तुलजा भवानी मंदिर चित्तौड़गढ़ दुर्ग में विराजित माँ महिषासुर मर्दिनी का पूरा इतिहास और चमत्कार

तुलजा भवानी मंदिर चित्तौड़गढ़ के इतिहास और चमत्कारों की पूरी कहानी। जानिए दासी पुत्र बनवीर द्वारा तुलादान के सोने से निर्मित इस मंदिर का छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी से क्या गुप्त कनेक्शन है, और इससे जुड़ी पन्नाधाय के बलिदान की अमर गाथा।

तुलजा भवानी मंदिर चित्तौड़गढ़ निर्माण और इतिहास

बनवीर द्वारा निर्माण: इस भव्य मंदिर का निर्माण 16वीं शताब्दी (लगभग 1536 से 1540 ईस्वी के बीच) में दासी पुत्र बनवीर ने करवाया था। बनवीर वही क्रूर शासक था जिसने महाराणा विक्रमादित्य की हत्या कर दी थी और कुंवर उदय सिंह (महाराणा प्रताप के पिता) को मारना चाहता था, लेकिन पन्नाधाय के बलिदान के कारण वह असफल रहा।

तुलादान की राशि से निर्माण: ऐसा माना जाता है कि बनवीर ने अपने वजन के बराबर सोना, चांदी और कीमती रत्नों का ‘तुलादान’ (वजन के बराबर दान) किया था। उस तुलादान से प्राप्त धन का उपयोग उसने इस भव्य मंदिर को बनवाने में किया, इसीलिए इस देवी का नाम ‘तुलजा भवानी’ पड़ा।

तुलजा भवानी मंदिर चित्तौड़गढ़ का छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी से संबंध

मराठा साम्राज्य का जुड़ाव: तुलजा भवानी माता मूल रूप से महाराष्ट्र के उस्मानाबाद (वर्तमान धाराशिव) जिले के ‘तुलजापुर’ में प्रतिष्ठित हैं और वे हिंदवी स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी हैं।

मेवाड़ और मराठा संबंध: शिवाजी महाराज के पूर्वज (भोंसले वंश) का संबंध मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश से ही माना जाता है। जब बनवीर चित्तौड़ का शासक बना, तो उसने महाराष्ट्र की इस प्रसिद्ध देवी की आराधना के लिए चित्तौड़गढ़ दुर्ग के भीतर इस भव्य मंदिर की स्थापना करवाई।

तुलजा भवानी मंदिर चित्तौड़गढ़ की वास्तुकला और स्थान

दुर्ग में स्थिति: यह मंदिर चित्तौड़गढ़ दुर्ग के मुख्य प्रवेश द्वारों (राम पोल और पदम पोल) को पार करने के बाद, ‘बनवीर की दिवार’ के ठीक पास स्थित है।

स्थापत्य शैली: मंदिर का निर्माण दक्षिण भारतीय और राजस्थानी नागर शैली के मिश्रण से किया गया है। इसके ऊंचे शिखर, सुंदर नक्काशीदार खंभे और गर्भगृह की बनावट दर्शकों को आकर्षित करती है।

अष्टभुजी प्रतिमा: मंदिर के गर्भगृह में माता तुलजा भवानी की काले संगमरमर (काले पत्थर) से निर्मित अत्यंत सुंदर अष्टभुजी (आठ भुजाओं वाली) प्रतिमा स्थापित है, जो महिषासुर मर्दिनी के रूप में दिखाई देती है।

तुलजा भवानी मंदिर चित्तौड़गढ़ धार्मिक महत्व और उत्सव

मेवाड़ में मान्यता: यद्यपि यह मंदिर एक क्रूर शासक (बनवीर) द्वारा बनवाया गया था, लेकिन देवी माँ की पवित्रता और शक्ति के कारण स्थानीय राजपूतों, मेवाड़ के वासियों और यहाँ आने वाले पर्यटकों के बीच इस मंदिर के प्रति अगाध श्रद्धा है।

नवरात्रि उत्सव: बिलाड़ा की आई माता की तरह ही, चित्तौड़गढ़ की तुलजा भवानी माता के मंदिर में भी चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रों के दौरान विशेष पूजा-अर्चना, घटस्थापना और भव्य मेलों का आयोजन होता है। इस दौरान पूरा दुर्ग ‘जय माता दी’ के जयकारों से गूंज उठता है।

तुलजा भवानी मंदिर के पास स्थित ‘बनवीर की दीवार’ का क्या इतिहास है?

: तुलजा भवानी मंदिर के ठीक समीप एक विशाल अधूरी दीवार दिखाई देती है, जिसे इतिहास में ‘बनवीर की दीवार’ कहा जाता है। जब दासी पुत्र बनवीर ने महाराणा विक्रमादित्य की हत्या कर चित्तौड़ के सिंहासन पर कब्जा किया, तब वह खुद को सुरक्षित करने और दुर्ग को दो भागों में बांटने के लिए इस मजबूत दीवार का निर्माण करवा रहा था। उसका उद्देश्य दुर्ग के भीतर ही अपने लिए एक अभेद्य किला तैयार करना था। लेकिन इसी बीच पन्नाधाय के संरक्षण में बड़े हुए कुंवर उदय सिंह ने मेवाड़ के सरदारों की सहायता से चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण कर दिया। उदय सिंह की सेना ने बनवीर को पराजित कर भगा दिया, जिससे इस दीवार का निर्माण हमेशा के लिए अधूरा रह गया।

क्या तुलजा भवानी माता और चित्तौड़गढ़ की कालिका माता एक ही हैं? दोनों में क्या अंतर है?

नहीं, तुलजा भवानी माता और कालिका माता दो अलग-अलग मंदिर और देवियाँ हैं, जो चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर ही स्थित हैं। कालिका माता मंदिर दुर्ग का सबसे प्राचीन मंदिर है, जो मूल रूप से 8वीं शताब्दी में राजा मानभंग द्वारा निर्मित एक ‘सूर्य मंदिर’ था, जिसे बाद में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के बाद कालिका माता (दुर्गा) मंदिर के रूप में परिवर्तित किया गया। यह गुहिल वंश की आराध्य देवी हैं। इसके विपरीत, तुलजा भवानी मंदिर का निर्माण 16वीं शताब्दी में बनवीर ने करवाया था और इसका सीधा संबंध महाराष्ट्र की तुलजा भवानी और छत्रपति शिवाजी महाराज के वंश से है। दोनों मंदिरों का इतिहास और निर्माण काल पूरी तरह भिन्न है।

बनवीर द्वारा निर्मित होने के बावजूद राजपूत समाज और स्थानीय लोग इस मंदिर को इतनी श्रद्धा क्यों देते हैं?

इतिहास में बनवीर को एक क्रूर शासक, हत्यारे और विश्वासघाती के रूप में देखा जाता है जिसने मेवाड़ के राजपरिवार को नष्ट करने का प्रयास किया। इसके बावजूद, इस मंदिर के प्रति लोगों की श्रद्धा में कोई कमी नहीं आई। इसका मुख्य कारण यह है कि हिंदू संस्कृति में मंदिर का निर्माण चाहे किसी भी राजा या व्यक्ति ने करवाया हो, लेकिन गर्भगृह में स्थापित मूर्ति साक्षात ईश्वर या शक्ति का रूप होती है। स्थानीय राजपूत और मेवाड़ के निवासी बनवीर के कृत्यों से घृणा करते हैं, लेकिन अष्टभुजी तुलजा भवानी माता को साक्षात आदिशक्ति दुर्गा का रूप मानकर पूजते हैं। भक्तों के लिए देवी माँ की पवित्रता सर्वोपरि है।

पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए तुलजा भवानी मंदिर पहुँचने का सही मार्ग और समय क्या है?

तुलजा भवानी मंदिर चित्तौड़गढ़ दुर्ग परिसर के भीतर स्थित है, जो चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड से लगभग 5 से 7 किलोमीटर की दूरी पर है। दुर्ग तक पहुँचने के लिए स्थानीय ऑटो-रिक्शा, टैक्सी और दोपहिया वाहन आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। मंदिर में प्रवेश के लिए दुर्ग का सामान्य टिकट ही मान्य होता है। यह मंदिर साल के बारह महीने खुला रहता है, लेकिन यहाँ आने का सबसे उत्तम समय अक्टूबर से मार्च के बीच का माना जाता है, क्योंकि इस दौरान राजस्थान का मौसम खुशनुमा रहता है। इसके अतिरिक्त, चैत्र और आश्विन नवरात्रि में यहाँ का माहौल सबसे भव्य और दर्शनीय होता है।

तुलजा भवानी मंदिर में ‘भवानी’ शब्द का क्या महत्व है और छत्रपति शिवाजी महाराज की तलवार का इससे क्या संबंध है?

तुलजा भवानी मंदिर में ‘भवानी’ शब्द साक्षात आदिशक्ति, करुणा और दुष्टों का संहार करने वाली माँ दुर्गा का प्रतीक है। इतिहास में ‘भवानी’ नाम का एक और गहरा और वीरगाथाओं से भरा महत्व है। ऐसी सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक मान्यता है कि माँ तुलजा भवानी ने छत्रपति शिवाजी महाराज की राष्ट्रभक्ति और कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें स्वयं एक दिव्य तलवार भेंट की थी। शिवाजी महाराज की उस सबसे प्रसिद्ध और चमत्कारी तलवार का नाम भी देवी माँ के नाम पर ‘भवानी तलवार’ रखा गया था। इसी तलवार के बल पर शिवाजी महाराज ने मुगलों और आदिलशाही साम्राज्य के छक्के छुड़ाकर ‘हिंदवी स्वराज्य’ की स्थापना की थी।

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