जानिए खाटू धाम से भी पुराने मूंडरू श्याम मंदिर का इतिहास, ज़मीन के नीचे दबे मंदिर का रहस्य और महाभारत कालीन भीम की कटोरी (खोखली पहाड़ी) का सच।
मूंडरू श्याम मंदिर का इतिहास (Mundru Shyam Mandir History)
मूंडरू धाम का यह अति प्राचीन श्याम मंदिर विक्रम संवत 1656 (करीब सन 1599) का बताया जाता है। स्थानीय लोककथाओं और इतिहास के अनुसार, यहाँ बाबा श्याम की मूर्ति स्वतः प्रकट (स्वयंभू) हुई थी।
खाटू धाम आने वाले कई पुराने भक्त और इतिहासकार मानते हैं कि खाटू में श्याम बाबा के शीश की नियमित पूजा शुरू होने से पहले ही मूंडरू धाम में बाबा के इस स्वरूप की आराधना की जा रही थी। यहाँ की सेवा-पूजा का ज़िम्मा कई पीढ़ियों से एक ही पुजारी परिवार संभाल रहा है
ज़मीन के नीचे छिपा प्राचीन मंदिर: क्या है इसका रहस्य?
मूंडरू धाम की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ का पाताल लोक या ज़मीन के नीचे धंसा हुआ मंदिर है। करीब छह दशक (60 साल) पहले तक किसी को यह अंदाज़ा नहीं था कि वर्तमान मंदिर के ठीक नीचे एक और पूरा का पूरा मंदिर दबा हुआ है।
मंदिर के पुजारियों के अनुसार, करीब 60 साल पहले मंदिर को बड़ा स्वरूप देने के लिए जब नींव खोदी जा रही थी, तब अचानक क्षेत्र में 10 घंटे तक मूसलाधार बारिश हुई। बारिश का सारा पानी उस नींव के गड्ढे के अंदर समा गया।
जब ग्रामीणों और कारीगरों ने पानी सूखने के बाद वहाँ और खुदाई की, तो नीचे एक प्राचीन पक्की दीवार दिखाई दी। पूरी खुदाई होने पर ज़मीन के नीचे से हूबहू बना हुआ एक प्राचीन मंदिर निकल आया। आज भी भक्त इस नीचे वाले मंदिर में जाकर दर्शन करते हैं, जहाँ प्राचीन नक्काशी और पत्थरों का काम देखा जा सकता है। यहाँ एक प्राचीन परिक्रमा मार्ग भी है, जिसे सुरक्षा कारणों से अब बंद कर दिया गया है।
मूंडरू गाँव की रहस्यमयी पहाड़ी: ‘भीम की कटोरी’ या ‘भीम की हांडी’
मूंडरू गाँव के प्रवेश द्वार पर ही एक बेहद विशाल और अजीबोगरीब चट्टान दिखाई देती है, जिसे स्थानीय लोग “भीम की कटोरी” या “भीम की हांडी” कहते हैं। इस पहाड़ी के साथ दो बड़े रहस्य जुड़े हैं:
एक ही पत्थर से बनी खोखली पहाड़ी: वैज्ञानिकों और भूवैज्ञानिकों के लिए यह आज भी शोध का विषय है कि यह पूरी विशाल पहाड़ी एक ही अखंड पत्थर (Single Rock) से बनी है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जब इस पहाड़ी के पत्थर को किसी चीज़ से ठोका या पीटा जाता है, तो इसके अंदर से खोखली आवाज़ (Hollow Sound) आती है।
महाभारत कालीन लोककथा: मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडव इस क्षेत्र में ठहरे थे। तब बलशाली भीम ने यहाँ खीर बनाई थी। जाते समय उन्होंने अपनी कटोरी या हांडी को यहाँ उल्टा रख दिया था, जो कालान्तर में एक विशाल पत्थर की पहाड़ी बन गई। कहा जाता है कि इस हांडी का ढक्कन यहाँ से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर जाकर गिरा था।
पहाड़ी पर स्थित है डूंगरी बालाजी मंदिर मूंडरू गाँव में (Dungari Balaji Dham)
इसी रहस्यमयी पहाड़ी के ठीक ऊपर डूंगरी बालाजी का मंदिर स्थित है। यह मंदिर लगभग 400 साल पुराना है। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहाँ हनुमान जी की प्रतिमा किसी पत्थर की नहीं, बल्कि सात पवित्र नदियों की मिट्टी से मिलाकर बनाई गई थी, जिसे प्राचीन काल में महात्माओं ने अपनी तपस्या के बल पर स्थापित किया था।
इस पहाड़ी पर प्राचीन राजाओं द्वारा सन 1622 ईस्वी में बनाया गया एक सुरक्षा परकोटा (सैन्य चौकी) और बारिश का पानी इकट्ठा करने के लिए एक प्राचीन कुंड भी मौजूद है। साथ ही यहाँ भीम के विशाल पद-चिह्न (पैर के निशान) भी बने हुए हैं।
रींगस या खाटू धाम से मूंडरू श्याम मंदिर कैसे पहुँचें? (How to Reach Mundru)
यदि आप खाटू श्याम जी आ रहे हैं, तो रींगस रेलवे स्टेशन से महज 15-20 किमी दूर स्थित मूंडरू धाम आसानी से पहुँच सकते हैं। इसके लिए रींगस से भैरव जी मोड़ आकर, वहाँ से बस या ई-रिक्शा द्वारा जालपाली (किराया लगभग ₹20) और फिर वहाँ से सीधे ऑटो या टैक्सी लेकर मूंडरू गाँव आ सकते हैं। निजी वाहन से आने वाले लोग गूगल मैप की मदद से सीधे भी पहुँच सकते हैं। यहाँ श्रद्धालुओं के रुकने और खाने के लिए डूंगरी बालाजी मंदिर के पास विश्वकर्मा होटल एंड रेस्टोरेंट जैसी अच्छी सुविधाएं उपलब्ध हैं, जहाँ ₹700 (नॉन-एसी) से ₹1000 (एसी) के बजट में कमरे मिल जाते हैं।
मूंडरू गाँव में मिट्टी से बनी हनुमान जी की प्रतिमा
मिट्टी से बनी हनुमान जी की अनोखी प्रतिमा नीमकाथाना (राजस्थान) के मूंडरू गाँव में ‘भीम की कटोरी’ पहाड़ी पर स्थित 400 साल पुराने डूंगरी बालाजी मंदिर में है। मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में यहाँ के सिद्ध संतों ने अपनी तपस्या के बल पर इस चमत्कारी मूर्ति की स्थापना की थी। इस दिव्य विग्रह को किसी सामान्य पत्थर या धातु के बजाय सात पवित्र नदियों की मिट्टी को मिलाकर विशेष रूप से तैयार किया गया था, जो श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था का केंद्र है।
डूंगरी बालाजी मंदिर मूंडरू का इतिहास
डूंगरी बालाजी मंदिर मूंडरू का इतिहास लगभग 400 वर्ष पुराना है। यह ऐतिहासिक मंदिर राजस्थान के नीमकाथाना जिले के मूंडरू गाँव में एक अखंड और खोखली पहाड़ी ‘भीम की कटोरी’ के ऊपर स्थित है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, यह स्थान सिद्ध संतों की तपोभूमि रहा है, जिन्होंने अपनी दिव्य साधना के बल पर यहाँ बालाजी महाराज की स्थापना की थी। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ स्थापित हनुमान जी की चमत्कारी प्रतिमा है, जिसे किसी पत्थर के बजाय सात पवित्र नदियों की मिट्टी से निर्मित किया गया है, जो आज भी भक्तों के कौतूहल का मुख्य केंद्र है।
मूंडरू श्याम मंदिर ड्रेस कोड
मूंडरू श्याम मंदिर की मर्यादा बनाए रखने के लिए समिति द्वारा सख्त ड्रेस कोड लागू किया गया है। नए नियमों के तहत परिसर में हाफ पैंट, बरमूडा, नाइट सूट, मिनी स्कर्ट, क्रॉप टॉप और कटी-फटी जींस जैसे छोटे कपड़ों पर पूर्ण प्रतिबंध है। मंदिर प्रबंधन ने श्रद्धालुओं से पारंपरिक व शालीन परिधानों में ही आने की अपील की है, जिसके तहत पुरुषों के लिए कुर्ता-पायजामा या फुल पैंट और महिलाओं के लिए साड़ी या सलवार-सूट पहनना ही उचित माना गया है ताकि धाम के आध्यात्मिक माहौल की गरिमा बनी रहे।
मूंडरू श्याम मंदिर दर्शन का समय
मूंडरू श्याम मंदिर (Mundru Shyam Mandir) में दर्शन का समय भक्तों की सुविधा के लिए सुबह से रात तक तय रहता है। सामान्य दिनों में मंदिर के कपाट सुबह 5:30 बजे खुल जाते हैं और रात 10:00 बजे शयन आरती के बाद बंद होते हैं।
दिनभर में यहाँ मुख्य रूप से पाँच आरतियाँ होती हैं, जिनमें सुबह 4:30 बजे मंगला आरती और दोपहर 12:00 बजे राजभोग आरती शामिल है। विशेष अवसरों जैसे हर महीने की एकादशी पर भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए मंदिर के कपाट चौबीसों घंटे (24 घंटे) खुले रहते हैं। मौसम के अनुसार समय में 30-45 मिनट का बदलाव हो सकता है।
मूंडरू धाम का रास्ता और बस टाइमिंग
मूंडरू धाम राजस्थान के नीमकाथाना जिले की श्रीमाधोपुर तहसील में स्थित है, जहाँ पहुँचने के लिए मुख्य केंद्र रींगस जंक्शन है। रींगस रेलवे स्टेशन से मूंडरू की दूरी करीब 15-20 किलोमीटर है, जहाँ से भैरव जी मोड़ और जालपाली होते हुए लोकल ऑटो या ई-रिक्शा (किराया ₹20) से आसानी से पहुँचा जा सकता है; निजी वाहनों के लिए अजीतगढ़ के पास शाहपुरा रोड से सीधा रास्ता है। यातायात के लिए जयपुर (सिंधी कैंप) और सीकर से रींगस के लिए हर 15-30 मिनट में 24 घंटे बसें मिलती हैं, जबकि रींगस से मूंडरू के लिए सुबह 6:00 से रात 8:00 बजे तक हर 20-30 मिनट में लोकल मिनी बसें और जीप चलती हैं। इसके अलावा खाटू मेले और एकादशी पर विशेष बसें भी संचालित की जाती हैं।
रींगस से मूंडरू श्याम मंदिर कैसे जाएं
रींगस से मूंडरू जाने के लिए सबसे सुगम और बेस्ट रास्ता शाहपुरा रोड से होकर जाता है, जिसकी कुल दूरी मात्र 15 से 20 किलोमीटर है। यदि आप बस या ट्रेन से रींगस पहुँचे हैं, तो स्टेशन से ऑटो लेकर 3-4 किमी दूर भैरव जी मोड़ आएं, जहाँ से जालपाली बस स्टैंड के लिए ₹20 किराये में नियमित शेयरिंग ऑटो या ई-रिक्शा मिल जाते हैं; इसके बाद जालपाली से हर 20-30 मिनट में मूंडरू गाँव के लिए सीधी मिनी बसें और टैक्सियाँ उपलब्ध रहती हैं। वहीं निजी वाहन या बुक की गई टैक्सी से जाने वाले श्रद्धालु रींगस से मुख्य शाहपुरा रोड पकड़कर अजीतगढ़ से थोड़ा पहले मूंडरू के लिए कटने वाले सीधे पक्के मार्ग से मात्र 25-30 मिनट में आसानी से धाम पहुँच सकते हैं।
खाटू श्याम जी से मूंडरू की दूरी
खाटू श्याम जी से मूंडरू की कुल दूरी लगभग 30 से 35 किलोमीटर है। यदि आप खाटू धाम से अपनी निजी गाड़ी या टैक्सी द्वारा निकलते हैं, तो रींगस (Reengus) होकर जाने वाले मुख्य मार्ग से आपको मूंडरू पहुँचने में लगभग 45 से 50 मिनट का समय लगता है। यह रास्ता पूरी तरह पक्का और सुगम है, जिसे श्रद्धालु खाटू दर्शन के बाद आसानी से तय कर सकते हैं।
खाटू श्याम जी से मूंडरू जाने के लिए सबसे बेस्ट और सुगम रूट( khatu-shyam-to-mundru-best-route)
खाटू श्याम जी से मूंडरू जाने के लिए सबसे बेस्ट और सुगम रूट रींगस (Reengus) होकर जाता है। इस रूट की कुल दूरी लगभग 32 किलोमीटर है, जिसे निजी वाहन या टैक्सी से तय करने में करीब 45 से 50 मिनट का समय लगता है
खाटू धाम से रींगस: सबसे पहले खाटू श्याम जी मंदिर से लिंक रोड पकड़कर मुख्य हाईवे के ज़रिए रींगस (Reengus) पहुँचें (दूरी लगभग 17 किमी)।
रींगस से भैरव जी मोड़: रींगस पहुँचने के बाद जयपुर-सीकर हाईवे बाईपास पर स्थित भैरव जी के मोड़ की तरफ बढ़ें।
भैरव जी मोड़ से शाहपुरा रोड: यहाँ से आपको मुख्य शाहपुरा-अजीतगढ़ रोड पकड़नी होगी।
अजीतगढ़ से मूंडरू: इस रोड पर आगे बढ़ते हुए अजीतगढ़ से थोड़ा पहले ही मूंडरू गाँव के लिए सीधा पक्का रास्ता कटता है, जहाँ से आप सीधे श्याम मंदिर और डूंगरी बालाजी पहुँच जाएंगे।
खाटू श्याम जी का असली शीश कहाँ मिला था?
मान्यताओं के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद बर्बरीक (बाबा श्याम) का शीश सबसे पहले मूंडरू गाँव (नीमकाथाना) के पास मुंदरी डूंगरी क्षेत्र में प्रकट हुआ था। इसी पावन घटना के कारण इस स्थान का नाम ‘मूंडरू’ (शीश रूपी पत्थर मिलने के कारण) पड़ा। बाद में बाबा श्याम का शीश खाटू धाम के कुण्ड से प्रकट हुआ, जहाँ वर्तमान में मुख्य भव्य मंदिर स्थित है। यही वजह है कि खाटू श्याम जी का इतिहास जानने वाले श्रद्धालु मूंडरू धाम के प्राचीन श्याम मंदिर के दर्शन करने भी ज़रूर आते हैं।
डूंगरी बालाजी मंदिर मूंडरू (नीमकाथाना) के मुख्य चमत्कार और रहस्य
सात पवित्र नदियों की मिट्टी से निर्मित मूर्ति: इस मंदिर का सबसे बड़ा चमत्कार यहाँ स्थापित हनुमान जी की प्रतिमा है। यह विग्रह किसी पत्थर या धातु से नहीं, बल्कि प्राचीन काल के सिद्ध संतों द्वारा अपने तपोबल से सात पवित्र नदियों की मिट्टी मिलाकर तैयार किया गया था, जो आज भी सुरक्षित और चमत्कारी अवस्था में है।
रहस्यमयी खोखली पहाड़ी (भीम की कटोरी): यह मंदिर जिस डूंगरी (पहाड़ी) पर स्थित है, वह एक ही अखंड पत्थर (Single Rock) से बनी है। इस पहाड़ी का चमत्कार यह है कि इसके पत्थर को ठोकने या चोट करने पर अंदर से बिल्कुल खोखली (Hollow) आवाज़ आती है।
ऊँचाई पर स्थित कभी न सूखने वाला प्राकृतिक कुंड: पहाड़ी की ऊँचाई पर स्थित होने के बावजूद यहाँ एक प्राचीन प्राकृतिक कुंड है। इस कुंड का चमत्कार यह है कि भीषण गर्मी में भी इसका पानी कभी नहीं सूखता और यह पूरे साल मुख्य रूप से वर्षा जल से भरा रहता है, जिसे बेहद पवित्र माना जाता है।
भीम के पद-चिह्न और महाभारत कालीन जुड़ाव: स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, अज्ञातवास के दौरान पांडव यहाँ ठहरे थे। पहाड़ी पर आज भी महाबली भीम के विशाल पैरों के निशान (पद-चिह्न) मौजूद हैं, जो भक्तों के लिए गहरी आस्था और कौतूहल का विषय हैं।
खंडेला राजदरबार की सैन्य चौकी मूंडरू का इतिहास
खंडेला राजदरबार की सैन्य चौकी मूंडरू का इतिहास बेहद गौरवशाली और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है। मूंडरू की रहस्यमयी और ऊँची पहाड़ी ‘भीम की कटोरी’ के ऊपर इस सैन्य चौकी और प्राचीन परकोटे (किले की दीवार) के अवशेष आज भी मौजूद हैं।
ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, खंडेला रियासत के राजाओं ने इस पहाड़ी की रणनीतिक स्थिति को देखते हुए यहाँ अपनी मुख्य मिलिट्री पोस्ट स्थापित की थी। इस चौकी की सबसे खास बात यह थी कि यहाँ खंडेला राजदरबार के युवा राजकुमारों को युद्ध कौशल, शस्त्र संचालन और सैन्य नेतृत्व (Military Commander) की कड़ा प्रशिक्षण (Training) दिया जाता था ताकि वे भविष्य के युद्धों के लिए तैयार हो सकें।
मूंडरू के प्राचीन पाताल लोक मंदिर का इतिहास
मूंडरू का प्राचीन पाताल लोक श्याम मंदिर सन 1599 (विक्रम संवत 1656) का है, जो समय के साथ ज़मीन के नीचे दब गया था और करीब 60 साल पहले नींव की खुदाई के दौरान पुनः सामने आया। इस भूमिगत खुदाई में पौराणिक नक्काशीदार दीवारें और एक गुप्त परिक्रमा मार्ग मिला, जहाँ आज भी श्रद्धालु बाबा श्याम के दर्शन करते हैं।
मूंडरू के पास स्थित प्राचीन जैन और शिव मंदिर (Ancient temples near Mundru Sikar)
नीमकाथाना (सीकर) जिले का मूंडरू (Mundru) गाँव अपने 51 छोटे-बड़े मंदिरों के कारण ‘छोटी काशी’ के रूप में विख्यात है। खाटू धाम के पास स्थित इस ऐतिहासिक क्षेत्र में प्राचीन जैन और शिव मंदिरों की समृद्ध विरासत बिखरी हुई है।
मूंडरू के समीप मुंडवारा में प्राचीन जैन मंदिर (Mundwara Jain Temple) स्थित है, जो दिगंबर जैन समाज की गहरी आस्था और प्राचीन शिल्प कौशल का जीवंत उदाहरण है। वहीं, शिव भक्तों के लिए मूंडरू के बिल्कुल पास कोलवा और लिसरिया गाँवों में ऐतिहासिक शिव मंदिर (Ancient Shiva Temples) मौजूद हैं, जहाँ महाशिवरात्रि और सावन के महीने में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। अरावली की पर्वत श्रृंखलाओं से घिरे ये मंदिर धार्मिक शांति के साथ-साथ पर्यटकों को प्राचीन शेखावटी वास्तुकला से भी रू-ब-रू कराते हैं।
मूंडरू श्याम मंदिर का रहस्य और इतिहास पढ़कर आपको कैसा लगा?
कस्बे का नाम ‘मूंडरू’ कैसे पड़ा?
: मूंडरू कस्बे के नामकरण को लेकर दो प्रमुख ऐतिहासिक मत प्रचलित हैं। पहला मत यह मानता है कि यहाँ खाटू श्याम जी (बाबा श्याम) का ‘मूंड’ यानी शीश रूपी पत्थर विद्यमान होने के कारण इसका नाम मूंडरू पड़ा। वहीं दूसरा मत भौगोलिक बनावट पर आधारित है, जिसके अनुसार प्राचीन काल में यह पहाड़ी चारों तरफ से नदी के प्रवाह से घिरी हुई थी और इसका आकार एक अंगूठी यानी ‘मूंदरी’ के समान दिखाई देता था। यही ‘मूंदरी’ शब्द आगे चलकर ‘मूंडरू’ में परिवर्तित हो गया।
मूंडरू कस्बे की चारों दिशाओं में कौन-कौन से प्रमुख मंदिर स्थित हैं और इनका क्या महत्व है?
मूंडरू कस्बे की चारों दिशाओं में सुप्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर स्थित हैं जो धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसके पूर्व दिशा में सीतारामजी का मंदिर, पश्चिम दिशा में डाबर का बालाजी मंदिर, दक्षिण दिशा में कोलवा बालाजी मंदिर और उत्तर दिशा में डूंगरी बालाजी का प्राचीन मंदिर स्थित है। स्थानीय आस्था और मान्यताओं के अनुसार, चारों दिशाओं में मौजूद ये दिव्य मंदिर कस्बे के सुरक्षा प्रहरी के रूप में कार्य करते हैं और हर संकट से मूंडरू की रक्षा करते हैं।
मंडरू श्याम मंदिर का राहु दोष मुक्ति और ज्योतिष (Astrology) से क्या संबंध है?(“Mandru Shyam Mandir Rahu Secret”)
आध्यात्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, खाटू श्याम बाबा और मंडरू के प्राचीन मंदिर में राहु ग्रह की ऊर्जा (Rahu Energy) का वास है । चूंकि राहु को शास्त्रों में केवल ‘शीश’ (सिर) माना गया है और श्याम बाबा का भी यहाँ शीश ही पूजा जाता है, इसलिए जिनकी कुंडली में राहु की स्थिति ठीक नहीं है या जो कर्म बंधनों से मुक्ति चाहते हैं, उनके लिए मंडरू गांव के मंदिर में दर्शन करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है ।
राजस्थान का सबसे प्राचीन श्याम मंदिर कौन सा है और यह कहाँ स्थित है?
आम धारणा के विपरीत, राजस्थान में सीकर के मुख्य खाटूधाम मंदिर से भी अधिक प्राचीन श्याम मंदिर मंडरू गांव में स्थित है । यह मंदिर अति प्राचीन माना जाता है और रींगस से खाटू जाने वाले मार्ग से कुछ किलोमीटर पहले स्थित है
मंडरू गांव के श्याम मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता क्या है?
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ एक ही मंदिर परिसर में बाबा श्याम की दो अलग-अलग जगहों पर स्थापना की गई है । भक्त जब यहाँ दर्शन के लिए जाते हैं, तो उन्हें मुख्य मंदिर के ऊपर (धरातल पर) और मंदिर के बेसमेंट (भूमिगत हिस्से) में, दोनों स्थानों पर श्याम बाबा की अलौकिक प्रतिमा के दर्शन मिलते हैं ।
मंडरू प्राचीन श्याम मंदिर में बाबा को प्रसन्न करने के लिए किस चीज़ का भोग लगाना चाहिए?
: राहु की असीमित ऊर्जा को शांत और तृप्त करने के लिए यहाँ पंचमेवा (सूखे मेवे) का भोग लगाने का विशेष विधान है । पंचमेवे में मुख्य रूप से काजू, किशमिश, बादाम, अखरोट और पिस्ता शामिल होने चाहिए । इसके साथ ही बाबा को एक मोर पंख अर्पित करने से राहु जनित मानसिक कष्टों से तत्काल शांति मिलती है ।
क्या मंडरू श्याम मंदिर में सवामनी या चूरमे का भोग लगाना सही है?
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से, राहु की ऊर्जा इतनी तीव्र होती है कि वह चूरमे या भारी भोजन के भोग से आसानी से तृप्त नहीं होती। इसलिए, यदि आप विशेष रूप से ग्रहों के दोष निवारण या मानसिक शांति के लिए अर्जी लगा रहे हैं, तो चूरमे के स्थान पर पंचमेवे का सात्विक भोग लगाना ही सबसे उत्तम और फलदायी माना गया है । बाकी भगवान तो भाव के भूखे हैं समर्पण और आस्था ही सबसे बड़े मेवे हैं।


