पूंछरी लोटा की हुप हुप प्यारे” का असली अर्थ क्या है? जानिए गोवर्धन परिक्रमा के इस सबसे अनोखे जयकारे के पीछे छिपी हनुमान जी और श्री कृष्ण की पौराणिक कथा।
पूंछरी लोटा की हुप हुप प्यारे का अर्थ
ब्रज भाषा और स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार, ‘हुप हुप’ (Hup Hup) वास्तव में बंदरों (वानरों) द्वारा निकाली जाने वाली एक स्वाभाविक आवाज है।
जब हम कहते हैं “पूंछरी लोटा की, हुप हुप प्यारे”, तो इसका अर्थ यह है कि हम उस परम भक्त (लोठा बाबा) को पुकार रहे हैं, जिन्होंने श्री कृष्ण के प्रेम में अपनी सुध-बुध खो दी थी और उनके वियोग में बिना अन्न-जल के वहीं बैठे रहे। कई पौराणिक विद्वान लोठा बाबा को हनुमान जी (वानर राज) का ही एक अंश या स्वरूप मानते हैं, इसीलिए उन्हें प्रसन्न करने के लिए वानर जैसी ‘हुप-हुप’ की ध्वनि निकालकर प्रेम से ‘प्यारे’ कहकर पुकारा जाता है।
पूंछरी लोटा की हुप हुप प्यारे जयकारे का रहस्य
श्री कृष्ण के सखा लोठा जी की प्रतीक्षा : कथा के अनुसार, लोठा जी (जिन्हें मधुमंगल का स्वरूप भी माना जाता है) भगवान श्री कृष्ण के बचपन के परम मित्र और मल्ल (कुश्ती लड़ने वाले) सखा थे। जब श्री कृष्ण ब्रज छोड़कर द्वारका जाने लगे, तो लोठा जी फूट-फूट कर रोने लगे। कन्हाई ने अपने सखा को गले लगाया और कहा—”मित्र, तुम दुखी मत हो। तुम इसी गोवर्धन पर्वत की पूंछ (पूछरी) पर बैठकर मेरा इंतजार करो, मैं जल्द ही वापस आऊंगा।”
जब हनुमान जी परीक्षा लेने पहुंचे : कन्हाई के वचनों को पत्थर की लकीर मानकर लोठा जी वहीं बैठ गए। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक कृष्ण लौटकर नहीं आते, वे अन्न की एक कणी और जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करेंगे। वे वर्षों तक बिना हिले-डुले केवल कृष्ण के ध्यान में बैठे रहे।लोठा जी की इस अडिग भक्ति और कठोर तपस्या को देखकर त्रेता युग के परम रामभक्त हनुमान जी प्रकट हुए। हनुमान जी ने लोठा जी की परीक्षा लेने और उनका ध्यान भटकाने के लिए उनके कान के पास जाकर जोर से बंदरों की तरह “हुप… हुप…” की आवाज निकाली।
हनुमान जी की इस तेज ‘हुप-हुप’ की आवाज से भी लोठा जी का ध्यान नहीं भटका। जब उन्होंने आंखें खोलीं, तो सामने हनुमान जी को पाया। लोठा जी की अनन्य निष्ठा देखकर हनुमान जी अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने लोठा जी को गले लगा लिया। माना जाता है कि हनुमान जी का वह बल और अंश लोठा बाबा की इसी प्रतिमा में समा गया।
यही कारण है कि आज भी जब भक्त यहाँ आते हैं, तो वे हनुमान जी और लोठा बाबा के उस मिलन को याद करते हुए जोर से जयकारा लगाते हैं—”पूछरी के लोटा की… हुप हुप प्यारे!”
परिक्रमा के दौरान पूंछरी लोटा की हुप हुप प्यारे जयकारे का महत्व
ब्रज मंडल की पावन लोक-मान्यताओं के अनुसार, साक्षात भगवान रूप श्री गिरिराज गोवर्धन पर्वत का स्वरूप एक बैठे हुए विशाल बैल (ऋषभ) की भांति दिखाई देता है, जिसका मुख मानसी गंगा की ओर और अंतिम सिरा यानी पूंछ इसी ‘पूछरी’ गांव में समाहित है
पैदल परिक्रमा करते-करते जब श्रद्धालु थककर चूर होने लगते हैं, तब पूछरी धाम की चौखट पर पैर रखते ही फिजाओं में गूंजता यह ऊर्जावान जयकारा जादू सा असर करता है। इसके अलौकिक प्रभाव से:
थकान पलभर में छू मंतर हो जाती है: मीलों पैदल चलने से पैरों में आई सूजन और शरीर की पूरी शारीरिक थकान इस दिव्य उद्घोष को मुख से निकालते ही कपूर की तरह उड़ जाती है।
• सकारात्मक ऊर्जा का महा-संचार होता है: ‘हुप हुप प्यारे’ की गूंज पूरे वातावरण में एक ऐसी दिव्य तरंग और आनंदमयी सकारात्मकता घोल देती है कि थका हुआ भक्त भी फिर से नाचने-झूमने लगता है।
• बाबा लगाते हैं सीधे कन्हाई के दरबार में हाजिरी: ऐसी सुदृढ़ मान्यता है कि वानर रूपी इस अनूठी ध्वनि को सुनते ही लोठा बाबा भाव-विभोर होकर जागृत हो उठते हैं। वे गिरिराज जी की धूलि में लिपटे भक्तों की हाजिरी को सीधे अपने आराध्य, प्राण-प्रिय भगवान श्री कृष्ण के परम दरबार तक पहुंचा देते हैं।
हुप हुप प्यारे’ (Hup Hup Pyare) बोलने के पीछे क्या धार्मिक कारण है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब लोठा बाबा श्री कृष्ण की प्रतीक्षा में तपस्या कर रहे थे, तब हनुमान जी ने उनकी परीक्षा लेने के लिए वानर रूप में आकर उनके कान के पास ‘हुप-हुप’ की ध्वनि निकाली थी। लोठा बाबा की अडिग भक्ति देखकर हनुमान जी इसी स्थान पर उनमें समा गए थे। इसलिए बाबा को प्रसन्न करने के लिए आज भी यह जयकारा लगाया जाता है।
पूछरी का लोठा मंदिर उत्तर प्रदेश में है या राजस्थान में?
भौगोलिक और प्रशासनिक दृष्टि से पूछरी का लोठा मंदिर राजस्थान के डीग जिले (पूर्व में भरतपुर जिला) की सीमा में आता है। हालांकि, सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से यह उत्तर प्रदेश के मथुरा से जुड़े ब्रज क्षेत्र और गोवर्धन परिक्रमा मार्ग का ही एक हिस्सा है।
गोवर्धन परिक्रमा में पूछरी का लोठा पर हाजिरी लगाना क्यों जरूरी है?
भगवान श्री कृष्ण ने अपने सखा लोठा जी को वरदान दिया था कि जो भी भक्त गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा करेगा, उसकी यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाएगी जब तक वह पूछरी में आकर लोठा बाबा के दर्शन (हाजिरी) नहीं कर लेता। इसीलिए यहाँ हाजिरी लगाना अनिवार्य माना जाता है।
पूछरी का लोठा बाबा को मुख्य रूप से क्या भोग और चोला चढ़ाया जाता है?
चूंकि लोठा बाबा में हनुमान जी का अंश माना जाता है, इसलिए उन्हें मुख्य रूप से सिंदूर का चोला चढ़ाया जाता है। इसके अलावा भक्त उन्हें देसी घी, बूंदी के लड्डू, पेड़े और माखन-मिश्री का भोग लगाते हैं।
क्या महिलाएं पूछरी का लोठा बाबा की मूर्ति को स्पर्श कर सकती हैं?
स्थानीय परंपराओं और मंदिर के नियमों के अनुसार, लोठा बाबा को हनुमान जी का ही एक स्वरूप (ब्रह्मचारी रूप) माना जाता है, इसलिए महिलाओं के लिए मुख्य गर्भगृह में मूर्ति को सीधे स्पर्श करने की मनाही है। महिलाएं बाहर से ही बाबा के दर्शन कर सकती हैं।
गोवर्धन के दानघाटी मंदिर से पूछरी का लोठा की दूरी कितनी है?
गोवर्धन के मुख्य दानघाटी मंदिर से परिक्रमा मार्ग के रास्ते पूछरी का लोठा की दूरी लगभग 8 से 9 किलोमीटर है। यह 21 किलोमीटर की गोवर्धन परिक्रमा का लगभग मध्य या मुख्य पड़ाव माना जाता है।
“धन्य धन्य पूछरी को लोटा, अन्न खावे ना पानी पीवे… पूरा दोहा और अर्थ
“धनि-धनि पूंछरी के लौठा, अन्न खाय न पानी पीवै।पड़ो रहे बनके सिलौठा, कृष्ण मिलन के कारन जीवै॥”
(कहीं-कहीं इसे स्थानीय ब्रज लोकभाषा में इस प्रकार भी गाया जाता है: “धन्य धन्य पूंछरी को लोठा, अन्न खाए ना पानी पीवे, पड़ो रहे सिलोटा।”)
धनि-धनि पूंछरी के लौठा: पूछरी गांव में (गोवर्धन पर्वत की पूंछ पर) विराजमान सखा लोठा जी आपकी यह अनन्य भक्ति धन्य है, आपकी प्रतीक्षा और प्रेम महान है!
अन्न खाय न पानी पीवै: द्वापर युग में जब भगवान श्री कृष्ण ब्रज छोड़ कर द्वारका जाने लगे, तो आपने प्रतिज्ञा की थी कि कन्हाई के वापस लौटने तक आप अन्न का एक दाना और जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करेंगे। तब से लेकर आज तक आप बिना कुछ खाए-पिए तपस्या में लीन हैं।
पड़ो रहे बनके सिलौठा: आप बिना अन्न-जल के भी एक भारी पत्थर (सिलौटे/शिला) की भांति मजबूत और अचल होकर इसी पावन भूमि पर लेटे हुए हैं।
कृष्ण मिलन के कारन जीवै: बिना भोजन और पानी के इतने युगों से आपके जीवित रहने का एकमात्र कारण अपने प्राण-प्रिय कन्हाई से दोबारा मिलने की अटूट आस और विश्वास है।
“लोठा बाबा को अन्न और जल का भोग नहीं लगता है, क्योंकि वे श्री कृष्ण के वरदान स्वरूप बिना अन्न-जल के रहते हैं। भक्त उन्हें केवल दूध, दही, माखन और मिश्री का भोग लगाते हैं।”
“पूंछरी को लोटा अन्न खाए ना पानी पीवे लिरिक्स/ अन्न खावे ना पानी पीवे वाला भजन कौन सा है”)
- “धन्य-धन्य पूछरी को लौठा, अन्न खावे ना पानी पीवे।पड़ो रहे बनके सिलौठा, कृष्ण मिलन के कारन जीवे॥
- द्वापर से बैठी आस लगाए, कन्हाई की राह निहारे।पूंछरी लोटा की, हुप-हुप प्यारे! हुप-हुप प्यारे!
- ब्रजवासी सब रो-रो हारे, जब द्वारका चले मुरारी।लोठा को दे गए धीर कन्हाई, तुम पूँछ पे रहियो हमारी॥”
अन्न खावे ना पानी पीवे’ भजन का वास्तविक धार्मिक संदर्भ और महत्व क्या है?
यह प्रसिद्ध भजन गोवर्धन परिक्रमा मार्ग पर स्थित ‘पूछरी का लोठा’ धाम के पौराणिक महत्व को दर्शाता है। द्वापर युग में जब भगवान श्री कृष्ण ब्रज छोड़कर द्वारका जाने लगे, तो उनके परम सखा लोठा जी (मधुमंगल) वियोग में व्याकुल हो गए। कन्हाई ने उन्हें गोवर्धन की पूंछ (पूछरी) पर बैठकर प्रतीक्षा करने को कहा। लोठा जी ने प्रतिज्ञा की कि जब तक कृष्ण लौटकर नहीं आते, वे अन्न की एक कणी और जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करेंगे। यह भजन इसी निश्छल मित्रता, अडिग विश्वास और युगों-युगों से चली आ रही शाश्वत प्रतीक्षा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए गाया जाता है।
पड़ो रहे बनके सिलौठा’ का क्या अर्थ है?
इस भजन की पंक्ति ‘पड़ो रहे बनके सिलौठा, कृष्ण मिलन के कारन जीवे’ का ब्रज भाषा में गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। ‘सिलौठा’ या ‘सिलोटा’ का अर्थ होता है एक अचल, भारी और मजबूत पत्थर (शिला)। बिना अन्न और जल के इतने युगों तक जीवित रहना किसी भी साधारण मानव के लिए असंभव है। परंतु लोठा बाबा अपने प्राणप्रिय श्री कृष्ण से पुनः मिलने की आस में एक अचल शिला की भांति दृढ़ होकर, बिना विचलित हुए इसी पावन भूमि पर लेटे रहे। उनका शरीर पत्थर की तरह अचल हो गया, लेकिन उनके प्राण कृष्ण-प्रेम के सहारे आज भी जागृत हैं।
गोवर्धन परिक्रमा के दौरान ‘हुप हुप प्यारे’ भजन को गाने या सुनने से भक्तों को क्या लाभ मिलता है?
गोवर्धन की 21 किलोमीटर की पैदल परिक्रमा अत्यंत कठिन और थकान भरी होती है। पूछरी गांव इस परिक्रमा का लगभग मध्य या आखिरी पड़ाव माना जाता है, जहाँ पहुँचते-पहुँचते श्रद्धालु पूरी तरह थक जाते हैं। इस मोड़ पर जब लाउडस्पीकरों में यह ऊर्जावान और भावुक भजन गूंजता है, तो ब्रज रस के प्रभाव से भक्तों की पूरी शारीरिक थकान पल भर में गायब हो जाती है। यह भजन वातावरण में एक अद्भुत सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और ऐसी मान्यता है कि इसे सुनकर लोठा बाबा भक्तों की हाजिरी सीधे ठाकुर जी के दरबार में स्वीकार करवाते हैं।


