“जानिए महाभारत में भीष्म पितामह और बर्बरीक का रिश्ता क्या था? क्यों बर्बरीक के 3 बाण देखकर काँप उठे थे पितामह भीष्म? इस अद्भुत और गुप्त संवाद की पूरी कहानी यहाँ पढ़ें।”
भीष्म पितामह और बर्बरीक का रिश्ता क्या था
भीष्म पितामह और बर्बरीक का रिश्ता परदादा और परपोते (Grandfather and Great-grandson) का था। महाभारत के अनुसार, बर्बरीक भीम के पुत्र घटोत्कच और नागकन्या अहिलावती के बेटे थे। भीष्म, पांडवों के दादा (पितामह) थे, इसलिए वे रिश्ते में बर्बरीक के परदादा लगे।
कुरुक्षेत्र के मैदान में जब दोनों का सामना हुआ, तब भीष्म ने बर्बरीक को कुरुवंश के महान और शक्तिशाली योद्धा के रूप में सहर्ष स्वीकार किया। उनके बीच गहरा आदर और प्रेम का भाव था। हालाँकि, बर्बरीक की ‘हारे का सहारा’ बनने की प्रतिज्ञा के कारण भीष्म समझ गए थे कि यह रिश्ता अंततः युद्ध में एक भीषण धर्मसंकट पैदा कर देगा।
बर्बरीक ने भीष्म पितामह से क्या कहा था
जब बर्बरीक कुरुक्षेत्र युद्ध में आए, तो उन्होंने भीष्म पितामह से अपनी माँ को दिए गए वचन का जिक्र किया कि वह केवल हारने वाले पक्ष की ओर से ही लड़ेंगे। बर्बरीक ने अपने तीन अचूक बाणों का परिचय देते हुए यह भी कहा कि वे अपनी असीम शक्ति से पूरे युद्ध को चंद मिनटों में खत्म कर सकते हैं।
बर्बरीक के तीन बाण देखकर भीष्म क्यों डर गए ?
भीष्म पितामह बर्बरीक के बाणों से निजी तौर पर भयभीत नहीं थे, बल्कि वे युद्ध के भयानक परिणाम और धर्मसंकट को देखकर चिंतित थे। बर्बरीक के पास कामाख्या देवी के दिए तीन अचूक बाण थे, जिनमें से पहला दुश्मनों को चिन्हित करता था, दूसरा अपनों को सुरक्षित रखता था, और तीसरा पलक झपकते ही सबका खात्मा कर देता था। यह देखकर भीष्म समझ गए कि ये बाण पूरी सृष्टि का विनाश कर सकते हैं।
इसके साथ ही, बर्बरीक की अपनी माँ को दी गई “हारे का सहारा” बनने की प्रतिज्ञा ने संकट को और बढ़ा दिया था। भीष्म ने तुरंत हिसाब लगाया कि यदि बर्बरीक हारते हुए कौरवों की मदद करते, तो पांडव कमजोर होने लगते। फिर अपनी प्रतिज्ञा के कारण बर्बरीक को पाला बदलकर पांडवों की तरफ से लड़ना पड़ता और कौरवों को मारना पड़ता। इस प्रतिज्ञा के चक्रव्यूह के कारण अंत में केवल बर्बरीक अकेले बचते और महाभारत की दोनों विशाल सेनाओं का पूरी तरह सफाया हो जाता। रणभूमि में न्याय और धर्म की रक्षा के बजाय केवल सर्वनाश को सामने देखकर पितामह भीष्म अत्यंत भयभीत हो गए थे।
बर्बरीक और भीष्म संवाद महाभारत
- भीष्म पितामह: (गंभीरता से) “कुरुक्षेत्र की रणभूमि में स्वागत है, वीर बर्बरीक। तुम्हारी प्रतिज्ञा तो अद्भुत है, पर क्या तुम अकेले ही युद्ध का रुख बदल सकते हो?”बर्बरीक: “पितामह, माँ के आशीर्वाद से मिले ये तीन बाण ही मुझे अपराजेय बनाते हैं। एक बाण से ही मैं युद्ध का परिणाम बदल सकता हूँ।”भीष्म पितामह: “यही तो धर्मसंकट है, पुत्र। ‘हारे का सहारा’ बनने के चक्कर में, तुम दोनों तरफ की सेनाओं का अंत कर दोगे। ऐसे में, यह धर्मयुद्ध नहीं, विनाश का कारण बनेगा।”बर्बरीक: “तो पितामह, मैं अपनी प्रतिज्ञा कैसे निभाऊँ?”भीष्म पितामह: “इस विकट स्थिति का समाधान केवल श्रीकृष्ण ही निकाल सकते हैं, जो इस युद्ध के नियंता हैं।”
बर्बरीक की कहानी महाभारत
महाभारत में बर्बरीक की कहानी महाबलिदान और असीम शक्ति का प्रतीक है। बर्बरीक महाबली भीम के प्रपौत्र और घटोत्कच के पुत्र थे। उन्होंने कामाख्या देवी की तपस्या करके तीन ऐसे अचूक बाण प्राप्त किए थे, जो पूरी सृष्टि का विनाश कर सकते थे। कुरुक्षेत्र युद्ध की शुरुआत में उन्होंने अपनी माता को वचन दिया कि वे हमेशा “हारे का सहारा” बनेंगे, यानी जो पक्ष हार रहा होगा, वे उसकी ओर से लड़ेंगे।
भगवान श्रीकृष्ण बर्बरीक की इस प्रतिज्ञा के रणनीतिक खतरे को भांप गए। वे जानते थे कि इस वचन के कारण बर्बरीक अंततः दोनों पक्षों की सेनाओं का सर्वनाश कर देंगे। इसलिए, श्रीकृष्ण ने एक ब्राह्मण का रूप धारण कर बर्बरीक से उनका शीश दान में मांग लिया। बर्बरीक ने सहर्ष अपना शीश काट कर दान कर दिया। श्रीकृष्ण ने उनके शीश को एक ऊंचे पर्वत पर स्थापित कर दिया, जहाँ से उन्होंने पूरा महाभारत युद्ध देखा।
बी.आर. चोपड़ा की ‘महाभारत’ में बर्बरीक और भीष्म का संवाद
बी आर. चोपड़ा की ऐतिहासिक ‘महाभारत’ सीरियल में डॉ. राही मासूम रज़ा द्वारा लिखे गए संवादों में पितामह भीष्म और वीर बर्बरीक का संवाद बेहद भावुक, नीतिगत और दार्शनिक है। इस दृश्य में जब बर्बरीक (अभिनेता प्रेमचंद शर्मा) युद्ध से पहले पितामह भीष्म के शिविर में आशीर्वाद लेने पहुँचते हैं, तो दोनों के बीच यह संवाद होता है
- भीष्म: बर्बरीक के तेज से उन्हें पहचानते हुए उनका स्वागत करते हैं और आशीर्वाद देते हैं, यह कहते हुए कि उनकी ख्याति पहले ही उन तक पहुँच चुकी है।
- बर्बरीक: वे कहते हैं कि वे पितामह के विरुद्ध युद्ध नहीं करना चाहते, इसलिए वे युद्ध में उनके सामने नहीं आना चाहते।
- भीष्म: वे बताते हैं कि युद्ध अब उनकी व्यक्तिगत इच्छा से ऊपर है और सेनापति के रूप में उनका धर्म है।
- बर्बरीक: वे माँ जगदम्बा के वरदान स्वरूप अपने तीन अजेय बाणों का उल्लेख करते हैं।
- भीष्म: वे अपने ‘इच्छा मृत्यु’ के वरदान का उल्लेख करते हुए स्वयं को अपराजित बताते हैं।
निष्कर्ष: अंत में, भीष्म बर्बरीक को अपना निर्णय पूरा करने के लिए कहते हैं और उन्हें नियति को स्वीकार करने का परामर्श देते हैं।
बर्बरीक का रोल महाभारत में
बर्बरीक के पास तीन अमोघ बाण थे, जिनसे वे कुछ ही क्षणों में पूरे युद्ध का अंत कर सकते थे। उन्होंने अपनी माता को वचन दिया था कि वे हमेशा हारने वाले पक्ष का साथ देंगे। श्रीकृष्ण ने उनकी शक्ति की परीक्षा ली और समझा कि यह वचन धर्म के संतुलन को बिगाड़ सकता है। इसलिए धर्म की रक्षा के लिए बर्बरीक ने अपना शीश दान कर दिया। उनका शीश ऊँचे स्थान पर स्थापित किया गया, जहाँ से उन्होंने पूरा महाभारत युद्ध देखा। युद्ध के बाद उन्होंने विजय का श्रेय श्रीकृष्ण की रणनीति और सुदर्शन चक्र को दिया। श्रीकृष्ण के वरदान से वे कलयुग में खाटू श्याम जी के रूप में पूजे जाने लगे।
Who played Barbarik in Mahabharat(महाभारत में बर्बरीक का रोल किसने निभाया)
बी.आर. चोपड़ा की महाभारत (1988) में बर्बरीक का किरदार अभिनेता प्रेमचंद शर्मा ने प्रभावशाली ढंग से निभाया। उनके अभिनय में वीरता, विनम्रता और श्रीकृष्ण के प्रति अटूट भक्ति साफ दिखाई देती है।
धारावाहिक का सबसे यादगार दृश्य पीपल के पत्तों की परीक्षा और बर्बरीक का शीश दान है। इन दृश्यों ने दर्शकों को भावुक कर दिया और बर्बरीक के त्याग को अमर बना दिया।
युद्ध के अंत में बर्बरीक का शीश पांडवों का भ्रम दूर करता है और बताता है कि विजय का वास्तविक श्रेय श्रीकृष्ण की दिव्य लीला और रणनीति को था। बाद में महाभारत कथा में भी बर्बरीक की कहानी को और विस्तार से प्रस्तुत किया गया।



