रहस्यमयी इतिहास: कहाँ है रावण का ससुराल और मंडोर से क्या है इसका संबंध?

क्या आप जानते हैं कि रावण का ससुराल कहाँ है (where is Ravan’s in-laws house)? जानिए जोधपुर के ऐतिहासिक मंडोर और रावण मंदिर (Mandore Ravan Mandir) का रहस्यमयी इतिहास और क्यों यहाँ दशहरे पर शोक मनाया जाता है।

मंदोदरी का जन्मस्थान और मंडोर का इतिहास (Mandodari’s Birthplace and History of Mandore)

जोधपुर से करीब 9 किलोमीटर दूर स्थित मंडोर (Mandore) का प्राचीन नाम ‘मांडव्यपुर’ था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मंडोर की राजकुमारी और रावण की मुख्य पत्नी महारानी मंदोदरी (Queen Mandodari) थीं। मंदोदरी के पिता का नाम ‘मय दानव’ (May Danav) था, जो उस समय के बेहद कुशल शिल्पी और मंडोर के शासक थे। इसी कारण मंदोदरी का जन्मस्थान (Mandodari ka janamsthan) मंडोर को माना जाता है। मय दानव की पुत्री होने के कारण ही रावण की पत्नी का नाम मंदोदरी पड़ा।

मंडोर में आज भी मौजूद है रावण की चँवरी (Ravan Chawri in Mandore)

मंडोर के खूबसूरत बगीचों और पहाड़ियों के बीच आज भी एक प्राचीन अवशेष मौजूद है, जिसे स्थानीय लोग रावण की चँवरी (Ravan ki Chawri) या विवाह मंडप कहते हैं। मान्यताओं के अनुसार, इसी मंडप में रावण और मंदोदरी के फेरे (wedding vows) हुए थे।

प्राचीन नक्काशी: पत्थरों से बने इस मंडप पर बेहद प्राचीन कलाकृतियां और देवी-देवताओं की मूर्तियां उत्कीर्ण हैं।

विवाह के साक्ष्य: स्थानीय इतिहासकार इसे रावण के विवाह का पुख्ता प्रमाण मानते हैं, जिसे देखने दूर-दूर से पर्यटक आते हैं।

जहाँ दशहरे पर नहीं जलता रावण, मनाया जाता है शोक (Where Ravan is Not Burnt on Dussehra)

पूरे भारत में जहाँ विजयादशमी (Vijayadashami) यानी दशहरे के दिन बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में रावण के पुतले का दहन (burning of Ravan’s effigy) किया जाता है, वहीं जोधपुर के मंडोर में माहौल इसके बिल्कुल विपरीत होता है।

यहाँ के गोधा और दधीच उपजाति के श्रीमाली ब्राह्मण खुद को रावण का वंशज (descendants of Ravan) मानते हैं। उनके लिए रावण लंका का राजा होने के साथ-साथ उनके दामाद (son-in-law) भी थे। दामाद का पुतला जलाना भारतीय संस्कृति में अशुभ माना जाता है। इसलिए यहाँ:

शोक मनाया जाता है: दशहरे के दिन यहाँ के लोग रावण की मृत्यु पर शोक (mourning) व्यक्त करते हैं।

स्नान और तर्पण: इस दिन ये लोग स्नान करके अपने पूर्वज के रूप में रावण का श्राद्ध और तर्पण करते हैं।

जोधपुर का विशेष रावण मंदिर (Special Ravan Temple in Jodhpur)

जोधपुर में मेहरानगढ़ किले (Mehrangarh Fort) की तलहटी में रावण का एक भव्य और विशेष मंदिर बना हुआ है। इस मंदिर में रावण की एक विशाल प्रतिमा स्थापित है, जहाँ नियमित रूप से उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। लोग यहाँ आकर रावण की विद्वता, शिव भक्ति और शास्त्रों के ज्ञान की आराधना करते हैं। इंटरनेट पर मंडोर रावण मंदिर (Mandore Ravan Mandir) कीवर्ड को लोग इतिहास और संस्कृति जानने के लिए काफी सर्च करते हैं।

भारत में रावण की ससुराल से जुड़ी अन्य मान्यताएं (Other Beliefs Related to Ravan’s In-Laws in India)

हालाँकि मंडोर को सबसे प्रमुख मान्यता प्राप्त है, लेकिन भारत के दो अन्य स्थानों को लेकर भी रावण की पत्नी का घर कहाँ था (Ravan ki patni ka ghar kahan tha) जैसी जिज्ञासाओं से जुड़े दावे किए जाते हैं:

मेरठ, उत्तर प्रदेश (Meerut, UP): मेरठ का प्राचीन नाम ‘मयराष्ट्र’ (Mayarashtra) था। माना जाता है कि यह भी मय दानव की राजधानी थी। यहाँ के प्राचीन ‘बिल्वेश्वर नाथ शिव मंदिर’ को लेकर मान्यता है कि इसी मंदिर में मंदोदरी और रावण की पहली मुलाकात हुई थी।

मंदसौर, मध्य प्रदेश (Mandsaur, MP): मंदोदरी के नाम पर इस शहर का नाम मंदसौर पड़ा, ऐसा स्थानीय लोगों का मानना है। यहाँ भी रावण की 35 फीट ऊँची मूर्ति है और लोग रावण को दामाद मानकर उसका सम्मान करते हैं।

जोधपुर के मंडोर में दशहरे पर रावण का पुतला क्यों नहीं जलाया जाता? (Why Ravan’s effigy is not burnt on Dussehra in Mandore?)

पूरे भारत में जहाँ विजयादशमी पर रावण के पुतले का दहन (burning of Ravan’s effigy) किया जाता है, वहीं जोधपुर के मंडोर में इस दिन शोक मनाया जाता है। यहाँ रहने वाले गोधा और दधीच उपजाति के श्रीमाली ब्राह्मण खुद को रावण का वंशज (descendants of Ravan) मानते हैं। उनके लिए रावण लंका के राजा होने के साथ-साथ उनके पूजनीय दामाद थे। हिंदू संस्कृति में दामाद का पुतला जलाना घोर अशुभ माना जाता है। इसलिए, दशहरे के दिन यहाँ के लोग शोक व्यक्त करते हैं, पुतला जलाने की जगह स्नान करके रावण का श्राद्ध करते हैं और उनके लिए तर्पण करते हैं।

रावण का ससुराल कहाँ है और इसके क्या प्रमाण हैं? (Where is Ravan’s in-laws house and what are its proofs?)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, लंकापति रावण का ससुराल राजस्थान के जोधपुर शहर के पास स्थित मंडोर (Mandore) में माना जाता है। मंडोर को रावण की मुख्य पत्नी महारानी मंदोदरी का जन्मस्थान कहा जाता है। इसके ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में मंडोर बाग की पहाड़ियों के बीच आज भी एक प्राचीन पत्थरों का ढांचा मौजूद है, जिसे स्थानीय लोग ‘रावण की चँवरी’ (Ravan Chawri) या विवाह मंडप कहते हैं। इस मंडप पर प्राचीन नक्काशी और देवी-देवताओं की मूर्तियां बनी हुई हैं। इतिहासकारों और स्थानीय लोगों का मानना है कि इसी मंडप में रावण और मंदोदरी के फेरे हुए थे।

मंदोदरी के पिता मय दानव का किला (Mandodari ke pita May Danav ka kila)

रामायण काल में जोधपुर के मंडोर क्षेत्र पर मय दानव का शासन था। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, ‘मंदोदरी के पिता मय दानव का किला’ (Mandodari ke pita May Danav ka kila) और उनकी भव्य नगरी इसी क्षेत्र में विकसित थी। मय दानव को देवताओं और असुरों का एक अत्यंत कुशल और चमत्कारी वास्तुकार (Architect) माना जाता था, जिन्होंने मंडोर को एक अभेद्य दुर्ग और सुंदर महलों का रूप दिया था। समय के साथ वह प्राचीन किला अब खंडहरों में बदल चुका है, लेकिन मंडोर के ऊंचे पहाड़ों पर आज भी मौजूद पत्थरों की विशाल दीवारें और अवशेष मय दानव के उस गौरवशाली काल की गवाही देते हैं।

जोधपुर का रावण मंदिर किसने बनवाया (Jodhpur ka Ravan mandir kisne banwaya)

जोधपुर के मेहरानगढ़ किले की तलहटी में स्थित इस अनूठे रावण मंदिर का निर्माण यहाँ के स्थानीय श्रीमाली गोधा ब्राह्मण समाज द्वारा करवाया गया है। श्रीमाली ब्राह्मण खुद को रावण का वंशज मानते हैं और रावण को अपने दामाद के रूप में पूजते हैं। इस मंदिर के गर्भगृह में रावण की एक भव्य और विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है। इस मंदिर को बनवाने का मुख्य उद्देश्य रावण की विद्वता, प्रकांड शास्त्र ज्ञान और उसकी अमर शिव भक्ति को सम्मान देना था।

फैक्ट फाइल: रावण का ससुराल और अनोखी परंपराएं (Fact File)

  • मुख्य ससुराल स्थान :मंडोर (Mandore), जोधपुर, राजस्थान, भारत
  • ऐतिहासिक साक्ष्यरावण की चँवरी (Ravan Chawri) – मंडोर बाग में स्थित प्राचीन विवाह मंडप
  • ऐतिहासिक साक्ष्य :रावण की चँवरी (Ravan Chawri) – मंडोर बाग में स्थित प्राचीन विवाह मंडप
  • रावण का मंदिर :मेहरानगढ़ किले की तलहटी, जोधपुर (श्रीमाली ब्राह्मणों द्वारा निर्मित)
  • रावण के वंशज :जोधपुर के श्रीमाली ब्राह्मण (विशेषकर गोधा और दधीच उपजाति)
  • परंपरा :यहाँ रावण दहन नहीं होता; इस दिन को शोक दिवस के रूप में मनाया जाता है
  • अनूठा धार्मिक अनुष्ठान :दशहरे की सुबह रावण का श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण और जनेऊ बदलना
  • दामाद का सम्मान: जोधपुर और मंदसौर दोनों ही जगहों पर रावण को खलनायक नहीं, बल्कि उस क्षेत्र का ‘दामाद’ माना जाता है, इसलिए उनका पुतला जलाना वर्जित है।
  • अमर शिव भक्त और विद्वान: यहाँ रावण की पूजा उनके अहंकार के लिए नहीं, बल्कि उनकी अतुलनीय शिव भक्ति, चारों वेदों के ज्ञान और प्रकांड विद्वता के लिए की जाती है।
  • माता-पिता और वंशपिता महर्षि विश्रवा (ऋषि पुलस्त्य के पुत्र) और माता कैकसी (राक्षस कुल)। इस प्रकार रावण आधा ब्राह्मण और आधा राक्षस था।
  • संगीत और वाद्य यंत्ररावण एक उत्कृष्ट संगीतकार था। उसने ‘रावणहत्था’ (Ravanahatha) नामक वाद्य यंत्र का आविष्कार किया, जिसे दुनिया के सबसे प्राचीन वायलिन का रूप माना जाता है।
  • रचित स्रोत और स्तुतिभगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए रावण ने ‘शिव तांडव स्तोत्र’ (Shiva Tandava Stotra) की रचना की थी, जो आज भी शिव आराधना का सबसे शक्तिशाली स्रोत है।
  • विज्ञान और ज्योतिष ज्ञानरावण एक महान खगोलशास्त्री और ज्योतिषी था। उसने ‘रावण संहिता’ (Ravana Samhita) नामक ग्रंथ लिखा, जिसमें ज्योतिष और तंत्र विज्ञान का गूढ़ ज्ञान है।
  • आयुर्वेद और चिकित्सारावण आयुर्वेद का प्रकांड ज्ञाता था। उसने ‘अर्क प्रकाश’, ‘कुमारतंत्र’ और ‘नाड़ी परीक्षा’ जैसे चिकित्सा ग्रंथों की रचना की, जिसमें बाल रोगों के इलाज और नाड़ी देखकर बीमारी पकड़ने की विधियां हैं।
  • लंका का असली वास्तुकारहालाँकि लंका का निर्माण कुबेर के लिए भगवान विश्वकर्मा ने किया था, लेकिन रावण ने कुबेर को हराकर उस पर विजय प्राप्त की और उसे सोने की भव्य नगरी में तब्दील किया।
  • ग्रहों पर नियंत्रण: पौराणिक कथाओं के अनुसार, रावण का ज्योतिषीय ज्ञान और शक्ति इतनी असीम थी कि उसने अपने पुत्र मेघनाद के जन्म के समय सभी नौ ग्रहों को उच्च स्थान पर रहने के लिए बाध्य कर दिया था, ताकि उसका पुत्र अमर हो सके।
  • श्री राम द्वारा सम्मान: लक्ष्मण को राजनीति और कूटनीति की शिक्षा देने के लिए स्वयं भगवान श्री राम ने उन्हें मृत्युशैया पर लेटे रावण के चरणों के पास भेजा था, क्योंकि रावण से बड़ा नीतिशास्त्र का ज्ञाता उस युग में कोई नहीं था।

जोधपुर में रावण के वंशज (Jodhpur mein Ravan ke vanshaj)

राजस्थान के सांस्कृतिक शहर ‘जोधपुर में रावण के वंशज’ (Jodhpur mein Ravan ke vanshaj) आज भी निवास करते हैं। यहाँ के गोधा और दधीच उपजाति के श्रीमाली ब्राह्मण समाज के लोग खुद को लंकापति रावण की संतानें मानते हैं। लोक मान्यताओं के अनुसार, जब रावण मंदोदरी से विवाह करने मंडोर आए थे, तब उनके साथ कुछ ब्राह्मण भी यहाँ आए थे जो बाद में यहीं बस गए। ये लोग रावण को एक राजा से बढ़कर एक परम ज्ञानी ब्राह्मण और अपना पूजनीय पूर्वज मानते हैं। यही वजह है कि ये लोग कभी भी रावण दहन नहीं देखते और दशहरे के त्योहार को एक उत्सव की तरह नहीं बल्कि शोक दिवस के रूप में मनाते हैं।

जोधपुर के श्रीमाली ब्राह्मण दशहरे के दिन अपनी जनेऊ क्यों बदलते हैं? (Why Shrimali Brahmins of Jodhpur change their Janeu on Dussehra?)

जोधपुर के गोधा और दधीच उपजाति के श्रीमाली ब्राह्मण खुद को रावण का वंशज मानते हैं। हिंदू सनातन धर्म की परंपरा के अनुसार, जब परिवार में किसी सगे संबंधी या पूर्वज की मृत्यु होती है, तो सूतक (शोक काल) के बाद पवित्र होने के लिए पुरानी जनेऊ (यज्ञोपवीत) को बदलकर नई जनेऊ धारण की जाती है। चूंकि दशहरे के दिन लंकापति रावण का वध हुआ था, इसलिए ये लोग इस दिन को अपने पूर्वज का मृत्यु दिवस मानते हैं। सुबह रावण का तर्पण और श्राद्ध करने के बाद, वे शोक निवारण और आत्म-शुद्धि के प्रतीक के रूप में अपनी पुरानी जनेऊ को बदलकर नई जनेऊ पहनते हैं।

रावण और मंदोदरी के विवाह के समय मंडोर आने वाले ब्राह्मणों का क्या इतिहास है? (What is the history of Brahmins who came to Mandore during Ravan and Mandodari’s wedding?)

स्थानीय लोक कथाओं और इतिहासकारों के अनुसार, जब लंकापति रावण महारानी मंदोदरी से विवाह करने के लिए बारात लेकर लंका से मंडोर (जोधपुर) आए थे, तब उनके साथ लंका के प्रकांड पंडित और ब्राह्मण भी विवाह की रस्में संपन्न कराने आए थे। विवाह संपन्न होने के बाद, उन ब्राह्मणों में से कुछ परिवार मंडोर की शांत और पावन भूमि से इतने प्रभावित हुए कि वे लंका वापस नहीं गए और यहीं स्थायी रूप से बस गए। आज जोधपुर में रहने वाले गोधा गोत्र के श्रीमाली ब्राह्मण उन्हीं पौराणिक ब्राह्मणों के वंशज माने जाते हैं, जो रावण के काल से यहाँ रह रहे हैं।

मंडोर में स्थित ‘रावण की चँवरी’ की वास्तुकला और वर्तमान स्थिति क्या है? (What is the architecture and current status of ‘Ravan ki Chawri’ in Mandore?)

मंडोर बाग की पहाड़ियों की तलहटी में स्थित ‘रावण की चँवरी’ एक प्राचीन और अनूठा चौकोर मंडपनुमा ढांचा है। इसकी वास्तुकला प्रतिहार कालीन स्थापत्य कला से मेल खाती है। यह पूरी तरह से लाल और बलुआ पत्थरों (Red Sandstone) से निर्मित है, जिसके खंभों पर प्राचीन हिंदू देवी-देवताओं, अप्सराओं और बेल-बूटों की बेहद बारीक नक्काशी की गई है। वर्तमान में यह ऐतिहासिक स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और राजस्थान पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। समय के थपेड़ों के कारण इसके कुछ हिस्से खंडित जरूर हुए हैं, लेकिन आज भी यह पर्यटकों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र है।

जोधपुर के अलावा राजस्थान में रावण से जुड़ा दूसरा प्रमुख स्थान कौन सा है? (Apart from Jodhpur, which is the other major place associated with Ravan in Rajasthan?)

जोधपुर (ससुलार) के अलावा राजस्थान के जालौर (Jalore) जिले में स्थित मुदगलेश्वर महादेव मंदिर का संबंध भी रावण से जोड़ा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रावण एक परम शिव भक्त था और अपनी लंका यात्राओं के दौरान उसने इस क्षेत्र में रुककर भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। यहाँ रावण द्वारा स्थापित माना जाने वाला एक प्राचीन शिवलिंग मौजूद है। इसके अतिरिक्त, राजस्थान के प्रसिद्ध वाद्य यंत्र ‘रावणहत्था’ का उपयोग आज भी यहाँ के लोक कलाकारों (भोपा समुदाय) द्वारा पाबूजी की फड़ गाते समय प्रमुखता से किया जाता है।

मंडोर (प्राचीन नाम मांडव्यपुर) जोधपुर का ऐतिहासिक स्थल है, जिसका नाम यहाँ तपस्या करने वाले मांडव ऋषि के नाम पर पड़ा। रावण से इसका संबंध शोध का विषय है। यहाँ का मंडोर उद्यान प्रमुख पर्यटन केंद्र है, जहाँ चौथी शताब्दी का प्राचीन किला, देवताओं की साल, जनाना महल, एक थंबा महल और मारवाड़ के राजाओं के देवल स्थित हैं।

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