लाठी सीरीज (जैसलमेर) क्या है? जानिए थार मरुस्थल की इस मीठी जल पट्टी का रहस्य, जुरासिक काल का इतिहास, सेवण घास और सुमेर सिंह भाटी के ओरण आंदोलन की पूरी कहानी।
लाठी सीरीज क्या है?
लाठी सीरीज राजस्थान के जैसलमेर जिले में पोकरण से मोहनगढ़ तक फैली लगभग 60 किलोमीटर लंबी एक भूमिगत जल पट्टी है। शुष्क थार मरुस्थल के बीच स्थित यह क्षेत्र मीठे और शुद्ध पानी का एक विशाल प्राकृतिक भंडार है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार, यह प्राचीन काल में बहने वाली लुप्त सरस्वती नदी का भूगर्भीय अवशेष है। इस मीठे पानी की नमी के कारण यहाँ प्रोटीन से भरपूर पौष्टिक ‘सेवण घास’ उगती है, जो संकटग्रस्त राज्य पक्षी गोडावण की मुख्य शरणस्थली और पसंदीदा ब्रीडिंग ग्राउंड है।
लाठी सीरीज ( जैसलमेर) की भूवैज्ञानिक विशेषता: जुरासिक काल और जीवाश्म का इतिहास (Lathi Formation Geology)
यदि हम lathi formation geology की बात करें, तो यह क्षेत्र भूविज्ञान के नजरिए से एक खजाना है। इस पट्टी की चट्टानें आज से लगभग 180 मिलियन वर्ष पुरानी यानी जुरासिक काल (Jurassic Period) की बलुआ पत्थर (Sandstone) और शेल (Shale) चट्टानों से बनी हैं।लाठी क्षेत्र के ठीक पास स्थित Akal Wood Fossil Park (आकल वुड फॉसिल पार्क) इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। इस पार्क में करोड़ों वर्ष पुराने पेड़ों के विशाल तने और प्राचीन समुद्री जीवों के पत्थर बन चुके अवशेष (Fossils) आज भी सुरक्षित हैं। यह जीवाश्म इस बात को साबित करते हैं कि आज जहाँ सूखा मरुस्थल है, वहाँ जुरासिक काल में कभी घना उष्णकटिबंधीय जंगल और एक विशाल समंदर (टैथिस सागर) हुआ करता था।
लाठी सीरीज ( जैसलमेर) और सेवण घास: थार का हरा सोना (Sevan Ghas Jaisalmer)
जैसलमेर की लाठी सीरीज में मीठे भूमिगत जल की नमी के कारण प्राकृतिक रूप से उगने वाली सेवण घास (वैज्ञानिक नाम: Lasiurus scindicus) थार मरुस्थल का एक अमूल्य प्राकृतिक वरदान है। प्रोटीन से भरपूर होने के कारण यह स्थानीय गोवंश, भेड़ों और ऊंटों के लिए सबसे पौष्टिक चारे का काम करती है, जो पशुधन के स्वास्थ्य और दुग्ध उत्पादन को बढ़ाता है। इसके साथ ही, यह घास पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत के अत्यंत संकटग्रस्त पक्षी गोडावण (Great Indian Bustard) की मुख्य शरणस्थली है। गोडावण अपने अंडे देने, शत्रुओं से छिपने और प्रजनन के लिए पूरी तरह से इन्हीं सेवण घास के मैदानों पर निर्भर करता है। संक्षेप में, यह घास मरुस्थल के पशुधन और लुप्तप्राय वन्यजीवों दोनों के अस्तित्व का मुख्य आधार है।
लाठी सीरीज (जैसलमेर) में ओरण बचाओ आंदोलन और सुमेर सिंह भाटी (Sumer Singh Bhati Jaisalmer)
जैसलमेर के लाठी-सावता क्षेत्र में सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं की हाई-टेंशन लाइनों से ‘ओरण’ (पारंपरिक पवित्र लोक वन) और संकटग्रस्त गोडावण पक्षी को बचाने के लिए पर्यावरण कार्यकर्ता सुमेर सिंह भाटी ने ओरण बचाओ आंदोलन शुरू किया। उन्होंने इसके खिलाफ जैसलमेर से जयपुर तक लंबी पदयात्रा की। उनके इसी अद्भुत संघर्ष और थार की जैव विविधता को बचाने के प्रयासों के लिए उन्हें मंगोलिया में प्रतिष्ठित रेंजलैंड रेस्टोरेशन अवार्ड्स 2026 से सम्मानित किया जा रहा है।
lathi to jaisalmer distance लाठी से जैसलमेर की दूरी
लाठी से जैसलमेर की सड़क मार्ग से सटीक दूरी 66.9 किलोमीटर है। राष्ट्रीय राजमार्ग 11 (NH 11) के माध्यम से निजी वाहन या टैक्सी द्वारा यहाँ पहुँचने में लगभग 1 घंटा 6 मिनट का समय लगता है। इसके अलावा, लाठी और जैसलमेर के बीच नियमित बस सेवाएँ और जोधपुर-जैसलमेर रेल लाइन के माध्यम से ट्रेन सुविधा भी आसानी से उपलब्ध है।
गोडावण संरक्षण परियोजना (Great Indian Bustard Conservation Project)
राजस्थान के राज्य पक्षी गोडावण को विलुप्त होने से बचाने के लिए जैसलमेर के राष्ट्रीय मरु उद्यान (DNP) और लाठी क्षेत्र में यह परियोजना चलाई जा रही है। इसके तहत सम और सावता गांवों में कृत्रिम प्रजनन केंद्र (Breeding Centres) स्थापित कर अंडों को सुरक्षित रूप से सेकर चूजों का पालन-पोषण किया जा रहा है। साथ ही, इनके प्राकृतिक आवास ‘सेवण घास’ के मैदानों को संरक्षित करने और हाई-टेंशन बिजली लाइनों से होने वाली मौतों को रोकने के लिए ‘बर्ड डायवर्टर’ लगाए जा रहे हैं।
लाठी सीरीज कहाँ स्थित है”
लाठी सीरीज राजस्थान के जैसलमेर जिले में स्थित है। यह थार मरुस्थल के भीतर पोकरण से लेकर मोहनगढ़ तक फैली हुई एक प्रसिद्ध भूगर्भीय जल पट्टी (Underground Water Belt) है। लगभग 60 किलोमीटर की लंबाई में विस्तृत यह क्षेत्र अपने मीठे भूमिगत जल भंडार, जुरासिक काल की बलुआ पत्थर चट्टानों और पौष्टिक ‘सेवण घास’ के मैदानों के लिए जाना जाता है।
पोकरण से मोहनगढ़ जल पट्टी
पोकरण से मोहनगढ़ जल पट्टी को ही भौगोलिक भाषा में ‘लाठी सीरीज’ कहा जाता है, जो जैसलमेर जिले में स्थित है। लगभग 60 किलोमीटर लंबी यह भूगर्भीय संरचना धधकते थार मरुस्थल के बीच मीठे और शुद्ध पानी का एक अभूतपूर्व भंडार है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह प्राचीन लुप्त सरस्वती नदी का भूमिगत अवशेष है। इस जल पट्टी की नमी से यहाँ पौष्टिक ‘सेवण घास’ उगती है, जो संकटग्रस्त गोडावण पक्षी का मुख्य प्रजनन क्षेत्र है।
“लाठी सीरीज की खोज किसने की”
सर्वप्रथम भूवैज्ञानिक खोज (1886): भूगर्भीय स्तर पर इस संरचना को सबसे पहले आर. डी. ओल्डम (R. D. Oldham) ने साल 1886 में लाठी गांव के नाम पर “लाठी बेड्स” (Lathi Beds) नाम दिया था। इसके बाद साल 1959 में जे. स्वामीनाथ और उनकी टीम ने इसे आधिकारिक रूप से ‘लाठी फॉर्मेशन’ (Lathi Formation) के रूप में परिभाषित किया।
भूमिगत मीठे जल-पट्टी (Water Belt) की आधुनिक खोज (2007): रेगिस्तान के नीचे बहने वाली इस मीठे पानी की वास्तविक जल-पट्टी और इसके पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का सटीक मानचित्रण साल 2007 में काजरी (CAZRI – Central Arid Zone Research Institute, जोधपुर) के वैज्ञानिकों की एक विशेष टीम द्वारा किया गया था।
इसके अलावा, इसरो (ISRO) और ओएनजीसी (ONGC) के वैज्ञानिकों ने ‘प्रोजेक्ट सरस्वती’ के तहत इस पट्टी को प्राचीन लुप्त सरस्वती नदी का भूमिगत अवशेष माना है
लाठी सीरीज का पानी मीठा क्यों है”
लाठी सीरीज का पानी मीठा होने का मुख्य कारण यहाँ के भूगर्भ में स्थित जुरासिक काल की छिद्रदार बलुआ पत्थर चट्टानें हैं, जो बारिश के पानी को प्राकृतिक रूप से फ़िल्टर करती हैं। वैज्ञानिकों और इसरो (ISRO) के अनुसार, यह जल पट्टी प्राचीन लुप्त सरस्वती नदी का भूगर्भीय मार्ग है, जिसके कारण यहाँ सदियों से शुद्ध पानी का प्रवाह बना हुआ है। इसके अतिरिक्त, इस पानी के नीचे खारे पानी की कोई परत न होना भी इसके शुद्ध और मीठा रहने का एक बड़ा कारण है।
सुमेर सिंह भाटी को रेंजलैंड रेस्टोरेशन अवार्ड 2026′
जैसलमेर (राजस्थान) के पर्यावरण कार्यकर्ता सुमेर सिंह भाटी को मंगोलिया की राजधानी उलानबटोर में ‘रेंजलैंड रेस्टोरेशन अवार्ड 2026’ से सम्मानित किया जाएगा। यह वैश्विक पुरस्कार उन्हें संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय (UNCCD COP17) के तहत 18 अगस्त 2026 को प्रदान किया जाएगा। भाटी ने जैसलमेर के पारंपरिक चारागाह ‘देगराय माता ओरण क्षेत्र’ की करीब 10,000 हेक्टेयर सामुदायिक भूमि को संरक्षित और पुनर्जीवित किया है। पर्यावरण और गोचर भूमि की रक्षा के लिए उनके द्वारा चलाए गए ‘ओरण बचाओ आंदोलन’ के कारण ही आज राजस्थान के इस पारंपरिक संरक्षण मॉडल को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान मिली है।


