जानिए बाबा रामदेव जी और नेपा दर्जी की कहानी लिखित में। कपड़े का घोड़ा और नेपा दर्जी का इतिहास, दर्जी को क्या सजा मिली और क्यों चढ़ाया जाता है घोड़लियो? पूरी कथा यहाँ पढ़ें।
कपड़े का घोड़ा और नेपा दर्जी का इतिहास
यह पावन प्रसंग तब का है जब बाबा रामदेव जी अत्यंत छोटे थे और अपने माता-पिता के साथ पोकरण के राजमहल में रहते थे। एक दिन बालक रामदेव ने अपनी माता मैणादे से खेलने के लिए एक घोड़े की जिद (बाल-हठ) की। राजा अजमल जी के महल में धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन बालक रामदेव साधारण मिट्टी या लकड़ी के खिलौनों से बहलने को तैयार नहीं थे।
माता मैणादे अपने लाडले पुत्र को उदास नहीं देख सकती थीं। उन्होंने सोचा कि बालक के खेलने के लिए रेशम के सुंदर कपड़ों से भरा एक सजीला और मुलायम घोड़ा बनवाया जाए। इसके लिए माता मैणादे ने पोकरण क्षेत्र के एक प्रसिद्ध दर्जी, जिसका नाम नेपा दर्जी था, उसे तत्काल राजमहल में बुलवाया।
माता ने नेपा दर्जी को राजकोष से बेहद कीमती, चमकीला और उत्तम श्रेणी का रेशमी कपड़ा सौंपते हुए कहा, “हे नेपा! इस कीमती कपड़े से मेरे लाल रामदेव के लिए एक ऐसा सुंदर और भव्य घोड़ा बनाओ, जिसे देखकर मेरा बच्चा खिल उठे।”
नेपा दर्जी का लालच और बेईमानी
नेपा दर्जी वह कीमती रेशमी कपड़ा लेकर अपने घर आ गया। जब उसने एकांत में उस वस्त्र को देखा, तो उसके मन में लालच आ गया। उसके भीतर का स्वार्थ जाग उठा। उसने सोचा, “इतना कीमती और दुर्लभ रेशमी कपड़ा एक छोटे बच्चे के खिलौने में क्यों व्यर्थ करना? क्यों न मैं इस कपड़े का बड़ा हिस्सा छिपाकर अपनी पत्नी के लिए एक सुंदर पोशाक बनवा लूं।”
इस लालच में आकर नेपा दर्जी ने भारी बेईमानी की। उसने उस असली कीमती रेशमी कपड़े का अधिकांश हिस्सा अपने संदूक में छिपा दिया। घोड़े को आकार देने के लिए उसने अपने कारखाने से फटे-पुराने चिथड़े, गंदे और बेकार कपड़े इकट्ठे किए और उन्हें घोड़े के आकार के ढांचे के अंदर ठोस रूप से भर दिया। ऊपर से केवल थोड़ा सा नया कपड़ा लपेटकर उसने बाहर से दिखने में एक बेहद सुंदर घोड़ा तैयार कर दिया। बाहर से तो घोड़ा अत्यंत आकर्षक लग रहा था, लेकिन उसके भीतर दर्जी का छल, कपट और पाप छुपा हुआ था।
घोड़लियो मंगवा दे माँ: निर्जीव कपड़े का आकाश में उड़ना
नेपा दर्जी उस तैयार किए गए कपड़े के घोड़े को लेकर गर्व के साथ राजमहल पहुँचा। माता मैणादे ने जब बाहर से सुंदर दिख रहे घोड़े को देखा, तो वह अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने वह घोड़ा बालक रामदेव को खेलने के लिए सौंप दिया।
लेकिन बालक रामदेव तो अंतर्यामी थे, साक्षात द्वारकाधीश के अवतार थे। वे नेपा दर्जी के मन के भीतर चल रहे छल, कपट और चोरी को पहली ही दृष्टि में पहचान गए। बाबा रामदेव जी ने समाज को यह संदेश देना था कि धर्म के कार्यों में और निर्दोष बच्चों के साथ किया गया छल कभी छिप नहीं सकता।
जैसे ही नन्हे बालक रामदेव उस कपड़े के घोड़े की पीठ पर सवार हुए, राजमहल के आंगन में एक विस्मयकारी और अलौकिक चमत्कार हुआ। वह निर्जीव कपड़े का घोड़ा अचानक एक जीवित और शक्तिशाली अश्व की भांति हवा में उछला। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, वह घोड़ा बालक रामदेव को पीठ पर बैठाकर तेज गति से आकाश मार्ग की ओर उड़ गया। देखते ही देखते बालक और कपड़ा का घोड़ा बादलों के पार ओझल हो गए।
रामदेव जी ने दर्जी को क्या सजा दी?
अपने नन्हे और लाडले बालक को इस प्रकार हवा में गायब होते देख माता मैणादे का हृदय कांप उठा। वे जोर-जोर से विलाप करने लगीं और रोते हुए बेसुध हो गईं। पूरे राजमहल और पोकरण राज्य में हाहाकार मच गया। राजा अजमल जी को जब इस घटना की सूचना मिली, तो वे तुरंत समझ गए कि इस निर्जीव घोड़े में कोई न कोई भारी गड़बड़ी है।
राजा अजमल जी ने बिना विलंभ किए अपने सैनिकों को आदेश दिया और नेपा दर्जी को तुरंत बंदी बनाकर दरबार में पेश करने को कहा। सैनिकों ने नेपा दर्जी को उसके घर से घसीटते हुए राजा के सामने लाकर खड़ा कर दिया। जब राजा ने कड़कड़ाती आवाज में पूछताछ की, तो दर्जी थर-थर कांपने लगा।
मौत के डर और अपने पाप के बोध से नेपा दर्जी फुट-फुट कर रोने लगा। उसने हाथ जोड़कर राजा के सामने अपनी पूरी चोरी स्वीकार कर ली कि उसने कीमती रेशम चुराकर अंदर पुराने चिथड़े भरे थे। राजा अजमल जी ने क्रोध में आकर नेपा दर्जी को तुरंत कालकोठरी (जेल) में डालने की सजा दे दी।
दर्जी की भूल-सुधार और बाबा की सकुशल वापसी
नेपा दर्जी जेल की सलाखों के पीछे बैठकर रो रहा था और अपनी भूल पर पछता रहा था। उधर, आकाश मार्ग का भ्रमण करने के बाद, बाबा रामदेव जी उस कपड़े के घोड़े के साथ सकुशल राजमहल के आंगन में वापस उतर आए। बालक रामदेव को पूरी तरह सुरक्षित और मुस्कुराते देख माता मैणादे के आंसू थम गए और पूरे राज्य में उत्सव का माहौल हो गया।
जेल में बंद नेपा दर्जी को जब बालक रामदेव के सकुशल लौटने और उनके इस महान दैवीय अवतार होने का अहसास हुआ, तो उसका अहंकार पूरी तरह से नष्ट हो गया। राजा अजमल जी ने उसे पुनः दरबार में बुलाया। दर्जी सीधे बालक रामदेव के चरणों में गिर पड़ा और फूट-फुट कर क्षमा याचना करने लगा।
दयालु और कृपालु बाबा रामदेव जी ने नेपा दर्जी की सच्ची ग्लानि को देखकर उसे माफ कर दिया और उसे सीख दी कि “संसार में कभी भी किसी के साथ छल, कपट या बेईमानी नहीं करनी चाहिए, विशेषकर धर्म, आस्था और बच्चों के मामले में किया गया छल सर्वनाश का कारण बनता है।”
रामदेवरा मेले में ‘घोड़लियो’ चढ़ाने की परंपरा क्यों है?
नेपा दर्जी के इसी हृदय परिवर्तन और बाबा के इस अद्भुत परचे की याद में आज सदियों बाद भी एक पवित्र परंपरा जीवित है। जैसलमेर के रामदेवरा (रुणिचा) में आयोजित होने वाले वार्षिक मेले में देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालु बाबा के दरबार में कपड़े का घोड़ा (घोड़लियो) चढ़ाते हैं।
भक्त अपने घरों से या मेले के बाजारों से सुंदर, रंग-बिरंगे कपड़ों से बने घोड़े खरीदते हैं और बाबा की समाधि पर अर्पित करते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि बाबा हमारे भीतर के कपट और लालच रूपी चिथड़ों को दूर कर हमारे जीवन को भक्ति के रेशमी रंग में रंग देते हैं।
कपड़ा रो घोड़ों उड़ायो आकाश में (The Cloth Horse Miracle Bhajan
- स्थाई (Refrain):कपड़ा रो घोड़ों उड़ायो आकाश में,बाबा रामदेवजी परचो दीनो प्रकाश में।कपड़ा रो घोड़ों उड़ायो आकाश में…अंतरा (Stanzas):मैणादे माता थारे घोड़े ने मँगावे,रूपा दर्जी ने बुलाय रेशम रो कपड़ा देवे।दर्जी मन में पाप कमायो, जूठो कपड़ो लगायो,बाबा अंतर्यामी जाण्या, घोड़ों पवन वेग उड़ायो।कपड़ा रो घोड़ों उड़ायो आकाश में…रोवे राजा अजमल जी, रोवे माता मैणादे,पकड़ दर्जी ने कोठड़ी में घाल्या, अब कूण बचावे रे।दर्जी बाबा ने ध्यावे, धोक लगावे, भूल थारी बकसावे,बाबा घोड़ों पाछो लाया, परचो भारी दिखावे।कपड़ा रो घोड़ों उड़ायो आकाश में…
काचे की घोड़ी उड़ाई बाबा रामदेवजी
- स्थाई (Refrain):ओ जी रे… काचे की घोड़ी उड़ाई बाबा रामदेवजी,थारे परचा रो पार पायो नी जाय जी।अंतरा (Stanzas):दर्जी की भूल बाबा पल में सुधारी,कंचन वरणी काया की माया न्यारी।रुणिचा रा राजा थारी महिमा है भारी,घोड़ी आकाश चढ़ाई, रोवे दुनिया सारी।काचे की घोड़ी उड़ाई बाबा रामदेवजी…
खम्मा खम्मा ओ धनिया रुणिचे रा धनिया (The Most Famous Ancient Bhajan)
- स्थाई (Refrain):खम्मा खम्मा ओ म्हाने रुणिचे रा धनिया,थने ध्यावे आखो मारवाड़ जी,ओ जी आखो मारवाड़ जी,अजमल जी रा कंवरा, माता मैणादे रा लाल जी,रानी नेतल रा भरतार, म्हाने रुणिचे रा धनिया।अंतरा (Stanzas):कुमकुम रा पगल्या बाबा आंगणे पधार्या,दूध उफणायो बाबा, माता ने दिखलाया।भैरु राक्षस ने मार्या, परचो भारी दिखलाया।खम्मा खम्मा ओ म्हाने रुणिचे रा धनिया…कपड़े रो घोड़ों बाबा पवन वेग उड़ायो,दर्जी री चोरी पकड़ी, जेल से छुड़ायो।बोयता रो जहाज़ तार्यो, अंधा ने सुजाया।खम्मा खम्मा ओ म्हाने रुणिचे रा धनिया…
लीले घोड़े रा असवार थारी महिमा अपरंपार
- स्थाई (Refrain):लीले घोड़े रा असवार, थारी महिमा अपरंपार,बाबा रामदेवजी, थे तो बेड़ा कर दो पार।लीले घोड़े रा असवार…अंतरा (Stanzas):हाथ में भाला चमके, गल मोतियन की माला,शीश पे मुकुट सोहे, रुणिचे रा लाला।जो भी आवे थारे द्वारे, कदे न जावे खाली हाथ,लीले घोड़े रा असवार…भगत थारा भजन गावे, झांझ और मंजीरा बाजे,नौबत बाजे थारे आंगणे, धोक लगावे नर-नार।लीले घोड़े रा असवार…
नेपा दर्जी की कहानी: बाबा रामदेव जी का चमत्कारी परचा और कपड़े का घोड़ा पर लिखा यह आर्टिकल आपको कैसा लगा?


