खाटू श्याम जी और औरंगजेब के इतिहास का वो सच, जब मुगलों के आक्रमण के समय शिवलिंग से बहने लगी थी खून की धारा! जानिए 1679 ईस्वी के इस भीषण हमले और बड़े चमत्कारों का पूरा इतिहास।
कैसे पुजारियों ने बाबा के शीश की रक्षा की और औरंगजेब खुद ‘बुत’ बन गया।
खाटू श्याम जी और औरंगजेब का इतिहास क्या है? (Khatu Shyam mandir Aurangzeb history)
ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, मुगल बादशाह औरंगजेब की हिंदू विरोधी धार्मिक नीति के तहत उसकी सेना ने राजस्थान के प्रसिद्ध मंदिरों को निशाना बनाया था। इसी क्रम में सेनापति दराब खान के नेतृत्व में मुगल सेना खाटू धाम पहुँची थी। यह इतिहास आस्था और क्रूरता के टकराव का गवाह है, जहाँ मुगलों ने मंदिर के बाहरी ढांचे को क्षतिग्रस्त किया, लेकिन भक्तों और पुजारियों ने बाबा के विग्रह को खंडित होने से बचा लिया।
खाटू श्याम शिव मंदिर का शिवलिंग चमत्कार क्या है? (Khatu Shyam Shiv mandir Shivling miracle)
खाटू धाम के मुख्य बाजार में स्थित प्राचीन शिव मंदिर (गौरीशंकर मंदिर) से यह चमत्कारी घटना जुड़ी है। लोक-मान्यता के अनुसार, जब औरंगजेब के सैनिकों ने इस मंदिर को तोड़ने के लिए शिवलिंग पर भाले या तलवार से प्रहार किया, तो शिवलिंग से साक्षात खून की धारा बहने लगी। इस भयानक और दैवीय दृश्य को देखकर मुगल सेना डर के मारे पीछे हट गई और आगे तोड़फोड़ नहीं कर सकी। आज भी इस शिवलिंग पर उस प्रहार का निशान देखा जा सकता है।
शिवलिंग से खून निकलने का रहस्य (खाटू का प्राचीन शिव मंदिर)
खाटू धाम के मुख्य बाजार में बाबा श्याम के मंदिर के पास ही एक अत्यंत प्राचीन शिवालय (गौरीशंकर मंदिर) स्थित है, जिसका इतिहास विक्रम संवत 600 से भी पुराना माना जाता है। स्थानीय लोक-कथाओं के अनुसार, जब मुगल बादशाह औरंगजेब का सेनापति मूर्तजा खान आसपास के क्षेत्रों के हिंदू मंदिरों (जैसे हर्ष पर्वत के शिव मंदिर) को नष्ट करता हुआ खाटू पहुँचा, तो उसने इस प्राचीन शिवालय को भी तोड़ने का प्रयास किया.
मंदिर के पुजारियों के कड़े विरोध के बावजूद, जब क्रूर सेनापति मूर्तजा खान ने अपने भाले से शिवलिंग के शीर्ष भाग पर प्रहार किया, तो वहां से साक्षात खून की धारा प्रवाहित होने लगी। इस भयानक और अलौकिक दृश्य को देखकर मुगल सेनापति और उसके सैनिक बुरी तरह घबरा गए। आज भी खाटू धाम के इस प्राचीन मंदिर में उस समय का खंडित शिवलिंग मौजूद है, जिसके दर्शन के लिए श्याम भक्त विशेष रूप से आते हैं.
औरंगजेब का मूर्ति (बुत) बन जाना: जब पहली सीढ़ी पर थम गए कदम
शिवलिंग से खून बहने की घटना से भयभीत होकर सेनापति ने तुरंत इसकी सूचना औरंगजेब को दी। औरंगजेब स्वयं इस चमत्कार को देखने और मंदिर को ध्वस्त करने के उद्देश्य से सेना लेकर खाटू (तत्कालीन खटवांग नगरी) पहुँचा।
कहा जाता है कि जैसे ही अहंकारी औरंगजेब ने मंदिर की पहली सीढ़ी पर अपना पैर रखा, उसके कदम वहीं जम गए और वह किसी बुत (पत्थर की मूर्ति) की तरह स्थिर हो गया। वह चाहकर भी वहां से एक इंच भी हिल नहीं पा रहा था। लगातार दो दिनों तक एक ही स्थान पर मूर्ति की तरह खड़े रहने के बाद, जब औरंगजेब की अकड़ टूटी, तब मंदिर के मुख्य पुजारी की सलाह पर उसने भगवान शिव से अपनी भूल के लिए क्षमा याचना की। औरंगजेब ने भविष्य में वहां के मंदिरों को नुकसान न पहुँचाने का प्रण लिया, जिसके बाद वह बंधन से मुक्त हुआ और अपनी सेना समेटकर दिल्ली लौट गया।
मुगलों के आक्रमण के समय बाबा श्याम का शीश कहाँ छुपाया गया था?
इतिहासकार पंडित झाबरमल्ल शर्मा की प्रामाणिक पुस्तक ‘खाटू श्यामजी का इतिहास’ के अनुसार, औरंगजेब की सेना के आक्रमण (1679 ईस्वी) के दौरान खाटू के राजा रूप सिंह चौहान द्वारा 1027 ईस्वी में निर्मित मूल मंदिर के बाहरी हिस्से को तोड़ा गया था। लेकिन मुगल सैनिक बाबा के पवित्र विग्रह को छू भी नहीं पाए।
आक्रमण की भनक लगते ही मंदिर के पुजारियों, परम भक्तों और चौहान शासकों के सेवकों ने आक्रमण की भनक लगते ही मंदिर के पुजारियों, परम भक्तों और चौहान शासकों के सेवकों ने मिलकर बाबा श्याम के दिव्य विग्रह (शीश) को गर्भगृह से सुरक्षित निकाल लिया था। इस पावन शीश को मुगलों की नजरों से दूर एक अज्ञात और सुरक्षित गुप्त स्थान (एक परम भक्त के घर या भूमिगत तहखाने) में छुपाकर रखा गया था। इसी सूझबूझ के कारण बाबा का असली विग्रह पूरी तरह सुरक्षित रहा, जिसे बाद में नए मंदिर में स्थापित किया गया। बाबा श्याम के दिव्य विग्रह (शीश) को गर्भगृह से सुरक्षित निकाल लिया था। इस पावन शीश को मुगलों की नजरों से दूर एक अज्ञात और सुरक्षित गुप्त स्थान (एक परम भक्त के घर या भूमिगत तहखाने) में छुपाकर रखा गया था। इसी सूझबूझ के कारण बाबा का असली विग्रह पूरी तरह सुरक्षित रहा, जिसे बाद में नए मंदिर में स्थापित किया गया।
राजा अभय सिंह का सपना और 1720 ईस्वी में मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण
औरंगजेब के आक्रमण के बाद खाटू का मूल मंदिर क्षतिग्रस्त हो गया था और लंबे समय तक बाबा का शीश सुरक्षित स्थान पर ही पूजा जाता रहा। इसके बाद वर्ष 1720 ईस्वी (विक्रम संवत 1777) में एक ऐतिहासिक मोड़ आया।
मारवाड़ (जोधपुर) रियासत के तत्कालीन राजा के निर्देश पर उनके दीवान राजा अभय सिंह को सपने में स्वयं बाबा श्याम ने दर्शन दिए। बाबा ने स्वप्न में उन्हें निर्देश दिया कि उनका पावन शीश कहाँ रखा है और वे उसका पुनरुद्धार करवाएं। बाबा श्याम की दैवीय प्रेरणा से दीवान अभय सिंह ने ठीक उसी पावन भूमि पर मकराना के सफेद संगमरमर और बहुमूल्य पत्थरों का उपयोग करके एक भव्य और विशाल नए मंदिर का निर्माण करवाया। अक्षय तृतीया के शुभ मुहूर्त पर बाबा के उसी चमत्कारी शीश को पूरे विधि-विधान के साथ नए गर्भगृह में पुनर्स्थापित किया गया। वर्तमान में हम जिस खाटू श्याम मंदिर के दर्शन करते हैं, वह दीवान अभय सिंह द्वारा बनवाया गया यही ऐतिहासिक मंदिर है।
खाटू श्याम जी का पुराना इतिहास (मूल कथा) क्या है? (Old history of Khatu Shyam ji)
बाबा श्याम का पुराना इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है। वे महाबली भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक थे। उनके पास तीन अचूक बाण थे, जिससे वे अकेले पूरा युद्ध समाप्त कर सकते थे। भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध का संतुलन बनाए रखने के लिए दान में उनका शीश मांग लिया था। बर्बरीक के इस महान बलिदान से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि कलयुग में वे उनके स्वयं के नाम ‘श्याम’ से पूजे जाएंगे। कलयुग में उनका शीश खाटू धाम की धरती (श्याम कुंड के पास) से प्रकट हुआ था।
पंडित झाबरमल्ल शर्मा की ‘खाटू श्याम इतिहास’ किताब का महत्व क्या है? (Pandit Jhabarmull Sharma Khatu Shyam history book)
इतिहासकार पंडित झाबरमल्ल शर्मा द्वारा लिखित पुस्तक ‘खाटू श्यामजी का इतिहास’ को इस विषय पर सबसे प्रामाणिक और ऐतिहासिक दस्तावेज माना जाता है। इस पुस्तक में उन्होंने विक्रम संवत 1736 (1679 ईस्वी) में हुए औरंगजेब के आक्रमण, स्थानीय राजपूतों के बलिदान और राजा अभय सिंह द्वारा कराए गए मंदिर के पुनर्निर्माण का सिलसिलेवार और तथ्यपरक ब्यौरा दिया है।
औरंगजेब द्वारा तोड़ा गया असली श्याम मंदिर कहाँ है? (Where is original Shyam mandir)
औरंगजेब की सेना द्वारा जिस प्राचीन मंदिर की बाहरी संरचना को क्षतिग्रस्त किया गया था, वह उसी स्थान पर स्थित है जहाँ आज वर्तमान खाटू श्याम मंदिर खड़ा है। मुगलों के आक्रमण के बाद मंदिर जर्जर हो गया था, जिसके बाद वर्ष 1720 ईस्वी में मारवाड़ के दीवान राजा अभय सिंह ने ठीक उसी स्थान पर वर्तमान भव्य मंदिर का जीर्णोद्धार (पुनर्निर्माण) करवाया था।
औरंगजेब ने खाटू श्याम मंदिर पर कब हमला किया था? (When did Aurangzeb attack Khatu Shyam temple)
औरंगजेब की सेना ने वर्ष 1679 ईस्वी (विक्रम संवत 1736) में खाटू स्थित बाबा श्याम के मंदिर पर हमला किया था। इस दौरान मंदिर की रक्षा के लिए स्थानीय वीरों ने मुगलों का कड़ा मुकाबला किया था।
खाटू श्याम जी मंदिर औरंगजेब का इतिहास और 1779 ईस्वी (खाटू श्याम जी का ऐतिहासिक युद्ध)
अक्सर लोग 1679 के मंदिर विध्वंस को खाटू के उस प्रसिद्ध युद्ध से जोड़ देते हैं जिसमें राजपूत वीरों ने मुगलों के छक्के छुड़ाए थे। लेकिन इतिहास में वे दोनों अलग-अलग घटनाएं हैं:
1679 ईस्वी (औरंगजेब का समय): इस दौरान औरंगजेब की शाही सेना बहुत शक्तिशाली थी और उसने अचानक हमला कर मंदिर को नष्ट कर दिया था। इस दौरान कुछ स्थानीय स्तर पर झड़पें या बलिदान जरूर हुए, लेकिन कोई बड़ा संगठित युद्ध दर्ज नहीं है।
1779 ईस्वी (खाटू श्याम जी का ऐतिहासिक युद्ध): मंदिर की रक्षा और शेखावाटी के स्वाभिमान के लिए जो सबसे बड़ा और भीषण महासंग्राम लड़ा गया था, वह औरंगजेब के समय नहीं, बल्कि उसकी मृत्यु के 72 साल बाद जून 1779 ईस्वी (कुछ स्रोतों में 1780) में लड़ा गया था।
गूगल या इंटरनेट पर लोग अक्सर 1679 (जब औरंगजेब ने मंदिर तुड़वाया) और 1779 (जब मुगलों को खाटू के मैदान में राजपूतों ने काट डाला), इन दोनों अलग-अलग ऐतिहासिक घटनाओं को एक ही समझ लेते हैं। इतिहास के नजरिए से औरंगजेब के समय मंदिर क्षतिग्रस्त हुआ था, जबकि मुगलों से सबसे भीषण और विजयी मुकाबला उसके कई दशकों बाद हुआ था।
मूर्तजा खान और खाटू का युद्ध
मूर्तजा खान और खाटू का ऐतिहासिक युद्ध जून 1779 ईस्वी में दिल्ली के मुगल शासक शाह आलम द्वितीय के सेनापति मूर्तजा खान भाडेच और सीकर के राव राजा देवी सिंह के नेतृत्व में शेखावाटी के राजपूतों के बीच लड़ा गया था।
मुगल सेनापति खाटू श्याम मंदिर को नष्ट करने और क्षेत्र को लूटने के इरादे से आया था। इस युद्ध में महंत मंगल दास जी के नागा योद्धाओं और राजपूत वीरों ने मुगलों पर ऐसा भीषण आक्रमण किया कि मुगल सेना तितर-बितर हो गई और सेनापति मूर्तजा खान मारा गया। इस धर्मयुद्ध में करीब 2,000 राजपूत वीरों ने मंदिर के स्वाभिमान के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया और मुगलों को करारी शिकस्त दी।
खाटू श्याम जी और औरंगजेब का इतिहास सनातन धर्म की अटूट आस्था और मुगलों की क्रूरता के टकराव की एक जीवंत दास्तान है। वर्ष 1679 ईस्वी (विक्रम संवत 1736) में जब क्रूर मुगल बादशाह औरंगजेब की सेना ने देश के अन्य प्रसिद्ध मंदिरों की तरह खाटू धाम स्थित बाबा श्याम के प्राचीन मंदिर को भी नष्ट करने का प्रयास किया, तो वहां कई ऐसे दैवीय चमत्कार हुए जिन्होंने मुगलों के हौसले पस्त कर दिए। पुजारियों की सूझबूझ से बाबा का दिव्य शीश सुरक्षित बचा लिया गया, वहीं पास के प्राचीन शिव मंदिर में शिवलिंग पर प्रहार करते ही खून की धारा बह निकली, जिसे देख मुगल सेना खौफ से भर गई।


