सांवरिया सेठ मंदिर का इतिहास: मीराबाई के गिरधर गोपाल और व्यापार के सबसे बड़े भागीदार की अमर कथा

सांवरिया सेठ मंदिर का इतिहास सांवरिया सेठ के अनन्य उपासक जानने की चाह रखते हैं।राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित श्री सांवरिया सेठ मंदिर (Shri Sanwariya Seth Temple) देश-विदेश के लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का एक प्रमुख केंद्र है। भगवान कृष्ण को समर्पित इस दिव्य धाम को लेकर मान्यता है कि यहाँ आने वाला कोई भी भक्त कभी खाली हाथ नहीं लौटता। इस मंदिर का इतिहास जितना अलौकिक है, उतना ही रहस्यमयी भी है। आइए, इस लेख में सांवरिया सेठ मंदिर के इतिहास (Sanwariya Seth Temple History in Hindi), मूर्तियों के प्राकट्य की कहानी और इससे जुड़ी अनसुनी मान्यताओं को विस्तार से जानते हैं।

सांवरिया सेठ मंदिर का इतिहास और पृष्ठभूमि (Historical Background of Sanwariya Seth)

सांवरिया सेठ मंदिर राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले की भदेसर तहसील के मंडफिया ग्राम (Mandfiya Village) में स्थित है। मंडफिया को अब ‘श्री सांवरिया धाम’ के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर उदयपुर से लगभग 80 किलोमीटर और चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर है। यह पूरा क्षेत्र मेवाड़ के ऐतिहासिक और धार्मिक ताने-बाने से जुड़ा हुआ है।

सांवरिया सेठ की मूर्तियों के प्राकट्य की अलौकिक कहानी (The Story of Underground Idols Appearance)

सांवरिया सेठ की मूर्तियों का इतिहास लगभग 186 वर्ष पुराना है। इस मंदिर की स्थापना और मूर्तियों के मिलने की कहानी बेहद दिलचस्प और चमत्कारिक है:

भोलाराम गुर्जर का सपना (The Dream of Bholaram Gurjar): साल 1840 (Year 1840) में मंडफिया ग्राम में भोलाराम गुर्जर नाम के एक साधारण ग्वाले रहते थे। एक रात भोलाराम को एक दिव्य सपना आया। सपने में भगवान ने उनसे कहा कि भादसोड़ा-बागूंड के छापर (मैदान) में एक बबूल के पेड़ के नीचे जमीन में तीन अद्भुत मूर्तियां दबी हुई हैं।

जमीन की खुदाई (The Excavation of Ground): अगले दिन भोलाराम ने यह बात ग्रामीणों को बताई। जब ग्रामीणों ने बताए गए स्थान पर जाकर सावधानीपूर्वक खुदाई शुरू की, तो हर कोई हैरान रह गया। जमीन के भीतर से सचमुच भगवान कृष्ण की तीन बेहद सुंदर और दिव्य श्यामवर्ण (काली) मूर्तियां प्रकट हुईं।

तीन मूर्तियों का रहस्य (The Secret of Three Idols): खुदाई में मिली तीनों मूर्तियों को अलग-अलग स्थानों पर प्रतिष्ठित किया गया, जो आज इस प्रकार हैं:

सबसे बड़ी मूर्ति: इसे मंडफिया ग्राम (Mandfiya Temple) लाया गया, जो आज का मुख्य और भव्य ‘सांवरिया सेठ मंदिर’ है।

मझली (बीच की) मूर्ति: इसे भादसोड़ा ग्राम (Bhadsora Temple) में स्थापित किया गया।

सबसे छोटी मूर्ति: इसे उसी स्थान पर स्थापित किया गया जहाँ से मूर्तियां निकली थीं, जिसे आज प्राकट्य स्थल मंदिर (Praktiya Sthal Bagund) कहा जाता है।

सांवरिया सेठ और संत मीराबाई से संबंध और मूर्तियों का रहस्य ( sanvriya seth Connection with Saint Mirabai)

लोक मान्यताओं और किंवदंतियों के अनुसार, इन मूर्तियों का सीधा संबंध 16वीं शताब्दी की महान कृष्ण भक्त संत मीराबाई (Saint Mirabai) से है।ऐसा माना जाता है कि ये वही मूर्तियां हैं जिनकी पूजा स्वयं मीराबाई अपनी भक्ति यात्रा के दौरान संतों की मंडली के साथ किया करती थीं। जब मुगलों के आक्रमणों के कारण चित्तौड़गढ़ और मेवाड़ क्षेत्र में संकट बढ़ा, तो संतों ने इन पवित्र मूर्तियों को सुरक्षित रखने के लिए भादसोड़ा के छापर में जमीन के अंदर छिपा दिया था। सदियों बाद, यही मूर्तियां भोलाराम गुर्जर के माध्यम से दोबारा दुनिया के सामने आईं ।

सांवरिया सेठ: व्यापार के सबसे बड़े बिजनेस पार्टनर (The Ultimate Business Partner)

राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में मंडफिया धाम में विराजित सांवरिया सेठ (Sanwaliya Seth) देश के व्यापारियों और उद्यमियों के लिए आस्था के साथ-साथ ‘व्यापार के सबसे बड़े बिजनेस पार्टनर’ (The Ultimate Business Partner) के रूप में पूजे जाते हैं। यहाँ के व्यापारियों में यह अनोखी और अटूट परंपरा है कि वे अपने व्यापार, मुनाफे या नई डील में भगवान सांवरिया जी को 2% से लेकर 15% या उससे अधिक का बकायदा पार्टनर (हिस्सेदार) बनाते हैं।

व्यापारियों का मानना है कि सांवरिया सेठ को अपना साझीदार बनाने के बाद उनके बिजनेस में कभी घाटा नहीं होता और दिन-दूनी रात-चौगुनी तरक्की होती है। यही कारण है कि मंदिर के दानपात्र (खुले भंडारे) से हर महीने करोड़ों रुपये का चढ़ावा, सोना, चांदी और कीमती विदेशी मुद्राएं निकलती हैं, जो इस अनोखी बिजनेस पार्टनरशिप और देशव्यापी अटूट आस्था का सबसे बड़ा प्रमाण है।

सांवरिया सेठ मंदिर इतिहास:FAQ

  • मुख्य स्थान (Main Location): मंडफिया गांव (Mandaphiya), भदसोड़ा-चित्तौड़गढ़ हाईवे, जिला चित्तौड़गढ़, राजस्थान।
  • भगवान का स्वरूप (Deity Form): भगवान श्रीकृष्ण का सांवला और अलौकिक चतुर्भुज रूप (सांवलिया सरकार)।
  • मूर्तियों का प्राकट्य वर्ष (Discovery Year): सन् 1840 ईस्वी (विक्रम संवत 1897)।
  • प्राकट्य का रहस्य (The Miracle): भदसोड़ा गांव के ग्वाले भोलाराम गुर्जर को आए दिव्य स्वप्न के बाद भदसोड़ा-मंडफिया के बीच छापर (जंगल) में खुदाई के दौरान एक प्राचीन पेड़ के नीचे से 3 मूर्तियां प्रकट हुई थीं।
  • तीन विग्रहों की स्थापना: सबसे बड़ी मुख्य प्रतिमा मंडफिया (सांवरिया सेठ मुख्य मंदिर) में, दूसरी भदसोड़ा (प्राकट्य स्थल मंदिर) में और तीसरी भादसों गांव के मंदिर में विराजमान है।
  • दूरी (Distance Guide): झीलों की नगरी उदयपुर (Udaipur) से लगभग 75 किमी और चित्तौड़गढ़ मुख्यालय से करीब 40 किमी।
  • अनोखी पहचान (The Ultimate Business Partner): इन्हें देश के व्यापारियों का “लीगल बिजनेस पार्टनर” माना जाता है। व्यापारी अपने मुनाफे में भगवान को 2% से 15% तक का हिस्सेदार बनाते हैं।
  • मासिक चढ़ावा (Monthly Donation Volume): इस अनूठी पार्टनरशिप के कारण हर महीने मंदिर के दानपात्र से औसतन 15 से 20 करोड़ रुपये नकद, विदेशी मुद्राएं और भारी मात्रा में सोना-चांदी निकलता है।
  • मुख्य दर्शन व समय (Timings & Bhog): कपाट प्रतिदिन सुबह 5:30 बजे से रात 11:00 बजे तक खुले रहते हैं। राजभोग में मावे के पेड़े, केसरिया लापसी और मिश्री-मक्खन का राजसी भोग लगता है।
  • सबसे बड़ा उत्सव/मेला (Main Festival): प्रतिवर्ष भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी (जलझूलनी एकादशी) को यहाँ तीन दिवसीय विशाल लखी मेला लगता है, जहाँ सांवरिया सरकार सोने के रथ (बेवाण) में शाही स्नान के लिए निकलते हैं।
  • जलझूलनी एकादशी का महामेला: प्रतिवर्ष भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी (देवझूलनी एकादशी) को यहाँ तीन दिवसीय विशाल लखी मेला लगता है। इस दिन सांवरिया सेठ को रथ में बिठाकर शाही स्नान के लिए ले जाया जाता है, जिसमें देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु (High Volume) शामिल होते हैं।
  • दर्शन का समय (Timings): मंदिर के कपाट प्रतिदिन सुबह 5:30 बजे से रात 11:00 बजे तक भक्तों के लिए खुले रहते हैं। दोपहर में दोपहर 12:00 से 12:30 बजे के बीच ठाकुरजी के राजभोग के समय विशेष भीड़ उमड़ती है।
  • अनोखी पहचान (The Ultimate Business Partner): इन्हें देश के व्यापारियों का “लीगल बिजनेस पार्टनर” माना जाता है। व्यापारी अपने मुनाफे में भगवान को 2% से 15% तक का हिस्सेदार बनाते हैं।
  • सांवरिया सेठ ट्रस्ट (Temple Governance): मंदिर का पूरा प्रबंधन और संचालन ‘श्री सांवरिया जी मंदिर देवस्थान ट्रस्ट’ द्वारा सरकारी नियमों के अंतर्गत किया जाता है, जो क्षेत्र के सबसे बड़े सामाजिक सेवा संगठनों में से एक है।

सांवरिया सेठ मंदिर का इतिहास और सांवरिया सेठ मंदिर वास्तुकला

सांवरिया सेठ मंदिर की वास्तुकला का वैभव (Architectural Design): मंदिर का निर्माण अक्षरधाम मंदिर की तर्ज पर पूरी तरह से गुलाबी बलुआ पत्थर (Pink Sandstone) से किया गया है, जिसे विशेष रूप से बंसी पहाड़पुर (भरतपुर) से मंगाया गया था। इस पर की गई नक्काशी प्राचीन महा-मारू और द्रविड़ शैली का अद्भुत मिश्रण है।

सांवरिया सेठ मंदिर गर्भगृह की भव्यता (The Golden Sanctum): ठाकुरजी का मुख्य सिंहासन और पूरा गर्भगृह (Sanctum Sanctorum) खरे सोने और चांदी के पत्तरों (Gold & Silver Plating) से मढ़ा गया है, जिसकी चमक देखने लायक है।

सांवरिया सेठ मंदिर कांच की अनूठी कारीगरी (Belgian Glass Work): मंदिर के आंतरिक हिस्से और गुंबद में बेल्जियम के रंगीन कांच (Belgian Glass) की बेहद खूबसूरत पच्चीकारी की गई है, जो भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न रासलीलाओं को जीवंत करती है।

सांवरिया सेठ मंदिर का इतिहास: 5 सबसे रोचक तथ्य:

दानपात्र नहीं, वह है ‘सांवरिया सेठ का खुला खजाना’ (The Mega Cash Counter)भारत के चुनिंदा अमीर मंदिरों में सांवरिया सेठ का नाम सबसे ऊपर आता है, लेकिन यहाँ का दानपात्र (Donation Box) अपने आप में एक रोचक विषय है। व्यापारियों द्वारा की जाने वाली “बिजनेस पार्टनरशिप” (Business Partnership) के कारण हर महीने जब यहाँ का भंडार (दानपात्र) खोला जाता है, तो नोटों की गिनती के लिए बकायदा बैंक के अधिकारियों को आना पड़ता है। कई दिनों तक चलने वाली इस गिनती में हर महीने 15 से 20 करोड़ रुपये नकद, विदेशी मुद्राएं (डॉलर, पाउंड), और भारी मात्रा में सोने-चांदी के गहने व बिस्कुट निकलते हैं, जो भगवान और भक्त के बीच व्यापारिक हिस्सेदारी का अनोखा प्रमाण है।

अफीम की खेती का पहला ‘भोग’ और अनोखी मन्नत (Opium Farming Tradition)चित्तौड़गढ़, मंदसौर और नीमच का यह पूरा बेल्ट वैध अफीम (Opium) की खेती के लिए जाना जाता है। यहाँ के किसानों के बीच एक बेहद अनोखी और पारंपरिक मान्यता है। किसान अपनी अफीम की फसल की सुरक्षा के लिए सांवरिया सेठ को अपना पार्टनर बनाते हैं। जब सरकार द्वारा किसानों को अफीम की खेती का लाइसेंस मिलता है, तो वे सबसे पहले सांवरिया सेठ के चरणों में अर्जी लगाते हैं। फसल कटने के बाद, अफीम का पहला और प्रतीकात्मक ‘भोग’ (Prasad) सांवरिया सरकार के चरणों में चढ़ाया जाता है, ताकि उनकी अफीम की क्वालिटी सबसे बेस्ट रहे और सरकार द्वारा उनका लाइसेंस कभी कैंसिल न हो।

एक पेड़ की जड़, तीन मूर्तियां और तीन मंदिर (Three Idols – Three Temples):खुदाई के दौरान बबूल के पेड़ की जड़ों के बीच से कृष्ण भगवान की एक या दो नहीं, बल्कि कुल तीन मूर्तियां एक साथ प्रकट हुई थीं।

ग्वाले भोलाराम गुर्जर का ‘त्रिकाल स्वप्न’ (The Divine Dream)मूर्तियों का प्राकट्य किसी खुदाई के दौरान अचानक नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे एक दिव्य स्वप्न था। भदसोड़ा गांव के एक सीधे-सादे ग्वाले (Cowherd) भोलाराम गुर्जर को लगातार तीन रातों तक भगवान ने स्वप्न में दर्शन दिए। भगवान ने उसे सटीक स्थान बताते हुए कहा कि “मैं इस बबूल के पेड़ की जड़ों के नीचे दबा हुआ हूँ, मुझे बाहर निकालो।” शुरुआत में ग्रामीणों ने इसे साधारण सपना माना, लेकिन जब भोलाराम के बार-बार कहने पर उस निर्जन जंगल में खुदाई की गई, तो सचमुच वहाँ से तीन हूबहू चमत्कारी मूर्तियां प्रकट हुईं।

संत मीराबाई की पूजा से सीधा संबंध (Connection with Mirabai):लोक मान्यताओं के अनुसार, ज़मीन से प्रकट हुईं ये दिव्य प्रतिमाएं साक्षात संत शिरोमणि मीराबाई की हैं, जिनकी वे मेवाड़ में पूजा करती थीं। मीराबाई के द्वारिका जाने पर मुगलों के आक्रमण से रक्षा हेतु संत दयाराम ने इन्हें भदसोड़ा के घने जंगलों में छुपा दिया था, जो सन् 1840 में प्रकट हुईं।

अफीम की खेती और मन्नत का गुप्त विज्ञान (The Opium Farming Secret sanvriya seth Mandir

चित्तौड़गढ़ और मालवा का यह पूरा बेल्ट अफीम (Opium) की वैध खेती के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ के किसानों और सांवरिया सेठ के बीच एक गुप्त और अटूट रिश्ता है। किसान अपनी अफीम की फसल की सुरक्षा के लिए सांवरिया सेठ के नाम की मन्नत मांगते हैं और उन्हें अपना पार्टनर बनाते हैं। फसल कटने के बाद, अफीम का पहला और सबसे शुद्ध हिस्सा (प्रतीकात्मक भोग) सांवरिया सरकार के चरणों में चढ़ाया जाता है। यह आज भी एक रहस्यमयी आस्था है कि सांवरिया जी के आशीर्वाद से यहाँ के किसानों की अफीम की क्वालिटी हमेशा सबसे बेस्ट रहती है और उनका सरकारी लाइसेंस कभी कैंसिल नहीं होता।

करोड़ों का चढ़ावा और नोटों का पहाड़: सांवरिया सेठ मंदिर के दानपात्र और गुप्त कमरे का विस्मयकारी रहस्य

श्री सांवरिया सेठ मंदिर (मंडफिया) का दानपात्र खुलना किसी उत्सव से कम नहीं है। हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को भारी सुरक्षा के बीच इसे एक हाई-टेक गुप्त कमरे में ले जाया जाता है, जो चौबीसों घंटे सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में रहता है। इस तिजोरी से हर महीने औसतन 15 से 20 करोड़ रुपये कैश, सोने के बिस्कुट, चांदी की ईंटें और विदेशी मुद्राएं निकलती हैं।

नोटों की तादाद इतनी विशाल होती है कि इंसानी हाथों से गिनती असंभव है; इसलिए SBI और BOB जैसे बैंकों के अधिकारियों की टीम बुलाई जाती है। दर्जन भर से ज़्यादा हेवी-ड्यूटी नोट गिनने वाली मशीनें कई दिनों तक लगातार चलती हैं।

सांवरिया सेठ को व्यापारियों का “अल्टीमेट बिजनेस पार्टनर” (The Ultimate Business Partner) माना जाता है, जिससे उनके दानपात्र से निकलने वाला चढ़ावा अद्भुत होता है। यहाँ हर महीने औसतन 15 से 20 करोड़ रुपये का भारी कैश निकलता है, जिसे बोरियों और बक्सों में भरकर बैंक ले जाया जाता है। देश-विदेश के बड़े हीरा और स्वर्ण व्यवसाई जब अपने बिजनेस का प्रॉफिट शेयर चुकाने आते हैं, तो नकद के साथ खरे सोने के बिस्कुट (Gold Bars) और चांदी की ईंटें सीधे दानपात्र में डाल जाते हैं। इसके अलावा सात समंदर पार फैले एनआरआई (NRI) भक्तों द्वारा चढ़ाया गया अमेरिकी डॉलर, पाउंड और यूरो जैसी विदेशी मुद्राएं भी भारी मात्रा में निकलती हैं।

सांवरिया सेठ मंदिर किसने बनवाया

सांवरिया सेठ (मंडफिया) के मुख्य मंदिर का प्रारंभिक निर्माण साल 1840 में मूर्ति मिलने के बाद मंडफिया ग्राम के तत्कालीन प्रधान रोदूलाल जी जैन (Rodulalji Jain) ने समस्त ग्रामीणों के सहयोग से एक छोटे ओटले और छापरी के रूप में करवाया था।

अतः यदि आप भी जीवन में सुख-समृद्धि और मानसिक शांति चाहते हैं, तो एक बार मेवाड़ के राजा श्री सांवरिया सेठ के दरबार में हाजिरी ज़रूर लगाएं। सांवरिया सरकार आपकी हर अधूरी मन्नत को अवश्य पूरा करेंगे।कैसा लगा हमारा यह आर्टिकल आपकी सार्थक राय दें ताकि हम और सुधार कर सकें।

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