जानें भारत-पाक बॉर्डर पर बसे आखिरी गाँव ‘गजुओ की बस्ती’ जैसलमेर (Gajuo Ki Basti) का इतिहास। बिना बिजली-पानी के यहाँ लोग कैसे जीते हैं? जानें दूरी, रूट और अनुमति की पूरी जानकारी।
गजुओ की बस्ती कहाँ है?
गजुओ की बस्ती राजस्थान के जैसलमेर जिले में भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के पास स्थित एक बेहद छोटा और अनोखा सीमावर्ती गाँव है। मुख्य जैसलमेर शहर से लगभग 100 से 120 किलोमीटर दूर, यह प्रसिद्ध जैसलमेर-तनोट हाईवे के करीब बसा है। यहाँ पहुँचने के लिए केवल सड़क मार्ग ही एकमात्र सहारा है। इसकी भौगोलिक स्थिति इतनी संवेदनशील है कि यहाँ के ऊँचे रेतीले टीलों से पाकिस्तानी सरहद को बेहद करीब से महसूस किया जा सकता है, जो तनोट माता मंदिर जाने वाले सैलानियों के लिए हमेशा कौतूहल का विषय रहता है।
बिना बिजली-पानी के लोग बॉर्डर पर कैसे रहते हैं?”गजुओ की बस्ती जैसलमेर
यहाँ के लोग ‘झुम्पा’ नाम की गोल झोपड़ियों में रहते हैं। ये झोपड़ियां स्थानीय घास, सूखी झाड़ियों और मिट्टी से बनाई जाती हैं। इनकी बनावट ऐसी होती है कि ये गर्मियों में अंदर से ठंडी और सर्दियों में गर्म रहती हैं, जिससे बिना बिजली (पंखों/AC) के भी भीषण गर्मी (48°C+) झेली जा सकती है।
पानी का जुगाड़: इस क्षेत्र में पानी का मुख्य स्रोत ‘बेरी’ (पारंपरिक कुएं) या सरकार द्वारा बनाए गए पानी के कुंड होते हैं। कई बार महिलाओं को पानी लाने के लिए रेतीले टीलों को पार करते हुए कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। हाल के दिनों में कुछ घरों में छोटे सोलर पैनल भी दिखने लगे हैं, जिससे रात में एक बल्ब जल सके।
आजीविका (Livelihood): यहाँ के लोगों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन (ऊँट, भेड़, बकरी) और बारिश के मौसम में नाममात्र की पारंपरिक खेती (बाजरा) है।
How to visit Gajuo Ki Basti”गजुओ की बस्ती जैसलमेर कैसे पहुंचे?
जैसलमेर मुख्य शहर से गजुओ की बस्ती की दूरी लगभग 100-115 किलोमीटर है। यहाँ जाने के लिए जैसलमेर से जैसलमेर-तनोट हाईवे (NH-70) पकड़ें। तनोट माता मंदिर के पास से अंदरूनी रेगिस्तानी रूट शुरू होता है। चूंकि आगे पक्की सड़कें नहीं हैं और केवल ऊंचे रेतीले टीले हैं, इसलिए यहाँ केवल 4×4 (फोर-बाय-फोर) गाड़ी या ऊँट से ही पहुँचा जा सकता है। संवेदनशील बॉर्डर एरिया होने के कारण जाने से पहले BSF या जिला प्रशासन से अनुमति (Permit) लेना अनिवार्य है।
गजुओ की बस्ती जैसलमेर :कुछ और अनोखे और अनसुने फैक्ट्स
रेडियो ही मनोरंजन का एकमात्र साधन: इस गाँव में मोबाइल नेटवर्क न के बराबर है। यहाँ के लोग आज भी बाहरी दुनिया की खबरें सुनने या मनोरंजन के लिए पारंपरिक ट्रांजिस्टर रेडियो का इस्तेमाल करते हैं। अक्सर यहाँ भारतीय चैनलों से ज्यादा पाकिस्तान के रेडियो सिग्नल्स साफ आते हैं।
शाकाहारी और सीधा जीवन: रेगिस्तान की कठिन परिस्थितियों के कारण यहाँ हरी सब्जियां मिलना मुश्किल है। यहाँ के लोग मुख्य रूप से सूखी रेगिस्तानी सब्जियों (जैसे कैर-सांगरी, कुमटिया) और बाजरे की रोटी व छाछ (मट्ठा) पर निर्भर रहते हैं।
Gajuo Ki Basti Drone Videoगजुओ की बस्ती जैसलमेर ड्रोन वीडियो
राजस्थान के जैसलमेर में भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के पास स्थित ‘गजुओ की बस्ती’ का ड्रोन वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जो थार मरुस्थल की अनूठी सुंदरता को दर्शाता है। हवाई फुटेज में रेत के टीलों के बीच पारंपरिक मिट्टी और घास-फूस से बनी झोपड़ियाँ (ढाणियाँ) नजर आती हैं, जो यहाँ की कठिन लेकिन शांत जीवनशैली और सीमाई क्षेत्र की संवेदनशीलता को बयां करती हैं। इस वायरल ड्रोन फुटेज के बारे में और जानने के लिए यूट्यूब या इंस्टाग्राम रील्स देखें।
पर्वत सिंह सोढ़ा का ‘लास्ट कैफे’ गजुओ की बस्ती जैसलमेर (India’s Last Cafe)
पर्वत सिंह सोढ़ा का ‘लास्ट कैफे’ (India’s Last Cafe) जैसलमेर में भारत-पाकिस्तान सीमा के पास स्थित ‘गजुओ की बस्ती’ का एक प्रमुख आकर्षण है। इस कैफे को सीमा क्षेत्र के आखिरी पड़ाव पर होने के कारण ‘लास्ट कैफे’ नाम दिया गया है, जो थार मरुस्थल की यात्रा करने वाले पर्यटकों और एडवेंचर के शौकीनों के बीच काफी लोकप्रिय हो रहा है। यहाँ आने वाले सैलानी रेतीले टीलों के बीच पारंपरिक राजस्थानी मेहमाननवाज़ी और चाय-नाश्ते का लुत्फ उठाते हैं। पर्वत सिंह सोढ़ा का यह अनूठा कैफे न केवल स्थानीय रोजगार को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि सीमावर्ती पर्यटन (Border Tourism) का एक नया चेहरा बनकर उभरा है।


