सूर्यवर्चा यक्षराज मंत्र खाटू श्याम और खाटू श्याम बाबा (बर्बरीक) के पिछले जन्म की कहानी जो आपको आर्टिकल पूरा पढ़ने को मजबूर और आह्लादित कर देगी । स्कंद पुराण के कौमारिका खंड में बाबा बर्बरीक के पिछले जन्म की बेहद विस्मयकारी कथा मिलती है। आज के इस लेख में हम जानेंगे खाटू श्याम जी के पिछले जन्म यानी यक्षराज सूर्यवर्चा (Suryavarcha Yaksharaaj) की कहानी और उनके उस गुप्त मंत्र के बारे में, जिसकी खोज आज कई साधक इंटरनेट पर कर रहे हैं।
कौन थे यक्षराज सूर्यवर्चा? (Who was Suryavarcha)
स्कंद पुराण के अनुसार, पूर्वजन्म में बर्बरीक कोई साधारण मनुष्य या राक्षस नहीं, बल्कि देवसभा के एक अत्यंत पराक्रमी और तेजस्वी यक्ष थे, जिनका नाम सूर्यवर्चा था। वे ८४ करोड़ यक्षों के सेनापति और यक्षराज थे। उनका तेज सूर्य के समान देदीप्यमान था
ब्रह्मा जी का श्राप और राक्षस कुल में जन्म का कारण
एक बार जब पृथ्वी पर राक्षसों और मूर दैत्य का अत्याचार बहुत बढ़ गया, तब सभी देवता और ऋषि-मुनि ब्रह्मा जी की अध्यक्षता में भगवान विष्णु के पास सहायता मांगने जा रहे थे।उसी समय देवसभा में मौजूद यक्षराज सूर्यवर्चा ने अहंकार वश अपनी भुजा उठाकर कहा:
“हे देवगण! मूर दैत्य या पृथ्वी के राक्षसों का संहार करने के लिए स्वयं भगवान विष्णु को कष्ट देने की कोई आवश्यकता नहीं है। मैं अकेला ही मनुष्य लोक में अवतार लेकर पृथ्वी का सारा भार हर लूंगा और समस्त दैत्यों का नाश कर दूंगा।”
सूर्यवर्चा के वचनों में झलके इस भयंकर अहंकार को देखकर ब्रह्मा जी अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने सूर्यवर्चा को श्राप देते हुए कहा:
“मूर्ख! पृथ्वी का भार उतारना कोई साधारण कार्य नहीं है। तुमने स्वयं को साक्षात विष्णु के समान समझकर देवसभा का अपमान किया है। इसलिए तुम पृथ्वी पर राक्षस कुल में जन्म लोगे । और जब तुम पृथ्वी का भार उतारने के लिए युद्ध करने जाओगे, तब युद्ध शुरू होने से ठीक पहले स्वयं भगवान श्री कृष्ण (विष्णु जी) तुम्हारा शीश काट देंगे।”
सूर्यवर्चा यक्षराज मंत्र खाटू श्याम (Suryavarcha Yaksharaaj Mantra)
सनातन धर्म के गुप्त तंत्र और प्राचीन संहिताओं में यक्षराज सूर्यवर्चा की साधना और उनके मंत्र का उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि जो भक्त खाटू श्याम जी के इस मूल स्वरूप (सूर्यवर्चा) की आराधना करते हैं, उनके जीवन से दरिद्रता, भय और ग्रहों के दोष (विशेषकर सूर्य दोष) हमेशा के लिए समाप्त हो जाते हैं।
ॐ यक्षराजाय सूर्यवर्चाय नमः”
“स्कंद पुराण के अनुसार स्तुति मंत्र :हे चतुरशीति-कोटी-यक्ष-परिवार-वृत्ताय, लब्धशापाय सूर्यवर्चसे नमः।”(अर्थ: ८४ करोड़ यक्ष परिवारों के स्वामी, ब्रह्मा जी से श्राप प्राप्त करने वाले जाग्रत यक्षराज सूर्यवर्चा को मेरा नमन है)।
सूर्यवर्चा यक्षराज मंत्र खाटू श्याम जाप की सही विधि
दिन: इस मंत्र का जाप रविवार या शुक्ल पक्ष की एकादशी से शुरू करना सबसे उत्तम माना जाता है।दिशा और आसन: सूर्योदय के समय पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या लाल रंग के आसन पर बैठें।सामग्री: खाटू श्याम जी की मूर्ति या चित्र के सामने गाय के घी का दीपक और सुगन्धित इत्र अर्पित करें।संख्या: इस मंत्र की कम से कम १ माला (१०८ बार) जाप रुद्राक्ष या चंदन की माला से करें।
सूर्यवर्चा यक्षराज मंत्र खाटू श्याम के लाभ
अहंकार और मानसिक तनाव से मुक्ति: यह मंत्र साधक के भीतर के छिपे अहंकार को नष्ट कर उसे मानसिक शांति प्रदान करता है।सूर्य ग्रह की मजबूती: यक्षराज सूर्यवर्चा का तेज सूर्य देव के समान है। इस मंत्र के जाप से कुंडली में सूर्य ग्रह मजबूत होता है और समाज में मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा बढ़ती है।शत्रुओं पर विजय: चूँकि सूर्यवर्चा एक महापराक्रमी योद्धा और सेनापति थे, उनके इस मंत्र के प्रभाव से जीवन के गुप्त शत्रुओं और बाधाओं का नाश होता है।बाबा श्याम की विशेष कृपा: खाटू श्याम जी के पिछले जन्म के नाम का स्मरण करने से बाबा अत्यंत प्रसन्न होते हैं और अपने भक्त की हर ‘अर्जी’ स्वीकार करते हैं।
यक्षराज सूर्यवर्चा को ब्रह्मा जी के श्राप का कारण (The Backstory & Curse) स्कंद पुराण के कौमारिका खंड का प्रामाणिक संदर्भ (The Authentic Source)
इस कथा का सबसे पहला और प्रामाणिक उल्लेख सनातनी ग्रंथ ‘स्कंद पुराण’ के कौमारिका खंड (Skanda Purana, Kaumarika Khanda) में मिलता है।वेदव्यास जी द्वारा रचित इस पुराण के अनुसार, जब मूर दैत्य का अत्याचार चरम पर था, तब देवसभा में एक भयंकर घटना घटी। ८४ करोड़ यक्षों के महापराक्रमी सेनापति यक्षराज सूर्यवर्चा ने भगवान विष्णु की शक्ति पर संदेह करते हुए अहंकार में आकर यह मूल श्लोक कहा था:
“न विष्णवे नमस्यामि न च देवान् कदाचन।अहमेकः करिष्यामि मूरं वै लोककंटकम्॥”
इस श्लोक का अर्थ है कि सूर्यवर्चा अकेले ही मूर दैत्य का वध करने का दंभ भर रहे थे। इसी कारण ब्रह्मा जी ने उन्हें तत्काल श्राप दिया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें कलयुग के राजा बनने से पहले द्वापर में घटोत्कच के पुत्र ‘बर्बरीक’ के रूप में जन्म लेना पड़ा
“ॐ यक्षराजाय सूर्यवर्चाय नमः” को सिद्ध कैसे करें?
इस गुप्त मंत्र की साधना शुक्ल पक्ष की एकादशी या किसी भी रविवार से शुरू करना सबसे उत्तम माना जाता है। साधक को प्रातः काल सूर्योदय के समय पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा के आसन पर बैठना चाहिए। सामने खाटू श्याम जी या सूर्य देव का चित्र स्थापित कर तांबे के पात्र से सूर्य देव को जल, अक्षत और लाल चंदन मिलाकर अर्घ्य दें। इसके बाद बाबा श्याम को मोगरे या गुलाब का इत्र अर्पित करें और गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें। मंत्र को सिद्ध व जाग्रत करने के लिए पूर्ण ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार का पालन करते हुए, ११ दिनों तक रोजाना लाल चंदन या रुद्राक्ष की माला से ११ माला (१०८ बार प्रति माला) का जाप करें।
स्कंद पुराण में बर्बरीक का मंत्र क्या लिखा है?
स्कंद पुराण में बर्बरीक (सूर्यवर्चा) की स्तुति और उनके मूल स्वरूप को नमन करने के लिए महर्षि वेदव्यास जी ने इस विशेष मंत्र श्लोक का उल्लेख किया है:”ॐ चतुरशीति-कोटि-यक्ष-परिवृताय, लब्धशापाय सूर्यवर्चसे नमः।”हिंदी अर्थ: ८४ करोड़ यक्षों के सेनापति और परिवार से घिरे रहने वाले, तथा (अहंकार मुक्ति के लिए) ब्रह्मा जी से श्राप प्राप्त करने वाले जाग्रत देव यक्षराज सूर्यवर्चा को मेरा बारंबार प्रणाम है।
सूर्यवर्चा यक्षराज का मूल श्लोक क्या है?
स्कंद पुराण के कौमारिका खंड में जब मूर दैत्य के अत्याचारों से तंग आकर देवसभा भगवान विष्णु की शरण में जाने लगती है, तब यक्षराज सूर्यवर्चा अहंकारवश जो मूल श्लोक कहते हैं, वह इस प्रकार है
“न विष्णवे नमस्यामि न च देवान् कदाचन।अहमेकः करिष्यामि मूरं वै लोककंटकम्॥”
हिंदी अर्थ: “मुझे मूर दैत्य का संहार करने के लिए न तो भगवान विष्णु की आवश्यकता है और न ही अन्य देवताओं की। मैं अकेला ही उस लोक-कंटक (संसार को कष्ट देने वाले) मूर दैत्य का विनाश करने में पूरी तरह समर्थ हूँ।”
यदि बर्बरीक पिछले जन्म में देवता (यक्ष) थे, तो वे महाभारत में कौरवों की तरफ से क्यों लड़ना चाहते थे?
बर्बरीक किसी दुर्भावना या अधर्म के कारण कौरवों की तरफ से नहीं लड़ रहे थे। दरअसल, उनकी माता अहिलवती (मोर्वी) ने उन्हें संस्कार दिया था कि जो पक्ष युद्ध में ‘हार रहा हो, हमेशा उसका सहारा बनना’। युद्ध की शुरुआत में कौरवों की सेना कमजोर पड़ने लगी थी, इसलिए अपने माता के वचन को निभाने के लिए वे कौरवों (हारने वाले पक्ष) की ओर से युद्ध में उतरने वाले थे।
घटोत्कच के पुत्र होने के कारण क्या बर्बरीक में राक्षसी प्रवृत्तियां थीं
बिलकुल नहीं। भले ही बर्बरीक का जन्म राक्षस कुल (भीम के पुत्र घटोत्कच के घर) में हुआ था, लेकिन उनके संस्कार पूरी तरह से दैवीय और सात्विक थे। उन्होंने बचपन से ही वेदों का अध्ययन किया था, अपनी माता से धर्म की शिक्षा ली थी और वे भगवान शिव के परम भक्त थे। उनका यह जन्म केवल ब्रह्मा जी के श्राप को पूरा करने और उनके पिछले जन्म के अहंकार को शुद्ध करने के लिए हुआ था।
यक्षराज सूर्यवर्चा का तेज किस देव के समान माना जाता है और इसके ज्योतिषीय लाभ क्या हैं?
स्कंद पुराण के अनुसार, यक्षराज सूर्यवर्चा का तेज साक्षात सूर्य देव के समान देदीप्यमान (चमकदार) था। यही कारण है कि ज्योतिष शास्त्र में माना जाता है कि खाटू श्याम जी के इस पूर्वजन्म के स्वरूप का ध्यान करने या उनके मंत्र का जाप करने से कुंडली का सूर्य ग्रह बेहद मजबूत होता है, जिससे व्यक्ति को समाज में मान-सम्मान, यश और सरकारी कार्यों में सफलता मिलती है।
सूर्यवर्चा यक्षराज मंत्र खाटू श्याम: जानिए बाबा बर्बरीक के पिछले जन्म का रहस्य और चमत्कारी मंत्र पर लिखा यह आर्टिकल आपको कैसा लगा? खाटू श्याम बाबा की जय।


