आवरी माता मंदिर निकुंभ (चित्तौड़गढ़) का इतिहास, रहस्य और लकवा मुक्ति की अनूठी मान्यता के बारे में जानें। यहाँ माँ आवरी के चमत्कार से लकवा के मरीज ठीक होते हैं।
आवरी माता मंदिर निकुंभ का इतिहास (History of Avari Mata Mandir)
आवरी माता मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है। स्थानीय मान्यताओं और लोक कथाओं के अनुसार, इस मंदिर की स्थापना राजा-महाराजाओं के काल में हुई थी। माना जाता है कि माँ आवरी, शक्ति स्वरूपा देवी दुर्गा का ही एक रूप हैं।
कहा जाता है कि पुराने समय में इस घने जंगल वाले क्षेत्र में माता ने अपने एक परम भक्त को दर्शन दिए थे और यहाँ स्थापित होने की इच्छा प्रकट की थी। निकुंभ और चित्तौड़गढ़ के राजवंश भी इस मंदिर के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे। युद्ध पर जाने से पहले या किसी बड़े संकट के समय राजपूत योद्धा माता का आशीर्वाद लेने यहाँ आया करते थे। आज भी इस क्षेत्र के लोगों की माँ आवरी माता में अटूट आस्था है।
आवरी माता मंदिर निकुंभ (चित्तौड़गढ़ ) का सबसे बड़ा चमत्कार: लकवा (Paralysis) से मुक्ति का रहस्य
आवरी माता मंदिर निकुंभ (चित्तौड़गढ़) को पूरे भारत में एक अलौकिक ‘लकवा निवारण केंद्र’ माना जाता है। यहाँ बिना किसी आधुनिक दवा के, मंदिर की पवित्र बावड़ी के जल से स्नान और माता के चरणों के विशेष तेल की मालिश से लकवा व पोलियो के मरीज ठीक होते हैं। गंभीर रोगियों को यहाँ 7 से 21 दिनों तक रुककर रोज़ सुबह-शाम आरती और परिक्रमा करनी होती है। मान्यता इतनी दृढ़ है कि व्हीलचेयर पर आने वाले लोग भी अपने पैरों पर चलकर लौटते हैं और मन्नत पूरी होने पर श्रद्धा से सोने या चांदी के मानव अंग माँ के दरबार में चढ़ाते हैं।
आज के चिकित्सकिय युग में हमारी सलाह है कि लकवे के इलाज के लिए dr साब से परामर्श करते हुए आस्था का दामन पकड़े रखें।
आवरी माता मंदिर निकुंभ (चित्तौड़गढ़ ) की वास्तुकला और परिसर
मुख्य गर्भगृह: मंदिर के मुख्य गर्भगृह में माता की एक बेहद सुंदर और भव्य मूर्ति स्थापित है, जो सदैव दिव्य वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित रहती है।
पवित्र बावड़ी: मंदिर के पास स्थित प्राचीन बावड़ी का जल कभी नहीं सूखता। इस जल को अत्यंत पवित्र और औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है।
धर्मशालाएं: दूर-दराज से आने वाले मरीजों और उनके परिवारों के रुकने के लिए मंदिर ट्रस्ट द्वारा यहाँ कई धर्मशालाओं और भोजनालयों की व्यवस्था की गई है।
आवरी माता मंदिर निकुंभ के नवरात्रि और प्रमुख मेले (Festivals & Fairs)
यूं तो साल भर यहाँ भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन वर्ष में दो बार आने वाले नवरात्रि (चैत्र और शारदीय नवरात्रि) के दौरान यहाँ का माहौल देखने लायक होता है।इन 9 दिनों में यहाँ एक विशाल मेले का आयोजन होता है।देश के विभिन्न राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और दिल्ली से लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं।नवरात्रि में माता का विशेष श्रृंगार किया जाता है और अखंड ज्योति जलाई जाती है।
“आवरी माता मंदिर लकवा का इलाज कैसे होता है”
आवरी माता मंदिर निकुंभ में लकवा और पोलियो का उपचार पूरी तरह आध्यात्मिक व प्राकृतिक पद्धति से होता है, जहाँ आधुनिक दवाओं का प्रयोग नहीं किया जाता। इसकी उपचार प्रक्रिया मुख्य रूप से तीन चरणों में है—पहला, मंदिर की प्राचीन चमत्कारी बावड़ी के पवित्र जल से प्रतिदिन स्नान; दूसरा, माता के चरणों में चढ़ाए गए विशेष तेल से प्रभावित अंगों की मालिश; और तीसरा, मंदिर परिसर की धर्मशालाओं में 7 से 21 दिनों तक रुककर रोज़ सुबह-शाम दिव्य आरती व परिक्रमा करना। इसी अटूट श्रद्धा, सेवा और माता के आशीर्वाद से मरीज पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने पैरों पर घर लौटते हैं।
“लकवा ठीक होने के लिए आवरी माता मंदिर में कितने दिन रुकना पड़ता है”
आवरी माता मंदिर निकुंभ में लकवा ठीक होने के लिए मरीजों को उनकी स्थिति के आधार पर 7, 11 या 21 दिनों तक मंदिर परिसर में रुकना पड़ता है। इस अवधि के दौरान मरीजों को प्रतिदिन मंदिर की चमत्कारी बावड़ी के जल से स्नान करना, माता के विशेष तेल से मालिश करना और सुबह-शाम की दिव्य आरती व परिक्रमा में शामिल होना अनिवार्य होता है।
“आवरी माता मंदिर का चमत्कारी तेल और बावड़ी का पानी”
आवरी माता मंदिर का चमत्कारी तेल और पवित्र बावड़ी का पानी यहाँ के मुख्य रहस्य हैं। लकवा और पोलियो से पीड़ित मरीजों को प्रतिदिन इस प्राचीन बावड़ी के औषधीय जल से स्नान कराया जाता है। इसके बाद माता के चरणों में चढ़ाए गए विशेष तेल से प्रभावित अंगों की मालिश की जाती है। श्रद्धालुओं की अटूट मान्यता है कि इस दिव्य जल और तेल के प्रभाव से मृत नसें भी पुनः काम करने लगती हैं।
“आवरी माता मंदिर का इतिहास और कहानी
आवरी माता मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है, जो लोककथाओं के अनुसार राजा-महाराजाओं के काल से जुड़ा है। लोक मान्यताओं के अनुसार, चित्तौड़गढ़ के जंगलों में माँ आवरी ने अपने एक अनन्य भक्त की भक्ति से प्रसन्न होकर दर्शन दिए थे और यहीं स्थापित होने की इच्छा प्रकट की थी। मूल रूप से इन्हें शक्ति स्वरूपा देवी दुर्गा का रूप माना जाता है। निकुंभ और मेवाड़ राजवंश के राजपूत योद्धा युद्ध पर जाने से पहले माता का आशीर्वाद लेने यहाँ आते थे। माता की कृपा से सदियों से असाध्य रोगों और लकवा से मुक्ति मिलने की दिव्य कहानी आज भी लाखों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र बनी हुई है।
“केसर कुंवर (आवरी माता) और उनके पिता अवाजी की पौराणिक कथा
लोककथा के अनुसार, मेवाड़ के जागीरदार अवाजी राठौड़ की इकलौती पुत्री केसर कुंवर अत्यंत धर्मपरायण थीं। विवाह की एक विकट परिस्थिति के कारण उन्होंने अपनी कुलदेवी का ध्यान किया, जिससे अचानक धरती फटी और वे उसमें समाने लगीं।पिता अवाजी ने घबराकर उनका पल्लू पकड़ लिया, जिससे क्रोधित होकर केसर ने उन्हें श्राप दे दिया। बाद में पिता के अनुनय-विनय पर उन्होंने अवाजी का नाम अमर होने का वरदान दिया। उसी भूमिमग्न स्थान पर अवाजी ने मंदिर बनवाया, जिसे पिता-पुत्री के नाम पर असावरा (आवरी) माता मंदिर कहा गया।
आवरी माता किस राजवंश की कुलदेवी हैं”
निकुंभ राजवंश (Nikumbh Dynasty): इस प्राचीन सूर्यवंशी क्षत्रिय वंश का शासनकाल गुहिलोत (सिसोदिया) वंश से पहले मेवाड़ के मांडलगढ़ और अलवर (बाला किला) के क्षेत्रों में रहा है. माता का नाम निकुंभ क्षेत्र और इस राजवंश से गहराई से जुड़ा है, जो माँ कालिका (काली) के रूप में इनकी मूल कुलदेवी मानी जाती हैं.
मेवाड़ के राठौड़ (Rathores of Mewar): लोककथा के अनुसार माँ आवरी का जन्म मेवाड़ के जागीरदार अवाजी राठौड़ के घर ‘केसर कुंवर’ के रूप में हुआ था, जिसके कारण इन्हें ‘राठौड़ां री रानी’ भी कहा जाता है.
नोट: समूचे मेवाड़ राजवंश यानी उदयपुर/चित्तौड़गढ़ के सिसोदिया वंश की मुख्य कुलदेवी बाण माता (बायण माता) हैं, जबकि निकुंभ माता इस क्षेत्र की एक परम पूजनीय लोकदेवी व इष्टदेवी हैं.)
“चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन से आवरी माता मंदिर निकुंभ की दूरी”
कुल दूरी: लगभग 38 से 40 किलोमीटर.यात्रा का समय: निजी वाहन, टैक्सी या कार से जाने पर लगभग 50 मिनट से 1 घंटा का समय लगता है.मुख्य मार्ग: स्टेशन से बाहर निकलकर मुख्य मार्ग चित्तौड़गढ़ – मंगलवाड़ रोड (Chittorgarh – Mangalwad Rd) के जरिए असावरा (निकुंभ) स्थित मंदिर पहुँचा जाता है. यह मार्ग पूरी तरह सुगम है.
आवरी माता मंदिर के पास धर्मशाला और रुकने की व्यवस्था
चूंकि यहाँ लकवा और पोलियो से पीड़ित मरीज 7 से 21 दिनों की मन्नत के लिए रुकते हैं, इसलिए मंदिर परिसर और उसके आस-पास रहने की पर्याप्त व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं:मंदिर ट्रस्ट की धर्मशालाएं: मंदिर परिसर के भीतर ही विशाल धर्मशालाएं बनी हुई हैं. यहाँ बेहद कम दरों (या मानमात्र शुल्क) पर कमरे और हॉल उपलब्ध कराए जाते हैं.मरीजों के लिए विशेष व्यवस्था: लंबे समय तक रुकने वाले मरीजों और उनके तीमारदारों (परिजन) के लिए खाना बनाने के लिए बर्तन, चूल्हा और पानी की सुचारू व्यवस्था रहती है.निजी विश्राम गृह व लॉज: मंदिर के मुख्य द्वार और निकुंभ रोड के आस-पास कई निजी समाज की धर्मशालाएं और बजट लॉज भी मौजूद हैं, जहाँ भोजन और ठहरने की बुनियादी सुविधाएं मिल जाती हैं.
आवरी माता मंदिर का रास्ता और बस टाइमिंग
सीधा रास्ता: चित्तौड़गढ़ से निजी और राजस्थान राज्य परिवहन (RSRTC) की बसें वाया भदेसर या मंगलवाड़ मार्ग से होकर निकुंभ-असावरा की तरफ जाती हैं.
सांवलिया जी और निम्बाहेड़ा होकर रास्ता: कई श्रद्धालु पहले चित्तौड़गढ़ से श्री सांवलिया सेठ मंदिर (मंडफिया) या निम्बाहेड़ा के लिए बस लेते हैं. वहाँ से आवरी माता मंदिर की दूरी मात्र 12 से 15 किलोमीटर रह जाती है, जिसके लिए स्थानीय ऑटो, जीप और लोकल बसें हर 15-20 मिनट में मिल जाती हैं.
बस टाइमिंग (Bus Timings): चित्तौड़गढ़ मुख्य बस स्टैंड से सुबह 06:00 बजे से लेकर शाम 07:00 बजे तक हर आधे से एक घंटे के अंतराल पर निम्बाहेड़ा, मंगलवाड़ और भदेसर की तरफ जाने वाली बसें उपलब्ध रहती हैं. रात के समय इस रूट पर बसों की संख्या काफी कम हो जाती है, इसलिए दिन के समय यात्रा करना सबसे सुरक्षित और सुविधाजनक रहता है.
आवरी माता मंदिर में आरती और दर्शन का समय
आवरी माता मंदिर प्रतिदिन सुबह 05:30 बजे से रात 10:00 बजे तक खुला रहता है, जहाँ प्रतिदिन सुबह 05:00-05:30 बजे मंगला आरती और शाम को सूर्यास्त के समय 06:30-07:00 बजे शयन आरती होती है। लकवा पीड़ितों के लिए इन आरतियों में शामिल होना कल्याणकारी माना जाता है।
आवरी माता मंदिर नवरात्रि मेला और भीड़ की स्थिति
आवरी माता मंदिर में वर्ष में दो बार (चैत्र और शारदीय नवरात्रि) ९ दिनों का विशाल मेला लगता है, जिसमें देश भर से लाखों श्रद्धालु आते हैं। इस दौरान मंदिर को भव्य रोशनी व फूलों से सजाया जाता है, अखंड ज्योति जलती है और परिसर में भारी भीड़ होने के कारण दर्शन के लिए लंबी लाइनें लगती हैं व सभी धर्मशालाएं फुल हो जाती हैं। आम दिनों की बात करें तो यहाँ रविवार और मंगलवार को सबसे अधिक भीड़ रहती है, इसलिए शांति से दर्शन करने के लिए बुधवार से शुक्रवार का समय सबसे उत्तम माना जाता है।
लोककथाओं और जागीरदारों का संदर्भ (अवाजी राठौड़)
आवरी माता (केसर कुंवर) की कथा के संदर्भ में, उनके पिता अवाजी राठौड़ को मेवाड़ क्षेत्र का एक स्थानीय जागीरदार या सामंत माना जाता है। सीमावर्ती क्षेत्रों (जैसे पाली, भीलवाड़ा और चित्तौड़गढ़ के बॉर्डर) में कई राठौड़ परिवार पीढ़ियों से जागीरदार के रूप में बसे हुए थे, जिन्होंने मेवाड़ की संप्रभुता को स्वीकार किया था और वे महाराणा की सेना का हिस्सा थे।
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