कपड़े के टुकड़े से आकाश में उड़ने वाले जादुई कपड़े के घोड़े (कपड़े का घोड़ा) का निर्माण करना शामिल है। इसके अलावा, अपने सखाओं के साथ ऊँडूकासमेर के ‘दड़ी कुंड’ में ‘दड़ी-गेड़ा’ खेलते समय, वे अपनी गेंद ढूंढने के बहाने पोकरण के जंगलों में पहुंचे और वहां अपनी दैवीय शक्ति से अत्याचारी भैरव राक्षस का वध कर जनता को उसके आतंक से मुक्त कराया।

बाबा रामदेव जी की ‘दड़ी’ पर लिखा यह आर्टिकल आपको कैसा लगा? बाबा रामदेव जी रूणेचा की कृपा आप पर बनी रहे ।

रामदेव जी की जय।

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