12 साल बाद ही क्यों लगता है ‘मारवाड़ का अर्धकुंभ’? जानिए सुंईया मेला बाड़मेर का रहस्य और इतिहास

इस विस्तृत लेख में सुंईया मेला बाड़मेर (Suiya Mela Barmer) के इतिहास, इसके पीछे की पौराणिक कथाओं, इसके दुर्लभ ज्योतिषीय संयोग और यहाँ के प्रमुख दर्शनीय स्थलों के बारे में विस्तार से जानते हैं।

सुंईया मेला बाड़मेर: एक ऐतिहासिक परिचय

राजस्थान के बाड़मेर जिला मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित है चौहटन कस्बा। यह कस्बा अरावली और थार के मरुस्थल के मिलन स्थल पर ऊंची और पथरीली पहाड़ियों की गोद में बसा है। इसी चौहटन की पहाड़ियों में स्थित है सुईया महादेव मंदिर चौहटन।

सामान्य दिनों में शांत रहने वाली चौहटन की ये वादियां मेले के दौरान लाखों श्रद्धालुओं के जयकारों से गूंज उठती हैं। इस मेले की भव्यता और श्रद्धा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मात्र दो से तीन दिनों के भीतर यहाँ 10 लाख से अधिक लोग महास्नान का लाभ उठाने पहुँचते हैं। भारत के सुदूर राज्यों जैसे गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब और हरियाणा से भी लोग इस मरु कुंभ का हिस्सा बनने आते हैं।

Suiya Mela kab lagta hai? जानिए सुंईया मेला बाड़मेर दुर्लभ ज्योतिषीय संयोग

सुंईया मेला हर साल न लगकर 7 से 12 वर्ष के लंबे अंतराल में लगता है, क्योंकि इसके लिए हिंदू पंचांग के अनुसार एक अत्यंत दुर्लभ ‘पंचयोग’ का होना अनिवार्य है। यह विशेष मुहूर्त केवल तब बनता है जब पौष मास की कृष्ण पक्ष अमावस्या, सोमवार के दिन (सोमवती अमावस्या) पड़े और साथ में मूल नक्षत्र व व्यातिपात योग का खगोलीय मिलन हो। इसी अनूठे ज्योतिषीय संयोग के कारण इसे ‘मारवाड़ का अर्धकुंभ’ माना जाता है, जिसका पिछला भव्य आयोजन 29-30 दिसंबर 2024 को हुआ था।

मारवाड़ का अर्धकुंभ किसे कहते हैं और क्यों?

बाड़मेर के चौहटन में लगने वाले सुंईया मेले को ‘मारवाड़ का अर्धकुंभ’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह मुख्य कुंभ की तरह हर साल न आकर 7 से 12 साल के लंबे अंतराल पर आता है, जहां कड़कड़ाती ठंड के बावजूद 10 लाख से अधिक श्रद्धालुओं का विशाल जनसमूह उमड़ता है और मान्यता के अनुसार यहाँ के पांच पवित्र तीर्थों में स्नान करने से प्रयागराज या हरिद्वार कुंभ जैसा ही महापुण्य प्राप्त होता है।

चौहटन के सुंईया मेले का पौराणिक इतिहास और पांडव कथा

इस पवित्र स्थल और मेले का इतिहास सदियों पुराना है, जिसका संबंध द्वापर युग यानी महाभारत काल से जोड़ा जाता है। स्थानीय लोक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार:पांडवों का अज्ञातवासजब पांडवों को 12 वर्ष के वनवास के बाद 1 वर्ष का अज्ञातवास मिला था, तब वे छिपते-छिपाते पश्चिमी भारत के इस मरुस्थलीय अंचल में आए थे। उन्होंने चौहटन की इन सुरक्षित और दुर्गम पहाड़ियों को अपना ठिकाना बनाया। यहाँ रहने के दौरान पांडवों को पीने के पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ा।

सुई से प्रकट हुआ जल :पानी की समस्या को दूर करने के लिए भगवान श्री कृष्ण के निर्देश पर अर्जुन ने अपनी एक विशेष ‘सुई’ (या सुई नुमा तीर) को पहाड़ी पर दे मारा। जहाँ वह सुई लगी, वहाँ से पहाड़ों को चीरती हुई पानी की एक पवित्र धारा फूट पड़ी। सुई के प्रहार से जलधारा निकलने के कारण ही इस स्थान का नाम ‘सुंईया’ पड़ा और यहाँ स्थापित शिवलिंग को सुईया महादेव कहा गया।

सुई चुभाने की अनूठी रस्म :आज भी मेले के दौरान यहाँ आने वाले श्रद्धालु पहाड़ की दरारों में छोटी-छोटी लोहे की सुइयां चुभाते हैं और मन्नतें मांगते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से जीवन के कष्ट और संताप दूर हो जाते हैं।

सुंईया मेला बाड़मेर के महास्नान के 5 पवित्र जल स्रोत

सुंईया मेले का मुख्य आकर्षण कड़कड़ाती ठंड और भोर के समय होने वाला पवित्र महास्नान है, जहाँ श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाकर अपने कायिक, वाचिक और मानसिक पापों से मुक्ति पाते हैं। मान्यता के अनुसार, यहाँ सुंईया महादेव व कपालेश्वर महादेव मंदिर के झरनों, धर्मराज की बेरी (प्राचीन कुआँ), इंद्रभान तालाब और भगवान विष्णु के चरण चिह्नों वाले ‘विष्णु पगला’ जैसे पांच पवित्र स्थलों के मिश्रित जल से स्नान करने का विशेष विधान है।

सुईया महादेव मंदिर चौहटन और आस-पास के प्रमुख दर्शनीय स्थल

सुईया महादेव मंदिर :यह मंदिर चौहटन की ऊंची पहाड़ी की तलहटी और गुफाओं के बीच स्थित है। यहाँ की प्राकृतिक छटा अद्भुत है। मंदिर के चारों तरफ फैली हरी-भरी (बारिश के दिनों में) या पथरीली पहाड़ियाँ एक अलौकिक शांति का अहसास कराती हैं।

कपालेश्वर महादेव मंदिर बाड़मेर :सुंईया महादेव के समीप ही कपालेश्वर महादेव मंदिर बाड़मेर स्थित है। यह मंदिर भी शिव भक्तों के लिए अगाध श्रद्धा का केंद्र है। यहाँ की गुफाएं और प्राचीन मूर्तियां पुरातात्विक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण हैं।

सुंईया हिल्स का ट्रैकिंग ट्रैक :एडवेंचर के शौकीन लोगों के लिए चौहटन की पहाड़ियाँ एक बेहतरीन ट्रैकिंग डेस्टिनेशन हैं। पहाड़ी के ऊपर से पूरे चौहटन कस्बे और दूर तक फैले थार के रेगिस्तान का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।

सुंईया मेला चौहटन कैसे पहुँचें? (Travel Guide)

चौहटन कस्बा परिवहन के साधनों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है, जहाँ पहुँचने के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन 50 किमी दूर बाड़मेर (BME) है और सबसे नजदीकी नागरिक हवाई अड्डा 250 किमी दूर जोधपुर (JDH) में स्थित है। हवाई अड्डे या रेलवे स्टेशन से आप नियमित बसों और प्राइवेट टैक्सियों के माध्यम से सड़क मार्ग द्वारा आसानी से चौहटन पहुँच सकते हैं, जहाँ बाड़मेर जिला मुख्यालय से कार या बस द्वारा दूरी तय करने में लगभग 1 घंटे का समय लगता है।

सुइयाँ मेले में क्या होता है?

सुंईया मेले के दौरान पूरा क्षेत्र आस्था और राजस्थान की लोक संस्कृति के रंगों से सराबोर नजर आता है। श्रद्धालु सुंईया महादेव के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं और पवित्र स्नान की परंपरा निभाते हैं। मेले में दूर-दूर से साधु-संतों का आगमन होता है तथा धार्मिक अनुष्ठान, भजन और कीर्तन का आयोजन श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक वातावरण से जोड़ता है।

इस दौरान राजस्थान की पारंपरिक लोक संस्कृति की भी शानदार झलक देखने को मिलती है। ग्रामीण परिवेश, पशु मेला, पारंपरिक आयोजन और लोक रंग मेले की रौनक बढ़ाते हैं। दूर-दराज के गांवों और शहरों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं, जिससे सुंईया मेला आस्था, संस्कृति और जनसमागम का एक अनोखा संगम बन जाता है।

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