रियाण प्रथा राजस्थान (Riyan Pratha Rajasthan)जानिए राजस्थान की प्राचीन ‘रियाण प्रथा’ (Riyan Pratha) के बारे में, जहाँ अफीम (अमल की मनुहार) से मेहमानों का स्वागत होता है। पढ़िए इसका इतिहास, सामाजिक नियम और वर्तमान स्थिति।
रियाण क्या होती है? (What is Riyan Pratha Rajasthan)
सरल शब्दों में कहें तो ‘रियाण’ मारवाड़ और पश्चिमी राजस्थान के ग्रामीण समाजों में पुरुषों की एक औपचारिक और पारंपरिक सामाजिक सभा (Meeting) है। इस सभा का मुख्य उद्देश्य किसी विशेष अवसर पर एकत्रित होना और आपसी भाईचारे को बढ़ावा देना होता है।
इस प्रथा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें आने वाले मेहमानों और ग्रामीणों का स्वागत ‘अमल’ यानी अफीम घुलाकर किया जाता है। राजस्थानी संस्कृति में इसे केवल एक नशा नहीं, बल्कि सम्मान और मर्यादा का प्रतीक माना जाता रहा है।
रियाण का आयोजन कब और क्यों किया जाता है?
खुशी के मौकों पर: शादी-ब्याह, सगाई (टीका), बच्चे के जन्म (छूछक/जलवा) या ढूंढ के उत्सव पर मेहमानों और रिश्तेदारों के सत्कार के लिए।
शोक के मौकों पर (शोक भंग): परिवार में किसी बुजुर्ग की मृत्यु के बाद, बारहवें या तेरहवें दिन शोक को समाप्त करने और जीवन को सामान्य स्थिति में लाने के लिए ‘शोक भंग की रियाण’ होती है।
झगड़े और विवाद सुलझाने पर: यदि गाँव की पंचायत में दो पक्षों या परिवारों के बीच सालों पुराना कोई विवाद सुलझ जाता है, तो दुश्मनी को हमेशा के लिए दफन करने के प्रतीक के रूप में दोनों पक्ष एक-दूसरे को अफीम पिलाकर ‘रियाण’ करते हैं।
मारवाड़ में अमल की मनुहार (खोबा मनुहार) की पूरी प्रक्रिया
राजस्थानी गाँवों में रियाण का आयोजन बेहद अनुशासित और राजसी (Royal Style) तरीके से किया जाता है। इसकी प्रक्रिया कुछ इस प्रकार होती है:
बैठक व्यवस्था: गाँव के बुजुर्ग, जागीरदार या गणमान्य लोग अपने पारंपरिक परिधान (धोती-अंगरखी और रंग-बिरंगी साफा/पगड़ी) पहनकर एक गोल घेरे में बैठते हैं।
कसूंबा तैयार करना: सभा के बीच में एक अनुभवी व्यक्ति सूखी अफीम को लकड़ी के एक विशेष बर्तन (खरल) में डालकर पानी के साथ अच्छी तरह घोटता है। इसके बाद इसे मलमल के कपड़े या लकड़ी की बारीक छननी से छाना जाता है। इस तैयार तरल को ‘कसूंबा’ कहा जाता है।
हथेली से पिलाना: अफीम परोसने वाला व्यक्ति अपने हाथ की हथेली और उंगलियों को आपस में मिलाकर एक प्याला (जिसे स्थानीय भाषा में ‘खोबा’ कहते हैं) बनाता है। वह उसमें कसूंबा भरकर सामने वाले मेहमान के मुंह के पास ले जाता है।
तेड़ा (घूंट लेना): सामने बैठा व्यक्ति बहुत ही सम्मानपूर्वक झुककर, मनुहार करने वाले की हथेली से सीधे उस तरल को तीन बार में पीता है। इस घूंट लेने की क्रिया को ‘तेड़ा’ कहा जाता है
रियाण प्रथा राजस्थान के सामाजिक नियम और मर्यादा
मना करना मना है: रियाण में यदि मेजबान आपको अमल (अफीम) ऑफर करता है, तो इसे मना करना मेजबान का बहुत बड़ा अपमान माना जाता है।
नशा न करने वालों के लिए नियम: जो लोग नशा नहीं करते या अफीम नहीं पीते, वे मर्यादा रखने के लिए अपनी उंगली को कसूंबा में डुबोकर अपने माथे (तिलक के रूप में) पर लगा लेते हैं या जीभ से छुआ लेते हैं। इसे ‘आँख रखना’ या ‘लाज रखना’ कहा जाता है।
लोक संगीत की जुगलबंदी: खुशी के अवसरों पर होने वाली रियाण में स्थानीय मांगणियार या लंगा कलाकार रावणहत्था, कमायचा या खड़ताल जैसे वाद्ययंत्रों के साथ वीरों की गाथाएं और राजसी लोकगीत गाते हैं।
रियाण प्रथा राजस्थान का इतिहास: युद्ध के मैदान से सामाजिक महफिल तक
इतिहासकारों के अनुसार, पुराने समय में राजपूताना के योद्धा युद्ध के मैदान में जाने से पहले अफीम का सेवन करते थे। यह दर्द को सहन करने, थकान मिटाने और युद्ध के दौरान मलमूत्र के वेग को रोकने में मदद करती थी। धीरे-धीरे युद्ध काल की यह जरूरत शांति काल में राजघरानों के शौक और स्वागत की परंपरा में बदल गई। समय के साथ यह राजमहलों से निकलकर राजस्थान के आम ग्रामीण समाजों (जैसे राजपूत, चारण, बिश्नोई, जाट, देवासी आदि) का अभिन्न हिस्सा बन गई।
रियाण प्रथा राजस्थान की वर्तमान स्थिति: कानून की सख्ती और बदलता दौर
कानूनी पाबंदी (NDPS Act): भारत सरकार के स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम (NDPS Act) के तहत अफीम का इस तरह सार्वजनिक लेन-देन, भंडारण और सेवन पूरी तरह से अवैध और दंडनीय अपराध है। राजस्थान पुलिस और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) इस पर कड़ी नजर रखते हैं।
जागरूकता और बदलाव: अफीम के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले बुरे प्रभावों और कानूनी पचड़ों से बचने के लिए अब ग्रामीण समाजों ने खुद आगे बढ़कर कदम उठाए हैं।
दूध-केसर की मनुहार: आज के आधुनिक राजस्थान के गाँवों में अब कई जगहों पर अफीम की जगह केसर युक्त गर्म दूध, ड्राई फ्रूट्स या मावे के पेड़ों से मेहमानों की मनुहार की जाने लगी है, जिसे ‘नई रीत’ या ‘स्वस्थ रियाण’ कहा जा रहा है।
अमल की मनुहार और कसूंबा प्रथा राजस्थान क्या है
अमल की मनुहार पश्चिमी राजस्थान (विशेषकर मारवाड़ क्षेत्र) के ग्रामीण अंचल की एक बेहद प्राचीन, राजसी और गहरी सामाजिक प्रभाव रखने वाली पारंपरिक रस्म है ।। इसमें मुख्य रूप से राजपूत, चारण, बिश्नोई, जाट और देवासी समाजों में मेहमानों का स्वागत अफीम के पानी (तरल अफीम) से किया जाता है ।सरल शब्दों में, राजस्थानी संस्कृति में अफीम को ‘अमल’ और इसके घुले हुए रूप को ‘कसूंबा’ कहा जाता है । जब भी कोई मेहमान घर आता है या कोई सामाजिक सभा होती है, तो उसे आदरपूर्वक अफीम परोसना ही ‘अमल की मनुहार‘ कहलाता है ।
रियाण प्रथा में ‘तेड़ा’ लेना और ‘खोबा’ क्या है?
रियाण सभा में अफीम परोसने वाला व्यक्ति अपनी हथेली और उंगलियों को मिलाकर जो प्याला बनाता है, उसे ‘खोबा’ कहते हैं। सामने बैठा मेहमान जब झुककर आदरपूर्वक उस हथेली से सीधे अफीम की घूंट लेता है, तो उस क्रिया को ‘तेड़ा’ लेना कहा जाता है।
क्या राजस्थान में शादी-ब्याह या सामाजिक कार्यक्रमों में अफीम परोसना कानूनी रूप से वैध है?
बिल्कुल नहीं। भारत सरकार के NDPS एक्ट (Narcotics Drugs and Psychotropic Substances Act) के तहत किसी भी सामाजिक या निजी कार्यक्रम में अफीम का भंडारण, सार्वजनिक लेन-देन या सेवन पूरी तरह से अवैध और एक गैर-जमानती अपराध है।
यदि रियाण में कोई व्यक्ति अफीम (अमल) नहीं पीता, तो वह परंपरा कैसे निभाता है?
जो लोग नशा नहीं करते, वे समाज की मान-मर्यादा बनाए रखने के लिए अपनी अनामिका उंगली (Ring Finger) को कसूंबा में डुबोकर अपने माथे पर तिलक लगा लेते हैं या अपनी जीभ से छुआ लेते हैं। मारवाड़ में इसे ‘लाज रख
हमें अपनी पुरानी रीतियों (मेहमाननवाज़ी और आदर) को ज़रूर बनाए रखना चाहिए और समाज का सम्मान कम नहीं होने देना चाहिए। लेकिन अब समय बदल गया है, इसलिए हाथों से अफीम (अमल) परोसने के बजाय मेहमानों को आदरपूर्वक दूध पिलाकर उनका स्वागत करना चाहिए।
पाली जिले की गुर्जर महापंचायत में रियाण प्रथा को लेकर क्या बड़ा फैसला हुआ? (What is Pali Gurjar Mahapanchayat decision on Riyan?)
: हाल ही में पाली जिले में आयोजित हुई गुर्जर समाज की महापंचायत में सामाजिक कुरीतियों और नशे के खिलाफ एक ऐतिहासिक फैसला लिया गया है। इस फैसले के तहत समाज के किसी भी कार्यक्रम में अफीम की मनुहार (रियाण) करने या नशा परोसने पर 2.51 लाख रुपये का कड़ा जुर्माना (Fine of 2.51 Lakh) लगाने का नियम बनाया गया है, जिसकी हर तरफ तारीफ हो रही है।
राजस्थान के समाज अब रियाण प्रथा को बंद क्यों कर रहे हैं? (Why communities are banning Riyan Pratha?)
युवाओं में बढ़ती नशे की लत, फिजूलखर्ची, कानूनी बंदिशों और समाज सुधार की मुहिम के कारण अब राजस्थान के लगभग सभी प्रमुख समाज (जैसे गुर्जर, राजपूत, सीरवी आदि) महापंचायतें बुलाकर इस प्रथा पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा रहे हैं।
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