जानें मां भादरिया राय मंदिर का इतिहास (Maa Bhadariya Rai Mandir History)! यहाँ स्थित है 9 लाख किताबों वाली एशिया की सबसे बड़ी अंडरग्राउंड लाइब्रेरी और विशाल गौशाला।
पौराणिक पृष्ठभूमि और मां भादरिया राय मंदिर के नामकरण का इतिहास
मां भादरिया राय मंदिर का इतिहास लगभग 1100 वर्ष से भी अधिक प्राचीन माना जाता है। यहाँ स्थापित मुख्य देवी मां भादरिया राय (Maa Bhadariya Rai) हैं, जिन्हें आवड़ माता (Awad Mata) का ही साक्षात रूप माना जाता है।
आवड़ माता का अवतार (Incarnation of Awad Mata): लोक मान्यताओं के अनुसार, विक्रम संवत 808 में हिंगलाज शक्तिपीठ (Hinglaj Shaktipeeth) की असीम कृपा से मामड़िया जी चारण के घर सात दिव्य कन्याओं ने जन्म लिया। इन सातों बहनों में आवड़ माता सबसे चमत्कारी और प्रमुख थीं। आवड़ माता को जैसलमेर के शाही भाटी राजवंश की कुलदेवी (Clan Goddess of Bhati Dynasty) “स्वांगिया माता” के रूप में पूजा जाता है।
भादरिया राय’ नाम की उत्पत्ति (Origin of the name ‘Bhadariya Rai’): इतिहास के अनुसार, इस निर्जन रेगिस्तानी इलाके में राव तणु के छोटे भाई और माता के परम भक्त बहादुरा भाटी (Bhadura Bhati) रहते थे। उन्होंने इसी स्थान पर मातेश्वरी की निश्छल भाव से कठिन तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने इसी टीले पर अपने चरण टिकाए। भक्त बहादुरा के नाम के कारण ही इस पूरे क्षेत्र को ‘भादरिया’ कहा जाने लगा और स्वयं माता यहाँ ‘भादरिया राय’ के नाम से प्रतिष्ठित हुईं।
गर्भगृह की दिव्य मूर्तियां (Divine Idols in the Sanctum Sanctorum): मंदिर के मुख्य गर्भगृह (Sanctum Sanctorum) में एक ही काले पत्थर (Black Stone) पर आवड़ माता सहित उनकी सातों बहनों और भाई (महिरक्खा) की अत्यंत प्राचीन और मनमोहक आकृतियां उत्कीर्ण हैं, जिनके दर्शन मात्र से मन को शांति मिलती है।
मां भादरिया राय मंदिर का निर्माण और वास्तुकला
स्थापत्य कला (Architectural Style) के दृष्टिकोण से मां भादरिया राय जी का यह मंदिर मरुस्थलीय वास्तुकला का एक बेजोड़ नमूना है।
राजवंशों का योगदान (Contribution of Royal Dynasties): प्राचीन समय में यहाँ माता का एक छोटा सा थान (Shrine) हुआ करता था। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, जैसलमेर के महारावल देवराज (Maharawal Devraj) ने सबसे पहले यहाँ एक पक्के मंदिर की नींव रखी थी।
भव्य नवनिर्माण (Grand Reconstruction): इसके बाद, विक्रम संवत 1888 (वर्ष 1831 ईस्वी) में जैसलमेर के प्रतापी राजा महारावल गज सिंह (Maharawal Gaj Singh) ने इस मंदिर का भव्य पुनरुद्धार और विस्तार करवाया। उनके बाद महारावल जवाहर सिंह ने भी मंदिर परिसर के विकास में अहम भूमिका निभाई।
नागर शैली की विशिष्ट बनावट (Unique Features of Nagara Style): यह मंदिर एक ऊंचे रेतीले टीले (Sand Dune) पर स्थित है। इसे पारंपरिक नागर शैली में बनाया गया है, लेकिन थार मरुस्थल की तेज आंधियों और हवा के दबाव को देखते हुए इस मंदिर में अन्य पारंपरिक मंदिरों की तरह बहुत ऊंचा मुख्य शिखर (Tall Spire/Shikhara) नहीं बनाया गया है, जो इसकी बनावट को बेहद विशिष्ट और अनूठा रूप देता है।
आधुनिक युग और संत हरवंश सिंह निर्मल का संकल्प (Modern Era and Vision of Sant Harvansh Singh Nirmal)
मां भादरिया राय मंदिर को वर्तमान वैश्विक पहचान और प्रसिद्धि दिलाने का पूरा श्रेय संत हरवंश सिंह निर्मल (Sant Harvansh Singh Nirmal) को जाता है, जिन्हें श्रद्धालु आदरपूर्वक ‘भादरिया महाराज’ (Bhadariya Maharaj) कहते हैं।
1960 में आगमन और तपस्या (Arrival and Penance in 1960): मूल रूप से पंजाब के रहने वाले बाबा हरवंश सिंह जी वर्ष 1960 में इस मरुस्थलीय पावन भूमि पर आए थे। उन्होंने मंदिर परिसर के पास बनी एक प्राचीन गुफा (Ancient Cave) में रहकर वर्षों तक घोर तपस्या की।
ज्ञान और जीव-दया का संदेश (Message of Knowledge and Compassion): भादरिया महाराज का दृढ़ विश्वास था कि केवल पूजा-पाठ ही काफी नहीं है, बल्कि समाज के उत्थान के लिए शिक्षा (Education) और जीव-सेवा (Service to Animals) अत्यंत आवश्यक है। इसी महान सोच के साथ उन्होंने यहाँ एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत लाइब्रेरी (Underground Library) और एक विशाल गौशाला (Gaushala) की स्थापना की।
थार की सबसे बड़ी भादरिया गौशाला (Thar’s Largest Bhadariya Gaushala)
भादरिया महाराज के जीव-दया के संकल्प के कारण आज यहाँ भारत की सबसे व्यवस्थित और विशाल गौशालाओं (Largest Cowsheds) में से एक संचालित हो रही है।
50,000 से अधिक गोवंश की सेवा (Service to over 50,000 Cattle): इस गौशाला में वर्तमान में 50,000 से अधिक गायों (विशेषकर लावारिस, वृद्ध, अंधी और बीमार गायों) की देखरेख पूरी तरह निस्वार्थ भाव से की जाती है।
आधुनिक चिकित्सा और बुनियादी ढांचा (Modern Medical and Infrastructure): गायों के विचरण के लिए यहाँ हजारों एकड़ विशाल चारागाह (Pasture Lands) हैं। बीमार गायों के इलाज के लिए आधुनिक पशु अस्पताल (Cattle Hospital) और चारे को सुरक्षित रखने के लिए एशिया के सबसे बड़े गोदाम बनाए गए हैं।
मां भादरिया राय मंदिर दर्शन और आरती का सही समय
मुख्य मंदिर के पट खुलने का समय: सुबह 6:00 बजे से रात 8:30 बजे तक (यह समय पूरे दिन दर्शन के लिए खुला रहता है)।
सुबह की मंगल आरती (विशेष आरती): सुबह 5:00 बजे होती है। इस आरती में शामिल होने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु भोर में ही मंदिर प्रांगण पहुँच जाते हैं।
शाम की आरती: सूर्यास्त के समय (मौसम के अनुसार शाम 6:30 से 7:15 के बीच) भव्य संध्या आरती की जाती है।
“क्या भादरिया राय मंदिर में धर्मशाला है?”
जी हाँ, माँ भादरिया राय मंदिर परिसर में यात्रियों के ठहरने के लिए बहुत बड़ी और सुसज्जित धर्मशाला उपलब्ध है। यहाँ मंदिर ट्रस्ट द्वारा श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सभी जरूरी इंतज़ाम किए गए हैं।
कमरों के विकल्प: यहाँ आपको बहुत ही कम और रियायती दरों पर साधारण (Non-AC) कमरे, एसी (AC) कमरे और बड़े परिवारों/ग्रुप के लिए बड़े हॉल (Dormitories) मिल जाते हैं।साफ-सफाई: मरुस्थल के बीच होने के बावजूद यहाँ साफ-सफाई और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है।बुकिंग प्रक्रिया: कमरों की बुकिंग मुख्य रूप से मंदिर पहुँचने पर (On-Arrival) काउंटर से ही “पहले आओ, पहले पाओ” के आधार पर होती है। सामान्य दिनों में कमरे आसानी से मिल जाते हैं, लेकिन नवरात्रि या मेलों के दौरान भारी भीड़ रहती है।
मां भादरिया राय मंदिर ट्रस्ट संपर्क सूत्र (Contact Information)
यदि आप अपनी यात्रा से पहले कमरे की उपलब्धता या ट्रस्ट की अन्य सेवाओं के बारे में जानकारी चाहते हैं, तो श्री भादराराय जी मंदिर ट्रस्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर दिए गए नंबरों +91-7976359673 या +91-9414150002 पर संपर्क कर सकते हैं।
भादरिया राय माता किसकी कुलदेवी है?
भादरिया राय माता भाटी राजवंश (Bhati Dynasty) की कुलदेवी हैं।
स्वांगिया जी का स्वरूप: भादरिया राय माता को माँ दुर्गा के अवतार श्री आवड़ माता (श्री स्वांगिया जी) का ही रूप माना जाता है।
‘स्वांगिया’ नाम का कारण: ऐसी मान्यता है कि माता जी ने भाटी वंश के राजाओं और प्रजा की रक्षा के लिए एक मुड़ा हुआ ‘स्वांग’ (एक प्रकार का भाला/शस्त्र) धारण किया था। इसी कारण इन्हें स्वांगिया माता कहा जाता है।
जैसलमेर का राजचिह्न: जैसलमेर रियासत के राजचिह्न (Royal Emblem) में भी इस मुड़े हुए भाले (स्वांग) और कुलदेवी का प्रतीक चिह्न स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
लोक मान्यता: भाटी शासकों और उनके वंशज आज भी किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत या संकट के समय अपनी कुलदेवी भादरिया राय माता (स्वांगिया जी) की ही आराधना करते हैं।
हिंगलाज माता का अवतार और 7 बहनें
कथा की शुरुआत: प्राचीन काल में मरुभूमि (जैसलमेर क्षेत्र) में ‘मामड़िया जी’ (ममराज जी) नाम के एक चारण भक्त रहते थे। उनकी कोई संतान नहीं थी।
कठिन तपस्या: संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित प्रसिद्ध हिंगलाज शक्तिपीठ की सात बार पैदल यात्रा की और कठिन तपस्या की।
देवी का वरदान: उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर साक्षात हिंगलाज माता ने उनके घर पुत्री रूप में जन्म लेने का वरदान दिया।
7 कन्याओं का जन्म: समय आने पर मामड़िया जी के घर सात दिव्य कन्याओं और एक पुत्र ने जन्म लिया। इन सातों बहनों में सबसे बड़ी और चमत्कारी आवड़ माता थीं। इन्हीं बहनों को राजस्थान में ‘सप्त मातृका’ के रूप में पूजा जाता है।
आवड़ माता के समुद्र का पानी सोखने की कथा (थार मरुस्थल का निर्माण)
भूख का संकट: एक बार जैसलमेर और सिंध के क्षेत्र में भयंकर अकाल पड़ा। जीव-जंतु और इंसान भूख-प्यास से मरने लगे।
समुद्र देवता का अहंकार: लोककथा के अनुसार, जब आवड़ माता ने समुद्र देव से इस सूखे क्षेत्र को पानी देने की प्रार्थना की, तो समुद्र देव ने अपने अहंकार में माता की बात नहीं मानी।
तीन घूंट में समुद्र ख़ाली: क्रोधित होकर आवड़ माता ने अपनी दिव्य शक्ति से पूरे समुद्र के पानी को अपनी हथेली पर लिया और मात्र तीन घूंट में पी गईं।
भूभाग का बदलना: माना जाता है कि इसी घटना के बाद वह पूरा क्षेत्र पानी से विहीन हो गया और आज का ‘थार का मरुस्थल’ (Thar Desert) बना। बाद में समुद्र देव ने क्षमा मांगी, तो माता ने उन्हें वरदान दिया कि भविष्य में इस मरुभूमि के नीचे पानी के अटूट स्रोत (जैसे लाठी सीरीज का मीठा पानी) हमेशा मौजूद रहेंगे।
जैसलमेर से भादरिया राय मंदिर:
जैसलमेर से भादरिया राय मंदिर: राष्ट्रीय राजमार्ग 11 (NH-11) के रास्ते लगभग 86 किलोमीटर। गाड़ी से जाने में 1 घंटा 20 मिनट का समय लगता है।
पोकरण से भादरिया राय मंदिर
पोकरण से भादरिया राय मंदिर: NH-11 के रास्ते यह दूरी लगभग 34 किलोमीटर है। गाड़ी से यहाँ पहुँचने में सिर्फ 30 से 35 मिनट लगते हैं।
रामदेवरा से भादरिया राय मंदिर
रामदेवरा से भादरिया राय मंदिर: प्रसिद्ध बाबा रामदेव जी के मंदिर (रामदेवरा) से भादरिया राय की दूरी लगभग 46 किलोमीटर है। यहाँ पहुँचने में करीब 45 से 50 मिनट का समय लगता है।
जैसलमेर, मा भादरिया राय और रामदेवरा की यात्रा एक साथ कैसे करें?
- जैसलमेर ➔ (86 किमी) ➔ भादरिया राय मंदिर ➔ (34 किमी) ➔ पोकरण ➔ (12 किमी) ➔ रामदेवरा
स्टेप 1: सुबह जैसलमेर से जल्दी निकलकर सबसे पहले भादरिया राय माताजी के दर्शन करें और वहां की प्रसिद्ध अंडरग्राउंड लाइब्रेरी देखें।
स्टेप 2: दोपहर में भादरिया से आगे बढ़कर पोकरण पहुँचें, जहाँ आप पोकरण का ऐतिहासिक किला देख सकते हैं और दोपहर का भोजन कर सकते हैं।
स्टेप 3: पोकरण से मात्र 12 किलोमीटर दूर रामदेवरा पहुँचकर बाबा रामदेव जी की समाधि के दर्शन करें और शाम की आरती में शामिल हों।
मां भादरिया राय मंदिर कहाँ स्थित है?
यह प्रसिद्ध मंदिर राजस्थान के जैसलमेर जिले के पोकरण तहसील में भादरिया गाँव में स्थित है। यह जोधपुर-जैसलमेर हाईवे से करीब 10 किलोमीटर अंदर है।
मां भादरिया राय किसकी अवतार मानी जाती हैं?
मां भादरिया राय को देवी हिंगलाज का अवतार और मां आवड़ (स्वांगिया माता) का स्वरूप माना जाता है। वह जैसलमेर के भाटी राजवंश की कुलदेवी भी हैं।
मां भादरिया राय मंदिर मंदिर का मुख्य आकर्षण क्या है?
मंदिर की गहरी धार्मिक मान्यता के साथ-साथ यहाँ स्थित एशिया का सबसे बड़ा भूमिगत पुस्तकालय (Underground Library) और यहाँ की विशाल गौशाला मुख्य आकर्षण हैं।
भादरिया राय मंदिर के नीचे जो लाइब्रेरी है, उसमें कितनी किताबें हैं?
इस अनोखी भूमिगत लाइब्रेरी में 9 लाख से अधिक पुस्तकों का विशाल संग्रह है। यहाँ विभिन्न भाषाओं में धर्म, इतिहास, विज्ञान, आयुर्वेद और खगोल विज्ञान से जुड़े प्राचीन ग्रंथ सुरक्षित रखे गए हैं।
भादरिया माता मंदिर की भूमिगत लाइब्रेरी किसने बनवाई थी?
इस पुस्तकालय का निर्माण संत श्री हरवंश सिंह निर्मल (जिन्हें भादरिया महाराज के नाम से जाना जाता है) की प्रेरणा से किया गया था। उन्होंने ज्ञान को सबसे बड़ा भगवान मानकर दशकों तक इन किताबों को इकट्ठा किया।
क्या आम पर्यटक या छात्र भादरिया लाइब्रेरी की किताबें पढ़ सकते हैं?
हाँ, जैसलमेर के भदरिया गांव में स्थित भादरिया पुस्तकालय (एशिया का सबसे बड़ा भूमिगत पुस्तकालय) में कोई भी आम पाठक जाकर किताबें पढ़ सकता है। यह पुस्तकालय सभी शोधार्थियों, विद्यार्थियों और पुस्तक प्रेमियों के लिए पूरी तरह खुला है।
मां भादरिया राय मंदिर लाइब्रेरी जमीन से कितनी गहराई पर बनी है और क्यों?
यह लाइब्रेरी जमीन से करीब 16 फीट नीचे बनी हुई है। थार मरुस्थल की भीषण गर्मी (जो 48°C से ऊपर चली जाती है) में भी जमीन के नीचे होने के कारण यहाँ का तापमान प्राकृतिक रूप से बेहद ठंडा और अनुकूल रहता है।
मां भादरिया राय मंदिर में रुकने और भोजन की क्या व्यवस्था है?
हाँ, मंदिर ट्रस्ट द्वारा श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए धर्मशाला/गेस्ट हाउस और भोजन के लिए निःशुल्क प्रसादी (लंगर) की उत्तम व्यवस्था की जाती है
मां भादरिया राय मंदिर पर लिखा यह आर्टिकल आपको कैसा लगा?


