शाहजहाँ के जमाने का 400 साल पुराना नाहर नृत्य अर्थात् शेर का स्वांग नृत्य (Lion costume dance rajasthan)! पढ़ें नाहर नृत्य भीलवाड़ा (Nahar dance bhilwara) की 5 बड़ी चुनौतियाँ और हमारी टीम का यादगार अनुभव।
नाहर नृत्य कहाँ का प्रसिद्ध है (Nahar nritya kaha ka prasidh hai)
नाहर नृत्य (Nahar Nritya) मुख्य रूप से राजस्थान के भीलवाड़ा (Bhilwara) जिले के ऐतिहासिक कस्बे माण्डल (Mandal) का प्रसिद्ध है।
आयोजन का समय: यह उत्सव हर साल होली के 13 दिन बाद ‘रंग तेरस’ (Rang Teras) के पावन अवसर पर आयोजित किया जाता है।
इतिहास: इसकी शुरुआत मुगल सम्राट शाहजहाँ (Shah Jahan) के शासनकाल से हुई थी, जब वे मेवाड़ की यात्रा के दौरान माण्डल में रुके थे। उनके मनोरंजन के लिए स्थानीय कलाकारों ने पहली बार शेर (नाहर) का रूप धारण कर यह नृत्य प्रस्तुत किया था।
शाहजहाँ इस कला को देखकर इतने मंत्रमुग्ध हुए कि उन्होंने इसे राजकीय संरक्षण दिया, और तब से लेकर आज तक 400 से अधिक सालों से यह परंपरा बिना रुके निभाई जा रही है।
नाहर नृत्य की विशेषताएं( Unique Features of Nahar Dance)
रूई और सींग का अनोखा श्रृंगार (Cotton Costume): इस नृत्य को करने वाले कलाकार (Artists) अपने पूरे शरीर पर विशेष लेप की मदद से चमकीली रूई चिपकाते हैं। सिर पर दो सींग लगाए जाते हैं, जिससे वे हूबहू जंगली नाहर (शेर) जैसे दिखाई देते हैं।
ढोल और चंग की थाप (Traditional Beats): रंग तेरस के दिन जैसे ही माण्डल के मुख्य चौक में ‘झांझ’ और भारी-भरकम ‘ढोल’ (Dhol) बजना शुरू होते हैं, दर्शकों का उत्साह सातवें आसमान पर पहुंच जाता है।
शिकार का जीवंत अभिनय (Live Hunting Performance): नाहर बने कलाकार केवल नाचते नहीं हैं, बल्कि वे दर्शकों के बीच जाकर हिरण या शिकार का पीछा करने का जीवंत अभिनय (Acting) करते हैं, जिसे देखना एक अलग ही रोमांच (Thrill) पैदा करता है।
नाहर नृत्य प्रदर्शन की 5 सबसे बड़ी चुनौतियाँ (Top 5 Difficulties)
रूई चिपकाने का दर्द (Painful Costume Process): कलाकारों के नग्न शरीर पर बड़ी मात्रा में शुद्ध रूई (Pure Cotton) चिपकाई जाती है, जिसे बाद में शरीर से छुड़ाना बेहद दर्दनाक होता है।
दम घुटने की समस्या (Suffocation): चेहरे और शरीर पर रूई की मोटी परत होने के कारण कलाकारों को सांस लेने और भारीपन की समस्या का सामना करना पड़ता है।
सींग का संतुलन (Weight Balancing): सिर पर बंधे भारी हिरण के सींगों के साथ लगातार कूदना और दौड़ना पड़ता है।
शारीरिक चोट का जोखिम (Risk of Physical Injury): उबड़-खाबड़ रास्तों पर घुटनों के बल रेंगने और छलांग लगाने से कलाकारों को अक्सर चोट लग जाती है।
कठिन अभिनय और स्टैमिना (High Stamina Required): कई घंटों तक लगातार शेर की तरह दहाड़ना और दौड़ना गजब के शारीरिक स्टैमिना की मांग करता
माण्डल में घूमने की जगह (Best places to visit in mandal) कौन-सी हैं और नाहर उत्सव को कैसे देखें?
माण्डल एक ऐतिहासिक कस्बा है जहाँ आप प्राचीन बावड़ियाँ, पुराना किला और जगन्नाथ कछवाहा की बत्तीस खंभों की छतरी देख सकते हैं। अगर आप रंग तेरस के दौरान यहाँ आते हैं, तो नाहर नृत्य देखने के साथ-साथ यहाँ की प्राचीन संस्कृति को भी करीब से महसूस कर सकते हैं।
नाहर नृत्य कब किया जाता है (Nahar nritya kab kiya jata hai
विश्व प्रसिद्ध नाहर नृत्य भीलवाड़ा (Nahar dance bhilwara) के माण्डल कस्बे में हर साल होली के 13 दिन बाद ‘रंग तेरस’ (Rang Teras) के पावन अवसर पर आयोजित किया जाता है। चैत्र कृष्ण त्रयोदशी की रात को शुरू होने वाले इस अनूठे उत्सव में कलाकार रूई लपेटकर शेर का स्वांग रचते हैं।
नाहर नृत्य का इतिहास: कैसे हुई इसकी शुरुआत? (History of Nahar Dance)
बात 17वीं शताब्दी की है, जब मुगल सम्राट शाहजहाँ (Shah Jahan) उदयपुर (Mewar) जाते समय कुछ समय के लिए माण्डल कस्बे में ठहरे थे। उनके मनोरंजन के लिए स्थानीय कलाकारों और जागीरदारों ने एक अनोखी युक्ति सोची। उन्होंने अपने शरीर पर रूई (Cotton) लपेटकर और आगे सींग लगाकर ‘नाहर’ (शेर या सिंह) का रूप धारण किया और सम्राट के सामने एक अद्भुत स्वांग नृत्य (Swang Dance) प्रस्तुत किया। शाहजहाँ इस कला को देखकर इतने मंत्रमुग्ध हुए कि उन्होंने इसे राजकीय संरक्षण दिया, और तब से लेकर आज तक 400 से अधिक सालों से यह परंपरा बिना रुके निभाई जा रही है।
माण्डल भीलवाड़ा इतिहास (Mandal Bhilwara History in Hindi): एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर
माण्डल (Mandal) राजस्थान के भीलवाड़ा जिले (Bhilwara) के मेवाड़ क्षेत्र का एक ऐतिहासिक कस्बा है। यह अकबर और शाहजहाँ का पड़ाव स्थल रहा है। यहाँ जगन्नाथ कछवाहा की प्रसिद्ध 32 खंभों की छतरी स्थित है। स्थापत्य कला और 400 साल पुराने ऐतिहासिक ‘नाहर नृत्य’ (Nahar Nritya) की जन्मस्थली के रूप में यह प्रसिद्ध है।
रंग तेरस माण्डल भीलवाड़ा rang teras mandal bhilwara
माण्डल के निवासियों के लिए रंग तेरस का महत्व दीपावली और होली से भी बढ़कर है। इस दिन पूरे कस्बे को एक दुल्हन की तरह सजाया जाता है।
चौक में भारी भीड़ और ढोल की थाप (Traditional Beats): शाम होते ही माण्डल के मुख्य सदर बाजार और चौराहों पर हजारों लोगों की भीड़ जमा हो जाती है। भारी-भरकम ढोल, चंग और बांकिया की गूंज से पूरा माहौल थिरकने लगता है।
सजीव नाहर (शेर) का निकलना: इसी विशेष दिन कलाकार अपने पूरे शरीर पर विशेष लेप लगाकर शुद्ध रूई (Pure Cotton) चिपकाते हैं और सिर पर सींग लगाकर असली ‘नाहर’ का रूप धारण करते हैं। रंग तेरस की रात को जब ये नाहर गलियों में दौड़ते और शिकार का जीवंत अभिनय (Live Acting) करते हैं, तो दर्शकों का रोमांच सातवें आसमान पर होता है।
लोकल ढाबे और दुकानों की रौनक (Local Eatery Experience): इस उत्सव के दौरान माण्डल के स्थानीय बाजारों, चाट-पकौड़ी की दुकानों और लोकल ढाबों पर पैर रखने की जगह नहीं होती।
मुगल सम्राट शाहजहाँ के काल से शुरू हुआ ‘नाहर नृत्य’ (Nahar Nritya) केवल एक मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह माण्डल के लोक कलाकारों के कड़े संघर्ष, अटूट स्टैमिना (Physical Endurance) और सदियों पुरानी परंपरा को जिंदा रखने के संकल्प का प्रतीक है। हर साल रंग तेरस (Rang Teras) पर यहाँ बिखरने वाले संस्कृति के रंग यह साबित करते हैं कि राजस्थान की असली आत्मा आज भी इसके गाँवों और कस्बों में बसती है।


