राजस्थान का कोटा जिला न केवल अपनी कोचिंग इंडस्ट्री के लिए बल्कि अपनी अनूठी पारंपरिक कला कोटा डोरिया (Kota Doria Saree) के लिए भी दुनिया भर में प्रसिद्ध है। कोटा के पास कैथून (Kaithoon) कस्बे में बनने वाली यह साड़ी अपने हल्के वजन, शानदार बुनावट और शाही लुक के कारण महिलाओं की पहली पसंद मानी जाती है।
कोटा डोरिया का इतिहास (History of Kota Doria)
इस अद्भुत कपड़े का इतिहास सदियों पुराना है। मूल रूप से इस बुनाई तकनीक की शुरुआत मैसूर (कर्नाटक) में हुई थी, जहाँ इन्हें ‘मसूइया’ कहा जाता था। 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, कोटा के तत्कालीन मुग़ल सेनापति राव किशोर सिंह (Rao Kishore Singh) इस कला से अत्यधिक प्रभावित हुए। वे मैसूर से कई बुनकर परिवारों को अपने साथ राजस्थान ले आए और उन्हें कैथून में बसाया। इसके बाद इस हस्तशिल्प को शाही संरक्षण (Royal Patronage) मिला और इसे ‘कोटा डोरिया’ नाम दिया गया।
कोटा डोरिया की विशेषताएं
कोटा डोरिया साड़ी की सबसे बड़ी विशेषता इसका खाट पैटर्न (Khat Pattern) है। यह कपड़ा सूती (Cotton) और रेशम (Silk) के धागों के बेहतरीन मिश्रण से हैंडलूम पर तैयार किया जाता
चेक डिज़ाइन (Chequered Weave): इसमें धागों को इस तरह बुना जाता है कि कपड़े पर छोटे-छोटे चौकोर बॉक्स या चेक (Checks) बन जाते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘खाट’ कहते हैं।
हल्का वजन (Lightweight Fabrics): सूती धागा कपड़े को मजबूती और आराम प्रदान करता है, जबकि रेशम का धागा इसे एक बेहतरीन चमक (Shine) और हल्कापन देता है। यह चिलचिलाती गर्मी के लिए एक परफेक्ट समर वियर (Perfect Summer Wear) है।
जीआई टैग और वैश्विक पहचान (GI Tag and Global Recognition)
इस पारंपरिक कला की प्रामाणिकता और विशिष्टता को बनाए रखने के लिए कोटा डोरिया को भारत सरकार द्वारा भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication – GI Tag) दिया गया है। इसका मतलब है कि केवल कैथून और उसके आसपास के चुनिंदा क्षेत्रों में पारंपरिक हैंडलूम पर बने कपड़े को ही असली कोटा डोरिया माना जा सकता है। आज बॉलीवुड की मशहूर हस्तियों से लेकर अंतरराष्ट्रीय फैशन शो तक इसकी जबरदस्त मांग है।
📊 फैक्ट फाइल: कोटा डोरिया (Fact File: Kota Doria)
- उत्पत्ति स्थान (Origin Place): मैसूर, कर्नाटक (शुरुआती दौर में इसे मसूइया कहा जाता था)
- मुख्य निर्माण केंद्र (Main Hub): कैथून (Kaithoon), कोटा जिला, राजस्थान
- शाही संरक्षक (Royal Patron): कोटा के महाराव किशोर सिंह (17वीं शताब्दी में बुनकरों को राजस्थान लाए)
- मुख्य सामग्री (Raw Materials): शुद्ध कपास (Cotton Thread) और रेशम (Silk Thread)
- हस्तशिल्प का प्रकार (Craft Type): पारंपरिक हथकरघा बुनाई (Traditional
- मुख्य पहचान (Signature Style): कपड़े पर चौकोर बॉक्स की बुनावट, जिसे ‘खाट पैटर्न’ (Khat Pattern) कहते हैं ।
- एक साड़ी में बॉक्स (Total Checks): एक मानक कोटा डोरिया साड़ी में लगभग 300 से 350 खाट (चेक्स) होते हैं।
- विशेष कानूनी सुरक्षा (Legal Protection): भारत सरकार द्वारा जीआई टैग (Geographical Indication – GI Tag) प्राप्त ।
- कपड़े की खासियत (Fabric Feature): अत्यंत हल्का वजन (Lightweight), पारदर्शी (Translucent) और आरामदायक
- उपयुक्त मौसम (Best Season): भीषण गर्मी के लिए परफेक्ट समर वियर (Perfect Summer Wear)
- शुरुआती उपयोग (Initial Use): 17वीं शताब्दी में इसका उपयोग साड़ियों के लिए नहीं, बल्कि राजा-महाराजाओं की शाही पगड़ी (Paagh/Turbans) बनाने के लिए केवल 8 इंच चौड़े करघे पर होता था।
- धागों का सटीक अनुपात (Yarn Ratio): मजबूती और चमक का संतुलन बनाने के लिए इसमें 80% सूती (Cotton) और 20% रेशम (Silk) के धागों का अनूठा मिश्रण इस्तेमाल किया जाता है।
- खाट की गणितीय संरचना (Anatomy of a Khat): इसके एक चौकोर बॉक्स (खाट) को बनाने के लिए ताने (Warp) और बाने (Weft) में 14-14 धागों (कुल 28 धागे) का एक निश्चित सेट बुना जाता है, जिसमें 20 धागे सूती और 8 धागे सिल्क के होते हैं।
- बुनाई का अनोखा तरीका (Reverse Weaving): कोटा डोरिया की बुनाई उल्टी तरफ (Back Side) से की जाती है। बुनकर के सामने कपड़े का उल्टा हिस्सा होता है और वह डिज़ाइन को देखने व परखने के लिए शीशे (Mirror) का इस्तेमाल करता है।
- प्राकृतिक चमक का सीक्रेट (Starch Secret): धागों को कड़ा और मजबूत बनाने के लिए बुनाई के दौरान उन पर प्याज के रस और पके हुए चावल के पानी (मांड) का लेप लगाया जाता है, जिससे कपड़े को अलग से फिनिशिंग की जरूरत नहीं पड़ती।
- करघा सेट करने का समय (Loom Setting Time): बुनाई शुरू करने से पहले ग्राफ पेपर की डिज़ाइन के आधार पर करघे पर धागे सेट करने में ही 2 से 5 घंटे का समय लग जाता है।
- समय बनाम मेहनत (Time Investment): हाथ से एक साधारण 30-मीटर के थान (जिसमें 5 साड़ियाँ बनती हैं) को बुनने में 20 से 25 दिन का समय लगता है, जबकि भारी डिज़ाइन वाली साड़ी में 1 महीने से भी ज्यादा लग जाता है।
- जरी का शाही मिश्रण (Zari Insertion): साड़ी के बॉर्डर को और अधिक आकर्षक बनाने के लिए इसमें असली सोने और चांदी की परत वाले धागे, जिन्हें ‘जरी’ (Zari) कहते हैं, सीधे सूरत (गुजरात) से मंगवाकर बुने जाते हैं।
- फैशन शो में एंट्री (Runway Debut): साल 2006 में प्रसिद्ध भारतीय फैशन डिज़ाइनर ऋतु कुमार ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर कोटा डोरिया का पहला बड़ा फैशन कलेक्शन पेश किया था, जिसके बाद इसे ‘ग्लोबल वोग’ मिला।
- थ्री-इन-वन वैरायटी (Three Variants): बाज़ार में यह कपड़ा तीन मुख्य रूपों में बिकता है—प्लेन (बिना डिज़ाइन), प्रिंटेड (ब्लॉक प्रिंटिंग जैसे डाबू या बगरू के साथ) और ज़री/ज़र्दोजी वर्क (भारी कढ़ाई के साथ)।
- बुनकरों की ताकत (Women Artisans): कैथून और आसपास के गाँवों में कोटा डोरिया करघों को संभालने वाले लगभग 80% कारीगर महिलाएं हैं, जो घर बैठे इस कला के जरिए आत्मनिर्भर बनी हैं।
- असली बनाम नकली की पहचान (Authentication Test): असली हस्तनिर्मित (Handloom) कोटा डोरिया के कपड़े पर बुनाई की असमानता और उंगलियों से छूने पर सूती-सिल्क का कड़क अहसास होता है, जबकि पावरलूम (मशीन) पर बनी नकली साड़ी पूरी तरह चिकनी और नायलॉन जैसी दिखती है।
असली और नकली कोटा डोरिया साड़ी की पहचान कैसे करें? (How to identify original Kota Doria saree?)
असली कोटा डोरिया साड़ी की पहचान उसके ‘खाट’ (चेक पैटर्न) और छूने के अहसास से होती है। हस्तनिर्मित (Handloom) असली साड़ी को छूने पर सूती और सिल्क के धागों के कारण एक हल्का कड़कपन और प्राकृतिक खुरदरापन महसूस होता है। इसके धागों की बुनावट में हाथ से बने होने के कारण हल्की असमानता दिखाई देती है। इसके विपरीत, पावरलूम (मशीन) से बनी नकली साड़ियाँ नायलॉन या पॉलिएस्टर मिश्रित होती हैं, जो छूने में अत्यधिक चिकनी, चमकदार और पूरी तरह एक समान दिखती हैं। असली साड़ी पर सरकार द्वारा प्रमाणित ‘हैंडलूम मार्क’ या ‘जीआई टैग’ का लोगो भी लगा होता है।
कोटा डोरिया साड़ी को धोने और इसकी देखभाल करने का सही तरीका क्या है? (How to wash and care for Kota Doria sarees?)
कोटा डोरिया साड़ी बेहद नाजुक और हल्के कपड़े से बनी होती है, इसलिए इसकी लंबी उम्र के लिए पहली दो-तीन बार केवल ‘ड्राई क्लीन’ (Dry Clean) कराने की सलाह दी जाती है। यदि घर पर धोना हो, तो ठंडे पानी में माइल्ड डिटर्जेंट या बेबी शैम्पू का इस्तेमाल करें और इसे कभी भी जोर से न निचोड़ें। इस कपड़े को कभी भी सीधे तेज धूप में न सुखाएं, बल्कि छांव में हवा में सुखाएं। साड़ी पर प्रेस (Iron) करते समय हमेशा हल्के गर्म तापमान का उपयोग करें और कड़कपन बनाए रखने के लिए समय-समय पर हल्के स्टार्च (मांड) का प्रयोग करें।
कोटा डोरिया साड़ियों की कीमत इतनी अधिक क्यों होती है? (Why are Kota Doria sarees so expensive?)
कोटा डोरिया साड़ियों की कीमत मुख्य रूप से इसमें लगने वाली अत्यधिक मानवीय मेहनत, समय और शुद्ध सामग्री पर निर्भर करती है। एक साधारण साड़ी को हाथ से बुनने में एक कुशल कारीगर को 15 से 25 दिन का समय लगता है, जबकि जटिल डिज़ाइन और ज़री वाली साड़ियों में एक महीने से भी अधिक का समय लग जाता है। इसमें प्रयुक्त होने वाला शुद्ध शहतूत सिल्क और बेहतरीन क्वालिटी का कॉटन इसे महंगा बनाता है। जब इसमें असली सोने या चांदी के धागों (Pure Zari) का काम शामिल किया जाता है, तो इसकी कीमत हजारों से लाखों तक पहुँच जाती है।
क्या कोटा डोरिया कपड़ा केवल साड़ियों के लिए ही उपयुक्त है? (Is Kota Doria fabric only used for sarees?)
शुरुआत में कोटा डोरिया का उपयोग केवल शाही पगड़ियों और बाद में साड़ियों के लिए किया जाता था, लेकिन आधुनिक फैशन इंडस्ट्री में इसके उपयोग का दायरा बहुत बढ़ गया है। आज इसके अनोखे ट्रांसपेरेंट लुक और हल्के वजन के कारण डिज़ाइनर्स इससे महिलाओं के सूट, दुपट्टे, ट्रेंडी स्टोल और लहंगे तैयार कर रहे हैं। पुरुषों के लिए इसके समर कुर्ते और शेरवानी बहुत पसंद किए जाते हैं। इसके अलावा, होम डेकोर में इस कपड़े का इस्तेमाल करके प्रीमियम क्वालिटी के पर्दे, कुशन कवर, लैंपशेड और टेबल रनर भी बनाए जा रहे हैं जो घरों को एक विंटेज लुक देते हैं।
कोटा डोरिया को जीआई टैग (GI Tag) कब मिला
कोटा डोरिया को जुलाई 2005 में भारत सरकार के भौगोलिक उपदर्शन रजिस्ट्री द्वारा आधिकारिक रूप से जीआई टैग (Geographical Indication – GI Tag) प्रदान किया गया था। कोटा डोरिया राजस्थान का पहला उत्पाद था जिसे यह प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली थी। यह प्रमाणीकरण कपास और रेशम का मिश्रण (Cotton and Silk Blend) से बनी प्रामाणिक साड़ियों को कानूनी सुरक्षा देता है। यह जीआई टैग हैंडलूम वस्त्र निर्माण (Handloom Textile Manufacturing) के क्षेत्र में कैथून के बुनकर परिवारों की कला को मशीन निर्मित नकली कपड़ों से बचाने के लिए दिया गया था।
‘मसूइया’ मलमल का संबंध किस जिले से है और इसका यह नाम क्यों पड़ा?
मसूइया’ मलमल का सीधा संबंध कोटा जिले से है। ऐतिहासिक रूप से इस बेहद महीन और हल्के कपड़े की बुनाई तकनीक की उत्पत्ति दक्षिण भारत के मैसूर साम्राज्य (Mysore Kingdom) में हुई थी। जब मैसूर के कुशल बुनकर कोटा रियासत में आकर बसे, तो उनके द्वारा तैयार किए जाने वाले बारीक कपड़े को उनके मूल स्थान के नाम पर ‘मसूइया’ या ‘मसूरिया मलमल’ कहा जाने लगा।
राव किशोर सिंह और कोटा डोरिया का इतिहास क्या है? किस राजा ने इस कला को संरक्षण दिया था?
कोटा डोरिया के विकास में 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कोटा रियासत के शासक महाराव किशोर सिंह (Maharao Kishore Singh) का योगदान अतुलनीय माना जाता है। मुग़ल सेनापति के रूप में दक्षिण भारत के अभियानों के दौरान वे मैसूर के बुनकरों की कला से अत्यधिक प्रभावित हुए थे। उन्होंने कला प्रेमी राजा की तरह इस शिल्प को शाही संरक्षण (Royal Patronage) दिया और मैसूर से मास्टर बुनकर परिवारों को लाकर कोटा के समीप कैथून कस्बे (Kaithoon Town) में स्थाई रूप से बसाया। इसके बाद ही यह कला ‘कोटा डोरिया’ के नाम से फली-फूली, जिसका शुरुआती उपयोग राजाओं की शाही पगड़ी (Royal Turbans) बनाने के लिए होता था।
कोटा डोरिया फैब्रिक ऑनलाइन / मीटर प्राइस (Kota Doria Fabric Online / Meter Price)
विवरण: यदि आप बुटीक चलाते हैं, होम टेलर हैं या कस्टमाइज्ड आउटफिट तैयार करना चाहते हैं, तो ऑनलाइन थान (Fabric Rolls) में कोटा डोरिया कपड़ा खरीदना सबसे बेस्ट विकल्प है। यह पूरी तरह कस्टमाइजेबल होता है।
ऑनलाइन प्राइस रेंज: सादे (Plain Dyeable) कपड़े की कीमत ₹110 से ₹200 प्रति मीटर से शुरू होती है। वहीं डिजिटल प्रिंटेड या फ्लोरल एम्ब्रॉयडरी वाले प्रीमियम सिल्क कोटा डोरिया कपड़े की कीमत ₹350 से ₹750 प्रति मीटर तक जाती है।
कहाँ से खरीदें: आप इसे FabCouture, Fabcurate, और थोक में खरीदने के लिए IndiaMART जैसी वेबसाइट्स से ऑनलाइन ऑर्डर कर सकते हैं।
प्योर कॉटन कोटा डोरिया सूट्स / ड्रेस मटेरियल (Pure Cotton Kota Doria Suits / Dress Material)
विवरण: चिलचिलाती गर्मी के मौसम के लिए बिना सिले सूट का यह कपड़ा एक परफेक्ट समर वियर (Perfect Summer Wear) है। इसकी अनूठी ‘खाट’ बुनावट त्वचा को हवा देती है और शरीर को ठंडा रखती है। आमतौर पर इसमें 2.5 मीटर का कुर्ता और 2.5 मीटर का शानदार दुपट्टा शामिल होता है।
ऑनलाइन प्राइस रेंज: हल्के डेली वियर अनस्टिच्ड सूट सेट आपको ऑनलाइन ₹550 से ₹999 के बीच मिल जाएंगे। वहीं प्रीमियम प्योर कॉटन कोटा डोरिया सूट (दुपट्टे के साथ) की कीमत ₹1,390 से ₹2,400 के बीच होती है।
कहाँ से खरीदें: यह रेंज आपको Amazon India और Kota Doria World जैसी प्रामाणिक वेबसाइट्स पर आसानी से मिल जाएगी।
गोटा पत्ती वर्क और जरी बॉर्डर कोटा डोरिया साड़ी (Kota Doria Saree with Gota Patti Work / Zari Border)
विवरण: त्योहारों, शादियों और मांगलिक अवसरों के लिए ये साड़ियाँ महिलाओं की पहली पसंद होती हैं। इसके पारदर्शी (Translucent) और हल्के बेस पर राजस्थान का पारंपरिक गोटा पत्ती का काम और किनारों पर सोने-चांदी के धागों का जरी बॉर्डर इसे बेहद शाही और आकर्षक लुक देता है।
ऑनलाइन प्राइस रेंज: मशीन निर्मित या सेमी-कोटा गोटा पत्ती साड़ियाँ ₹1,200 से ₹2,500 के बीच आती हैं, जबकि शुद्ध हैंडलोम सिल्क कोटा डोरिया पर किया गया हैवी गोटा पत्ती और असली ज़री का काम ₹3,500 से ₹8,000+ तक की रेंज में बिकता है।
कहाँ से खरीदें: त्योहारों के विशेष कलेक्शन के लिए आप Kotadoriaworld या राजस्थानी एथनिक स्टोर्स पर विज़िट कर सकते हैं।
ब्लॉक प्रिंटेड / लहरिया कोटा डोरिया (Block Printed / Leheriya Kota Doria)
विवरण: यह श्रेणी राजस्थानी कला की सादगी और जीवंतता को दर्शाती है। इसमें कोटा डोरिया के कपड़े पर जयपुर की प्रसिद्ध सांगानेरी और बगरू हैंड-ब्लॉक प्रिंटिंग (Hand-Block Print) की जाती है। सावन के महीने और तीज-त्योहारों के लिए इसी कपड़े पर सतरंगी लहरिया (Leheriya) और बांधनी डिज़ाइन तैयार किए जाते हैं।
ऑनलाइन प्राइस रेंज: ब्लॉक प्रिंटेड दुपट्टे और सूट्स की शुरुआत ₹250 से ₹300 प्रति मीटर (कपड़े के लिए) होती है, और पूरा अनस्टिच्ड 3-पीस सूट सेट लगभग ₹1,450 से ₹1,890 के बीच ऑनलाइन मिल जाता है।
कहाँ से खरीदें: इसके सबसे बेहतरीन कलेक्शन के लिए आप The Studio Bagru और Doeraa जैसी वेबसाइट्स को चेक कर सकते हैं।
कोटा डोरिया बुनाई प्रक्रिया और तकनीक (Weaving Process & Technique)
कोटा डोरिया की बुनाई पारंपरिक पिट लूम (Pit Loom) यानी गड्ढे वाले हथकरघा पर की जाती है। इसकी प्रक्रिया तीन मुख्य चरणों में पूरी होती है: ताना तैयार करना (Warping), करघे पर धागे पिरोना (Drafting), और बुनाई (Weaving)। बुनकर जमीन में बने गड्ढे में पैर रखकर करघे के पैडल (Treadles) को नियंत्रित करता है। बुनाई के दौरान धागों को टूटने से बचाने और उन्हें कड़क बनाए रखने के लिए उन पर प्याज के रस और पके हुए चावल के मांड (Starch) का लेप लगाया जाता है। बुनाई की यह अनूठी शैली पीछे (Reverse Side) से की जाती है, जहाँ डिज़ाइन की सटीकता देखने के लिए बुनकर शीशे (Mirror) का उपयोग करता है।
खाट पैटर्न की गणितीय संरचना (Mathematical Structure of Khat)
कोटा डोरिया कपड़े की सबसे बड़ी खूबी इसका जालीदार खाट पैटर्न (Khat Pattern) है, जो पूरी तरह एक निश्चित गणितीय अनुपात पर आधारित होता है। कपड़े में दिखने वाले एक छोटे चौकोर बॉक्स (खाट) को बनाने के लिए ताने (Warp – लंबाई के धागे) और बाने (Weft – चौड़ाई के धागे) में 14-14 धागों के सेट (कुल 28 धागे) को एक खास ज्यामितीय क्रम में बुना जाता है। इस 14 धागों के सेट का गणितीय अनुपात 8 सूती धागे (Cotton) और 6 रेशम धागे (Silk) का होता है। धागों का यही सटीक संयोजन कपड़े को उसकी अनूठी ट्रांसपेरेंट जालीदार बनावट, मजबूती और शाही चमक प्रदान करता है।
कोटा डोरिया जीआई टैग केस स्टडी (GI Tag Case Study)
कोटा डोरिया को इसकी प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए भारत सरकार द्वारा जुलाई 2005 में भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्रदान किया गया था, जिसका पंजीकरण नंबर 10 है। कानूनी दस्तावेजों के अनुसार, इस कानून के तहत केवल राजस्थान के कोटा जिले के कैथून, बूंदी और बारां के चुनिंदा क्षेत्रों में पारंपरिक हथकरघा पर बुने गए कपड़े को ही ‘असली कोटा डोरिया’ माना जा सकता है। यह अधिकार मशीन निर्मित या पावरलूम के नकली कपड़ों को ‘कोटा डोरिया’ नाम से बेचने पर कानूनी रोक लगाता है। यह केस स्टडी दर्शाती है कि कैसे जीआई टैग ने स्थानीय बुनकरों के बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights) की रक्षा की है।
मॉडर्न कोटा डोरिया ड्रेस डिज़ाइन्स (Modern Kota Doria Dress Designs)
पारंपरिक साड़ियों से हटकर, आधुनिक फैशन में कोटा डोरिया का उपयोग इंडो-वेस्टर्न ड्रेसेस, शॉर्ट ट्यूनिक्स और ट्रेंडी को-ऑर्ड सेट्स (Co-ord Sets) बनाने के लिए बड़े पैमाने पर हो रहा है [shopping]. इसके जालीदार और हल्के ट्रांसपेरेंट लुक के कारण डिज़ाइनर्स इसके नीचे कॉटन की कंट्रास्ट लाइनिंग (अस्तर) लगाकर बेहद खूबसूरत फ्लेयर्ड मैक्सी ड्रेसेस और केप श्रग्स तैयार कर रहे हैं. यह कपड़ा गर्मियों में वेस्टर्न और फ्यूजन कपड़ों को एक बहुत ही शानदार, फ्लोई (Flowy) और ब्रीदेबल (Hawaadaar) लुक देता है, जो आजकल की कामकाजी महिलाओं और कॉलेज जाने वाली लड़कियों के बीच काफी पॉपुलर है ।
व्हाइट डाइएबल कोटा डोरिया फैब्रिक (White Dyeable Kota Doria Fabric)
प्लेन सफेद या ऑफ-व्हाइट कोटा डोरिया फैब्रिक कस्टमाइजेशन (Customization) के शौकीनों के लिए सबसे बेहतरीन विकल्प है. यह पूरी तरह से शुद्ध सूती और रेशमी धागों से बना होने के कारण डाई-फ्रेंडली (Dye-friendly) होता है. महिलाएं और बुटीक ओनर्स इस अनस्टिच्ड थान (Fabric Rolls) को खरीदकर अपनी पसंद के अनुसार ब्राइट कलर्स, टाई-एंड-डाई, या राजस्थान की मशहूर लहरिया और शिबोरी (Shibori) तकनीक से रंगवाते हैं. रंगे हुए इस जालीदार बेस पर चिकनकारी, मशीन एम्ब्रॉयडरी या मिरर वर्क करवाकर बेहद यूनिक और कस्टमाइज्ड डिज़ाइनर आउटफिट्स तैयार किए जाते हैं.
कोटा डोरिया दुपट्टा स्टाइल्स (Kota Doria Dupatta Styles)
एक साधारण और प्लेन कुर्ती-प्लाजो सेट को पल भर में रॉयल और एथनिक लुक देने के लिए कोटा डोरिया का हैवी दुपट्टा सबसे बेस्ट एक्सेसरी है. इन दिनों मार्केट में फ्लोरल डिजिटल प्रिंट, बनारसी ज़री बॉर्डर, ब्लॉक प्रिंट और ट्रेडिशनल गोटा पत्ती वर्क वाले कोटा डोरिया दुपट्टे काफी डिमांड में हैं [shopping]. अपने हल्के वजन के कारण इन्हें कैरी करना बेहद आसान होता है, और इनका वॉल्यूम (Fluffiness) कपड़ों को एक बेहतरीन ग्रेस देता है. किसी भी बोरिंग या मोनोक्रोम सूट के साथ एक कंट्रास्ट या हैवी प्रिंटेड कोटा डोरिया दुपट्टा पेयर करके आप त्योहारों या ऑफिस इवेंट्स के लिए परफेक्ट सेमी-फॉर्मल लुक पा सकती हैं ।


